सोमवार, 26 जुलाई 2021

रामानुज त्रिपाठी के गीतों में नव-मानवतावाद by सत्यम भारती

               रामानुज त्रिपाठी नवगीत के सशक्त हस्ताक्षर माने जाते हैं। इनके गीतों में विषयों का विस्तार, कला का सुंदर नमूना, नवीन प्रयोग, संवेदना की साफगोई और नव मानवतावाद एक साथ दृष्टिगोचर होता है। गीतकार अपने गीतों में लोक में प्रचलित संज्ञाओं का मानवीकरण कर भावों को नवीनता प्रदान करते हैं तो वहीं समन्वयवादी दृष्टिकोण अपनाकर समाज के हर वर्ग को साहित्य में उसकी समान उपस्थिति दर्ज कराते हैं। वे नगरीय संस्कृति एवं आधुनिकता के दुष्प्रभाव के चित्रण करने के साथ-साथ ठेठ गंवई संस्कृति का भी चित्रण प्रस्तुत करते हैं। उनके गीतों में प्रेम के विविध रूप देखने को मिलता हैं, यहाँ देशप्रेम, वात्सल्य प्रेम, प्रकृति प्रेम ,मर्यादित प्रेम आदि एक साथ दृष्टिगोचर होता है। वे मर्यादित प्रेम के पक्षधर हैं, उनके गीतों में मर्यादित प्रणय संबंधों का सुंदर निर्वाहन मिलता है-

 नेह के उपवन में
 महके जब पारिजात
 शरमा के पूनम का
 चांद जब तमाम रात
 बादलों की ओट में
 हो जाए गुम
 चले आना तुम। 

सामान्यवादी दृष्टिकोण वही अपना सकता है जिसके पास मानवों से प्रेम करने की अपार क्षमता हो, सच को सच कहने और अन्याय के खिलाफ आवाज बुलंद करने की शक्ति हो। इनके गीतों में निर्धनों के प्रति संवेदना है, किसानों के प्रति आशा है, निम्न जातियों के लिए सहयोग की भावना है-

सिसक कर 
दीवट पे जलता हर चिराग 
रोशनी का वहम केवल ढो रहा है। 

"भूख " देखने में तो बहुत छोटा शब्द लगता है, लेकिन इसके चपेट में आकर कितने लोग अब तक जान गवा चुके हैं। आजादी के इतने साल बाद भी यहाँ भूख से मरने वालों की संख्या अधिक है  । गीतकार गरीबी की कोढ़ "  भूख " का करूण चित्रण अपने गीतों में प्रस्तुत करते हैं-

 बर्तन में
 अदहन का पानी
 गया खौल कर सूख
 बैठी है
 चूल्हे के आगे
 आस लगाए भूख।

आज का मानव, संक्रमण काल से गुजर रहा है । एक तरफ वह समाज की कुरीति, ऑफिस ,बाजार ,सत्ता एवं पूंजी के गठजोड़ आदि से उत्पन्न हुई समस्याओं से जूझ रहा है तो वहीं दूसरी तरफ वह अपने मन के भीतर की व्याधियों से भी दो - दो हाथ कर रहा है। कुंठा, संत्रास, प्यास, वासना एकाकीपन आदि वह व्याधि है जो मानव को लघुमानव की ओर ले जा रहा है -

न ही कोई आहट
न हुई पदचाप 
घुस आया अंतस में 
कहाँ से संताप। 

मन पर नियंत्रण नहीं होने से अतृप्त इच्छाएँ इतनी प्रबल हो जाती हैं कि उसे तृप्त करने के लिए हमें सैकड़ों कुर्बानियां देनी पड़ती है। क्षण- क्षण बदलते मानवों के मन उसे कमजोर करता जा रहा है और वह किसी चीज पर फोकस नहीं कर पा रहा। इनके गीतों में "क्षणवाद" का सुंदर उदाहरण मिल जाता है जो आधुनिक मानव के मन - मस्तिष्क की अस्पष्ट नियति बन चुकी है-

