धीरज श्रीवास्तव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
धीरज श्रीवास्तव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

मेरे गाँव की चिनमुनकी : समाज को दर्पण दिखाते गीतों का संग्रह

समीक्ष्य कृति – गीत संग्रह ‘मेरे गाँव की चिनमुनकी’
कृतिकार – धीरज श्रीवास्तव, चलभाष - 8858001681
समीक्षक – ओम नीरव, चलभाष- 7526063802, ईमेल neeravom1948@gmail.com
========================================
     
       छंदमुक्त कविता ने जहाँ एक ओर लेखनी को अभिव्यक्ति के अधिक अवसर प्रदान किये हैं वहीं दूसरी ओर जाने-अनजाने छंदबद्ध कविता को क्षति पहुँचाने का कार्य भी किया है। अनेक रचनाकार छंदबद्धता को अभिव्यक्ति में बाधक बताकर न केवल अपनी शिल्पगत दुर्बलताओं को छिपा रहे हैं अपितु अपनी दुर्बलताओं को नवीन विधा के रूप में महिमामंडित करते भी देखे गये हैं। छंदमुक्त कविता के अस्तित्व को छांदस कविता की उपेक्षा या भर्त्सना के रूप में प्रस्तुत करने का चलन-सा हो गया है। यह छांदस काव्य विधाओं के लिए संकटकालीन स्थिति है। ऐसी त्रासद स्थिति में यदि कोई छंदबद्ध, भावप्रवण और सरस गीतों का संकलन प्रकाश में आता है तो लगता है जैसे जेठ की तपती दुपहरी में कोई पवन का शीतल झोंका तन-मन को रस-सिक्त कर गया हो। कुछ ऐसी ही अनुभूति हो रही है गीतों के लड़ैते राजकुमार धीरज श्रीवास्तव का गीत संग्रह ‘मेरे गाँव की चिनमुनकी’ को पढ़कर।
      धीरज जी एक लंबे अंतराल से छांदानुशासित गीतों के सृजन में संलग्न रहे हैं। उनके गीतों में कोमल भावनाओं का असीम सागर लहराता हुआ दिखाई देता है और इस सागर की उद्दाम तरंगों को शिल्पबद्ध करने की विशिष्ट क्षमता उनकी लेखनी में विद्यमान है। इसप्रकार भाव और शिल्प दोनों का मनोहारी समागम उनके गीतों को उत्कर्ष प्रदान करता है। अधिकांश गीतों में गाँव की माटी को भारतीय संस्कृति के सलिल में सान कर लोक भाषा की हथेली से आकार दिया गया है और फिर छांदस शिल्प के  आवे में तपाकर लोकार्पित किया गया है। एक झलक दृष्टव्य-
क्या अब भी रस्ते कच्चे हैं/ जिनपर हम आते जाते थे?
क्या पेड़ अभी है जामुन का/ हम बैठ जहाँ सुस्ताते थे? 
क्या झूला अब भी पड़ता है/ उस हरीराम की बगिया में?
क्या सभी सितारे टँके हुए/ हैं अभी तलक उस अँगिया में?
      गीत के मुख्य अंग होते हैं – मुखड़ा, टेक, अंतरे, पूरक पंक्तियाँ, गेयता, तुकांत विधान, भावप्रवणता। यदि ‘मेरे गाँव की चिनमुनकी’ के गीतों की बुनावट को देखा जाये तो गीत का अंग-प्रत्यंग पुष्ट दिखाई देता है। धीरज जी मुखड़े के चुनाव में विशेष सजग दिखाई देते हैं। उनके प्रत्येक गीत का मुखड़ा कथ्य की सटीक प्रस्तावना करने के साथ अंतरों को पढ़ने के लिए प्रबल जिज्ञासा उत्पन्न करता है। मुखड़े की उस पंक्ति को टेक के रूप में लिया गया है जो अंतरे की पूरक पंक्ति साथ सटीकता से भाव साम्य स्थापित करती हो। गीतों के अंतरे इस कौशल के साथ बुने गए हैं कि प्रारम्भिक पंक्तियों में कथ्य का संधान और पूरक पंक्ति में प्रहार के साथ विलक्षण भावप्रवणता उत्पन्न की गयी है। इस दृष्टि से एक गीत का मुखड़ा और एक अंतरा दृष्टव्य है, 
लड़ा उम्र भर जेठ निरंतर/ पूस करे जी भर मनमानी।
उस पर बैठा मीट हृदय में/ उलच रहा आँखों का पानी। (मुखड़ा)
अंगारों पर रात काटकर/ जैसे तैसे खड़े हुए हैं।
शूलों पर ही चलते-चलते/ हम दुनियाँ में बड़े हुए हैं।
(अंतरे की प्रारम्भिक पंक्तियाँ)
रोटी तक को बचपन तरसा/ खूब हुई हैरान जवानी।
(अंतरे की पूरक पंक्ति)
उस पर बैठा मीत हृदय में/ उलच रहा आँखों का पानी। (टेक)
