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सोमवार, 26 जुलाई 2021

रामानुज त्रिपाठी के गीतों में नव-मानवतावाद by सत्यम भारती

               रामानुज त्रिपाठी नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर माने जाते हैं। इनके गीतों में विषयों का विस्तार, कला का सुंदर नमूना, नवीन प्रयोग, संवेदना की साफगोई और नव मानवतावाद एक साथ दृष्टिगोचर होता है। गीतकार अपने गीतों में लोक में प्रचलित संज्ञाओं का मानवीकरण कर भावों को नवीनता प्रदान करते हैं तो वहीं समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाकर समाज के हर वर्ग को साहित्य में उसकी समान उपस्थिति दर्ज कराते हैं। वे नगरीय संस्कृति एवं आधुनिकता के दुष्प्रभाव के चित्रण करने के साथ-साथ ठेठ गंवई संस्कृति का भी चित्रण प्रस्तुत करते हैं। उनके गीतों में प्रेम के विविध रूप देखने को मिलता हैं, यहाँ देशप्रेम, वात्सल्य प्रेम, प्रकृति प्रेम ,मर्यादित प्रेम आदि एक साथ दृष्टिगोचर होता है। वे मर्यादित प्रेम के पक्षधर हैं, उनके गीतों में मर्यादित प्रणय संबंधों का सुंदर निर्वाहन मिलता है-

 नेह के उपवन में
 महके जब पारिजात
 शरमा के पूनम का
 चांद जब तमाम रात
 बादलों की ओट में
 हो जाए गुम
 चले आना तुम। 

सामान्यवादी दृष्टिकोण वही अपना सकता है जिसके पास मानवों से प्रेम करने की अपार क्षमता हो, सच को सच कहने और अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने की शक्ति हो। इनके गीतों में निर्धनों के प्रति संवेदना है, किसानों के प्रति आशा है, निम्न जातियों के लिए सहयोग की भावना है-

सिसक कर 
दीवट पे जलता हर चिराग 
रोशनी का वहम केवल ढो रहा है। 

"भूख " देखने में तो बहुत छोटा शब्द लगता है, लेकिन इसके चपेट में आकर कितने लोग अब तक जान गवा चुके हैं। आजादी के इतने साल बाद भी यहाँ भूख से मरने वालों की संख्या अधिक है  । गीतकार गरीबी की कोढ़ "  भूख " का करूण चित्रण अपने गीतों में प्रस्तुत करते हैं-

 बर्तन में
 अदहन का पानी
 गया खौल कर सूख
 बैठी है
 चूल्हे के आगे
 आस लगाए भूख।

आज का मानव, संक्रमण काल से गुजर रहा है । एक तरफ वह समाज की कुरीति, ऑफिस ,बाजार ,सत्ता एवं पूंजी के गठजोड़ आदि से उत्पन्न हुई समस्याओं से जूझ रहा है तो वहीं दूसरी तरफ वह अपने मन के भीतर की व्याधियों से भी दो - दो हाथ कर रहा है। कुंठा, संत्रास, प्यास, वासना एकाकीपन आदि वह व्याधि है जो मानव को लघुमानव की ओर ले जा रहा है -

न ही कोई आहट
न हुई पदचाप 
घुस आया अंतस में 
कहाँ से संताप। 

मन पर नियंत्रण नहीं होने से अतृप्त इच्छाएँ इतनी प्रबल हो जाती हैं कि उसे तृप्त करने के लिए हमें सैकड़ों कुर्बानियां देनी पड़ती है। क्षण- क्षण बदलते मानवों के मन उसे कमजोर करता जा रहा है और वह किसी चीज पर फोकस नहीं कर पा रहा। इनके गीतों में "क्षणवाद" का सुंदर उदाहरण मिल जाता है जो आधुनिक मानव के मन - मस्तिष्क की अस्पष्ट नियति बन चुकी है-

क्षण में याद आया कुछ 
भूल गया फिर क्षण में 
सुबह से शाम तक
बस केवल दर्पण में
निरख-निरख रूप
शरमाने के। 

बहुत कुछ की चाह और मशीनीकरण ने हमें स्वार्थी बना दिया है। हम निज स्वार्थ के लिए रिश्ते, नाते, मां-बाप सब को भूलते जा रहे हैं। रिश्तों  में बिखराव वर्तमान समय की प्रधान समस्या है। संयुक्त परिवार की अवधारणा अब बिल्कुल विलुप्त होने लगी है। संवाद के अभाव में अच्छे - अच्छे रिश्ते टूट जा रहे हैं। गीतकार के गीतों में रिश्तोंं केे टुटन, संवाद का अभाव, नेह का महावर आदि का सुंदर वर्णन मिलता है-

अनंतिम
संवाद -
तो पीछे पड़े हैं
प्रश्नचिन्ह
तमाम
सिरहाने खड़े हैं  ।

जब कोई दोस्ती, रिश्ता या व्यापार स्वार्थ की बुनियाद पर टिकी हो तथा लाभ - हानि का परस्पर अन्योन्याश्रय  संबंध हो, तब "समझौता " की उत्पत्ति होती है। समझौता में हमारा तन तो आपस में साथ रहता है लेकिन मन कोसों दूर चला जाता है।  आजकल राजनीति से लेकर रिश्ते तक सब जगह समझौता ही चल रहा है, इनके गीत समझौतों के गीत हैं-

परिभाषित होने से पहले
टूट गए सपने
और अचीन्हे समीकरण ही
हुए आज अपने 
समझौते पर प्रत्याशाएं
हुईं बहुत मजबूर  । 

अपने समाज से अब तप, दया, करूणा, प्रेम, सद्भाव , सहयोग, मर्यादा आदि जो मानवीय गुण कहा जाता था अब विलुप्त होने की कगार पर है  । मानवों में दानवी गुण दिनों - दिन घर करता जा रहा है  । रामानुज जी के गीत गिरते नैतिक मूल्य के विरूद्ध प्रतिरोध करता  है -

कहिए! किसको कहें आदमी
सिर्फ खड़े हैं ढाँचे जी।
बीच सड़क पर मरे हुओं की
पड़ी हुईं लावारिश लाशें
सब मुंह फेर चले जा रहे
मानवता को कहाँ तलाशें  । 

आधुनिक मानवों को जितना डर दुश्मनों से नहीं है उतना डर उसके अपनों से है  । वे हमारे अपने ही हमारे लिए चक्रव्यूह बनाते हैं और षड्यंत्र में शामिल  भी होते हैं , कहते हैं - "  घर का भेदी लंका ढाए "  ।  इनके गीत  हमें सचेत करता है ,आस्तीन के सांपों को पहचानने की सलाह देता है तथा षड्यंत्र के शिकार होने से बचने का नुस्खा भी प्रदान करता है -

झूठला कर हर नाते
अपनों से बार-बार बच रहे
आए दिन कितने ही व्यूह
विद्रोही अब रच रहे
अभिमन्यु कौन-कौन 
चक्रव्यूह तोड़े। 
नफरत का विष मानव में बचपन से ही भरा जाता है  । बचपन में घरवाले तो युवावस्था में मीडिया, सोशल साइट ,अराजक तत्व और राजनीति नफरत की आग भड़का कर उन्हें दिग्भ्रमित करते हैं । हम आज बारूद के पेड़  पर चढ़े बैठे हैं जिसे वर्षों से नफरत पोषित करती आई है  । गीतकार के गीत नफरत की मायावी पेड़ से वापस उतरने का मार्ग बताते हैं-

आंधियाँ नफरत की 
इतनी बहीं तेज
उड़ गए हर संहिता
के पेज-पेज 
रह गए अवशिष्ट पन्ने
रक्त-रंजित पाठ के । 

नफरत की आग में सबसे ज्यादा जनता ही जलती है। जनता को इस लोकतंत्र में सिर्फ वोट डालने के लिए रखा गया है। नेता हर बार कुछ नया जुमला फेक कर हमें बेवकूफ बना जाते हैं और फिर अगले चुनाव में ही वो अपना मुंह  दिखाते हैं। इनके गीतों में लोकतंत्र के गिरते स्तर, चुनावी हथकंडा, राजनेताओं का दोहरा चरित्र, कागज पर विकास ,कथनी करनी में फर्क तथा जनता की स्थिति का जीवंत चित्रण है-

देख रहा सपने रोटी के 
भूखा प्यासा मतदाता है 
पाकर चुपड़ी का आश्वासन 
वह लालच में फंस जाता है
देकर  मत  फिर भस्मासुर को
बन बैठा है औघड़दानी। 

 समाज धीरे-धीरे  बदल रहा है, एक वर्ग  जो बरसों से शोषित होता आया है उसमें भी अब जागृति आने लगी है, कीचड़ में ही कमल खिलने लगा है और अंधेरी बस्ती में भी अब चिराग जलने लगे हैं। इनके गीतों में इस परिवर्तन को सकारात्मक रूप से वर्णित किया गया है।प्राचीन परंपरा, वर्जना और रूढ़ियों के टूटने से गीतकार खुश नजर आ रहे हैं क्योंकि कहा गया है- "परिवर्तन ही संसार का नियम है।"

टूटा हवाओं का सिलसिला 
लहरों का एक पृष्ठ फिर खुला
सागर की नादान बेटियों ने 
चुपके से लिख दिया नाम।

जब बच्चों का सही से परवरिश नहीं हो पाता है तब वह अंधकार से हाथ मिला लेता है  । सही परवरिश के अभाव में समाज में न जाने कितने चोर, उचक्के, आतंकवादी पैदा हो रहे हैं  । रामानुज जी के गीत इस समस्या से भी हमें रूबरू कराता है-

अरमानों के पारिजात पर 
अंगारों के फूल खिले
रोशनीयों के बालिग बेटे 
अंधकार से गले मिले। 

इनके गीतों में एक कलाकार का सूखा जीवन, संघर्ष, स्वाभिमान आदि का भी जिक्र मिलता है  । एक कवि या साहित्यकार  कैसे एकाकी होकर साहित्य की सर्जना करता है, आम जन की आवाज बनता है ,लोगों के चेहरे पर खुशी लाता है; लेकिन उसके जीवन में क्या चल रहा है उसके बारे में कोई पूछने वाला नहीं है-

आहिस्ता खोलता है
डायरी के पन्ने 
कलम के कान जब 
हो जाते हैं चौकन्ने
फिर कुछ लिखता है 
लिख-लिख कर खोता है 
जब गांव सोता है। 

साहित्य में सब नाम नहीं कमा सकता, सब अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करवा पाते । साहित्य में आलोचकों की कलम, नेताओं की सिफारिश ,क्षेत्र का प्रभाव तथा चाटुकारिता भी हावी है  । परिणामतः अच्छी -अच्छी प्रतिभा जमींदोज हो जाती हैं, उसे फलने से पहले ही कुचल दिया जाता है ;रामानुज जी के गीत इस तरफ भी इशारा करता है -

सर्जना तो हुई है आज तक गगनचुंबी
किंतु पक्षधरता की गंध आ समाई है  ।

भाव पक्ष की ही तरह शिल्प पक्ष भी इनके गीतों में लाजवाब है। भाषा तत्सम प्रधान और लोकाधर्मी है, प्रतीकों का सुंदर प्रयोग यहाँ मिलता है - शबनम, पारिजात, शब्द ,तूलिका, रेत,दर्पण ,अहेरी, शिलालेख आदि इनके प्रिय प्रतीक हैं। प्रतीक उनके गीतों को सजीवता प्रदान कर भाव का नया मार्ग  खोलते हैं-

समेटे चुप्पी नियति की खिड़कियाँ
सह रहीं रुठे समय की झिड़कियाँ
घुन गए तकदीर के अमृत किवाड़े
कौन सांकल खटखटाए 
कौन खोले?

