गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

माँ धनपती देवी स्मृति कथा साहित्य सम्मान से सम्मानित किए गए कहानीकार

स्थानीय जिला पंचायत सभागार में 'कथा समवेत' पत्रिका द्वारा आयोजित "माँ धनपती देवी स्मृति कथा साहित्य प्रतियोगिता-2018" में चयनित कथाकारों में आलम आज़ाद (प्रतापगढ़), अरविंद क्लेरेंस (प्रयागराज),निशा गहलौत (लखनऊ),हेमलता यादव (नई दिल्ली),अनिता श्रीवास्तव (जयपुर),शिवाशंकर पाण्डेय जी को अंगवस्त्र, धनराशि, सम्मानपत्र एवं स्मृतिचिह्न प्रदान करके सम्मानित किया गया।

समारोह का आरम्भ माँ सरस्वती और माँ धनपती देवी की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन एवं माल्यार्पण के साथ हुआ।दो सत्रों के इस आयोजन में प्रथम सत्र की अध्यक्षता डॉ सूर्यदीन यादव (नाडियाड) ने किया। इस कार्यक्रम के आयोजक कथा समवेत के सम्पादक डॉ0 शोभनाथ शुक्ल ने समारोह में आये अतिथियों एवं कहानीकारों का स्वागत करते हुए कहा कि पुरस्कृत कहानियाँ आज के समय में सार्थक हस्तक्षेप की कहानियाँ हैं।अपनी भाषा,बुनावट और कहन में ये कहानियाँ पाठकों के मन में उतर जाती हैं।

सम्मानित कथाकारों में आलम आज़ाद ने कहा कि पुरस्कार हमें कुछ और बेहतर करने के लिए प्रेरित करते हैं।अरविंद क्लेरेंस ने कहा कि हम कहानियों में जीवन लिखते हैं न कि जीवन के लिए कहानी।डॉ हेमलता ने कहानियों पर बोलते हुए कहा कि जब कोई विचार उद्वेलित करता है तभी कहानी बनती है।निशा गहलौत ने कहा पारिवारिक रिश्ते भी हमारे लिए कथावस्तु तैयार करते हैं।इसी क्रम में अनिता श्रीवास्तव ने अपनी रचना प्रक्रिया में सामाजिक परिवेश और खासकर जीवन शैली के प्रभाव की चर्चा की।शिवाशंकर पाण्डेय ने कहा यदि शोभनाथ शुक्ल जैसे पारदर्शी और पवित्र आयोजक हों तो साहित्य समृद्ध होता जाएगा। प्रतियोगिता के निर्णायक राम नारायण रमण ने चयनित कहानियों की भाषा शैली,कथावस्तु,वस्तुविन्यास आदि के विषय में अपना पक्ष रखा।कहानीकारों के सम्मान के पश्चात कथा समवेत पत्रिका के दिसम्बर अंक का लोकार्पण विजेता कहानीकारों द्वारा किया गया।इस सत्र का संचालन नवगीतकार अवनीश त्रिपाठी ने किया।

    कार्यक्रम के दूसरे सत्र में 'सरकारी उपेक्षा और हिंदी का बढ़ता बाज़ार' विषय पर एक सार्थक बहस हुई।विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ शोभनाथ शुक्ल ने कहा हिंदी में अन्य भाषाओं की तुलना में ग्रहण करने की क्षमता और उसका तंत्र सबसे मजबूत है।बहुराष्ट्रीय कंपनियां अपने बाजार को बढ़ावा देने के लिए हिंदी को अन्य भाषसों के मुकाबले अधिक इस्तेमाल में ला रहे हैं किंतु सरकार राष्ट्रभाषा होने के बावजूद हिंदी को अनिवार्य भाषा बनाने की दृढ़ इच्छा शक्ति नहीं पैदा कर पा रही हैं।

डॉ ओंकारनाथ द्विवेदी ने कहा हिंदी विषय से यदि रोजगार पैदा हो तो उसका विकास हो।शैलेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा कि सरकारी तंत्र हिंदी की पुस्तकें खरीदना नहीं चाहता।युवा साहित्यकार ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह 'रवि' ने कहा कि हिन्दी सरकारी उपेक्षा के कारण नहीं बल्कि जन उपेक्षा के कारण पिछड़ रही है।आज हिन्दी का बाजार बहुत. बढ़ा है जिसमें सरकार का महत्वपूर्ण योगदान है ।