      गीत की गेयता का नियामक होता है – कोई न कोई छंद, जिसे हम गीत का आधार छंद कह सकते हैं। इस कृति के गीतों में जिन छंदों का प्रयोग किया गया है वे उदाहरण सहित इसप्रकार हैं - (1) चौपाई छंद (16 मात्रा, अंत में गाल वर्जित) मन का है विश्वास तुम्हीं से। (2) पदपादाकुलक (16 मात्रा, आदि में गुरु अनिवार्य, उस गुरु के बाद यदि एक त्रिकल हो तो उसके बाद दूसरा त्रिकल अनिवार्य) लिख रहा पत्र मैं आज तुम्हें (3) लावणी (30 मात्रा, 16,14 पर यति, अंत में वाचिक गुरु) अम्मा तुन तो चली गयीं पर, लाल तुम्हारा झेल रहा। (4) विष्णुपद (26 मात्रा, 16,10 पर यति, अंत में गुरु) हुई जेठ की धूप ज़िंदगी, जलता रहता हूँ। (5) सरसी (27 मात्रा, 16,11 पर यति, अंत में गाल) भाग रही है बचती-बचती, घिरी हुई है आग। (6) गीतिका (मापनी – 2122 2122 2122 212) कौन आकर रंग लब का,रात भर मुँह पर मले। (7) आनंदवर्धक (मापनी- 2122 2122 212) ये उदासी प्राण लेकर जा रही। (8) मधुमालती (मापनी- 2122 2122) हो सके तो माफ करना।
      गीतों में छंदों को सटीकता से साधने के कारण गेयता कहीं भी बाधित नहीं हुई है। कुछ गीतों में एक से अधिक छंदों का सुरुचिपूर्ण सम्मिश्रण है जिसमें लय की निरंतरता का विशेष ध्यान रखा गया है जैसे चौपाई के साथ लावणी, चौपाई के साथ विष्णुपद, विष्णुपद के साथ लावणी, सरसी के साथ लावणी, आनंदवर्धक के साथ गीतिका और मधुमालती के साथ गीतिका। उदाहरणार्थ इस गीत के अंतर्गत सरसी छंद में निबद्ध मुखड़ा और लावणी छंद में निबद्ध अंतरा मिलकर लयात्मक निरंतरता के साथ सम्मोहक गेयता उत्पन्न करते हैं-
पुरवाई के संग आ रही/ भीनी-भीनी गंध।
महक उठा है तुम्हें यादकर/ फिर से वो संबंध। 
जाने कितने दाँव लगाये/ बहुत लड़े पर हार गये।
मंडित मस्जिद गुरुद्वारों में/ जाने कितनी बार गये।
कर पाये पर नहीं वक्त से/ हम कोई अनुबंध।
      गीतों की भाषा व्यावहारिक खड़ी बोली हिन्दी के साथ-साथ वस्तुतः कवि के हृदय की भाषा है जो पाठक-मन की गहराई तक सीधे उतरती चली जाती है। माधुर्य एवं प्रसाद गुणों से युक्त गीतों के इस संग्रह में मुख्यतः विप्रलंभ शृंगार है जो आकाशीय न होकर जीवन के यथार्थ धरातल पर पल्लवित होता है जहाँ पर दया, करुणा, क्षमा, ममता जैसे सकारात्मक भावों की तरलता के साथ छल, प्रपंच, गरीबी, शोषण, व्यभिचार, पाशविक क्रूरता जैसे नकारात्मक भावों की विद्रूपता भी कम नहीं है तथा कुछ गीत करुण रस प्रधान हैं जिनमें युगीन विसंगतियों से पीड़ित मानवता का बिम्ब बड़ी यथार्थता के साथ उकेरा गया है। इसकी एक झलक- 
यहाँ पहुँच से बिलकुल बाहर/ आलू का है दाम हुआ।
सूखे लहसुन अरमानों के/ और प्याज बदनाम हुआ।
आसमान में रोज खोंटती/ बस बथुए का साग सखी।
दाल खौलती है चूल्हे मैं/ जले पतीली आग सखी।
      धीरज जी के गीतों में नये-नये प्रतीकों का प्रयोग कर अतीव मनोहारी बिम्ब योजनाएँ प्रस्तुत की गयी है जिनका उद्देश्य नवीनता के आग्रह को पूरा करना मात्र न होकर संप्रेषणीयता में अभिवृद्धि करना ही है।  बिम्ब-विधान का एक उदाहरण -
लड़ा उम्र भर जेठ निरंतर/ पूस करे जी भर मनमानी।
उस पर बैठा मीत हृदय में/ उलच रहा आंखों का पानी।
      कृति के गीतों में गीतकार के संवेदनशील हृदय का बिम्ब सहज ही देखा जा सकता है-
मुखिया जी सब जान रहे थे/ किसने अस्मत लूटी थी।
आउट बिचारी क्योंकर आखिर/ अंदर से वह टूटी थी।
देशी दारू थी पहले ही/ मछली तली गयी।
देख गाँव का भ्रष्ट आचरण/ कमली चली गयी।
      कवि ने गीत की मिठास में सना जन-जागरण का संदेश भी बड़ी कुशाग्रता से संप्रेषित किया है-
दारू पीकर चौकीदारी/ जाने कितने साल किया।
फूट गयी पर पोल एक दिन/ कर्मों ने कंगाल किया।
हाथ नहीं रह गयी नौकरी/ बैठा सिर खुजलाए अब।
फूटी कौड़ी नहीं जेब में/ किस से ठग कर लाये अब।
      इस कृति में गीतों के संग्रह से पूर्व प्रस्तुत अवनीश त्रिपाठी का आलेख समीक्षा साहित्य की एक अनमोल धरोहर है। उनके इस कथ्य से मैं पूर्णतः सहमत हूँ कि ‘धीरज जी मानव मन की कोमलता के पारंगत पारखी है’।
      समग्रतः धीरज श्रीवास्तव जी के गीतों का यह संग्रह ‘ मेरे गाँव की चिनमुनकी’ पुनः पुनः पठनीय और संग्रहणीय है। मेरा विश्वास हैं यह कृति हिन्दी काव्य साहित्य में यथेष्ट सम्मान प्राप्त करेगी और नव गीतकारों के सटीक सृजन की प्रेरणा स्रोत बनेगी।
- ओम नीरव
संस्थापक अध्यक्ष ‘कवितालोक’, लखनऊ
--------------------------------------------