क्षण में याद आया कुछ 
भूल गया फिर क्षण में 
सुबह से शाम तक
बस केवल दर्पण में
निरख-निरख रूप
शरमाने के। 

बहुत कुछ की चाह और मशीनीकरण ने हमें स्वार्थी बना दिया है। हम निज स्वार्थ के लिए रिश्ते, नाते, मां-बाप सब को भूलते जा रहे हैं। रिश्तों  में बिखराव वर्तमान समय की प्रधान समस्या है। संयुक्त परिवार की अवधारणा अब बिल्कुल विलुप्त होने लगी है। संवाद के अभाव में अच्छे - अच्छे रिश्ते टूट जा रहे हैं। गीतकार के गीतों में रिश्तोंं केे टुटन, संवाद का अभाव, नेह का महावर आदि का सुंदर वर्णन मिलता है-

अनंतिम
संवाद -
तो पीछे पड़े हैं
प्रश्नचिन्ह
तमाम
सिरहाने खड़े हैं  ।

जब कोई दोस्ती, रिश्ता या व्यापार स्वार्थ की बुनियाद पर टिकी हो तथा लाभ - हानि का परस्पर अन्योन्याश्रय  संबंध हो, तब "समझौता " की उत्पत्ति होती है। समझौता में हमारा तन तो आपस में साथ रहता है लेकिन मन कोसों दूर चला जाता है।  आजकल राजनीति से लेकर रिश्ते तक सब जगह समझौता ही चल रहा है, इनके गीत समझौतों के गीत हैं-

परिभाषित होने से पहले
टूट गए सपने
और अचीन्हे समीकरण ही
हुए आज अपने 
समझौते पर प्रत्याशाएं
हुईं बहुत मजबूर  । 

अपने समाज से अब तप, दया, करूणा, प्रेम, सद्भाव , सहयोग, मर्यादा आदि जो मानवीय गुण कहा जाता था अब विलुप्त होने की कगार पर है  । मानवों में दानवी गुण दिनों - दिन घर करता जा रहा है  । रामानुज जी के गीत गिरते नैतिक मूल्य के विरूद्ध प्रतिरोध करता  है -

कहिए! किसको कहें आदमी
सिर्फ खड़े हैं ढाँचे जी।
बीच सड़क पर मरे हुओं की
पड़ी हुईं लावारिश लाशें
सब मुंह फेर चले जा रहे
मानवता को कहाँ तलाशें  । 

आधुनिक मानवों को जितना डर दुश्मनों से नहीं है उतना डर उसके अपनों से है  । वे हमारे अपने ही हमारे लिए चक्रव्यूह बनाते हैं और षड्यंत्र में शामिल  भी होते हैं , कहते हैं - "  घर का भेदी लंका ढाए "  ।  इनके गीत  हमें सचेत करता है ,आस्तीन के सांपों को पहचानने की सलाह देता है तथा षड्यंत्र के शिकार होने से बचने का नुस्खा भी प्रदान करता है -

झूठला कर हर नाते
अपनों से बार-बार बच रहे
आए दिन कितने ही व्यूह
विद्रोही अब रच रहे
अभिमन्यु कौन-कौन 
चक्रव्यूह तोड़े। 
नफरत का विष मानव में बचपन से ही भरा जाता है  । बचपन में घरवाले तो युवावस्था में मीडिया, सोशल साइट ,अराजक तत्व और राजनीति नफरत की आग भड़का कर उन्हें दिग्भ्रमित करते हैं । हम आज बारूद के पेड़  पर चढ़े बैठे हैं जिसे वर्षों से नफरत पोषित करती आई है  । गीतकार के गीत नफरत की मायावी पेड़ से वापस उतरने का मार्ग बताते हैं-

आंधियाँ नफरत की 
इतनी बहीं तेज
उड़ गए हर संहिता
के पेज-पेज 
रह गए अवशिष्ट पन्ने
रक्त-रंजित पाठ के । 

