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गुरुवार, 1 जुलाई 2021

सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश by राज खन्ना

तब ऐसा था सुल्तानपुर
                       ■ राज खन्ना
                       ब्यौरे बहुत पुराने हैं लेकिन उनकी दिलचस्पी हो सकती है , जिन्हें सुल्तानपुर के अतीत को लेकर जिज्ञासा रहती है। 1857 की क्रांति में बढ़चढ़कर हिस्सेदारी की बहुत बड़ी कीमत सुल्तानपुर ने चुकाई थी। गोमतीं के उत्तर बसा शहर अंग्रेजों ने पूरी तौर पर नष्ट कर दिया था। वहां चिराग जलाने तक की इजाजत नहीं थी। शांति स्थापित होने के बाद अंग्रेजों ने 1858 - 59 में गोमतीं के दक्षिणी किनारे पर मौजूदा शहर और जिले का मुख्यालय स्थापित किया । शहर बसने के पहले यह स्थान गिरगिट नामक गांव था। चूंकि पहले इस स्थान पर अंग्रेजी फौज कैम्प करती थी , इसलिए आम लोग इसे कम्पू भी कहते थे। मिस्टर पार्किन्स पहले डिप्टी कमिश्नर थे। शहर का पार्किंसगंज मोहल्ला उन्हीं के नाम पर है। मेजरगंज और गोरा बारिक ( गोरा बैरक) जैसे नाम इस स्थान पर फौज की मौजूदगी की याद दिलाते हैं।
                 1903 में छपा सुल्तानपुर का गजेटियर इन दिनों पढ़ रहा हूँ। एच. आर.नेविल्स आई.सी.एस. ने इसे तैयार किया था। जिले के इतिहास के अलावा जनजीवन और साथ ही प्रशासनिक और बुनियादी जरूरतों के इंतजाम की कोशिशों के शुरुआती ढांचे से जुड़े तमाम पहलुओं से जुड़ी जानकारियां यह गजेटियर समेटे हुए है। 1863 -70 के मध्य जिले का प्रथम भूमि बंदोबस्त मिस्टर मिलेट ने किया। 1869 में जिले का पुनर्गठन किया गया। उसके पहले जिले में 12 परगने थे। नए सीमांकन में इसौली,बरौंसा और अलदेमऊ को फैजाबाद से हटाकर सुल्तानपुर से जोड़ा गया। उधर सुल्तानपुर से निकाल कर इन्हौना,जायस , सिमरौता और मोहनलाल गंज को रायबरेली में तथा सुबेहा को बाराबंकी में शामिल कर दिया गया।
             1869 में जिले में पहली जनगणना हुई। आबादी थी 9,30,023। सीमाओं के परिवर्तन के बाद आबादी बढ़कर 10,40,227 हो गई। प्रति वर्गमील 593 लोग रहते थे। 1881 में आबादी घटकर 9,57,912 रह गई। आबादी घटने का कारण 1873 और 1877 का भयंकर अकाल था जिसमें बड़ी संख्यां में मौतें हुईं और पलायन भी हुआ। 1891 की जनगणना में आबादी 10,75,851 थी। इस जनगणना में पास-पड़ोस के जिलों में भी जनसंख्या में वृद्धि हुई थी।
            1901की जनगणना में पिछली की तुलना में जनसंख्या में मामूली वृद्धि हुई। कुल जनसंख्या 10,83,904 थी। प्रतिवर्ग मील 637 लोग निवास करते थे। कुल आबादी में हिंदुओं की संख्या 9,63,879 और मुसलमान 1,19,740 थे। यह जनगणना इस मिथ को तोड़ती है कि सिख विभाजन के बाद ही यहां बसे। उस समय 151 सिख यहाँ आबाद थे। दो जैनी और एक पारसी भी थे। 25 हिंदुओं ने स्वयं को ' आर्य ' के तौर पर दर्ज कराया था। इस जनगणना में जातिवार ब्यौरे दर्ज हुए। इसमें ब्राह्मण 1,60,000 , राजपूत 86,561, जाटव 1,40,000 , यादव 1,28,000 ,वैश्य 22,970 ,कायस्थ 12,832, मुराई 4,244 तथा कुर्मी 28,455 थे। अन्य आबादी में कलवार,केवट, कुम्हार,पासी,कोरी,गड़रिया,तेली और कहांर आदि का उल्लेख है लेकिन उनकी अलग-अलग संख्या दर्ज नहीं  हैं। मुसलमानों की कुल आबादी में 25,800 ऐसे मुसलमान थे जो राजपूतों के विभिन्न वर्गों से धर्मांतरित हुए थे। आबादी में कम हिस्सेदारी के बाद भी जिले की कृषियोग्य भूमि के 76 फीसद हिस्से के मालिक राजपूत थे। उनके पास 1633 मौजे थे। मुसलमानों के पास 175, ब्राह्मणों के पास 75 और कायस्थों के पास 67 मौजे थे। शेष भूमि अन्य जातियों के पास थी।