सोमवार, 25 अप्रैल 2016

'गीत और नवगीत के सन्धि हस्ताक्षर धीरज श्रीवास्तव'--डॉ० मंजु श्रीवास्तव

"मेरे गाँव की चिनमुनकी'' 
पेज-१४४ मूल्य - २५०  प्रकाशन - शुभांजलि प्रकाशन  कानपुर 
=======================================
गीत और नवगीत के सन्धि हस्ताक्षर के रूप में कवि श्री धीरज श्रीवास्तव जी का गीत संग्रह 'मेरे गाँव की चिनमुनकी 'नवगीतों की श्रृंखला में अवश्य मील का पत्थर साबित होगा,एेसा मेरा विश्वास है।

सीधे सादे सहज व्यतित्व के धनी कवि धीरज जी के सरल व्यतित्व की पूर्ण छाप उनके कृतित्व पर दिखाई पड़ती है।
उन्होने वातानुकूलित हवेली में बैठकर गीतों की रचना नहीं की,बल्कि जेठ की तपती दुपहरी में तपकर,पूस की ठिठुरती ठंड़ में सिहर -सिहर कर सृजन को वाणी दी है।उन्होंने गीतों में गाँव को नहीं रचा है वरन ग्रामीण जीवन को गीतों में जिया है।संग्रह में वर्णित छोटा सा गाँव भारत के समस्त गाँवों का प्रतिनिधित्व कर रहा है।
उनके भावों में संप्रेषणीयता है,कथ्य में प्रबल प्रवाह है जिसमें डुबकी लगाता, डूबता-उतराता पाठक दर्शन की उन ऊँचाइयों तक पहुँच जाता है जहाँ कवि का अन्तर्मन 'स्थिरता' प्राप्त करना चाहता है।मोती जैसे भावों से भरी इस बहुमूल्य पिटारी में गरीबी, दहेज, साम्प्रदायिक दंगे, प्रदूषित होती हुई गंगा की परवाह करता हुआ रचनाकार अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन भी बखूबी कर पाया है।
कलरात जब मैं इस गीत संग्रह को पढ़ने बैठी तो पता ही नहीं चला कब समाप्त हो गया।मैं स्तब्ध थी।संयत होने पर मैं उस गाँव के बीच खड़ी थी जहाँ मेरे इर्द -गिर्द कवि के कथित पात्रों की चहल-पहल थी।एक ओर बिना नील का कुर्ता पहने रामपाल,सीधे सरल बड़कन के खेत पर कब्जा कर अट्टाहास करता बुझावन,पतीली में खौलती दाल के सामने बैठी विपन्नताओं की मार झेलती युवती,परदेशी झल्लर को मिसकॉल देती रमलिया, सामाजिक विद्रूपताओं का दर्द अपने सीने में छिपाये,वेदना की प्रतिमूर्ति बनी अनब्याही बेटी कोने मे सहमी सी खड़ी थी।अम्मा की बहू सज-संवर कर इठला रही थी।राधे बाबा के बेटे के कुसंग में बिगड़े छोटे भाई की चिन्ता करता बड़ा भाई,जमीन के लिए एक दूसरे केे सिर फोड़ते लोग ,सभी बारी बारी से सामने आ रहे थे।साथ ही सेठ ,साहूकार,नेता, दरोगा और सरपंच द्वारा सतायी गई मुन्नी बाई अश्रुपूरित नेत्रो से मेरे सामने खड़ी थी। वहीं दूसरी ओर पायल छनकाती, कंगन खनकाती,रूठती-मनाती,रार-मनुहार करती, खिलखिलाकर प्रिय का आलिंगन करती,जूही-कचनार सीऔर सावन की रिमझिम बौछार सी,अल्हण यौवन की मलिका"चिनमुनकी" मेरे सामने बैठी मंद-मंद मुस्करा रही थी।
मैं किंकर्तव्यमूढ़ सी चलचित्र की भाँति सजीव चित्रों को रात्रि भर देखती रही।प्रात कब हुई ,पता ही नहीं चला। पक्षियों के कलरव से मेरी तन्द्रा टूटीऔर मैं वर्तमान में लौट आई।
कुछ एेसा है कवि धीरज श्रीवास्तव जी की सर्जना का जादू !जिसमें शब्द गायब हो जाते हैं,भाव 'चित्र ' बनकर सजने -सँवरने लगते हैं तथा पाठक ठगा सा रह जाता है।.....
अंत में दोशब्दों में मैं बस इतना कहना चाहूंगी-कि कवि के मधुर गीतों में प्रेम, सौंदर्य, प्रकृति एवं दर्शन की गंगा-यमुनी छवि उन्हेंश्रेष्ठ गीतकार के रूप में स्थापित करती है। मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत उनके सुन्दर गीत 'भाव 'जगाते हैं ,'शब्द 'चित्र बनाते हैं और हृदय की गहराइयों में उतर कर अनायास ही गुनगुनाने को विवश कर जाते हैं।
ऐसे महान कवि को मेरा शत-शत नमन
डॉ० मंजु श्रीवास्तव
कानपुर