नफरत की आग में सबसे ज्यादा जनता ही जलती है। जनता को इस लोकतंत्र में सिर्फ वोट डालने के लिए रखा गया है। नेता हर बार कुछ नया जुमला फेक कर हमें बेवकूफ बना जाते हैं और फिर अगले चुनाव में ही वो अपना मुंह  दिखाते हैं। इनके गीतों में लोकतंत्र के गिरते स्तर, चुनावी हथकंडा, राजनेताओं का दोहरा चरित्र, कागज पर विकास ,कथनी करनी में फर्क तथा जनता की स्थिति का जीवंत चित्रण है-

देख रहा सपने रोटी के 
भूखा प्यासा मतदाता है 
पाकर चुपड़ी का आश्वासन 
वह लालच में फंस जाता है
देकर  मत  फिर भस्मासुर को
बन बैठा है औघड़दानी। 

 समाज धीरे-धीरे  बदल रहा है, एक वर्ग  जो बरसों से शोषित होता आया है उसमें भी अब जागृति आने लगी है, कीचड़ में ही कमल खिलने लगा है और अंधेरी बस्ती में भी अब चिराग जलने लगे हैं। इनके गीतों में इस परिवर्तन को सकारात्मक रूप से वर्णित किया गया है।प्राचीन परंपरा, वर्जना और रूढ़ियों के टूटने से गीतकार खुश नजर आ रहे हैं क्योंकि कहा गया है- "परिवर्तन ही संसार का नियम है।"

टूटा हवाओं का सिलसिला 
लहरों का एक पृष्ठ फिर खुला
सागर की नादान बेटियों ने 
चुपके से लिख दिया नाम।

जब बच्चों का सही से परवरिश नहीं हो पाता है तब वह अंधकार से हाथ मिला लेता है  । सही परवरिश के अभाव में समाज में न जाने कितने चोर, उचक्के, आतंकवादी पैदा हो रहे हैं  । रामानुज जी के गीत इस समस्या से भी हमें रूबरू कराता है-

अरमानों के पारिजात पर 
अंगारों के फूल खिले
रोशनीयों के बालिग बेटे 
अंधकार से गले मिले। 

इनके गीतों में एक कलाकार का सूखा जीवन, संघर्ष, स्वाभिमान आदि का भी जिक्र मिलता है  । एक कवि या साहित्यकार  कैसे एकाकी होकर साहित्य की सर्जना करता है, आम जन की आवाज बनता है ,लोगों के चेहरे पर खुशी लाता है; लेकिन उसके जीवन में क्या चल रहा है उसके बारे में कोई पूछने वाला नहीं है-

आहिस्ता खोलता है
डायरी के पन्ने 
कलम के कान जब 
हो जाते हैं चौकन्ने
फिर कुछ लिखता है 
लिख-लिख कर खोता है 
जब गांव सोता है। 

साहित्य में सब नाम नहीं कमा सकता, सब अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करवा पाते । साहित्य में आलोचकों की कलम, नेताओं की सिफारिश ,क्षेत्र का प्रभाव तथा चाटुकारिता भी हावी है  । परिणामतः अच्छी -अच्छी प्रतिभा जमींदोज हो जाती हैं, उसे फलने से पहले ही कुचल दिया जाता है ;रामानुज जी के गीत इस तरफ भी इशारा करता है -

सर्जना तो हुई है आज तक गगनचुंबी
किंतु पक्षधरता की गंध आ समाई है  ।

भाव पक्ष की ही तरह शिल्प पक्ष भी इनके गीतों में लाजवाब है। भाषा तत्सम प्रधान और लोकाधर्मी है, प्रतीकों का सुंदर प्रयोग यहाँ मिलता है - शबनम, पारिजात, शब्द ,तूलिका, रेत,दर्पण ,अहेरी, शिलालेख आदि इनके प्रिय प्रतीक हैं। प्रतीक उनके गीतों को सजीवता प्रदान कर भाव का नया मार्ग  खोलते हैं-

समेटे चुप्पी नियति की खिड़कियाँ
सह रहीं रुठे समय की झिड़कियाँ
घुन गए तकदीर के अमृत किवाड़े
कौन सांकल खटखटाए 
कौन खोले?