            लगभग पूरी आबादी खेती पर निर्भर थी। पूरे जिले में इकलौता शहर सुल्तानपुर था। उसकी आबादी दस हजार से भी कम थी। 1890 में उसे म्युनिस्पिलिटी
    का दर्जा हासिल हो चुका था। इसके तेरह सदस्यों में दस निर्वाचन से चुने जाते थे। दो का नामांकन होता था। डिप्टी कमिश्नर इसके पदेन अध्यक्ष होते थे। 1871 में डिस्ट्रिक्ट कमेटी बनाई गई। इसे 1884 में डिस्ट्रिक्ट बोर्ड (आज की जिला पंचायत ) नाम दिया गया। इसकी सत्रह सदस्यीय कमेटी में 12 का निर्वाचन होता था। चार तहसीलें थीं। प्रत्येक तहसील से तीन प्रतिनिधि चुने जाते थे। चारों तहसीलों के एस. डी. एम. इसके पदेन सदस्य जबकि डिप्टी कमिश्नर अध्यक्ष होते थे। 
          अपने बुजुर्गों से उनके दौर के किस्से सुनते या उन्होंने जो अपने बड़ों से सुन रखा था , उसे जब वे दोहराते थे तो हमारी पीढ़ी हंसती थी। खासतौर पर जब गुजरे जमाने की कीमतों का जिक्र होता था। दिलचस्प है कि गजेटियर में भी इनमें बहुत कुछ पढ़ा जा सकता है। उन दिनों तौल के लिए ' सेर ' का इस्तेमाल होता था। प्रति सेर लगभग आठ सौ ग्राम का होता था। ब्यौरों के मुताबिक 1861 में गेहूं एक रुपये का 28 सेर मिलता था। अगले तीन सालों में सूखे के कारण दाम बढ़े। इन वर्षों में एक रुपये का दस सेर गेहूं बिका। 1869 में पौने तेरह सेर जबकि 1867 से 1872 का औसत दाम 19 सेर था। 1877 के अकाल में गेहूं की भारी किल्लत हुई। लेकिन 1880 से 1886 के सात वर्षों में एक रुपये में गेहूं का औसत दाम 21.4 सेर था। 1887 से 1896 के सात वर्षों में गेहूं एक रुपये में 15.2 सेर की दर से बिका। बाद के सात वर्षों यानी 1902 तक गेहूं का औसत दाम 16.5 सेर था। कोदों, ज्वार, चना की कमजोर वर्गों में सबसे ज्यादा खपत थी। उनमें चना सबसे ज्यादा पसंद किया जाता था। 1861 में एक रुपये में ज्वार-चना 32 सेर उपलब्ध था। अगले चालीस वर्षों में इन जिसों का औसत मूल्य प्रति रुपया 22.5 सेर था।
                  20 वीं सदी की शुरुआत तक सुल्तानपुर में नकद मजदूरी का चलन नहीं था। आमतौर पर एवज में अनाज ही दिया जाता था , यद्यपि मजदूरी का निर्धारण पैसे में होता और फिर उस मूल्य का अनाज दिया जाता था। कम परिश्रम के काम जो महिलाओं और बच्चों के जिम्मे होते , उसकी मजदूरी इकन्नी थी। ज्यादा परिश्रम के कामों की मजदूरी छह पाई थी। बढई की मजदूरी उसके हुनर के मुताबिक तीन से पांच आने के बीच थी। हल को साल भर दुरुस्त रखने के लिए लोहार को आठ सेर अनाज दिया जाता था। सबसे कीमती माने जाने जाने वाले ' सोने ' के दाम तो गजेटियर में नहीं दिए गए हैं लेकिन सुनार की मजदूरी का जिक्र जरूर है। इसके मुताबिक सुनार सोने के मूल्य के प्रति रुपये में एक आना मजदूरी लेते थे। जिले के लगभग सभी मकान कच्चे थे। पक्की ईंटें बनती थीं लेकिन उनका इस्तेमाल सिर्फ ताल्लुकेदारों-जमींदारों और सम्पन्न और सबल लोगों के मकानों में ही होता था। उस समय तक मकानों में पत्थर का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं हुआ था।  अमीर जानकर लुटने के डर से भी लोग पक्के मकान बनवाने से बचते थे। ईंटों का दाम चार से नौ रुपये प्रति हजार था। कच्चे मकानों में इस्तेमाल होने वाला खपड़ा का दाम एक रुपया प्रति हजार था। दस क्यूबिक फीट कच्ची दीवार की लागत बारह आना थी।  कीमती लकड़ी यहां उपलब्ध नहीं थी। आम-,महुआ-नीम बहुतायत में था। आम की लकड़ी का प्रति क्यूबिक फीट दाम पांच आना था। बांस एक रुपये के अट्ठारह थे। तब यहां बैंक नही थे। गांव के साहूकार प्रति रुपया पर इकन्नी ब्याज लेते थे। ब्याज की दरें आमतौर पर एक से दो फीसद महीना थीं। हालांकि शर्तें कर्जदार की 