अगर अलंकार की बात करें तो यहाँ उपमा, रूपक, अनुप्रास, मानवीकरण का सुंदर प्रयोग मिलता है। 
 प्रकृति का मानवीकरण इनके गीतों में सुंदर तरीके से अभिव्यक्त होता है। चांद के मानवीकरण का सुंदर उदाहरण देखें-

 सांझ हुई अवसन्न 
 पत्थरों पर चुप्पी बोकर।

 रातों की आजानुबाह में
 सिमटी दसों दिशाएँ
 शायद छप्पन भोग लिए
 शशि की बालाएं आएं। 

अभिधा में कम , लक्षणा और व्यंजना में इनके गीत अधिकतर हैं। लक्षणा एवं व्यंजना का सुंदर प्रयोग व्यंग्य और प्रस्तुत-अप्रस्तुत योजना के लिए किया गया है-

 सुना, तुम्हारी मटकी में
 कुल सात - समुंदर हैं!

अंततः यह कहा जा सकता है कि रामानुज जी मानवीय संघर्ष और उल्लास  के गीतकार हैं। इनके गीत आधुनिक मानव की नियति एवं नियत का जीवंत दस्तावेज है। इनके गीतों में नव मानवतावाद के विविध पक्षों का विस्तार पूर्वक वर्णन मिलता है। वीरेंद्र मिश्र के शब्दों में कहें तो इनके नवगीत "आस्थाशील अनुभूतियों का निर्बंध समवेत स्वर हैं।" 

सत्यम भारती
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
नई दिल्ली, 110067
मो. - 8677056002.

सोमवार, 29 अक्टूबर 2018

कवि रामानुज त्रिपाठी की पुण्यतिथि पर पुस्तक लोकार्पण,सम्मान समारोह एवं साहित्यिक संगोष्ठी


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सुलतानपुर 08 जुलाई।
रामानुज त्रिपाठी सृजन संस्थान गरयें,सुलतानपुर उप्र की ओर से कवि रामानुज त्रिपाठी की 15वीं पुण्य तिथि पर 08 जुलाई 2018 को 'क्षत्रिय भवन सभागार' में पुस्तक लोकार्पण, साहित्यकार सम्मान समारोह , साहित्यिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।कार्यक्रम का प्रारम्भ माँ सरस्वती एवं रामानुज त्रिपाठी के चित्रों पर अतिथियों द्वारा माल्यार्पण और दीप प्रज्ज्वलन से हुआ।संचालक डॉ शोभनाथ शुक्ल ने अतिथि साहित्यकारों का परिचयात्मक स्वागत करते हुए कहा कि "यह आयोजन एक ऐसे गीतकार-बालकवि की पुण्य तिथि को समर्पित है जिनके गीत मानवीय अस्मिताबोध की भावना से भरे हुए हैं।प्रकृतिकामा सौंदर्य और नेह जहाँ अपने पूरे वजूद में प्रतिबिम्बित हुए हैं,वहीं भूख,प्यास और जन अभावों की प्रश्नगत मौजूदगी है,जो धीरे से हमारे अदृश्य भावबोध का विषय बन जाती है।"  इस अवसर पर तीन सत्रों में चले समारोह के प्रथम सत्र के कार्यक्रम में रामानुज त्रिपाठी की स्मृति में संस्था के संरक्षक चित्रेश, अध्यक्ष अवनीश त्रिपाठी एवं छाया त्रिपाठी ओझा द्वारा गीतकार रमाकांत सिंह को गीत साहित्य सम्मान, कविताकोश के सम्पादक राहुल शिवाय को नवगीत साहित्य सम्मान, रविशंकर मिश्र को गीत साहित्य सम्मान तथा आलम आजाद को हिंदी साहित्य सम्मान से अंगवस्त्रम एवं प्रतीक चिन्ह प्रदान कर सम्मानित किया गया।
ततपश्चात छाया त्रिपाठी ओझा (फतेहपुर) के गीत संग्रह ‘अक्षर-अक्षर गीत’ एवं डाॅ0 शोभनाथ शुक्ल द्वारा संपादित पत्रिका कथा समवेत के नवीन अंक का लोकार्पण आचार्य ओम नीरव,रमाकांत सिंह,छाया त्रिपाठी, संजीव ओझा, राहुल शिवाय,धीरज श्रीवास्तव, डॉ शोभनाथ शुक्ल,डॉ ओंकारनाथ द्विवेदी, डॉ सुशील कुमार साहित्येन्दु,डॉ कैलाशनाथ मिश्र, उमाकांत पाण्डेय, संस्था के अध्यक्ष अवनीश त्रिपाठी एवं संरक्षक कथाकार चित्रेश द्वारा किया गया। 'अक्षर अक्षर गीत' संग्रह पर गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए आचार्य ओम नीरव ने कहा कि 'छाया त्रिपाठी ओझा के गीतों में गीत विधा का शिल्प और भाव पक्ष अपने उत्कर्ष पर मौजूद है।'अक्षर अक्षर गीत' के गीतों को देखकर लगता है कि उन्होंने इन गीतों को केवल लिखा ही नहीं है, अपितु जिया भी है।' इसी क्रम में 'अभिदेशक' पत्रिका के संपादक डॉ ओंकारनाथ द्विवेदी ने कहा कि "हृदय की घनीभूत पीड़ा,मन की एकाग्रता में बंधकर जब भाषा में ढलती है,तो गीत बन जाती है।इस भावभूमि पर छाया त्रिपाठी ओझा के गीत कोमल कल्पनाओं एवं सम्वेदनाओं के कारण बड़े मार्मिक और प्रभावकारी बन पड़े हैं।" इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए कविताकोश के संपादक नवगीतकार राहुल शिवाय ने रामानुज त्रिपाठी के नवगीतों में व्याप्त बिम्बों और प्रतीकों के अनूठे प्रयोग की चर्चा की और साथ ही छाया त्रिपाठी के गीतों पर टिप्पणी करते हुये कहा "चकवाल की भूमिका में दिनकर जी ने कहा था कविता का अगला पथ बेला और चमेली के कुँज से नहीं समर्थ बुद्धि की कड़ी चट्टान से होकर गुजरेगी और यह बात सच भी हुई। कविता/गीत/नवगीत ने खुद को पाषाण बना लिया है। पर रामानुज त्रिपाठी के नवगीत ने ऐसी राह चुनी है जिसमें असामाजिक तत्वों पर प्रहार भी है और बेला-चमेली की गंध भी। प्रकृति से जुड़े प्रतीक और बिम्ब इन्हें पुराना नहीं होने देते।आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा है कवि या साहित्यकार अपनी रचनाओं में भले ही कुछ लिखना चाहे पर लिख वह देता है जो उसके अंदर होता है। वह अपनी व्यक्तिगत पहचान से कविता को मुक्त नहीं कर पाता।संवेदनशील और सामाजिक भावप्रधानता के कारण छाया त्रिपाठी ओझा के गीतों में करुण तत्व की प्रधानता है।" इसके पश्चात परिचर्चा के केंद्र में रामानुज त्रिपाठी के नवगीत संग्रह 'धुएँ की टहनियाँ' पर व्याख्यान देते हुए कवि-आलोचक शुभम श्रीवास्तव ओम ने इस संग्रह के गीतों को प्रतिबिम्बों की वसीयत मानते हुए कहा "आज किसी भी कृति का आकलन करते हुए यह ध्यान रखा जाना आवश्यक है कि कृतिकार ने अपने समकाल को कितना शब्दायित किया है।'धुएँ की टहनियाँ' में व्यक्त 'धुआँ' निराशा या विषाद का प्रस्तुतिकरण नहीं अपितु उस क्रांति का उद्घोषक है जिसमें रचनाकार की समस्त परिवर्तनकामी इच्छाएँ निहित हैं।" आलोचक उत्कर्ष सिंह ने चर्चा करते हुए कहा "स्वर्गीय कवि रामानुज शब्दों की अर्थवत्ता के प्रति अत्यन्त सचेत हैं । उनके काव्यजगत में शब्दों के मूलार्थ और ध्वन्यार्थ का समायोजन एक प्रमुख समस्या के रुप में उभर कर सामने आता है । क्योंकि शब्दों का ध्वन्यार्थ सामाजिक परिवेश से नियोजित होता है अतः रामानुज इतिहास के विश्लेषण की ओर भी झुकाव रखते हैं किन्तु इतिहास के विश्लेषण मे वे किसी विशेष मतवाद या विचार- सरणी  से कतई प्रभावित नहीं दिखते , वे इतिहास को शाश्वत मानवीय समस्याओं यथा भूख और रोटी के सन्दर्भ में समझने का प्रयास करते हैंं । वास्तव में ये तत्व ही इतिहास की चालक शक्तियां हैं जो समय को हमेशा गतिमान बनाऐ रखती हैं । इतिहास को उसकी सामान्यता में समझने का प्रयास ही कवि रामानुज की विशेषता है और समकाल के लिऐ उपयोगी भी।" कथाकार चित्रेश के कहानी संग्रह 'अंधेरे के बीच' पर व्याख्यान देते हुए आलोचक डॉ0 रामप्यारे प्रजापति ने कहा "यह कहानी संग्रह ग्रामीण पृष्ठभूमि और लोक की परिवीक्षा करता है तो साथ ही ग्रामीण परिवेश में व्याप्त आर्थिक और सामाजिक असन्तुलन को भी उद्घाटित करता है।" सत्राध्यक्ष गीतकार रमाकांत सिंह ने कहा कि "कवि रामानुज त्रिपाठी की प्रत्येक पुण्यतिथि पर साहित्यिक आयोजन उनके लिए सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।इसे यदि सारस्वत श्राद्ध कहें तो गलत नहीं है।'इस सत्र के संचालक डॉ0 शोभनाथ शुक्ल ने रामानुज त्रिपाठी के साहित्यिक परिदृश्य पर बोलते हुए कहा '' यूं तो न कभी साहित्य मरता है, न साहित्यकार  पर विस्मृति की काली खोहों से धुएं की टहनियाँ हटा कर यादों के चन्दन वन  को रौशन किया ही जाना चाहिए, अवनीश त्रिपाठी की यही कोशिश आज के लिए एक जरुरी साहित्यकार रामानुज को सबसे बड़ी श्रद्धांजलि है।"
         दूसरे सत्र में कवि रामानुज त्रिपाठी की स्मृति में संस्था के संरक्षक चित्रेश द्वारा बालपत्रिका 'लल्लू जगधर' के सम्पादक प्रेमचन्द्र गुप्त विशाल, अरविन्द कुमार साहू, योगेन्द्र मौर्य को अंगवस्त्रम एवं सम्मानपत्र प्रदान करके 'बाल साहित्य सम्मान' एवं डॉ0 सुशील कुमार साहित्येन्दु को 'हिंदी साहित्य सम्मान' से सम्मानित किया गया। तत्पश्चात रामानुज त्रिपाठी के बालकविता संग्रह 'जंगल का स्कूल' पर समीक्षात्मक टिप्पणी में बन्धु कुशावर्ती ने कहा "रामानुज त्रिपाठी की कविताएँ प्राकृतिक, बालमनोवैज्ञानिक एवं बचपन के समाज को जीने वाली कविताएँ हैं।वे सीधे अपनी बात कहते हुए बच्चों के मन मे समा जाती है।'' इसके पश्चात 'बाल साहित्य पत्रकारिता एवं वर्तमान बाल साहित्य की दशा' विषय पर मुख्य वक्ता अरविंद कुमार साहू ने कहा कि "बालसाहित्य पत्रकारिता का विषय बहुत विशाल व उद्देश्यपूर्ण है।लेकिन बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिये इसे भी वर्गीकृत किया जाना आवश्यक है। बाल पत्रकारिता, बालसाहित्य पत्रकारिता, बाल सूचनात्मक साहित्य,बाल रचनाकारों व बाल साहित्यकारों की गतिविधियाँ को वर्गीकृत करके बाल समाचार पत्रों की अवधारणा पर बल दिया जाना चाहिये। बच्चों की जिज्ञासा, कल्पना और साहसिक जिजीविषा के साथ ही बालसाहित्य के स्वरूप , उसके विविधीकरण व इतिहास पर अलग - अलग कार्य अधिक उपयोगी रहेगा।" इस सत्र के संचालक ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह 'रवि' ने चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि "टी.वी.और इंटरनेट ने बच्चों की शारीरिक क्षमता का ह्रास किया है । आज बाजार में बाल साहित्य की मांग बढ़ी है इसलिये इसमें गुणवत्ता का विशेष ध्यान रखना होगा"। सत्राध्यक्ष आद्या प्रसाद सिंह प्रदीप ने बाल साहित्य की उपेक्षा पर चिंता भी जताई और कहा कि "बाल साहित्य युवाओं के लिए बौद्धिक उर्जा प्रदान करता है।" सत्रांत में नवोदित बाल कवयित्री साक्षी शुक्ला ने ‘चारों ओर छा रहे बादल, घिर घिर तड़प रहे हैं बादल’ बालकविता का पाठ किया। ततपश्चात आशुकवि मथुरा प्रसाद सिंह जटायु के संचालन में काव्यपाठ हुआ।जिसमें कवियों और गीतकारों ने अपनी रचनाओं का पाठकर श्रोताओं की खूब तालियाँ बटोरी।अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए संस्था के अध्यक्ष और कार्यक्रम के आयोजक अवनीश त्रिपाठी ने कहा "किसी भी साहित्यकार की साहित्यिक विरासत को संभालना केवल उसके परिवार का दायित्व नहीं बल्कि सम्पूर्ण साहित्यजगत का है।इस दायित्व के निर्वहन में सहयोगी और कार्यक्रम में उपस्थित समस्त लेखक, रचनाकार एवं श्रोता बाबूजी की पुण्यतिथि पर उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देते हुए धन्यवाद के पात्र हैं। इस अवसर पर साहित्यकार डॉ कैलाशनाथ मिश्र, कथाकार वीरेंद्र त्रिपाठी, साहिल मिश्रा, व्यंग्यकार हनुमान मिश्र, आलोचक सुरेश चन्द्र शर्मा, हरगोविन्द सिंह, देव नारायण शर्मा, डॉ करूणेश भट्ट, संदीप सिंह, संगीता शुक्ला, प्रिया मिश्रा, प्रीति तिवारी, पिंकी त्रिपाठी, दिलीप सिंह, शैलेन्द्र तिवारी, दयाराम अटल, सत्यदेव तिवारी,लक्ष्मीनारायण मिश्र, तालुकदार सिंह, परमहंस सिंह, राजेन्द्र उपाध्याय, इकबाल भारती, यतीन्द्र प्रताप शाही, श्रीकांत मिश्र, अब्दुल मन्नान, ओम प्रकाश सिंह, देवेंद्र सिंह, राम शरण मिश्र, शैलेश पाल, कुंवर सुल्तानपुरी, समाजसेवी करतार केशव यादव और डॉ0 लक्ष्मण गांधी, सत्य प्रकाश गुप्ता,अब्दुल रहमान आदि विशेष रूप से उपस्थित रहे।