वीरेंद्र त्रिपाठी का कहना था कि हिंदी की उपेक्षा की बात भले की जा रही है लेकिन हिंदी फिर भी पूरे विश्व बाजार में पसरती चली जा रही है।व्यंग्यकार हनुमान प्रसाद मिश्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि सरकार ने अखबारों को विज्ञापन देने की दुर्भावनापूर्ण दोहरी नीति अपना लिया जिसके परिणाम स्वरूप तमाम पाक्षिक एवं दैनिक साप्ताहिक समाचारपत्र बन्द हो गए या बन्दी के कगार पर हैं।

डॉ करुणेश भट्ट ने कहा कि राजतंत्र और सरकारी तंत्र का दोष तो है ही लेकिन हमारा भी अपनी भाषा हिंदी के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार बना हुआ है।प्रतियोगिता के प्राथमिक निर्णायक चित्रेश जी ने प्रतियोगिता में आई सम्पूर्ण कहानियों के विषय में विशेष टिप्पणी किया।इसी क्रम में साक्षी प्रकाशन संस्थान से प्रकाशित तीन पुस्तकों का लोकार्पण किया गया जिसमें डॉ रामप्यारे प्रजापति का कहानी संग्रह 'मुक्तिकामी शिलायें', गुरु प्रसाद सिंह का उपन्यास 'कैसे टूटी गुलामी की जंजीरें' और शैलेन्द्र तिवारी का उपन्यास 'विसर्जन' सम्मिलित थे।

इस सत्र की अध्यक्षता शैलेन्द्र श्रीवास्तव एवं संचालन श्याम नारायण श्रीवास्तव ने किया।इसके पश्चात समारोह में मथुरा प्रसाद सिंह 'जटायु' के संचालन में काव्य सन्ध्या का आयोजन किया गया जिसमें नरेंद्र शुक्ल,साक्षी शुक्ल,रेणु अग्रहरि, जगदीश श्रीवास्तव आदि ने कविता पाठ किया।समारोह में पूजा पाठक, प्रिया मिश्रा, भावना पाण्डेय, प्रशंसा शुक्ला, डॉ.सुशील कुमार पाण्डेय 'साहित्येन्दु', जयंत त्रिपाठी, डॉ.सूर्यदीन यादव,डॉ.रामप्यारे प्रजापति,सुरेश चंद्र शर्मा,कपिल देव सिंह, शैलेन्द्र तिवारी,डॉ गीता सिंह, प्रीति त्रिपाठी, अन्नू त्रिपाठी,सन्दीप सिंह आदि की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय है।आगंतुकों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए डॉ शोभनाथ शुक्ल ने कहा कि ये कहानी प्रतियोगिता और सम्मान समारोह कहानी के अच्छे भविष्य की ओर संकेत करता है।अन्य विधाओं के मुकाबले कहानी लोगों की ज़ेहन में अच्छा प्रभाव छोड़ती है।सैकड़ों श्रोताओं की उपस्थिति इसका सजीव प्रमाण है।

सोमवार, 29 अक्तूबर 2018

कब लौटोगे राम?

क्या रावण वध शेष अभी है

कब लौटोगे राम?

देख   रहा   है  राह  तुम्हारी

विकल अयोध्या धाम 


महल नहीं खँडहर बाकी हैं

अब भी कातर स्वर बाकी हैं

बाद   तुम्हारे   जाने  कितने

प्रश्नों   के   उत्तर   बाकी  हैं


अक्सर  उठते  ही  रहते  हैं

तुम पर प्रश्न तमाम !


सच क्या है सब जान रहे हैं

लेकिन हठ  भी ठान  रहे  हैं

सिंहासन  पर  रखे  खड़ाऊं

खुद  को  राजा  मान रहे हैं


सुनने से  भी  कतराते  हैं

लोग तुम्हारा नाम!


जीवन का पथ मोड़ गये हैं

सुख से नाता तोड़  गये  हैं

कैसे   कोई  मन  समझाए

भरत अयोध्या छोड़ गये हैं


कठिन प्रतीक्षा के पल हैं ये

कैसे हो आराम!


कब लौटोगे राम !

कब लौटोगे राम !