अगर अलंकार की बात करें तो यहाँ उपमा, रूपक, अनुप्रास, मानवीकरण का सुंदर प्रयोग मिलता है। 
 प्रकृति का मानवीकरण इनके गीतों में सुंदर तरीके से अभिव्यक्त होता है। चांद के मानवीकरण का सुंदर उदाहरण देखें-

 सांझ हुई अवसन्न 
 पत्थरों पर चुप्पी बोकर।

 रातों की आजानुबाह में
 सिमटी दसों दिशाएँ
 शायद छप्पन भोग लिए
 शशि की बालाएं आएं। 

अभिधा में कम , लक्षणा और व्यंजना में इनके गीत अधिकतर हैं। लक्षणा एवं व्यंजना का सुंदर प्रयोग व्यंग्य और प्रस्तुत-अप्रस्तुत योजना के लिए किया गया है-

 सुना, तुम्हारी मटकी में
 कुल सात - समुंदर हैं!

अंततः यह कहा जा सकता है कि रामानुज जी मानवीय संघर्ष और उल्लास  के गीतकार हैं। इनके गीत आधुनिक मानव की नियति एवं नियत का जीवंत दस्तावेज है। इनके गीतों में नव मानवतावाद के विविध पक्षों का विस्तार पूर्वक वर्णन मिलता है। वीरेंद्र मिश्र के शब्दों में कहें तो इनके नवगीत "आस्थाशील अनुभूतियों का निर्बंध समवेत स्वर हैं।" 

सत्यम भारती
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
नई दिल्ली, 110067
मो. - 8677056002.

सोमवार, 5 जुलाई 2021

नवगीत-भरा हुआ संत्रास by आशुतोष कुमार आशू

जटा बढ़ाए बंजारा मन 
ढूढ़ रहा नित ठौर..!!

बना रहा है आज उजालों पर अँधियारा धाक,
डाँट पिलाता है हाथों को कुम्भकार का चाक,
छूटा जाता है हाथों से 
मुँह तक आया कौर..!!

सुख-जीवन चल रहे रात-दिन जैसे रेल पटरियाँ,
दुःख-जीवन इस तरह घुले हैं ज्यों धागे में लड़ियाँ,
जितना ऊब गया जीवन से
उतना जीना और..!!

सब होठों की एक शिकायत, भरा हुआ संत्रास,
किन्तु मूल में कारण ढूढें, है किसको अवकाश,
बस हर मानव कोस रहा है 
वर्तमान का दौर..!!

आज गर्त में गिरा पड़ा है यह अपना परिवेश,
मूल्य रखे हैं गिरवी सारे भरा हुआ बस क्लेश,
इठलाते हैं कि अतीत में,
हम सब थे सिरमौर..!!

- आशुतोष कुमार आशू

शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

नवगीत-तप कर हम कुंदन निकलेंगे by संध्या सिंह

मुस्कानों को अगर हटाया 
दबे हुए क्रंदन निकलेंगे 
अभी मौन की भट्टी में है 
तपकर हम कुंदन निकलेंगे

भरसक शब्द दिये चिंतन को 
लेकिन बचा बहुत कुछ बाकी 
भीग भीग कर भी नामुमकिन 
बूँद बूँद पढ़ना बरखा की

ज़रा झुर्रियों में झांको तो 
छुपे हुए बचपन निकलेंगे

हवा छुपी पत्तों के पीछे 
धूप बादलों में दुबकी है 
दिन को कैसे पता चलेगा 
रात कहाँ कितनी सुबकी है 

उत्सव के महलों के भीतर 
पीड़ा के आंगन निकलेंगे 

यायावरी बहुत की बाहर
अब अंदर का सफ़र ज़रूरी 
जाने कितना समय लगेगा 
खुद से खुद की मीलों दूरी 