सोमवार, 14 मार्च 2016

धीरज श्रीवास्तव का गीत- "ढूंढ रहा उल्लास"

मौत कहाँ तू छिपकर बैठी
आ जा मेरे पास!
इधर जिन्दगी दगा दे रही
बस है तेरी आस!
**
जितने भी थे सच्चे साथी
धीरे धीरे बिछड़ गये!
हम इस जग के स्वार्थ दौड़ मेँ
धीरे धीरे पिछड़ गये!
धूप जेठ की तन झुलसाती
गुजर गया मधुमास!
**
अब तो सर्दी बनी बहुरिया
रह रह सुई चुभोती है!
और कामना हरदम मेरी
बच्चोँ जैसी रोती है!
खुद अपने ही साये से अब
टूट गया विश्वास!
**
आये दिन चिकचिक के चलते
बेटो ने है बाँट दिया!
बिस्तर विस्तर दिया एक ने
और एक ने डाँट दिया!
लिखना पढ़ना देख मुहल्ला
कहता कालीदास!
**
मौका मिलते मुझे चिकोटे
पसरा है सन्नाटा जो!
दिल पर पत्थर रखकर सहता
वक्त लगाये चाटा जो!
रोज रोज मन मरघट जाकर
ढ़ूँढ रहा उल्लास!
**

रचना - धीरज श्रीवास्तव
मनकापुर, गोंडा, उ.प्र.

चित्र गूगल से साभार

बुधवार, 2 मार्च 2016

डॉ गंगाप्रसाद गुणशेखर-'धीरज श्रीवास्तव प्रेम और संवेदनाओं के गीतकार'

अपनों से पराजित मन वाले  मीत के गीत
=============================

          एक दार्शनिक के लिए संसार क्षणभंगुर हो सकता है।वीतरागी के लिए निरर्थक हो सकता है। लेकिन एक अभिनेता के लिए  संसार एक रंग रँगीला  रंगमंच है,जिस पर वह अपने जीवनानुभवों  को कलात्मकता के साथ सबसे साझा करता है।संगीतज्ञ के लिए इस संसार के झरनों और नदियों  के कल-कल छल-छल तक मे एक सुरीला राग समाया हुआ रहता है।खग कुल के कुल-कुल में एक मोहक नाद उसे सुनाई पड़ता है। यही संसार योद्धा के लिए युद्ध क्षेत्र है तो प्रेमी के लिए वासंती पुष्पबाण चढ़ाए मदन- शिकारी का 'नाद रीझ तन देत मृग ' वाला  उन्मादक वसंत राग जिसमें  वह एक कुशल योद्धा की तरह जीतने के लिए नहीं हारने के लिए उतरता है। शिकार करने के लिए नहीं, शिकार होने के लिए प्रत्यक्ष होता है-

"इन नयनोँ के युद्ध क्षेत्र मेँ
तुमसे मैँ हारा कैसे!
जीवन का सर्वस्व तुम्हीँ पर
मैँने यूँ वारा कैसे!
आज पराजय लिख दूँ अपनी
और तुम्हारी जीत लिखूँ!" 