शनिवार, 8 जुलाई 2017

सम्मान समारोह एवं साहित्यिक संगोष्ठी 2017 सुल्तानपुर उप्र

      पंडित रामानुज त्रिपाठी सृजन संस्थान, गरएं,सुल्तानपुर,उप्र द्वारा कीर्तिशेष बालसाहित्यकार एवं गीतकार कवि रामानुज त्रिपाठी की 13वीं पुण्य तिथि पर 08 जुलाई 2017 को साहित्यकार सम्मान समारोह, पुस्तक लोकार्पण एवं विचार गोष्ठी का आयोजन जिला पंचायत सभागार, सुलतानपुर में किया गया| इस  अवसर पर देश प्रदेश के कई साहित्यकार भाग लिए | सम्पूर्ण कार्यक्रम दो सत्रों में विभाजित था जिसमें पहला सत्र बाल साहित्य पर और दूसरा सत्र  नवगीतों पर आधारित था| पहले सत्र में  रामानुज त्रिपाठी के बालगीत संग्रह "जंगल का स्कूल" और मासिक पत्रिका "बालवाटिका" के जुलाई अंक का लोकार्पण और दूसरे सत्र में आद धीरज श्रीवास्तव जी एवं आदरेया डॉ मंजु श्रीवास्तव जी द्वारा सम्पादित गीत-संकलन "नेह के महावर" और बाबूजी रामानुज त्रिपाठी के नवगीत संग्रह "धुंए की टहनियां" का लोकार्पण हुआ| दोनों सत्रों के विचार पक्ष को विभिन्न साहित्यकारों ने सम्बोधित किया| दोनों सत्रों का कुशल संचालन युवा आलोचक एवं समीक्षक साहित्यकार ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह रवि जी ने किया।
प्रथम सत्र:-----------
संस्थान द्वारा आद0  डॉ.भैरूंलाल गर्ग, आद0 आद्या प्रसाद सिंह प्रदीप जी, आद बन्धु कुशावर्ती जी, आद श्याम नारायण श्रीवास्तव जी एवं आद0 फतह सिंह लोढ़ा जी को बाल साहित्य सम्मान 2017 से सम्मानित किया। बाल साहित्य की वर्तमान प्रासंगकिता पर बोलते हुये वरिष्ठ बालकथाकार दिनेश प्रताप सिंह चित्रेश का कहना था "आज हम बच्चों को शिक्षा देने और उसे प्रौढ़ बनाने के नाम पर अधिक से अधिक बोझ के नीचे दबा रहे हैं| यहाँ बच्चे बौद्धिक न होकर कुंठित होने लगते हैं| हमें बच्चों को इस कुंठा से बचाने के लिए बाल साहित्य से जोड़ना होगा| इसे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि बाल साहित्य न के बराबर लिखे जा रहे हैं| घुमन्तू जातियों, दलितों और बंजारों पर तो लिखे ही नहीं जा रहें हैं| इसके लिए प्रत्येक प्रदेश सरकार को अपने अपने तरीके से प्रयत्न करना चाहिए| लखनऊ के आद बंधु कुशावर्ती का कहना था " रामानुज त्रिपाठी रामनरेश त्रिपाठी के बाद बाल साहित्य के इस जिले के बड़े महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं|" डॉ० शोभनाथ शुक्लजी ने त्रिपाठी जी के बाल साहित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा "बाल साहित्य पढ़ते हुए मुझे हमेशा लगता है कि दो प्रकार के उद्देश्य होने चाहिए जिसमें पहला-बच्चों का मनोरंज करना और दूसरा ज्ञान देते हुए बच्चों को सचेत करना| रामानुज त्रिपाठी के बाल साहित्य की बड़ी विशेषता रही है कि वे मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान देते हुए सचेत भी करती हैं|" मुख्य अतिथि के रूप में बालवाटिका पत्रिका के संपादक डॉ० भैरूं लाल गर्ग जी ने संस्मरण साझा करते हुए कहा "रामानुज त्रिपाठी के बाल साहित्य से परिचय बालवाटिका पत्रिका से ही संभव हो सका| उनकी चिट्ठियां बड़े आदरपूर्ण और सम्मान से सुन्दर हस्तलिखित प्रारूप में आती थीं| मैं सहसा देखकर यह विश्वास कर बैठता था की यह किसी मेहनती रचनाकार का खत है और उसे बड़े  मनोयोग से प्रकाशित करता था|" विशिष्ट अतिथि के रूप में राजस्थान के आद फतह सिंह लोढ़ा जी  ने कहा  "भारतवर्ष में अनेक लेखक थे,  हैं और  रहेंगे लेकिन पिता के साहित्य को आगे लाने वालों को उँगलियों पर गिना जा सकता है| रामानुज त्रिपाठी के साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने में अवनीश त्रिपाठी का बड़ा योगदान रहा है इसीलिए वे बधाई के पात्र हैं|"  प्रथम सत्र का अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ बाल एवं अवधी साहित्यकार आद्या प्रसाद सिंह 'प्रदीप' जी का कहना था कि "बाल साहित्य आज से नहीं आदि काल से रचा जा रहा है जिसे समृद्ध करने में रामानुज त्रिपाठी जी की बड़ी भूमिका रही है|"    
       द्वितीय सत्र:-------
आद ओम नीरव जी, डॉ सूर्यदीन यादव जी, आदरेया डॉ मंजु श्रीवास्तव जी, आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी को शॉल,पुष्पमाला एवं सम्मानपत्र देकर साहित्य सम्मान 2017 से सम्मानित किया गया।
    समीक्षक एवं आलोचक सुरेश चंद्र शर्मा ने बाबूजी रामानुज त्रिपाठी जी के नवगीतों में मानवीय संवेदना के पक्ष को रखते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला| चंडीगढ़ विश्वविद्यालय के शोधार्थी समीक्षक अनिल पाण्डेय ने कहा - "नवगीतों में आत्मकथ्य और मानवीय संवेदनाएं तलाशनी हों तो कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है,बस रामानुज जी के गीत पढ़ें।" वरिष्ठ साहित्यकार डा.सुशील कुमार पांडेय जी का कहना था "पंडित रामानुज त्रिपाठी जी प्राचीन परम्पराओं के पथ पर अग्रसर हैं| उनके नवगीत कल के प्रतीक पर आज की सच्चाई है| इस सत्र के  मुख्य अतिथि कवितालोक लखनऊ के संस्थापक आदरणीय आचार्य ओम नीरव जी ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए कहा कि "नवगीत और बाल कविता में  उनका स्वरुप अलग दिखता है| बच्चे  के अंदर प्रवेश करना परमहंस हो जाना है| पंडित जी इसके अनुकरणीय उदहारण हैं| यह कार्यक्रम एक पुत्र द्वारा पिता जी को श्रद्धांजलि ही नहीं समाज पर भी एक उपकार है|" द्वितीय सत्र में विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर मंजू श्रीवास्तव रहीं और अध्यक्षता नाडियाड गुजरात के वरिष्ठ उपन्यासकार डॉ० सूर्यदीन यादव ने की| मंच का सञ्चालन युवा समीक्षक ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह रवि और सरस्वती वंदना करुणेश भट्ट ने किया| कार्यक्रम  में आशुकवि आद मथुरा प्रसाद सिंह ' जटायु ' , डॉ० रामप्यारे प्रजापति, जगदीश प्रसाद श्रीवास्तव, डॉ० देवनारायण शर्मा, आद उमाशंकर शुक्ल जी, आद उमाकांत पांडेय जी, डॉ० ओंकार नाथ द्विवेदी, आद जयंत त्रिपाठी, डॉ० लक्ष्मण गाँधी, सुधा त्रिपाठी,आद वीरेंद्र कुमार त्रिपाठी जी,प्रीति त्रिपाठी,प्रशंसा शुक्ला,रचना शुक्ला, आदि प्रमुख रुप से  उपस्थित रहे|
आभार ज्ञापन आयोजक के रूप में मैंने किया ।