भीतर एक मथानी चलती 
बनकर हम मक्खन निकलेंगे

--- संध्या सिंह, लखनऊ

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

नवगीत-सुबह की गंध by विनय विक्रम सिंह

चल सुबह की गंध सूँघें, 
थक रहा है तन।

रख नहीं छोटे क़दम तू,
दूर उसका घर।
हर क़दम में लाँघ राही,
हाँफने के स्वर।
राह में काँटे बिछाते,
नींद के सागर।
खुम्भियों की छाँव बेचें,
चैन की भाँवर।
बाँध देते ये भुलावे, 
पाँव में बन्धन।
चल सुबह की गंध सूँघें, 
थक रहा है तन।१।

हो रहा हर पाट चौड़ा,
धार नित कमतर।
वसन काले ढँक चुके हैं,
अंग उसका हर।
बुदबुदाकर भर रही वो,
बुदबुदों में स्वर।
मंत्र साबर साधती है,
रेत में धँसकर।
टोटके सी साँस सूखी,
ढो रही जीवन।
चल सुबह की गंध सूँघें, 
थक रहा है तन।२।

लय अधूरे थाप लेती,
गद्य सी ढलकर।
भाव में लोहा मिलाकर,
वज़न पैदाकर।
लोच जीवन की थकी है,
सोच में मर कर।
पृष्ठ हैं पुस्तक नहीं हैं,
ठग रहे पोस्टर।
गेयता छुपकर वनों में,
लेपती चंदन।
चल सुबह की गंध सूँघें, 
थक रहा है तन।३।

गल रहे हिमशैल उजले,
दिख रही माटी।
नग्नता के ढोल बजते,
सिर धुने थाती।
बंजरों में दीप जलते,
खेत बिन बाती।
बिक रही हैं रोटियाँ,
दाँत से काटी।
अब नदी के पाँव जलते, 
रेत हर आँगन।।
चल सुबह की गंध सूँघें, 
थक रहा है तन।४।