जरूरतों पर बदलती रहती थीं। हसनपुर और निहालगढ़ के सेठ सबसे ज्यादा सम्पन्न थे। 4 अप्रैल 1893 को सुल्तानपुर से होकर गुजरी लखनऊ-फैजाबाद-बनारस रेल लाइन पर पहली गाड़ी चली लेकिन सुल्तानपुर में कोई स्टेशन नहीं बना। जौनपुर के अरगुपुर गांव में बने स्टेशन का नाम बिलवाई रखा गया। बिलवाई सुल्तानपुर जिले का राजस्व गांव है। दो साल बाद लखनऊ-प्रतापगढ़ रेल लाइन शुरू होने के बाद अमेठी, गौरीगंज और मिश्रौली में स्टेशन बन गए। जिला मुख्यालय को रेल सुविधा की शुरुआत के लिए 1901 तक इंतजार करना पड़ा। इस साल इलाहाबाद-सुल्तानपुर -फैजाबाद रेल लाइन चालू हुई थी।
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शनिवार, 8 जुलाई 2017

सम्मान समारोह एवं साहित्यिक संगोष्ठी 2017 सुल्तानपुर उप्र

      पंडित रामानुज त्रिपाठी सृजन संस्थान, गरएं,सुल्तानपुर,उप्र द्वारा कीर्तिशेष बालसाहित्यकार एवं गीतकार कवि रामानुज त्रिपाठी की 13वीं पुण्य तिथि पर 08 जुलाई 2017 को साहित्यकार सम्मान समारोह, पुस्तक लोकार्पण एवं विचार गोष्ठी का आयोजन जिला पंचायत सभागार, सुलतानपुर में किया गया| इस  अवसर पर देश प्रदेश के कई साहित्यकार भाग लिए | सम्पूर्ण कार्यक्रम दो सत्रों में विभाजित था जिसमें पहला सत्र बाल साहित्य पर और दूसरा सत्र  नवगीतों पर आधारित था| पहले सत्र में  रामानुज त्रिपाठी के बालगीत संग्रह "जंगल का स्कूल" और मासिक पत्रिका "बालवाटिका" के जुलाई अंक का लोकार्पण और दूसरे सत्र में आद धीरज श्रीवास्तव जी एवं आदरेया डॉ मंजु श्रीवास्तव जी द्वारा सम्पादित गीत-संकलन "नेह के महावर" और बाबूजी रामानुज त्रिपाठी के नवगीत संग्रह "धुंए की टहनियां" का लोकार्पण हुआ| दोनों सत्रों के विचार पक्ष को विभिन्न साहित्यकारों ने सम्बोधित किया| दोनों सत्रों का कुशल संचालन युवा आलोचक एवं समीक्षक साहित्यकार ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह रवि जी ने किया।
प्रथम सत्र:-----------
संस्थान द्वारा आद0  डॉ.भैरूंलाल गर्ग, आद0 आद्या प्रसाद सिंह प्रदीप जी, आद बन्धु कुशावर्ती जी, आद श्याम नारायण श्रीवास्तव जी एवं आद0 फतह सिंह लोढ़ा जी को बाल साहित्य सम्मान 2017 से सम्मानित किया। बाल साहित्य की वर्तमान प्रासंगकिता पर बोलते हुये वरिष्ठ बालकथाकार दिनेश प्रताप सिंह चित्रेश का कहना था "आज हम बच्चों को शिक्षा देने और उसे प्रौढ़ बनाने के नाम पर अधिक से अधिक बोझ के नीचे दबा रहे हैं| यहाँ बच्चे बौद्धिक न होकर कुंठित होने लगते हैं| हमें बच्चों को इस कुंठा से बचाने के लिए बाल साहित्य से जोड़ना होगा| इसे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि बाल साहित्य न के बराबर लिखे जा रहे हैं| घुमन्तू जातियों, दलितों और बंजारों पर तो लिखे ही नहीं जा रहें हैं| इसके लिए प्रत्येक प्रदेश सरकार को अपने अपने तरीके से प्रयत्न करना चाहिए| लखनऊ के आद बंधु कुशावर्ती का कहना था " रामानुज त्रिपाठी रामनरेश त्रिपाठी के बाद बाल साहित्य के इस जिले के बड़े महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं|" डॉ० शोभनाथ शुक्लजी ने त्रिपाठी जी के बाल साहित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा "बाल साहित्य पढ़ते हुए मुझे हमेशा लगता है कि दो प्रकार के उद्देश्य होने चाहिए जिसमें पहला-बच्चों का मनोरंज करना और दूसरा ज्ञान