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

कीर्तिशेष नवगीतकार रामानुज त्रिपाठी जी के नवगीतों पर संवेदनात्मक आलोक समूह में चर्चा

।। विशेषांक एक दृष्टि ।।
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विरासत से...
।। इस बार : स्मृतिशेष-रामानुज त्रिपाठी ।।
                      【78】
  वाट्सएप पर संचालित एवं अपने फेसबुक संस्करण में क्रियान्वित 'संवेदनात्मक आलोक' नवगीत साहित्य विचार समूह के लोकप्रिय रविवारीय विशेषांक अन्तर्गत प्रकाशित *'मेरी अपनी पसंद'* का 78वां अंक आपके हाथों में सौंपते हैं।
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      "यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि एक समय था जब मुझे रामानुज त्रिपाठी जी की रचनाओं की प्रतीक्षा रहती थी। वह भी इसलिए कि वे गीत नवगीत एक कवि-गीतकार के होते थे जो अपने रचनाधर्म में ही खोया हुआ था। उन्हें मैं जानता न था और न ही देखा था लेकिन यह कभी महसूस ही नहीं हुआ कि त्रिपाठी जी कभी मिले न हों यह उनकी रचनाओं का गहन प्रभाव था। उनके गीत यह बताते हैं कि वे केवल कवि होने के लिए ही जन्मे थे और कवि के सिवा और कुछ हो ही नहीं सकते थे। कहना चाहिए कि आज जब लिखने बैठा हूँ तो विस्मृति के पन्नों से निकलकर यादें उस गंवई कवि के विषय में फिर से जानने परखने का निमंत्रण दे रही हैं जिसके पास प्रांजल भाषा के साथ साथ बिम्बों और प्रतीकों के प्रयोग की अद्भुत क्षमता थी। परम्परा और आधुनिकता के मध्य एक सार्थक पुल का निर्वहन था। वे गाँव के तालाब के किनारे खड़े छतनार वृक्ष तरह ऐसे गीतकार थे जो कि उर्वर जमीन से रस एवं शक्ति का संचय करते हुए सदैव ही साहित्य के आकाश की ओर उन्मुख रहे।
       
        त्रिपाठी जी के नवगीतों में आंचलिक व्यञ्जना, लोकतत्व, आधुनिक बोध, समकालीन चेतना, सामाजिक सरोकार और नए प्रयोगों से भरपूर नवता, सहज संप्रेषणीयता के साथ संपृक्त होती हैं।तात्कालिक घटनाओं का विवरण भी पूर्णतः उपलब्ध हुआ है। सृजन में संवादात्मक शैली का उत्कृष्ट नियोजन देखने को मिलता है। उनकी भाषा की भंगिमाएं, रंग और तेवर बदलते रहते हैं। उसमें नई लक्षणाएँ और बिम्ब नज़र आने लगते हैं, मोहक कल्पनाएं वैचित्र्य भरा कौतुक भी। गीतों का अद्भुत सौंदर्यबोध अपने साथ बांधे रखता है। उन्होंने अपने रचना संसार में छन्द और लय का ढीलापन भी कभी स्वीकार नहीं किया और इसके लिए हम उन्हें सदैव चौकन्ना पाते हैं। त्रिपाठी जी अपनी धूसर गंवई जमीन से उठकर आधुनिक साहित्य के विभिन्न रंगों से भरे आकाश में पहुंचाते हैं और बहुत कुछ हासिल करके दिखा देते हैं जो आज हममें से बहुतों को हैरान करता है।"
                        प्रकाश मनु
             आलोचक, विमर्शक-सर्जक
                  फरीदाबाद [हरियाणा]
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       स्मृतिशेष-रामानुज त्रिपाठी जी से उनकी प्रभावशील रचनाधर्मिता के कारण पाठकीय तौर पर मेरे अत्यन्त आत्मीय सम्बन्ध रहे हैं। कभी-कभार पत्र-व्यवहार भी। उन दिनों जब उनकी लेखनी अपने चरम सीमा पर लेखन कार्य में संलिप्त थी। वे वीणा, युगधर्म, माधुरी, नवनीत, आजकल, सरिता, राजस्थान पत्रिका, अछूते सन्दर्भ, कादम्बिनी, समांतर, हरिगंधा, मुक्ता, रविवारीय परिशिष्ट में दैनिक भास्कर, नवभारत, देशबन्धु या यह कहूँ कहीं भी उनकी रचनाएँ पढ़ने को मिल जाया करतीं थीं।

       यह समय सन् 1984 से 95 का रहा है। मैं उन दिनों शहडोल जिले में एक कस्बे के पास गाँव सामन्तपुर में रहकर स्कूल शिक्षा विभाग में अपनी सेवाएँ देता था। आदर. रामानुज त्रिपाठी जी के नवगीतों से मैं बहुत प्रभावित था। नवगीत को जानने, समझने उसकी बारीकियों को पकड़ने के प्रयास में कई गीतकारों से सम्पर्क करना फिर मेरी आदत में शामिल गया। बुढ़ार एक आद्योगिक क़स्बा है जहाँ मेरे कुछ साहित्यिक मित्र बन गये और शहडोल वहाँ से चालीस किलोमीटर दूर था। कभी किसी भी रविवार या शासकीय अवकाश में मुझे अपने हैडक्वाटर को छोड़ना ही होता था। एक नशा था अच्छा कुछ पढ़ने और अच्छे साहित्यकारों के बीच रहकर उनसे नया कुछ सीखने का। यह क्रम लगातार दस वर्ष निरन्तर जारी रहा।

    फिर ऐसे भी अवसर आए जब मैं कई पत्र-पत्रिकाओं में रामानुज त्रिपाठी जी आजू-बाजू हम दोनों एक साथ भी प्रकाशित हुए। उनके साथ मेरी रचनाओं का छपना यह मेरा सौभाग्य ही था। मेरी राज्य शासन स्कूल शिक्षा विभाग में सेवा होने केे कारण मेरे लगातार कई स्थान्तरण हुए। फिर स्थानांतरण भी ऐसी जगह पर हुये जहाँ मैं प्रिन्ट और इलेक्ट्रानिक मीडिया दूर हो गया। जीवन की इस आपाधापी ने उस समय मुझसे बहुत कुछ छीना। उन दिनों मैं खुद भी एक मौसमी कवि था। लेखन वह भी कभी कभार हो पाता था। हाँ! पढ़ने का शौक अवश्य था। डाक से कुछ पत्र पत्रिकाएँ आती रहती थीं। पर! उन्हें पढ़ने का समय नहीं। घर-परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ पाँव जकड़े रहते थे।

        वाट्सएप समूह 'संवेदनात्मक आलोक' का हार्दिक धन्यवाद। हमारे समूह के सक्रिय सदस्य प्रिय भाई अवनीश त्रिपाठी जी से मेरी मोबाइल पर हुई चर्चा से मुझे ज्ञात हुआ कि..वे वरिष्ठ नवगीतकवि रामानुज त्रिपाठी जी के सुपुत्र हैं। रामानुज त्रिपाठी जी अपनी रचनाधर्मिता में एक ओर जहाँ गाँव के माटी की खुशबू है वहीं वे दूसरी ओर वे सामाजिक सरोकारों से गहरे जुड़े रहे हैं। मैं उनकी समृद्ध कलम को शत-शत प्रणाम करता हूँ।।
                    ■ रामकिशोर दाहिया
                          कटनी [म.प्र]
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  'संवेदनात्मक आलोक' समूह पटल पर सुधी पाठकों एवं मूर्धन्य साहित्य मनीषियों के समक्ष विशेषांक चर्चार्थ प्रस्तुत है। आप अपने भाव एवं विचार समीक्षात्मक टिप्पणी के रूप में पटल पर अवश्य देने का कष्ट करें। आपकी भावनात्मक रूप से हमें सम्बल देने के साथ मंच पटल को समृद्ध बनाती है।

    टिप्पणी के अंत में अपना नाम और स्थान अवश्य लिखें, जिससे हम उसे अपने अन्य प्रतिष्ठित संस्करणों के साथ 'संवेदनात्मक आलोक ब्लॉग' में भी सम्मानपूर्वक प्रकशित कर सकें। धन्यवाद सहित।
        दिनांक 04 दिसम्बर 2016
 
                     ■ रामकिशोर दाहिया
                          प्रमुख संचालक 
                    *संवेनात्मक आलोक*
                   सदस्यता हेतु वाट्सएप मोबा.
                    097525-39896
                    🌏📚✍🙏�
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*।। संक्षिप्त जीवन परिचय ।।*
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नाम : रामानुज त्रिपाठी।
जन्म-10 जून 1946 ई0।
पिता: स्व.रामजनक त्रिपाठी।
माता : स्व.धनपत्ती देवी।
लेखन-1965 से 2004 तक।
*शिक्षा :*
गोरखपुर विश्वविद्यालय से कला स्नातक एवं आई.जी.डी.बॉम्बे ड्रॉइंग, 1970 से 2004 तक इण्टर कालेज में प्रशिक्षित स्नातक अध्यापक।
*देहावसान* : 08 जुलाई 2004 ई0 इलाहाबाद में।

*प्रमुख प्रकाशन-*
[1] 'यादों का चन्दनवन' 2009 गीत-नवगीत संग्रह। [2] 'धुएँ की टहनियाँ' नवगीत संग्रह। प्रकाशन की ओर। [3] 'नेह का महावर' समवेत संकलन रामानुज त्रिपाठी जी को समर्पित 2016।
    