- विनय विक्रम सिंह

सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश by राज खन्ना

तब ऐसा था सुल्तानपुर
                       ■ राज खन्ना
                       ब्यौरे बहुत पुराने हैं लेकिन उनकी दिलचस्पी हो सकती है , जिन्हें सुल्तानपुर के अतीत को लेकर जिज्ञासा रहती है। 1857 की क्रांति में बढ़चढ़कर हिस्सेदारी की बहुत बड़ी कीमत सुल्तानपुर ने चुकाई थी। गोमतीं के उत्तर बसा शहर अंग्रेजों ने पूरी तौर पर नष्ट कर दिया था। वहां चिराग जलाने तक की इजाजत नहीं थी। शांति स्थापित होने के बाद अंग्रेजों ने 1858 - 59 में गोमतीं के दक्षिणी किनारे पर मौजूदा शहर और जिले का मुख्यालय स्थापित किया । शहर बसने के पहले यह स्थान गिरगिट नामक गांव था। चूंकि पहले इस स्थान पर अंग्रेजी फौज कैम्प करती थी , इसलिए आम लोग इसे कम्पू भी कहते थे। मिस्टर पार्किन्स पहले डिप्टी कमिश्नर थे। शहर का पार्किंसगंज मोहल्ला उन्हीं के नाम पर है। मेजरगंज और गोरा बारिक ( गोरा बैरक) जैसे नाम इस स्थान पर फौज की मौजूदगी की याद दिलाते हैं।
                 1903 में छपा सुल्तानपुर का गजेटियर इन दिनों पढ़ रहा हूँ। एच. आर.नेविल्स आई.सी.एस. ने इसे तैयार किया था। जिले के इतिहास के अलावा जनजीवन और साथ ही प्रशासनिक और बुनियादी जरूरतों के इंतजाम की कोशिशों के शुरुआती ढांचे से जुड़े तमाम पहलुओं से जुड़ी जानकारियां यह गजेटियर समेटे हुए है। 1863 -70 के मध्य जिले का प्रथम भूमि बंदोबस्त मिस्टर मिलेट ने किया। 1869 में जिले का पुनर्गठन किया गया। उसके पहले जिले में 12 परगने थे। नए सीमांकन में इसौली,बरौंसा और अलदेमऊ को फैजाबाद से हटाकर सुल्तानपुर से जोड़ा गया। उधर सुल्तानपुर से निकाल कर इन्हौना,जायस , सिमरौता और मोहनलाल गंज को रायबरेली में तथा सुबेहा को बाराबंकी में शामिल कर दिया गया।
             1869 में जिले में पहली जनगणना हुई। आबादी थी 9,30,023। सीमाओं के परिवर्तन के बाद आबादी बढ़कर 10,40,227 हो गई। प्रति वर्गमील 593 लोग रहते थे। 1881 में आबादी घटकर 9,57,912 रह गई। आबादी घटने का कारण 1873 और 1877 का भयंकर अकाल था जिसमें बड़ी संख्यां में मौतें हुईं और पलायन भी हुआ। 1891 की जनगणना में आबादी 10,75,851 थी। इस जनगणना में पास-पड़ोस के जिलों में भी जनसंख्या में वृद्धि हुई थी।
            1901की जनगणना में पिछली की तुलना में जनसंख्या में मामूली वृद्धि हुई। कुल जनसंख्या 10,83,904 थी। प्रतिवर्ग मील 637 लोग निवास करते थे। कुल आबादी में हिंदुओं की संख्या 9,63,879 और मुसलमान 1,19,740 थे। यह जनगणना इस मिथ को तोड़ती है कि सिख विभाजन के बाद ही यहां बसे। उस समय 151 सिख यहाँ आबाद थे। दो जैनी और एक पारसी भी थे। 25 हिंदुओं ने स्वयं को ' आर्य ' के तौर पर दर्ज कराया था। इस जनगणना में जातिवार ब्यौरे दर्ज हुए। इसमें ब्राह्मण 1,60,000 , राजपूत 86,561, जाटव 1,40,000 , यादव 1,28,000 ,वैश्य 22,970 ,कायस्थ 12,832, मुराई 4,244 तथा कुर्मी 28,455 थे। अन्य आबादी में कलवार,केवट, कुम्हार,पासी,कोरी,गड़रिया,तेली और कहांर आदि का उल्लेख है लेकिन उनकी अलग-अलग संख्या दर्ज नहीं  हैं। मुसलमानों की कुल आबादी में 25,800 ऐसे मुसलमान थे जो राजपूतों के विभिन्न वर्गों से धर्मांतरित हुए थे। आबादी में कम हिस्सेदारी के बाद भी जिले की कृषियोग्य भूमि के 76 फीसद हिस्से के मालिक राजपूत थे। उनके पास 1633 मौजे थे। मुसलमानों के पास 175, ब्राह्मणों के पास 75 और कायस्थों के पास 67 मौजे थे। शेष भूमि अन्य जातियों के पास थी।
            लगभग पूरी आबादी खेती पर निर्भर थी। पूरे जिले में इकलौता शहर सुल्तानपुर था। उसकी आबादी दस हजार से भी कम थी। 1890 में उसे म्युनिस्पिलिटी