देते हुए बच्चों को सचेत करना| रामानुज त्रिपाठी के बाल साहित्य की बड़ी विशेषता रही है कि वे मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान देते हुए सचेत भी करती हैं|" मुख्य अतिथि के रूप में बालवाटिका पत्रिका के संपादक डॉ० भैरूं लाल गर्ग जी ने संस्मरण साझा करते हुए कहा "रामानुज त्रिपाठी के बाल साहित्य से परिचय बालवाटिका पत्रिका से ही संभव हो सका| उनकी चिट्ठियां बड़े आदरपूर्ण और सम्मान से सुन्दर हस्तलिखित प्रारूप में आती थीं| मैं सहसा देखकर यह विश्वास कर बैठता था की यह किसी मेहनती रचनाकार का खत है और उसे बड़े  मनोयोग से प्रकाशित करता था|" विशिष्ट अतिथि के रूप में राजस्थान के आद फतह सिंह लोढ़ा जी  ने कहा  "भारतवर्ष में अनेक लेखक थे,  हैं और  रहेंगे लेकिन पिता के साहित्य को आगे लाने वालों को उँगलियों पर गिना जा सकता है| रामानुज त्रिपाठी के साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने में अवनीश त्रिपाठी का बड़ा योगदान रहा है इसीलिए वे बधाई के पात्र हैं|"  प्रथम सत्र का अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ बाल एवं अवधी साहित्यकार आद्या प्रसाद सिंह 'प्रदीप' जी का कहना था कि "बाल साहित्य आज से नहीं आदि काल से रचा जा रहा है जिसे समृद्ध करने में रामानुज त्रिपाठी जी की बड़ी भूमिका रही है|"    
       द्वितीय सत्र:-------
आद ओम नीरव जी, डॉ सूर्यदीन यादव जी, आदरेया डॉ मंजु श्रीवास्तव जी, आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी को शॉल,पुष्पमाला एवं सम्मानपत्र देकर साहित्य सम्मान 2017 से सम्मानित किया गया।
    समीक्षक एवं आलोचक सुरेश चंद्र शर्मा ने बाबूजी रामानुज त्रिपाठी जी के नवगीतों में मानवीय संवेदना के पक्ष को रखते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला| चंडीगढ़ विश्वविद्यालय के शोधार्थी समीक्षक अनिल पाण्डेय ने कहा - "नवगीतों में आत्मकथ्य और मानवीय संवेदनाएं तलाशनी हों तो कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है,बस रामानुज जी के गीत पढ़ें।" वरिष्ठ साहित्यकार डा.सुशील कुमार पांडेय जी का कहना था "पंडित रामानुज त्रिपाठी जी प्राचीन परम्पराओं के पथ पर अग्रसर हैं| उनके नवगीत कल के प्रतीक पर आज की सच्चाई है| इस सत्र के  मुख्य अतिथि कवितालोक लखनऊ के संस्थापक आदरणीय आचार्य ओम नीरव जी ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए कहा कि "नवगीत और बाल कविता में  उनका स्वरुप अलग दिखता है| बच्चे  के अंदर प्रवेश करना परमहंस हो जाना है| पंडित जी इसके अनुकरणीय उदहारण हैं| यह कार्यक्रम एक पुत्र द्वारा पिता जी को श्रद्धांजलि ही नहीं समाज पर भी एक उपकार है|" द्वितीय सत्र में विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर मंजू श्रीवास्तव रहीं और अध्यक्षता नाडियाड गुजरात के वरिष्ठ उपन्यासकार डॉ० सूर्यदीन यादव ने की| मंच का सञ्चालन युवा समीक्षक ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह रवि और सरस्वती वंदना करुणेश भट्ट ने किया| कार्यक्रम  में आशुकवि आद मथुरा प्रसाद सिंह ' जटायु ' , डॉ० रामप्यारे प्रजापति, जगदीश प्रसाद श्रीवास्तव, डॉ० देवनारायण शर्मा, आद उमाशंकर शुक्ल जी, आद उमाकांत पांडेय जी, डॉ० ओंकार नाथ द्विवेदी, आद जयंत त्रिपाठी, डॉ० लक्ष्मण गाँधी, सुधा त्रिपाठी,आद वीरेंद्र कुमार त्रिपाठी जी,प्रीति त्रिपाठी,प्रशंसा शुक्ला,रचना शुक्ला, आदि प्रमुख रुप से  उपस्थित रहे|
आभार ज्ञापन आयोजक के रूप में मैंने किया ।