*अन्य प्रकाशन*:
देश की समस्त श्रेष्ठ पत्रिकाओं सारिका, नई कहानियां, निहारिका, नवनीत, सरिता, समांतर, वीणा, संकल्प रथ, अछूते सन्दर्भ, कादम्बिनी, हरिगन्धा, राष्ट्रधर्म, काव्यम, उत्तरायण आदि पत्र-पत्रिकाओं में गीत, नवगीत, हिन्दी ग़ज़लें, दोहों का अनवरत प्रकाशन। अनेकों समवेत संकलनों 'गीतदशक', 'संदीपनी', 'भोर की आहट', 'समय की शिला पर', 'हिंदी के मनमोहक गीत' '280 साहित्यकार', 'गीत वसुधा'  'स्वरत्रयी', 'काव्यभारती', 'हिंदी ग़ज़ल एक प्रतिमान' आदि में रचनाएँ चयनित एवं संकलित।

*बाल साहित्य-*
[1] 'जंगल का स्कूल' बालगीत संग्रह।
[2] 'बाल साहित्य समीक्षा' और 'बालवाटिका' दो बाल पत्रिकाओ के अंक केंद्रित। नंदन, बालवाटिका, बालभारती, बालहंस, देवपुत्र सहित समस्त प्रतिष्ठित बाल पत्रिकाओं में निरन्तर बालगीतों एवं बाल कविताओं का प्रकाशन। 'प्रतिनिधि बालगीत' में रचनाएँ संकलित।

*पुरस्कार/सम्मान :*
अखिल भारतीय स्वतंत्र लेखक मंच स्लेम द्वारा 'काव्य साधना'। पानीपत साहित्य अकादमी द्वारा 'आचार्य'। भाव सृष्टि समिति रामपुरा द्वारा 'काव्य किरीट' सम्मान सहित अनेक साहित्यिक-सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं अभिनन्दित। 'नागरी बाल साहित्य संस्थान बलिया', 'भारतीय बाल कल्याण संस्थान कानपुर'। 'बाल साहित्य संस्कृति और कला विकास संस्थान बस्ती' द्वारा सम्मानित।

*सम्पर्क सूत्र :*
अवनीश त्रिपाठी [पुत्र]
गरयें, लम्भुआ, सुलतानपुर उ.प्र.। पिन-227-304 चलभाष-- 94515-54243
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।।धूप का खण्डहर ।।
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ढह
गया है धूप का
एक खण्डहर टूटकर।

क्षितिज की
पगडंडियों से
फिर कुहासा
दूर भागा जा रहा है
बेतहाशा ।

रोशनी का
एक सोया
शहर चुपके लूटकर ।

सिर दिशाओं के
शरम से झुक गये हैं
रश्मियों के पाँव
सहसा रूक गये हैं ।

लौट आया
है अँधेरा
कैद से फिर छूटकर ।

बड़बड़ाती !
हवा अब खामोश है
नदी पुलिया पर
पड़ी बेहोश है ।

रिस रहा
है जिस्म से
नासूर कोई फूटकर ।
           •••
■ रामानुज त्रिपाठी
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।। कौन साँकल खटखटाए ।।
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कहो कैसे !
खूँटियों पर टाँग दें...
फट गए हैं
हसरतों से भरे झोले ।

जिन्दगी भर
नेह से
जिसको भरा
सुप्त दीपक को
जगा देना मेरा ।

कभी आकर
अपाहिज अंधा अँधेरा...
रोशनी के जिस्म को
शायद टटोले ।

समेटे
चुप्पी नियति की
खिड़कियाँ
सह रहीं
रूठे समय की
झिड़कियाँ ।

घुन गए
तकदीर के
आवृत किवाड़े...
कौन साँकल खटखटाए
कौन खोले ।

जलाकर के
मरे रिश्तों की
चिताएँ
शोकाकुल लेटे
कदाचित अस्मिताएँ ।

अब तो सिर्फ
सँभाल करके ही
बिछाना !
हैं वसीयत में मिले
टूटे खटोले ।
           •••
■ रामानुज त्रिपाठी
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।। खींचने आया समय तस्वीर ।।
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लोग सहमे
खण्डहर में हैं छिपे
खींचने आया
समय तस्वीर जिनकी ।

नयन में जिनके
न अब तक
सुनहरे सपने खिले हैं
भीड़ में हों
या अकेले
जब मिले चिंतित मिले हैं ।

हैं खड़े वे मौन
नीचे सर झुकाए
फटे कागज़ पर
लिखी तकदीर जिनकी ।

वे बनाएँगे प्रतीकों के
नये आकार कैसे !
जायेंगे प्रतिबिम्ब लेकर
आईने के द्वार कैसे !!

रह गए हैं
जो पर युगबोध से
हो गई है
सहचरी अब पीर जिनकी ।

हर नये
एहसास ने भी
खुली आँखें बन्द कर लीं
नियति ने भी
स्यात् सम्प्रति
एक रेख पसन्द कर ली ।

अभी जो थी
एक ऋजु रेखा सहज-सी
हो गई है आज
वक्र लकीर जिनकी ।
         •••
■ रामानुज त्रिपाठी
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।। अंधकार सोया है ।।
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अरसे से
पेड़ तले
अंधकार सोया है ।

जाग रहीं
शाखाएँ
लेकर उम्मीद
कब लेगा
करवटें
टूटेगी नींद ।

एक भरम
ओढ़कर
वनपांखी खोया है ।

इन दिनों
जाने क्यों
ठौर-ठौर दर-दर
सारे ही
जंगल में
उग आए पत्थर ।

क्या पता
चुपके से
कौन बीज बोया है ।

पगडण्डी
पगडण्डी
भाग रही मृगतृषा
काँटों ही
काँटों में
उलझी जिजीविषा।

अधमुंदी
पलकों ने
स्वप्न में डुबोया है ।
         •••
■ रामानुज त्रिपाठी
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।। हमने कितने नाटक खेले ।।
-------------------------------------

छिपा
आस्था को परदे में
हमने कितने नाटक खेले ।

राग-रागिनी को
भरमाने-जुटी
आज दुर्वृत्ति आसुरी
जाने कहाँ !
सप्त स्वर भटके
भौचक्की रह गई बाँसुरी ।

लय की
नहीं कहीं गुंजाइश
किस स्वर को अपने संग ले-ले ।

मानव की
पहचान मापने के
लगते ओछे पैमाने
भरी भीड़ में
नहीं लग रहे
हैं चेहरे जाने-पहचाने ।

हैं अनभिज्ञ
परस्पर जन-जन
लेकिन लगे हुए हैं मेले ।

कहीं घोंसलों
में रोती है
पंखहीन पंछी की ममता
कहीं गले से
गले मिल रहीं
हँसकर समता और विषमता ।

कैसे चलें
चरण-चिन्हों पर
डरे-डरे हम आज अकेले ।
            •••
   ■ रामानुज त्रिपाठी
-----------------------------------------------------------

।। सपनों का गाँव ।।
-------------------------

ईंगुर -सी
धूप और
काजल -सी छाँव
एक प्यास
लूट गई
सपनों का गाँव ।

यद्यपि
भुलावे के
लम्हे छले गये
साँसो
के पर्याय
बनते चले गये ।

सूनी
पगडंडी से
थके-थके पाँव ।

पाँवो को
फैलाए
लम्बी चादर ताने
मसनद
सवालों की
फिर रखकर सिरहाने ।

खामोशी
लेट गई
फिर ठाँव- ठाँव ।

हिस्से में
लिए हुए
जख्मों का केवल धन
अड़े हुए
हैं अब तक
कुछ जिद्दी सम्बोधन ।

जिन्दगी की
चौसर में
नित्य नया दाँव ।
        •••
■ रामानुज त्रिपाठी
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।। नेह के खनके बाजूबंद ।।
----------------------------------

कोरे कागज़
पर किसने
लिख दिए लजीले छंद
नेह के खनके बाजूबंद।

सावन में
खुले सिन्होरे
भादों में कजरौटे
पिए वारुणी
बेसुध हो
यादों के मौसम लौटे ।

कच्ची उमर
खिली निशिगंधा
रह रह चुए मरंद
नेह के खनके बाजूबंद ।

टँगे कई
रेशमी ख्वाब के
परदे झीने झीने
खींच गए
तस्वीर हर घडी
सपनों के आईने ।

धूप छाँव में
अब सो जाना
पल छिन हुआ पसंद
नेह के खनके बाजूबंद ।
            •••
  ■ रामानुज त्रिपाठी
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।। नया अनुच्छेद ।।
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उग आए
चेहरे पर
मटमैले स्वेद ।

दृगों के
समन्दर में
तहछट का पानी
जिन्दगी है
बिना-
शीर्षक की कहानी ।

लिख रही हैं
साँसे
नया अनुच्छेद ।

खड़ी हैं
मुँह ढाँके
निर्वसन पीढ़ियाँ
चढ़ना है
मुश्किल
दुविधा की सीढ़ियाँ ।

चक्रव्यूह
मन का
सवाल रहे भेद ।
         •••
■ रामानुज त्रिपाठी
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विशेषांक पर आई प्रतिक्रियाएं----------------

[12/4, 6:18 PM] सुशीला जोशी
            मुजफ्फरनगर: संवेदनात्मक अलोक ,ग्रुप से जुड़ कर जीवन के आखिरी पड़ाव में नवगीत जैसी लोकप्रिय विधा को पढ़ने ,समझने ,जानने और लिखने के साहस का  करने की ईच्छा पूर्ण हुई ।
       रामकिशोर जी ने मुझे तुरन्त ये ग्रुप से जोड़ रामानुज त्रिपाठी जी के चार पांच गीत पढवाये । उन्हें पढ़ कर जो कुछ मैं समझ पाई ,उसे आपके समक्ष रखने का साहस कर रही हूं ।
      रामानुज त्रिपाठी जी का नवगीत " धूप का खण्डहर " पढ़ी तो मुम्बई में बिताए कुछ महीने मेरी स्मृति पटल पर तैर गये जहाँ मैंने धूप के लिए तरसते जीवन को देखा है । उनके गीत की यह पंक्ति " रौशनी का शहर चुपके लूट कर " मेरी स्मृति को बल प्रदान करती है । जहां एक ओर गगनचुम्बी इमारतों का आकर्षण लुभाता है वही उनके कारण बना अँधेरा कभी स्वयं को कैद करता है तो कभी दिशाओं तक को अपने  आँचल से ढकता नजर आता है । छोटे छोटे घरों में जिंदगियां जीवन के अंधेरे में कैद हो कर कसकती है तो कही रिसती है । इस गीत में शहरी जिंदगी की विसंगतिया देखने को मिली ।
   " कौन साँकल खटखटाये" गीत आभाव में पली बढ़ी जिंदगी की विषमताओं का आइना बड़ी सफाई से दिखया है रामानुज जी ने । अपने फ़टे थैले का लगाव आशा को अपनी इन पंक्तियों में " कभी आ कर ...... शायद टटोले " बाँध कर रखते है । यह गीत आशा और सकारात्मकता का अद्भुत सामंजस्य सँजोये है ।
   "  हमने कितने नाटक खेले " गीत आज की विसंगतियों के साथ स्वयं की तीव्र इच्छा को भी दर्शाता है । *कैसे चलें चरण चिन्हों पर , डरे डरे हम आज अकेले * पंक्तियां उनके इस भाव की पुष्टि करती है ।
     " खीचने आया समय तस्वीर " गीत में आभाव में जी रहे लोगो का चित्रण है । अभाव पोषित न प्रतीकों को आकार देने में सक्षम है और न ही स्वयं को दर्पण में निहारने का समय । कोई नया अहसास उन्हें मायूस बना जाता है । शायद यही वक्र रेखा उनकी नियति है ।
    " अंधकार सोया है " गीत एक सशक्त विरोधाभास से लबरेज है । जहाँ पेड़ के तले अँधेरा सोया है वही उसकी करवट लेने की आशा में उसकी डालिया जगती दिखाई देती है ।उस पर रहने वाले पाखी भी भ्रमित हो कर सोने और जागने की जंग से जूझ रहा है । आशावादिता और सकारात्मकता की चरम को दर्शाती है गीत की ये पंक्तिया -*इन दिनों ..........कौन बीज बोया * । यद्यपि जिंदगी की चौसर में किसी दाँव की भी पूरी सम्भवना देखते है किंतु कांटो में भाग रही मृगतृष्णा भी स्वप्न देखने से नही चूकती ।
     " नेह के खनके बाजूबन्द " एक श्रृंगार गीत है जिसमें जीवन की धूप छाँव के साथ यथार्थ को देर्शाता है ।
      " नया अनुच्छेद " -वास्तव में नया अनुच्छेद है जिसमे कही जिंदगी बिना शीर्षक के एक कहानी दिखाई देती है तो कही नई पीढ़ी के लिए एक दुविधा । समय का बदलाव हर पल एक नया अनुच्छेद लिख रहा है ।
    रामानुज त्रिपाठी जी के गीतों में परिपाटी , परम्परा , प्राकृतिक हलचल ,मानवीय संवेदना , हालात की चीत्कार और अधुनिकता का पुट स्पष्ट दिखाई देता है ।
(  क्षमा चाहूंगी ,इतने बड़े गीतकार ,लेखक या कवि का विश्लेषण मेरे जैसी नौसिखिया के लिए सम्भव नही ।)
सुशीला जोशी
मुजफ्फरनगर
4-12-2016