_ज्ञान प्रकाश आकुल

कवि रामानुज त्रिपाठी की पुण्यतिथि पर पुस्तक लोकार्पण,सम्मान समारोह एवं साहित्यिक संगोष्ठी


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सुलतानपुर 08 जुलाई।
रामानुज त्रिपाठी सृजन संस्थान गरयें,सुलतानपुर उप्र की ओर से कवि रामानुज त्रिपाठी की 15वीं पुण्य तिथि पर 08 जुलाई 2018 को 'क्षत्रिय भवन सभागार' में पुस्तक लोकार्पण, साहित्यकार सम्मान समारोह , साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।कार्यक्रम का प्रारम्भ माँ सरस्वती एवं रामानुज त्रिपाठी के चित्रों पर अतिथियों द्वारा माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन से हुआ।संचालक डॉ शोभनाथ शुक्ल ने अतिथि साहित्यकारों का परिचयात्मक स्वागत करते हुए कहा कि "यह आयोजन एक ऐसे गीतकार-बालकवि की पुण्य तिथि को समर्पित है जिनके गीत मानवीय अस्मिताबोध की भावना से भरे हुए हैं।प्रकृतिकामा सौंदर्य और नेह जहाँ अपने पूरे वजूद में प्रतिबिम्बित हुए हैं,वहीं भूख,प्यास और जन अभावों की प्रश्नगत मौजूदगी है,जो धीरे से हमारे अदृश्य भावबोध का विषय बन जाती है।"  इस अवसर पर तीन सत्रों में चले समारोह के प्रथम सत्र के कार्यक्रम में रामानुज त्रिपाठी की स्मृति में संस्था के संरक्षक चित्रेश, अध्यक्ष अवनीश त्रिपाठी एवं छाया त्रिपाठी ओझा द्वारा गीतकार रमाकांत सिंह को गीत साहित्य सम्मान, कविताकोश के सम्पादक राहुल शिवाय को नवगीत साहित्य सम्मान, रविशंकर मिश्र को गीत साहित्य सम्मान तथा आलम आजाद को हिंदी साहित्य सम्मान से अंगवस्त्रम एवं प्रतीक चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया।
ततपश्चात छाया त्रिपाठी ओझा (फतेहपुर) के गीत संग्रह ‘अक्षर-अक्षर गीत’ एवं डाॅ0 शोभनाथ शुक्ल द्वारा संपादित पत्रिका कथा समवेत के नवीन अंक का लोकार्पण आचार्य ओम नीरव,रमाकांत सिंह,छाया त्रिपाठी, संजीव ओझा, राहुल शिवाय,धीरज श्रीवास्तव, डॉ शोभनाथ शुक्ल,डॉ ओंकारनाथ द्विवेदी, डॉ सुशील कुमार साहित्येन्दु,डॉ कैलाशनाथ मिश्र, उमाकांत पाण्डेय, संस्था के अध्यक्ष अवनीश त्रिपाठी एवं संरक्षक कथाकार चित्रेश द्वारा किया गया। 'अक्षर अक्षर गीत' संग्रह पर गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए आचार्य ओम नीरव ने कहा कि 'छाया त्रिपाठी ओझा के गीतों में गीत विधा का शिल्प और भाव पक्ष अपने उत्कर्ष पर मौजूद है।'अक्षर अक्षर गीत' के गीतों को देखकर लगता है कि उन्होंने इन गीतों को केवल लिखा ही नहीं है, अपितु जिया भी है।' इसी क्रम में 'अभिदेशक' पत्रिका के संपादक डॉ ओंकारनाथ द्विवेदी ने कहा कि "हृदय की घनीभूत पीड़ा,मन की एकाग्रता में बंधकर जब भाषा में ढलती है,तो गीत बन जाती है।इस भावभूमि पर छाया त्रिपाठी ओझा के गीत कोमल कल्पनाओं एवं सम्वेदनाओं के कारण बड़े मार्मिक और प्रभावकारी बन पड़े हैं।" इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए कविताकोश के संपादक नवगीतकार राहुल शिवाय ने रामानुज त्रिपाठी के नवगीतों में व्याप्त बिम्बों और प्रतीकों के अनूठे प्रयोग की चर्चा की और साथ ही छाया त्रिपाठी के गीतों पर टिप्पणी करते हुये कहा "चकवाल की भूमिका में दिनकर जी ने कहा था कविता का अगला पथ बेला और चमेली के कुँज से नहीं समर्थ बुद्धि की कड़ी चट्टान से होकर गुजरेगी और यह बात सच भी हुई। कविता/गीत/नवगीत ने खुद को पाषाण बना लिया है। पर रामानुज त्रिपाठी के नवगीत ने ऐसी राह चुनी है जिसमें असामाजिक तत्वों पर प्रहार भी है और बेला-चमेली की गंध भी। प्रकृति से जुड़े प्रतीक और बिम्ब इन्हें पुराना नहीं होने देते।आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है कवि या साहित्यकार अपनी रचनाओं में भले ही कुछ लिखना चाहे पर लिख वह देता है जो उसके अंदर होता है। वह अपनी व्यक्तिगत पहचान से कविता को मुक्त नहीं कर पाता।संवेदनशील और सामाजिक भावप्रधानता के कारण छाया त्रिपाठी ओझा के गीतों में करुण तत्व की प्रधानता है।" इसके पश्चात परिचर्चा के केंद्र में रामानुज त्रिपाठी के नवगीत संग्रह 'धुएँ की टहनियाँ' पर व्याख्यान देते हुए कवि-आलोचक शुभम श्रीवास्तव ओम ने इस संग्रह के गीतों को प्रतिबिम्बों की वसीयत मानते हुए कहा "आज किसी भी कृति का आकलन करते हुए यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि कृतिकार ने अपने समकाल को कितना शब्दायित किया है।'धुएँ की टहनियाँ' में व्यक्त 'धुआँ' निराशा या विषाद का प्रस्तुतिकरण नहीं अपितु उस क्रांति का उद्घोषक है जिसमें रचनाकार की समस्त परिवर्तनकामी इच्छाएँ निहित हैं।" आलोचक उत्कर्ष सिंह ने चर्चा करते हुए कहा "स्वर्गीय कवि रामानुज शब्दों की अर्थवत्ता के प्रति अत्यन्त सचेत हैं । उनके काव्यजगत में शब्दों के मूलार्थ और ध्वन्यार्थ का समायोजन एक प्रमुख समस्या के रुप में उभर कर सामने आता है । क्योंकि शब्दों का ध्वन्यार्थ सामाजिक परिवेश से नियोजित होता है अतः रामानुज इतिहास के विश्लेषण की ओर भी झुकाव रखते हैं किन्तु इतिहास के विश्लेषण मे वे किसी विशेष मतवाद या विचार- सरणी  से कतई प्रभावित नहीं दिखते , वे इतिहास को शाश्वत मानवीय समस्याओं यथा भूख और रोटी के सन्दर्भ में समझने का प्रयास करते हैंं । वास्तव में ये तत्व ही इतिहास की चालक शक्तियां हैं जो समय को हमेशा गतिमान बनाऐ रखती हैं । इतिहास को उसकी सामान्यता में समझने का प्रयास ही कवि रामानुज की विशेषता है और समकाल के लिऐ उपयोगी भी।" कथाकार चित्रेश के कहानी संग्रह 'अंधेरे के बीच' पर व्याख्यान देते हुए आलोचक डॉ0 रामप्यारे प्रजापति ने कहा "यह कहानी संग्रह ग्रामीण पृष्ठभूमि और लोक की परिवीक्षा करता है तो साथ ही ग्रामीण परिवेश में व्याप्त आर्थिक और सामाजिक असन्तुलन को भी उद्घाटित करता है।" सत्राध्यक्ष गीतकार रमाकांत सिंह ने कहा कि "कवि रामानुज त्रिपाठी की प्रत्येक पुण्यतिथि पर साहित्यिक आयोजन उनके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।इसे यदि सारस्वत श्राद्ध कहें तो गलत नहीं है।'इस सत्र के संचालक डॉ0 शोभनाथ शुक्ल ने रामानुज त्रिपाठी के साहित्यिक परिदृश्य पर बोलते हुए कहा '' यूं तो न कभी साहित्य मरता है, न साहित्यकार  पर विस्मृति की काली खोहों से धुएं की टहनियाँ हटा कर यादों के चन्दन वन  को रौशन किया ही जाना चाहिए, अवनीश त्रिपाठी की यही कोशिश आज के लिए एक जरुरी साहित्यकार रामानुज को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।"