    का दर्जा हासिल हो चुका था। इसके तेरह सदस्यों में दस निर्वाचन से चुने जाते थे। दो का नामांकन होता था। डिप्टी कमिश्नर इसके पदेन अध्यक्ष होते थे। 1871 में डिस्ट्रिक्ट कमेटी बनाई गई। इसे 1884 में डिस्ट्रिक्ट बोर्ड (आज की जिला पंचायत ) नाम दिया गया। इसकी सत्रह सदस्यीय कमेटी में 12 का निर्वाचन होता था। चार तहसीलें थीं। प्रत्येक तहसील से तीन प्रतिनिधि चुने जाते थे। चारों तहसीलों के एस. डी. एम. इसके पदेन सदस्य जबकि डिप्टी कमिश्नर अध्यक्ष होते थे। 
          अपने बुजुर्गों से उनके दौर के किस्से सुनते या उन्होंने जो अपने बड़ों से सुन रखा था , उसे जब वे दोहराते थे तो हमारी पीढ़ी हंसती थी। खासतौर पर जब गुजरे जमाने की कीमतों का जिक्र होता था। दिलचस्प है कि गजेटियर में भी इनमें बहुत कुछ पढ़ा जा सकता है। उन दिनों तौल के लिए ' सेर ' का इस्तेमाल होता था। प्रति सेर लगभग आठ सौ ग्राम का होता था। ब्यौरों के मुताबिक 1861 में गेहूं एक रुपये का 28 सेर मिलता था। अगले तीन सालों में सूखे के कारण दाम बढ़े। इन वर्षों में एक रुपये का दस सेर गेहूं बिका। 1869 में पौने तेरह सेर जबकि 1867 से 1872 का औसत दाम 19 सेर था। 1877 के अकाल में गेहूं की भारी किल्लत हुई। लेकिन 1880 से 1886 के सात वर्षों में एक रुपये में गेहूं का औसत दाम 21.4 सेर था। 1887 से 1896 के सात वर्षों में गेहूं एक रुपये में 15.2 सेर की दर से बिका। बाद के सात वर्षों यानी 1902 तक गेहूं का औसत दाम 16.5 सेर था। कोदों, ज्वार, चना की कमजोर वर्गों में सबसे ज्यादा खपत थी। उनमें चना सबसे ज्यादा पसंद किया जाता था। 1861 में एक रुपये में ज्वार-चना 32 सेर उपलब्ध था। अगले चालीस वर्षों में इन जिसों का औसत मूल्य प्रति रुपया 22.5 सेर था।
                  20 वीं सदी की शुरुआत तक सुल्तानपुर में नकद मजदूरी का चलन नहीं था। आमतौर पर एवज में अनाज ही दिया जाता था , यद्यपि मजदूरी का निर्धारण पैसे में होता और फिर उस मूल्य का अनाज दिया जाता था। कम परिश्रम के काम जो महिलाओं और बच्चों के जिम्मे होते , उसकी मजदूरी इकन्नी थी। ज्यादा परिश्रम के कामों की मजदूरी छह पाई थी। बढई की मजदूरी उसके हुनर के मुताबिक तीन से पांच आने के बीच थी। हल को साल भर दुरुस्त रखने के लिए लोहार को आठ सेर अनाज दिया जाता था। सबसे कीमती माने जाने जाने वाले ' सोने ' के दाम तो गजेटियर में नहीं दिए गए हैं लेकिन सुनार की मजदूरी का जिक्र जरूर है। इसके मुताबिक सुनार सोने के मूल्य के प्रति रुपये में एक आना मजदूरी लेते थे। जिले के लगभग सभी मकान कच्चे थे। पक्की ईंटें बनती थीं लेकिन उनका इस्तेमाल सिर्फ ताल्लुकेदारों-जमींदारों और सम्पन्न और सबल लोगों के मकानों में ही होता था। उस समय तक मकानों में पत्थर का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं हुआ था।  अमीर जानकर लुटने के डर से भी लोग पक्के मकान बनवाने से बचते थे। ईंटों का दाम चार से नौ रुपये प्रति हजार था। कच्चे मकानों में इस्तेमाल होने वाला खपड़ा का दाम एक रुपया प्रति हजार था। दस क्यूबिक फीट कच्ची दीवार की लागत बारह आना थी।  कीमती लकड़ी यहां उपलब्ध नहीं थी। आम-,महुआ-नीम बहुतायत में था। आम की लकड़ी का प्रति क्यूबिक फीट दाम पांच आना था। बांस एक रुपये के अट्ठारह थे। तब यहां बैंक नही थे। गांव के साहूकार प्रति रुपया पर इकन्नी ब्याज लेते थे। ब्याज की दरें आमतौर पर एक से दो फीसद महीना थीं। हालांकि शर्तें कर्जदार की 
जरूरतों पर बदलती रहती थीं। हसनपुर और निहालगढ़ के सेठ सबसे ज्यादा सम्पन्न थे। 4 अप्रैल 1893 को सुल्तानपुर से होकर गुजरी लखनऊ-फैजाबाद-बनारस रेल लाइन पर पहली गाड़ी चली लेकिन सुल्तानपुर में कोई स्टेशन नहीं बना। जौनपुर के अरगुपुर गांव में बने स्टेशन का नाम बिलवाई रखा गया। बिलवाई सुल्तानपुर जिले का राजस्व गांव है। दो साल बाद लखनऊ-प्रतापगढ़ रेल लाइन शुरू होने के बाद अमेठी, गौरीगंज और मिश्रौली में स्टेशन बन गए। जिला मुख्यालय को रेल सुविधा की शुरुआत के लिए 1901 तक इंतजार करना पड़ा। इस साल इलाहाबाद-सुल्तानपुर -फैजाबाद रेल लाइन चालू हुई थी।
                             ................