[12/4, 6:33 PM] विनय शुक्ल जी:---------
        आदरणीय त्रिपाठीजी के समस्त नवगीत एक से बढ़कर एक हैं। शास्वत सत्य की तरफ इंगित करते हुए हर शब्द की गहराई अपने आप में अद्वतीय है। उनकी लेखनी को और उन्हें सदर वंदन।

[12/4, 7:34 PM] आलोक मित्तल:--------
            आज पटल पर परम श्रध्देय श्री रामानुज त्रिपाठी जी की रचनाएँ पढ़ने का मौका मिला मेरे लिए उनको पढ़ने का पहला मौका रहा है वाकई लाजवाब रचनाये है ये सौभाग्य है मेरा । नमन है उनकी लेखनी को शानदार रचनाये कही है उन्होंने उनकी रचनाओं की छाप मुझे बहुत कुछ अवनीश भाई में भी देखने को मिलती है ।
लाजवाब रचना है सब की सब ।।

[12/4, 7:50 PM] डॉ अर्चना गुप्ता:---------
         आदरणीय रामानुज त्रिपाठी जी के गीतों को पढ़ने का अवसर मिला ।अभी मैं नवगीत को सीखने की ही प्रक्रिया में हूँ ।  इसलिये विश्लेषण करना मेरे लिए असंभव ही है । लेकिन इतना जरूर कहूँगी  सभी गीत हृदयस्पर्शी हैं । कहो कैसे....फट गएँ हैं हसरतों से भरे झोले .... कौन सांकल खटखटाये ..नेह के खनके बाजूबंद .... आदि सभी अत्यंत भावपूर्ण हैं। उत्कृष्ट लेखनी को मेरा सादर नमन ------ डॉ अर्चना गुप्ता

[12/4, 8:21 PM] रामनरेश रमन मोठ:------
             कीर्तिशेष श्रद्धेय श्री रामानुज त्रिपाठी के नवगीतों को समूह पटल पर लाने हेतु आदरणीय श्री राम किशोर दहिया जी को सादर धन्यवाद एवम् पूज्य पिता की विरासत सभालने वाले भाई अवनीश त्रिपाठी जी को हार्दिक बधाई।
    प्रथम गीत में प्राकृतिक बिम्बों के माध्यम से आज की सामाजिक स्थिति को प्रतिबिम्बित किया गया है, जो एक समर्थ रचनाकार से ही सम्भव है।आधुनिकता के चलन ने पुराने प्रतीकों, रिवाजों, लोगों को जिस तरह उपेक्षित कर दिया है उसका दर्द दूसरे गीत में साकार होता है। " हमने कितने नाटक खेले " रचना में वर्तमान जीवन शैली को ही एक नाटक की तरह बताया गया है जिसके अनुसार जो दिखाई देता है वह सच नहीं होता, रचनाकार का यह प्रयोग सच्चाई से युक्त है।आज मानवीय संवेदनाएं क्षीण होती जा रही हैं , जिसको " खीचने आया समय तस्वीर" गीत के माध्यम से निरूपित किया है। " अंधकार सोया है " तथा "सपनों का गांव" रचनायें आम आदमी से जुड़ीं विषम परिस्थितियों को उकेरती हैं। " नेह के खनके बाजूबन्द " गीत में प्रकृति को साथ लेकर नायिका के जागते प्रेम को सुन्दर वर्णित किया है।
     कविहृदय कीर्तिशेष त्रिपाठी जी को श्रद्धा पुष्प अर्पित करते हुए नमन करता हूँ--------राम नरेश रमन मोठ(झाँसी)

[12/4, 9:42 PM] जीतेन्द्र प्रसाद माथुर:---------
          आदरणीय रामानुज त्रिपाठी जी की आठ रचनाये पढ़ने के बाद लगा, अभी मन नहीँ भरा कुछ और होना ही चाहिए ।।
      आपका ये सार्थक प्रयास
वास्तव में तारीफ़े क़ाबिल है ।।
बह के खनके बाजूबन्द रचना में जहां सौन्दर्यबोध के साथ मोहक भावों को सहज शब्दों में पिरोया गया है वहीँ त्रिपाठी जी ने नया अनुच्छेद में प्राकट्य मनः स्थिति से प्रकृति भावों को एक चित्र की भांति क़लम से उभरने की कोशिश की है।। सपनो के गाँव में जिद्दी सम्बोधन विशेषरूप से मन को भा गया ।। अन्धकार सोया है जैसी रचनाएं रचना हर किसी के बस की बात नहीँ है इस रचना ने सही मानिये मुझे निःशब्द कर दिया ।।
     रचनाकर ने चुन चुन कर भावों को अपनी क़लम से कलमबद्ध किया है इसमें शक़ नहीँ है हर रचना प्यारी और मोहक है, अब बताइये इन रचनाओं पर क्या टिप्पणी की जाये --------डॉ.जितेन्द्र प्रसाद माथुर।।

[12/5, 10:36 AM] डॉ श्याम सिरोठिया:-------
          मित्रो
सम्मानीय स्व.श्री रामानुज त्रिपाठी जी के गीतों को पढ़कर साहित्यिक तृप्ति का अनुभव होता है।
भाव,भाषा,और शिल्प के अनुपम शिल्पी,स्व, त्रिपाठी जी के नव गीत पढ़कर यह कहा जा सकता है कि वह सामाजिक सरोकारों के रचनाकार  थे। वह प्रकृति और मनुष्य के बीच सशक्त तादम्य स्थापित करने का कौशल रखते थे।
'हमने कितने नाटक खेले ",रचना छल के सामाजिक रूपान्तर की बानगी है।
"खीचने आया समय तस्वीर", "अंधकार सोया है," 'सपनों का गाँव" ,आदि रचनाएँ समाज के संघर्षों को झेलते आम आदमी की जीवटता की आवाज हैं।
"नेह के खनके बाजूबंद "प्रेम के शास्वत स्वरुप की सहज अभिव्यक्ति हैं।

ऐसे रचनाकार का हमारे बीच से चला जाना साहित्य में शून्यता उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त है,लेकिन उनका रचना कोष  इस रिक्तता को भरने में सक्षम है।
मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।
स्व,त्रिपाठी जी की रचनाओं को हम तक पहुँचाने के लिए
आद, भाई रामकिशोर दाहिया जी को साधुवाद---------डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया

[12/5, 11:15 AM] शशि पुरवार जी:-------
             सर्वप्रथम हमारी विरासत को नमन। श्री रामानुज त्रिपाठी जी के गीतों को पटल पर लाने के लिए आ. दहिया जी को सादर धन्यवाद , कल से इन गीतों का बारम्बार पढ़ रही हूँ किन्तु  क्षुधा शांत ही नहीं हो रही है । अध्बुद्ध  अनुपम जैसे एक एक गीत नगीने में जड़ा हुआ हीरा हैं प्रकाश जी व दहिया जी से सहमत हूँ पाठकों के लिए एक नया आकाश खोलतें है, नए नए बिम्ब, हृदयस्पर्शी संवेदना, गेयता, एक नयी उड़ान , समय के साथ चलते गीत, उनके सभी गीत बहुत अच्छे लगे।   निःशब्द हूँ सभी अनुभूति को बारम्बार महसूस कर रही हूँ। नवगीत गीत की  विरासत के किर्तिशेष रामानुज त्रिपाठी जी को नमन , मैं इन गीतों को सहेज रहीं हूँ , पुनः आ. दाहिया जी व अविनाश त्रिपाठी जी को हार्दिक बधाई।  मैं उनके अन्य गीतों को भी पढ़ना चाहती हूँ। कलम को नमन। सादर - -----शशि पुरवार।

[12/5, 1:18 PM] जय प्रकाश श्रीवास्तव जी:---------
       आ.रामानुज जी के नवगीत गहरे सामाजिक की उत्कृष्टता को तो जीते ही है नव्यता के उजले प्रतिमान भी स्थापित करते हैं युगबोध नवीन बिंब नये प्रतीकों से सजे सभी गीत आंचलिकता के साथ भाषा के सौष्ठव रूप को भी सहजता के साथ लेकर चलते हैं उनके गीत आज की युवा पीढ़ी ही नही हम जैसों के लिए प्रेरणा का कार्य करेंगे इन्ही शब्दों के साथ मैं अपनी विनम्र श्रद्धांजलि उन्हे अर्पित करता हूं और दाहिया जी का ह्रदय से धन्यवाद करता हूं।------जयप्रकाश श्रीवास्तव

[12/5, 2:13 PM] रंजना गुप्ता जी लखनऊ:-------
          रामानुज जी के गीत.. भाव संवाहक ..सहज..सामाजिक सरोकार से अनुबंधित ..से लगे...उनके सरस गीतों को पढ़ कर कौन सहृदय अभिभूत नहीं होगा..?
सादर ..अभिनंदन ..प्रणाम उनकी लेखनी को
वे युग बोध को अपने समय में ही नहीं ..
वरन आज के समय को भी भविष्य द्रष्टा की तरह जीवंत कर गये ----- रंजना गुप्ता