       दृश्य भले एक हो पर  दृष्टि कभी एक ही नहीं होती। एक ही दृश्य को कई-कई रूपों में चित्रित किए जाने के पीछे यही दृष्टि की भिन्नता होती है। उसे देखने वालों की  दृष्टि अपनी-अपनी होती है। अतः दृश्य एक होकर भी हमेशा और हर एक के लिए एक ही नहीं रहता।इसी दृष्टि भेद के चलते प्रकृति के नाना रंग-रूप अपनी सम्मोहक छटाओं के साथ ललित कलाओं के कैनवास पर बिखरे मिलते हैं। चित्रकला के बाद गीत -संगीत को प्रकृति ने आलंबन और उद्दीपन दोनों  प्रकारों से ऐसे आलिंगन बद्ध किया है कि वह ऊष्मा सामवेद से लेकर अब भी नहीं छीजी है-

"प्राण कहाँ पर बसते मेरे
जग कैसे ये चलता है!
किसका रंग खिला फूलोँ पर
कौन मधुप बन छलता है!
एक एक कर सब लिख डालूँ
अंतर का संगीत लिखूँ!"

            प्रेम शाश्वत है। जब उसे देशकाल में नहीं बांधा जा सकता तो भला उसके प्राचीन उपमानों  को यह कर त्याग देना कहाँ तक उचित है  कि ये मैले हो गए हैं।इसीलिए गीतकार धीरज श्रीवास्तव के गीत जायसी से लेकर रीतिकालीन कवियों के प्राकृतिक उद्दीपन तक को अपनाने में गुरेज नहीं करते।इनका चाँद भी विरहाग्नि को धधकाकर जलाता है-

"शरद चाँदनी क्योँ तपती है
क्योँ बदली ये रीत लिखूँ!"

       आज भी जब कवि-प्रिया पद्मावती की तरह अपने घने काले केश खोलती  है तो उसकी नागिन-सी लटकती लटों के खुलते ही घने अंधेरे के साथ बदली भी घिर आती है-

"लिख दूँ हवा महकती क्योँ है?
क्योँ सागर लहराता है!
जब खुलते हैँ केश तुम्हारे
क्योँ तम ये गहराता है!"

        'मेरे गाँव  की चिनमुनकी' सूर की तरह इस कवि के मन  की भी "लरिकाई कौ  प्रेम कहौ अलि  कैसे छूटै" एक ईमानदार  आत्मस्वीकृति है। यादों में पायल के 'छनकने'और कंगन के 'खनकने' जैसे श्रव्य बिंब एक सुमधुर नाद  के साथ तन-मन को झनझना देने के सामर्थ्य के साथ गीत की आत्मा के भीतर कुंडली मारे बैठे हुए मिलते हैं-

"यादोँ मेँ  पायल  छनकाकर
और कभी कंगन खनकाकर
आ पीछे से कभी कभी वह
आँख बंद कर लेती है!
नहीँ देखता कोई फिर तो 
बाँहोँ  मेँ  भर  लेती है!"

प्रेम की दैहिक क्रियाएँ भी यहाँ कितनी निश्छल और पावन  हैं कि उन्हें कहने में कवि को कोई संकोच नहीं होता। यही वे मीठी-मीठी हरारत और शरारत से भारी हरकतें भी हैं ,जिन्हें कवि मन दूर जाकर भी भुला नहीं पाता और जिनके कारण वह स्मृतियों की चिकोटी काट-काट कर बराबर आकुल -व्याकुल करती अपनी प्रिया को धड़कनों के  संग-संग चलती हुई पाता है-

"धड़कन संग  चला करती है
मेरे'  गाँव  की  चिनमुनकी!"

       कवि के बचपन की 'चिनमुनकी' भी बड़ी होकर समय  के साथ बदल गई है।इसका दर्द कविमान को बहुत आहत कर रहा है। शायद इसमें गीतकार को  स्वयं की भी गलती प्रतीत होती हो । इसीलिए वह  अपनी प्रिया को सीधे दोषी तो नहीं ठहरा पाता लेकिन बदले समय के दबाव में आई प्रिया को  भले इशारों में ही सही वह छली कह अवश्य लेता है-

"मोहक ऋतुएँ नहीँ रही अब
साथ तुम्हारे चली गईँ!
आशाएँ भी टूट गईँ जब
हाथ तुम्हारे छली गईँ!
बूढ़ा पीपल वहीँ खड़ा पर
नहीँ रही वो छाँव प्रिये!"