         दूसरे सत्र में कवि रामानुज त्रिपाठी की स्मृति में संस्था के संरक्षक चित्रेश द्वारा बालपत्रिका 'लल्लू जगधर' के सम्पादक प्रेमचन्द्र गुप्त विशाल, अरविन्द कुमार साहू, योगेन्द्र मौर्य को अंगवस्त्रम एवं सम्मानपत्र प्रदान करके 'बाल साहित्य सम्मान' एवं डॉ0 सुशील कुमार साहित्येन्दु को 'हिंदी साहित्य सम्मान' से सम्मानित किया गया। तत्पश्चात रामानुज त्रिपाठी के बालकविता संग्रह 'जंगल का स्कूल' पर समीक्षात्मक टिप्पणी में बन्धु कुशावर्ती ने कहा "रामानुज त्रिपाठी की कविताएँ प्राकृतिक, बालमनोवैज्ञानिक एवं बचपन के समाज को जीने वाली कविताएँ हैं।वे सीधे अपनी बात कहते हुए बच्चों के मन मे समा जाती है।'' इसके पश्चात 'बाल साहित्य पत्रकारिता एवं वर्तमान बाल साहित्य की दशा' विषय पर मुख्य वक्ता अरविंद कुमार साहू ने कहा कि "बालसाहित्य पत्रकारिता का विषय बहुत विशाल व उद्देश्यपूर्ण है।लेकिन बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिये इसे भी वर्गीकृत किया जाना आवश्यक है। बाल पत्रकारिता, बालसाहित्य पत्रकारिता, बाल सूचनात्मक साहित्य,बाल रचनाकारों व बाल साहित्यकारों की गतिविधियाँ को वर्गीकृत करके बाल समाचार पत्रों की अवधारणा पर बल दिया जाना चाहिये। बच्चों की जिज्ञासा, कल्पना और साहसिक जिजीविषा के साथ ही बालसाहित्य के स्वरूप , उसके विविधीकरण व इतिहास पर अलग - अलग कार्य अधिक उपयोगी रहेगा।" इस सत्र के संचालक ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह 'रवि' ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि "टी.वी.और इंटरनेट ने बच्चों की शारीरिक क्षमता का ह्रास किया है । आज बाजार में बाल साहित्य की मांग बढ़ी है इसलिये इसमें गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखना होगा"। सत्राध्यक्ष आद्या प्रसाद सिंह प्रदीप ने बाल साहित्य की उपेक्षा पर चिंता भी जताई और कहा कि "बाल साहित्य युवाओं के लिए बौद्धिक उर्जा प्रदान करता है।" सत्रांत में नवोदित बाल कवयित्री साक्षी शुक्ला ने ‘चारों ओर छा रहे बादल, घिर घिर तड़प रहे हैं बादल’ बालकविता का पाठ किया। ततपश्चात आशुकवि मथुरा प्रसाद सिंह जटायु के संचालन में काव्यपाठ हुआ।जिसमें कवियों और गीतकारों ने अपनी रचनाओं का पाठकर श्रोताओं की खूब तालियाँ बटोरी।अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए संस्था के अध्यक्ष और कार्यक्रम के आयोजक अवनीश त्रिपाठी ने कहा "किसी भी साहित्यकार की साहित्यिक विरासत को संभालना केवल उसके परिवार का दायित्व नहीं बल्कि सम्पूर्ण साहित्यजगत का है।इस दायित्व के निर्वहन में सहयोगी और कार्यक्रम में उपस्थित समस्त लेखक, रचनाकार एवं श्रोता बाबूजी की पुण्यतिथि पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देते हुए धन्यवाद के पात्र हैं। इस अवसर पर साहित्यकार डॉ कैलाशनाथ मिश्र, कथाकार वीरेंद्र त्रिपाठी, साहिल मिश्रा, व्यंग्यकार हनुमान मिश्र, आलोचक सुरेश चन्द्र शर्मा, हरगोविन्द सिंह, देव नारायण शर्मा, डॉ करूणेश भट्ट, संदीप सिंह, संगीता शुक्ला, प्रिया मिश्रा, प्रीति तिवारी, पिंकी त्रिपाठी, दिलीप सिंह, शैलेन्द्र तिवारी, दयाराम अटल, सत्यदेव तिवारी,लक्ष्मीनारायण मिश्र, तालुकदार सिंह, परमहंस सिंह, राजेन्द्र उपाध्याय, इकबाल भारती, यतीन्द्र प्रताप शाही, श्रीकांत मिश्र, अब्दुल मन्नान, ओम प्रकाश सिंह, देवेंद्र सिंह, राम शरण मिश्र, शैलेश पाल, कुंवर सुल्तानपुरी, समाजसेवी करतार केशव यादव और डॉ0 लक्ष्मण गांधी, सत्य प्रकाश गुप्ता,अब्दुल रहमान आदि विशेष रूप से उपस्थित रहे।