[12/5, 4:05 PM] विनय भदौरिया:-----
        विरासत के अन्तर्गत  मेरे चहेते श्रेष्ठ नवगीत कवि स्मृतिशेष रामानुज त्रिपाठी के नवगीत प्रस्तुत करने के लिए प्रथमतः आदरणीय दाहिया जी को हार्दिक धन्यवाद।श्रदेय त्रिपाठी जी भाषा, शिल्प, बिम्ब व प्रतीकों के प्रयोग मेंसर्वथा अनूठे रहे हैं। विषय वस्तु के चयन मे सजगता तथा निर्वहन मे नवता उनकी विशेषता थी।अनूठे प्रयोगों के द्वारा नवगीत को एक विशिष्ट आयाम देने का प्रयास किया।
आसपास  से लेकर वैश्विक परिवर्तनों पर उनकी  पैनी दृष्टि रही है तथा सूक्ष्म अन्वेषण के पश्चात  ही अनूभत अनुभूतियों  की अभिव्यक्ति उनके नवगीतो मे हुई है। पहले गीत में विसंगतियों को  बिम्बो के माध्यम से सार्थक अभिव्यक्ति मिली हैः
रोशनी का
एक सोया
शहर चुपके लूटकर।
****************
लौट आया है
अँधेरा है
कैद से फिर छूट कर।
     किन्तु कवि इन विसंगतियों के मध्य भी आशा की किरन संचरित करने हेतु प्रयास रत है
अन्धे के हाथों में  गई व्यवस्था जो पंगु हो चुकी है से कवि निराश नहीं है।
जिन्दगी भर
नेह से
जिसको भरा
सुप्त दीपक को
जगा देना जरा

कभी आकर
अपाहिज
अंधा अँधेरा
रोशनी के जिस्म
को शायद टटोले
अन्त में यह कहना चाहूँगा कि त्रिपाठी जी ने जीवन के विभिन्न आयामों को अपने नवगीतों  मे  अभिव्यक्त किया है ऐसे श्रेष्ठ सर्जक को शतशः
नमन।साथ ही अवनीश त्रिपाठी जी को हार्दिक साधुवाद व आशीर्वाद जो "
बाढहि पूत पिता के धर्मा "
कहावत को चरितार्थ कर श्रेष्ठ सृजन के माध्यम से हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने में संलग्न हैं।
विनय भदौरिया

[12/5, 5:50 PM] मुकुट सक्सेना जी:------
            ढह गया है धूप का एक
खण्डहर टूट कर.. कैसी विलक्षण परिकल्पना है।खण्डहर तो स्वयं एक स्वरूप की टूटकर गिरी हुई स्थिति  का द्योतक  है।किंतु रामानुज शेष रहे अवशेष में संवेदना स्पंदन महसूस करते हुए विसंगतियों  को  ऐसे लक्षित करते है कि गीत के सभी
बन्दों  में एक  अव्यक्त पीड़ा के वशीभूत परिभ्र्मणाधींन जाने क्या तलाशते हुए आकुल लगते है। ऐसी आकुल व्याकुल भावनात्मक स्थिति में तार्किकता बौनी लगने लगती है।
कोन सांकल खटखटाये ,, में मुझे  शे ली याद आये जिन्हों ने कहा था,,आवर स्विटेस्ट सोंगस आर  दोज़ डेट टेल्स अबाउट दी सेडेस्ट थॉट्स।,, सुंदर गीत के लिए  बधाई।
आदर नीय दाहिया जी द्वारा रामानुज जी के रचनाकर्म से साक क्षात्कार करने पर मुझे ऐसा लग रहा है कि वे अभी भी जीवित ही नहीँ, जीवन्त हैं हमारे  समक्ष अपनी रचनाओं और अवनीश जी की धमनियों शिराओं  में।
रामानुज जी के प्रति मेरा नमन तथा दा हिया जी,अवनीश जी के प्रति साधुवाद।
मुकुट सक्सेना जयपुर

[12/5, 6:35 PM] विजय बागरी जी:------
         कालजयी रचनाओं के प्रणेता लोकधर्मी अस्मिता के सशक्त हस्ताक्षर प्रेम,करुणा, रागात्मकता, संस्कृति और संवेदना की छांदस अभिव्यक्ति के ज्वलंत प्रतीक, कीर्ति शेष रामानुज त्रिपाठी जी की काव्य धारा का अवगाहन, सौभाग्य की बात है।
           उनकी अनूठी मर्मस्पर्शी रचना शैली निस्संदेह हिंदी साहित्य की गरिमामयी धरोहर है। इस अद्वितीय सारस्वत विरासत को मेरा कोटि-कोटि नमन। आदरनीय दाहिया जी को इस प्रस्तुति के लिए हृदय से साधुवाद।
                            विजय बागरी

[12/5, 7:06 PM] विजय प्रकाश भरद्वाज:-----
       श्रद्धेय रामानुज त्रिपाठी जी के विषय में बहुत कुछ पढ़ा सुना था किंतु आज उन्हें विशेषांक में विधिवत रूप से समझने का एक श्रेष्ठ अवसर मिला जिसके लिए साधुवाद आदरणीय रामकिशोर दाहिया जी के हिस्से में जाता है।निश्चय ही अग्रज बंधु आदरणीय अवनीश त्रिपाठी जी को विगत जन्म का पुण्य फला होगा जो साहित्य के ऐसे महामनीषी और शब्दसर्जना के शिखरपुरुष को पिता रूप में पाया उन्होंने।उन्हें अशेष बधाइयाँ।साथ ही नवगीत के महान शिल्पी श्रद्धेय स्व त्रिपाठी जी की स्मृतिशेष को मेरा विनत अभिनन्दन।
       प्रस्तुत विशेषांक के सभी आठों नवगीत विलक्षण तो हैं साथ ही स्वयं में नवगीत के लिए एक आदर्श मापनी भी हैं जिस पर भावी पीढियां सदियों तक अपने लेखन को माप सकती हैं।
      पहले नवगीत का मुखड़ा ही संप्रेषण शब्दकौशल और साहित्य-चेतना का संगम प्रतीत होता है।

ढह
गया है धूप का
एक खँडहर टूट कर।

भावव्यंजना की गहराई और संवेदना की सिद्ध मारकता ही है जो पूरे नवगीत का सारसूत्र इन पंक्तियों में गुँथा हुआ प्रतीत होता है। मुखड़े के प्रवाह में कहीं कुछ छूटा हुआ अवश्य लगता है हो सकता है अंकन की कोई त्रुटि रही हो क्योंकि जिस मापनी पर बंधांत हैं उस पर यह मुखड़ा कुछ इस तरह अधिक सटीक प्रतीत होता है कि

ढह
गया है धूप का
हर एक खँडहर टूट कर।

इसी नवगीत की योजना में आगे कुछ ऐसे अद्भुत प्रतीक हैं जो कल्पना लोक में नया संसार सा बसा देते हैं यथा रोशनी के सोये हुए शहर को चुपके से लूट ले जाना या क्षितिज की पगडंडियों से कुहासे का दूर भागे जाना या फिर नदिया का पुल पर बेहोश पड़े रहना आदि। इस नवगीत की एक पृथक विशेषता यह है कि इसमें नकारात्मकता से सकारात्मकता तक की अश्रम-यात्रा जारी है। मानवीकरण अलंकार भी इसे इस श्रृंखला के अन्य नवगीतों की तरह स्वतःसजीव बना दे रहा है।
      नवगीत 2 में "कौन सांकल खटखटाये" की उक्ति जीवन की उसी युक्ति को तलाशती प्रतीत होती है जहाँ विद्रूप व्यवस्थाओं के प्रति 'बिल्ली के गले में कौन घंटी बांधे' वाली विवशता ज़हन में कौंधती है। यह नवगीत के बड़ा उदाहरण है किसी भी नौजवान साहित्यकार के लिए जिससे उसे पता चले कि भाषा का मौलिक मुहावरा कैसे गढ़ा जाता है।

कहो कैसे !
खूँटियों पर टाँग दें...
फट गए हैं
हसरतों से भरे झोले।
 
भाषा का एक अद्भुत और निर्वाचीन सौंदर्य शब्दों की खिड़की से झाँक रहा है यहाँ जहाँ नवीनता भी है और परंपरा का निर्वाह भी।अपाहिज अँधेरे से रोशनी के जिस्म को टटोलने की आशा बांधना वाक़ई अँधेरे कुएं में प्रकाश की रेखा को खोजने का सबल साहित्यिक उपक्रम है जिससे सदियों के कलम की कुदाली साधती आयी है मगर यहाँ कहन का तरीका नया है।बाकी इस नवगीत में भी कहने समझने को बहुत कुछ मिलता ही है।प्रतीक योजना भी हमेशा की तरह ही ...लाज़वाब !!
      नवगीत 3 में समय के कैमरे से जिंतनी सारी तस्वीरें आदरणीय त्रिपाठी जी खींचते हैं वे सब युगबोध से परे हाशिये पर पड़े उस महामानव की पीड़ा की झलकियां हैं जिन्हें खींचते खींचते स्वयं समय की आँख भी अक्सर रोई है।
       नवगीत 4 नवगीतकार का स्वयं एक परिपक्व संवेदना से साक्षात्कार सा जान पड़ता है।

कैसे चलें
चरण चिह्नों पर
डरे डरे हम आज अकेले।

निश्चय ही अनिर्वचनीय संवेदना भरी है इन पंक्तियों में।
         नवगीत 5 भी कथ्य और भाव के स्तर पर अपना प्रथक प्रभाव छोड़ता है।
         नवगीत 6 को पढ़कर नवगीतकार की प्रतीक योजना की जिस सामर्थ्य से परिचय होता है वह साहित्य में उन्हें शीर्षस्थ प्रमाणित करती है।

ईंगुर सी
धूप और
काजल सी छाँव ....