           अपनी प्रिया को अपने से दूर देखकर निराश है।उसे मंज़िल तो क्या रास्ता ही नहीं सूझता। इसके लिए उसकी प्रिया को उससे ज़ुदा करने वाले जमाने को कोसे बिना वह नहीं रहता-

"दूर तलक है गहन अँधेरा
और जमाना हरजाई!
फिर भी चलता जाता हूँ मैँ
भले थके हैँ पाँव प्रिये!"

वह  थका होकर इसलिए हिम्मत नहीं हर रहा है कि शायद उसे उसकी मंज़िल मिल जाए।वह निराशा के घने  अँधेरों को चीरकर उनमें से आशा की किरण खोज ही लेता है। भले ही वह अपने को ठगा और हारा हुआ पाता है लेकिन जिनसे वह ठगा गया है वे कोई और नहीं हैं। उसकी प्रिया को उससे अलग ले जाने वाले उसके अपने ही हैं,जिनमें उसकी प्रिया भी शामिल है। इसलिए वह अपने ही गाँव में अपने को गैर जैसे पाता है-
"चिट्‌ठी लाता ले जाता जो
नहीँ रहा वो बनवारी!
धीरे धीरे उज़ड़ गये सब
बाग बगीचे फुलवारी!
बैठूँ जाकर पल दो पल मैँ
नही रही वो ठाँव प्रिये!"
लेकिन फिर भी वह गाँव छोडता नहीं है । क्योंकि वह अपनों से हारकर भी उन्की जीत की खुशी में खुद की  जीत की-सी खुशी  का अनुभव करता है और गाँव के ठोकर मारने वाले पथरीले रास्तों पर ही चलता रहता है----
"पथरीले रस्तों के ठोकर
जाने कितने झेल लिए!
सारे खेल हृदय से अपने
बारी बारी खेल लिए!
कदम कदम पर जग जीता हम
हार गये हर दाँव प्रिये!
बदल गये हैँ मंजर सारे
बदल गया है गाँव प्रिये!"
गाँव से इतनी शिकायतें होते हुए भी वह गाँव  नहीं छोड़ता क्योंकि -
"महक उठा है तुम्हेँ याद कर
फिर  से  वो संबंध!-"
और,
बरसों से प्रीति की प्रतीति वश उन्हीं पत्थरों पर चलकर उन्हें प्रतिठोकर मार रहा है। शायद कुरेद-कुरेद कर कंकड़ -कंकड़ से अपनी प्रिया का पता पूछ रहा है-

" बीत  गये हैँ  बरसोँ  लेकिन
जाने  कैसा  नाता  है!
प्रिये आज भी उसी गली से
पागल आता जाता है!"

गीतकार धीरज की प्रिया घरेलू काम-काज से निबटकर प्रीतम से बतियाने वाली जिम्मेदार स्त्री है। इसीलिए वह अपनी प्रिया को  वह सब कुछ याद दिलाना चाहता है जो उसका कर्म क्षेत्र रहे हैं-

"कहना  हाल  जरा   बाबा  का/
पीड़ा  गठिया   की  कैसी  है?
अम्माँ को  खाँसी आती  क्या/
वो छुटकी  बिटिया  कैसी  है?
अब  साथ  निभाना  तुम  मेरा/
प्रिय रखना  सँग  सदा  अपने!
तुम   जबसे   दूर  हुई   मुझसे/
दिन  रात   बहुत  आते  सपने!
मन  बहुत  सोचकर   घबराता/
धीरज अन्दर तक हिल  जाये!"

             धीरज श्रीवास्तव के गीतों का शिल्प पारंपरिक है।यहाँ पारंपरिक शब्द का प्रयोग किसी कमी के अर्थ में नहीं हुआ है।यहाँ ऋजुता है। कोमलता है।इनके गीतों में  भरपूर गेयता है,जो गीत का प्राण तत्त्व है। शायद इसीलिए इनके गीत सायास बिंब बोझिल गीत नहीं हैं। बस वे उर-प्रपात से नदी की तरह फूट निकलते हैं । यह अच्छा ही है कि सायास गढ़े गए नए-नए बिंब, प्रतीक और उपमानों की ईंट ,रेत और सीमेंट से बंधी नहर की तरह पक्की दीवारों के बीच इन्हें बहना नहीं आता-

 "चल सकते थे जितना भी हम
साथ  तुम्हारे  चले बहुत!
नर्म चाँदनी मेँ भी तुमको
सोच सोचकर जले बहुत!
मजबूरी मेँ मगर सभी हम
भूल गये सौगंध!"

