सोमवार, 14 मार्च 2016

धीरज श्रीवास्तव का गीत- "ढूंढ रहा उल्लास"

मौत कहाँ तू छिपकर बैठी
आ जा मेरे पास!
इधर जिन्दगी दगा दे रही
बस है तेरी आस!
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जितने भी थे सच्चे साथी
धीरे धीरे बिछड़ गये!
हम इस जग के स्वार्थ दौड़ मेँ
धीरे धीरे पिछड़ गये!
धूप जेठ की तन झुलसाती
गुजर गया मधुमास!
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अब तो सर्दी बनी बहुरिया
रह रह सुई चुभोती है!
और कामना हरदम मेरी
बच्चोँ जैसी रोती है!
खुद अपने ही साये से अब
टूट गया विश्वास!
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आये दिन चिकचिक के चलते
बेटो ने है बाँट दिया!
बिस्तर विस्तर दिया एक ने
और एक ने डाँट दिया!
लिखना पढ़ना देख मुहल्ला
कहता कालीदास!
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मौका मिलते मुझे चिकोटे
पसरा है सन्नाटा जो!
दिल पर पत्थर रखकर सहता
वक्त लगाये चाटा जो!
रोज रोज मन मरघट जाकर
ढ़ूँढ रहा उल्लास!
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रचना - धीरज श्रीवास्तव
मनकापुर, गोंडा, उ.प्र.

चित्र गूगल से साभार

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