अद्भुत ! अद्भुत ! मौलिक प्रतीकात्मकता का अन्यत्र दुर्लभ उदाहरण। यही नही पूरा नवगीत एक मास्टरपीस है स्वयं में। और इसी परंपरा का निर्वाह करता नवगीत 7 भी। कथ्य की मारकता के स्तर पर बिलकुल इसके बगल बैठा हुआ।
       श्रृंखला के अंतिम नवगीत में प्राञ्चल-प्रांजल-भाषा का अपना अलग स्वाद आ घुला है जैसे सोंठ का बताशा। इस नवगीत के प्रथम बन्ध में किसी कारणवश (शायद लिपिकीय त्रुटि यहाँ भी रही हो)हल्का लयभंग द्रष्टव्य अवश्य हुआ है किंतु अंत तक पूरा नवगीत रसराज श्रृंगार की जिस रतिप्रियता के साथ व्याख्या करता है उससे सिद्ध होता है कि काव्य में जिसने श्रृंगार साध लिया , मानो सब साध लिया।एक एक पंक्ति की गीतोक्ति हो मानो।
       अन्त में यही कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण श्रृंखला श्रद्धेय त्रिपाठी जी का साहित्य के लिए दिया गया वह रक्तपरिश्रम है जो साहित्यलोक की जड़ों को दूर तक सींचता रहेगा।सहज बोलचाल की भाषा ,उर्दूमिश्रित शब्दावली और ग़ज़ल की कहन जैसा सलीका अंततः नवगीतों में ऐसा माधुर्य पैदा करते हैं जो पाठक को शब्दशक्ति और अर्थोपादेयता तक की यात्रा को अधिक सहज कर देता है।
      मैं आदरणीय रामकिशोर दाहिया जी को पुनः साधुवाद देता हूँ उनके समवेत परिश्रम और गीत नवगीत की इस तरह उत्कृष्ट सेवाभावना के संपादन लिए।श्रद्धेय स्वर्गीय रामानुज त्रिपाठी जी की स्मृतिशेष को नमन वंदन अभिनन्दन ।आपने निश्चय ही शब्दों का एक ऐसा स्वर्ग पन्नों पर छोड़ा है जो आपको सदैव जीवित रखेगा साहित्य की दुनिया में... ऐसा मेरा विश्वास है ! सादर-----------------  विजय प्रकाश भारद्वाज,इगलास ,अलीगढ ( उत्तर-प्रदेश )

[12/5, 8:12 PM] मोहन भारतीय:-------
     श्रध्देय रामानुज त्रिपाठी जी
को मैं पढ़ता रहा हूं। अपनी
गीत यात्रा के  शुरुआत में
उनके जैसा लिखने की कोशिश करता था। इस
लिहाज से वे मेरे आदर्श जैसे
ही हैं।उन की गीत यात्रा की तरह मेरी यात्रा भी पारम्परिक गीतों से आधुनिक गीतों की यात्रा
रही है।
उनके गीतों मै भाषा का सौंदर्य और प्रतीकों कासहज
सटीक प्रयोग गीतों में मोर
मुकुट बन कर छाया रहता
है।
गीतों में सादगी भरी तल्लीनता  और नैसर्गिक
अभिव्यक्ति गीतों को प्रभावी
बनाती है। उन की गीत साधना को नमन करता हूं..

[12/6, 10:11 AM] रामबाबू रस्तोगी जी:----
स्व. रामानुज त्रिपाठी जी के नवगीत उनके व्यक्त्तित्व एवं उनके रचनाकर्म का प्रमाण हैं | वे सदैव बड़ा कैनवस लेकर चलते थे और उस पर बड़ी शालीनतापूर्वक शब्दों से पेंटिंग करते थे |

ढह
गया है धूप का
एक खंडहर टूट कर
-----------------------------------
कहो कैसे
खूँटियों पर टाँग दें
फट गये हैं
हसरतों से भरे झोले
-----------
अभी जो थी
एक ऋजु रेखा सहज सी
हो गई है आज
वक्र लकीर जैसी
----------------
पहले नवगीत से अंतिम तक उनका शब्द - संसार कहीं बाधित नहीं होता | युगबोध से लेकर अंतिम श्रृंगारिक कल्पना तक उनकी रास कहीं ढीली नहीं पड़ती | उनके नवगीतों की ख़ास बात यह है कि उनका भावनात्मक संसार कहीं विश्रंखल नहीं होता |
वे अपने जीवन में भी ऐसे ही थे |
मेरी उनसे कई मुलाकातें हुई थीं | वे अपने नवगीतों की तरह ही सहज और सरल थे |
माटी की गंध को सहेज कर रखने वाले स्व. रामानुज जी की बिंब - विधान अभूतपूर्व है | सीधे- शब्द , सीधी - बात जो दिल में उतरती चली जाती है |
ईँगुर सी
धूप और
काजल सी छाँव
एक प्यास
लूट गई
सपनों का गाँव |
-------------+-

कच्ची उमर
खिली निशिगंधा
रह रह चुये मरंद
नेह के खनकें बाजूबंद
-----------------
अद्भुत -
मैं उनके सुयोग्य पुत्र बहुत अच्छे साहित्यकार श्री अवनीश त्रिपाठी के प्रति उनकी रचनायें उपलब्ध कराने के लिये कृतज्ञता प्रकट करता हूँ |

[12/6, 1:16 PM] संजय प्रधान:--------
      श्रद्धेय त्रिपाठी जी के सभी नवगीतों में  प्रतीकात्मक उदाहरण सबसे अलग सौंदर्य है।
नवगीत में सहज बोलचाल की भाषा नें माधुर्य को जैसे जीवित कर दिया है ।
सादर नमन....संजय प्रधान , वाराणसी

[12/6, 11:19 PM] मुकेश त्रिपाठी:--------
          संवेदनात्मक आलोक मंच पटल पर स्मृतिशेष कवि स्व• रामानुज त्रिपाठी जी के नवगीत प्रस्तुत करने हेतु आदरणीय दाहिया जी का आभार। मुझे अच्छी तरह याद है जब मैंने सन 2001 में लिखने की शुरुवात की थी, उस समय आदरणीय त्रिपाठी जी के दोहे/गीत तथा अन्य विधाओं की रचनाएं नवनीत जैसी श्रेष्ठ अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं में पढ़कर मैं उनके करीब आता जा रहा था। अनेक बार उनसे पत्राचार भी हुआ है, मुझे याद है मेरे हर पत्र का उत्तर वे अवश्य दिया करते थे,मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ की मुझे उनका स्नेह मिला है। आज उनके नवगीत पढ़कर बहुत अच्छा लगा। कीर्तिशेष कवि और उनके श्रेष्ठ साहित्य को नमन।
------------- मुकेश त्रिपाठी

[12/7, 1:19 AM] संध्या सिंह जी:-----
          आज पटल पर कीर्तिशेष श्रद्धेय रामानुज त्रिपाठी जी के गीत सुशोभित हैं l मैं सौभाग्यशाली हूं कि उनके गीत संग्रह "यादों का चंदनवन " के विमोचन मे मैं भी शामिल थी और जिसे प्रकाश मे लाने का श्रेय उनके सुपुत्र श्री अवनीश त्रिपाठी जी को है l रामानुज त्रिपाठी जी के गीत प्रकृति के अनूठे प्रयोग से सुसज्जित हैं l उनका पहला  गीत 'धूप के खंडहर ' मे उन्होने  विस्मित करने वाले अंदाज़ मे संध्या समय को चित्रित किया है l एक एक अन्तरा त्रासदी को मर्मबेधी तरीके से प्रस्तुत करता है l " कौन सांकल खटखटाये " , "हमने कितने नाटक खेले " , ' अंधकार सोया है ' ये सभी गीत विषम परिस्थितियों और सामाजिक कमज़ोरियों को सशक्त शब्दों मे और प्रभावशाली बिम्बों के माध्यम से लय और ताल को बरकरार रखते हुए पाठक के दिल मे जगह बनाते हैं l " सपनों का गांव ' गीत मे ' एक प्यास लूट गयी सपनों का गांव ' कितने सशक्त शब्दों मे विडम्बना को  चित्रित किया है l नेह के खनके बाजू बंद एक  मधुर और नशीला श्रन्गार रस से सराबोर गीत विविधता को आयाम देता हुआ  l उनका अंतिम गीत ' नया अनुच्छेद' अपने शिल्प और कहन से चकित करता है l अंत मे रामानुज जी को प्रणाम करते हुए यही कहून्गी इतने अनमोल गीतों के रचियता का इतनी जल्दी दुनिया से विदा लेना एक बडी साहित्यिक क्षति है l अंत मे उन्हे प्रणाम करते हुए और अवनीश जी का आभार प्रकट करते हुए आदरणीय राम किशोर दाहिया जी को को भी नवगीत के क्षेत्र मे साहित्यिक योगदान के लिये साधुवाद देती हूं l ---------- संध्या सिंह , लखनऊ

[12/7, 10:13 AM] गणेश गम्भीर जी:---
      आदरणीय रामानुज जी के नवगीत नवगीत के वैभव पूर्ण इतिहास के संग्रहणीय पृष्ठ  हैं।गीत प्रस्तुत करने के लिए हार्दिक धन्यवाद ।इन गीतों की रचना -भूमि संस्कृति का अद्यतन विकास है और नयी आलोचना -दृष्टि की आग्रही भी ।दरअसल प्रचलित आलोचना - पद्धति के तर्क - आयुध बेकार हो चुके हैं।

[12/7, 1:38 PM] डॉ सुभाष वशिष्ठ:---

समूह के रविवारीय विशेषांक के सन्दर्भ में,सर्वप्रथम श्री दाहिया जी को बहुत धन्यवाद कि उन्होंने कीर्तिशेष श्री रामानुज त्रिपाठी जी के नवगीत समूह पटल पर चर्चार्थ प्रस्तुत किये।
संस्कारशील व सदाशय व्यक्तित्व व अच्छे गीतकार श्री अवनीश जी सौभाग्यशाली हैं जिनके श्री रामानुज त्रिपाठी जी जैसे गीत-व्यक्तित्व पिता थे।अवनीश जी को शुभेषणा! 
समूह पटल पर गीतों के प्रकाशन के उपक्रम के दौरान श्री दाहिया जी के माध्यम से,मुझे श्री रामानुज जी के कई गीतों को पढ़ने का सौभाग्य मिला।फिर पटल पर गीत पढ़े।
मुझे सभी गीत अच्छे लगे।श्रेष्ठ के आस-पास।
कविता,बात के सीधे कथन से इस अर्थ में भिन्न होती है कि उसकी अभिव्यक्ति प्रत्यक्ष नहीं अप्रत्यक्ष होती है।
उपर्युक्त के सन्दर्भ में श्री त्रिपाठी जी की अभिव्यक्ति सर्वत्र अप्रत्यक्ष है।वह एकदम सरल नहीं है,हाँ संश्लिष्ट भी नहीं है।परन्तु अपने मन्तव्यों को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने में पूर्णतः सक्षम है।
छन्द ,कथ्य की आवश्यकता/अपेक्षा के अनुसार आकार ग्रहण करते हैं।
बिम्ब सुस्पष्ट व सजीव हैं।
प्रकृति तथा उसके उपांगों का,मानवीकरण के माध्यम से ,बड़ा सधा हुआ तथा सार्थक प्रयोग दृष्टिगोचर होता है।
बाह्य जगत्,उसके मानस, उसके आचरण तथा परिणामस्वरूप व्यक्ति पर पड़ने वाले अच्छे-बुरे प्रभावों को श्री त्रिपाठी जी एक अन्तर्यात्रा के बतौर अहसास के स्तर पर जीते हैं और उसी अन्तर्यात्रा के साथ उसको,अहसास के तापमान के अनुसार तलाशे गये अथवा स्वतः रचना-प्रक्रिया के दौरान उभर आये,सटीक व प्रभावी शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं।
श्री त्रिपाठी जी अभिव्यक्ति कौशल के बेहतरीन नवगीतकार हैं।
कथ्य की दृष्टि से उनके सरोकार,सार्वजनीन हैं।कुछ सीमा तक कुछ गीतों के लिए दीर्घकालिक भी कहा जा सकता है।
अन्धकार व प्रकाश उनका प्रिय विषय-बिन्दु है,जो,श्रेय के स्तर पर लगभग सर्वत्र रेखांकित है। 
कुल मिलाकर प्रस्तुत सभी 
गीत अच्छे हैं। 
कीर्तिशेष श्री  रामानुज त्रिपाठी जी को सादर नमन!
- डॅा० सुभाष वसिष्ठ  , नई दिल्ली।