            गीतकार केवल मन की अंधेरी कोठरी में ही नहीं बैठा रहता । वह अपने साथ-साथ गाँव के दुख-दर्द भी महसूसता है। बदले परिवेश में आचरण बदल चुके गाँवों को देखकर हतप्रभ है। वह बदले आचरण की भर्त्सना  करता है----
"कैसे भला कली मुस्काये/करते भौँरे तंग!
अपना अपना राग छेड़ते/लगना चाहेँ अंग!
ताके झाँकेँ कीट पतंगे/बिन माली का बाग!"

स्त्री के लिए कंटक बनते समाज को देखकर वह  व्यभिचारियों और बलात्कारियों के प्रति आवेश से भर जाता  है। वह  स्त्री समाज कोउनके विरुद्ध खड़ी होने के लिए सचेत करता है  -

"देख गाँव का भ्रष्ट आचरण/
कमली चली गई!
मुखिया जी सब जान रहे थे
किसने अस्मत लूटी थी!
और बिचारी क्योँकर आखिर
अन्दर से वह टूटी थी!
देशी दारू थी पहले ही
मछली तली गई!.....
थोड़ा सा वह हिम्मत करती
और बजाती जो डंका!
रावण तो मरता ही मरता
खूब जलाती वह लंका!
कैसे कह दूँ ठीक किया औ
पगली भली गई!"
     उत्तर आधुनिक समय में कैसी तरक्की आई कि सारे रिश्ते-नाते भुला दिए गए। विकास देहरी तक पहुंचा भी नहीं कि चरित्र पहले ही घर छोडकर चला गया। शील पर्दा उठाकर निकला और देखते-देखते आँखों से ओझल हो गया। संकोच न जाने कहाँ लुप्त  हो गया। कवि का मन इसी लिए आकुल है कि आज कोई किस पर और कैसे विश्वास करे जब -

" बिटिया अपनी व्याहे कैसे/
और बचाये लाज!
संघर्षो मेँ सूख चली है/
आँखोँ की भी झील।
देखे जो लाचारी इसकी/
ताक लगाये बाज!
व्यंग्य कसे मुस्काये अक्सर/
खाँस खाँस कर चील।
.....
भाग रही है बचती बचती/
घिरी हुई है आग!
देख भयावह स्वप्न रात मेँ/
अक्सर जाती जाग! "
        धीरज के यहाँ एक बात बहुत धीरज बँधाती है कि गरीब के यहाँ रिश्ते के इस संक्रमण काल में भी माँ के लिए संवेदना बची है-

"ठोक रही बीमारी माँ की
छाती मेँ बस कील।"
       कवि के भाव जगत में स्त्री के प्रति कोई द्वेषभाव नहीं है। लेकिन ग्राम्य जीवन  में आज भी पुरुषत्त्व चूड़ियों की खनक पर रीझता भले हो पर उन्हें कामकेलि  के बाद घृणा की नज़रों से ही देखता है। उसी का सहज प्रभाव धीरज के अचेतन पर  भी बाकी है-
"पहन चूड़ियाँ लीँ तुमने या
मुँह पे कालिख पोत लिया!
जबरन उसने खेत तुम्हारा
पूरब वाला जोत लिया!"
          लेकिन यह कवि का स्वभाव नहीं है। स्त्री के प्रति उसमें करुणा की अंतर्धारा भी प्रवाहित है-

" चाची भी है दुख की मारी
बैठ अकेले रोती है!
छूट गया है खाना पीना
आकर दवा कराते भाई! "
             कभी गीतों के केंद्र में रहे ख़त अब गायब हो गए हैं। गाँव के हाल -चाल वाले खत लेकर उड़े कबूतर न जाने कहाँ बिला गए। घर-घर मोबाइल हैं। संदेश कबूतर नहीं टावर से बेतार के तार  उतार ले जाते हैं। अब तो बस इसी तरह के गीतों ,कविताओं और कहानियों मे मिलेंगे खत। इनके गीत में  उस खत का भी ज़िक्र है,जो अब अतीत हो रहा है। यह प्रयोग भले ही सायास न हो पर पत्रों के महत्त्व के प्रति कवि की सचेत निष्ठा अवश्य बता रहा है-

            'और ठीक पर तुम चल देना
             फौरन खत को पाते भाई!"
            अपनी तरक्की के लालच में गाँवों ने शहरों की नकल करने में अपनी पहचान गंवा दी और तरक्की नहीं कर पाए ।शहरों जैसा दहेज-दानव  गाँवों को भी निगलने आ गया। इसलिए गाँव की खुशहाली की अन्य चिंताओं के साथ-साथ दहेजप्रथा भी कवि की चिंता का विषय है-
"भाग्य छिपा है अँधियारे मेँ/
हुए न पीले हाथ!
काट रही है भरी जवानी/
भारी मन के साथ!"
            इसीलिए कवि अपने गाँव आकर पुरानी स्मृतियों में खोकर उदास हो जाता है-

"जब जब घर आता मै अपने/
दिखता बहुत उदास!
चौखट करने लगती मेरी/
सुधियोँ से परिहास!"
            जहां उसे नयों से निराशा होती है,वहीं पुरानों में बची आत्मीयता उसे लुभाती है ---

"देख मुझे बूढ़ी दीवारेँ
हो जाती हैँ दंग!
राख दौड़कर पुरखोँ की भी
लग जाती है अंग!
कुर्सी चलकर बाबू जी की
आ जाती है पास!"

       गीतकार की स्मृतियों में गाँव अपनी अच्छाइयों और बुराइयों के साथ मौजूद है। वह इन सबके बावजूद गाँव को बड़ी आत्मीयता से अपनाता है। शायद वह मानता है कि यह गाँव ही है जहां बाबा,बाबा ,दादी और बुआ के साथ वाला संयुक्त परिवार प्रेम से रह सकता है-
"बाबा दादी और बुआ का/
होता है आभास!"
गाँव में संवेदना के स्रोत पूरी तरह सूखे नहीं हैं। इन्हीं कारणों से गाँव उसे बसने  के लिए रास आता है-

 "बैठ रुआँसा कहे ओसारा
यहीँ करो अब वास!"
       कुछ प्रयोग कवि के  बिंबधर्मी होने का संकेत भी देते हैं-
" बूँद पसीने की लेकर मैँ
गूँथ रहा कर्मो का आटा!
और जरूरत सिर पर चढ़कर
हरदम एक पटाखा दागे!
........किन्तु गरीबी बैठ हमारी
उलझन की बस कथरी तागे!"

समाज की गरीबी और भुखमरी गीतकार को दुख देती है। वह आँसुओं की न टूटती लड़ी को देखकर उन्हें बेशर्म तक कह देता है। लेकिन करुणा मे भरकर  उन्हें बेशर्म कहता है,घृणा से नहीं -

" पत्थरोँ के बीच रहकर
हो  गये  बेशर्म   आँसू!
         किसी संवेदनशील गीतकार की तरह सांप्रदायिकता  के प्रति भी वह सजग है-

"किसने घोला जहर हवा में/
भड़काया किसने दंगा?
धर्म सेतु का चलो देख लें/
कौन रहा है तोड़?"
        गरीबी के बीच माँ की स्मृति और उस पर दार्शनिक भाव से चिंतन वाली पंक्तियाँ बड़े सहज भाव से ध्यान खींचती हैं -

"बैठ करे पंचायत दिन भर
सजती और सँवरती है!
जस की तस है बहू तुम्हारी
अपने मन का करती है!
कभी नहीँ ये राधा नाची
कभी न नौ मन तेल रहा!
.....खेल खिलाता वही सभी को
और जगत ये खेल रहा!"
         गीतकार धीरज श्रीवास्तव के गीत 'अपनों से पराजित मन वाले  मीत के गीत'हैं। इनमें आकुल मन की पीड़ा तो है ही साथ में आकुलों के मन की पीड़ा भी चोरी-छिपके नहीं सीना तान के समा गई है। इन्हें पढ़ते हुए पता ही नहीं चलता कि वे कब कविता मे ढल जाते हैं । यह भी आभास नहीं हो पाता कि कब गीत की कथ्य मुक्तता कब प्रबन्धात्मकमकता की आत्मा मे प्रवेश कर जाती है या फिर  कब गेय  कविताएँ गीत का रूप ले लेती हैं । इसका आशय यह नहीं कि यहाँ सबकुछ गड्डमड्ड है। यह विषय की विविधता के कारण है। कवि का प्रगतिशील मन कब दूसरों की पीड़ा पर भावुक हो उठे यह कवि के ही वश मे नहीं है। इसलिए उसका आत्म कब विस्तृत हो जाता है इसका उसे  होश ही नहीं रहता । शिल्प में भी कुछेक स्थलों पर बहाव की जगह ठहराव या तुक मिलाने की विवशता में बिठाए गए शब्द भी खोजे जा सकते थे,लेकिन अतिपरिश्रम के साथ,जो मैंने खोजे ही नहीं। कुछ काम पाठकों पर भी छोड़ देना चाहिए । आलोचक के धर्म -कर्म कितने निभे मैं नहीं जानता पर यह ज़रूर कह सकता हूँ कि मैंने तो जिन गीतों का पाठ किया उनमें आनंद आया।मैं तो  धीरज श्रीवास्तव को उनके साहित्यिक जीवन के सुखद साफल्य की अभी हार्दिक बधाई देता हूँ।
हार्दिक शुभकामनाएँ।
शुभमस्तु।

-डॉ. गंगा प्रसाद शर्मा 'गुणशेखर '
प्रोफेसर एवं अध्यक्ष (हिन्दी पीठ ),
क्वाङ्ग्चौ वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय,क्वाङ्ग्चौ ,चीन।