बुधवार, 30 जून 2021

विरल काव्यबोध की भावप्रधान कविताएं by अवनीश त्रिपाठी

समीक्षित पुस्तक- उन्हीं में पलता रहा प्रेम
कवयित्री- पूनम शुक्ला
प्रकाशक- आर्य प्रकाशन मंडल,नई दिल्ली
संस्करण- 2017
मूल्य- 200 ₹ (सजिल्द)
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             कविता में भाव तत्व की प्रधानता होती है।मुक्तछंद कविताओं में पद की आवश्यकता नहीं होती है,केवल एक भावप्रधान तत्व ही समाहित होता है।वर्तमान की कविताएं मानवमन की भावनाओं और मानव मस्तिष्क के विचारों और अनुभवों से अधिक प्रभावित हैं।
    आज मेरे हाथ में है 'उन्हीं में पलता रहा प्रेम'। जो कि कवयित्री पूनम शुक्ला का दूसरा स्वतंत्र काव्य संग्रह है।इस संग्रह की कविताएं भारी भरकम बिम्बों प्रतीकों से बोझिल नहीं हैं।एक पाठक के रूप में कहूँ तो ये कविताएं पढ़ने-बोलने में छोटी भले ही हैं लेकिन इनका प्रभाव खासतौर से उन पाठकों पर अधिक होता होगा जो काव्य में संप्रेषणीयता की अभिरुचि वाले हैं।पाठक को कविताओं के साथ प्रायशः एक समस्या आती है कि वे उसकी अर्थगम्भीरता से असहज हो उठते हैं।इस संग्रह की कविताएं भाषा की सहजता और भावों की सरल संप्रेषणीयता के साथ स्त्री विमर्श की तथा मानवीय संवेदना की उत्कट अभिव्यक्ति कर रही हैं।
        आज के छंदमुक्त और छन्दयुक्त दोनों प्रकार के काव्यों में अक्सर रचना का आरम्भ कसाव के साथ तो होता है लेकिन अंत आते आते रचना भसक जाती है।लेकिन पूनम शुक्ला कविताओं की बुनावट यूँ करती हैं कि वे कविताएं अपने कथ्य का आकार गढ़ते हुए अभिव्यक्ति के ठोस धरातल पर, भावों के बलिष्ठ पैरों के बल खड़ी हो जाती हैं।
          संग्रह की कविताओं में ईंट, गिट्टी, कंकड़, पत्थर जैसी कठोरता नहीं है।शब्दों की खुरदुराहट से खरोंच मारने की हड़बड़ी भी नहीं है।वे जल्दी से खरोंच मारकर प्रसिद्ध होने की उतावली भी नहीं दिखाई देती हैं।इसीलिए इन कविताओं में सहजता है।भावों के धरातल पर अभ्यासी होने का गुण है।सबसे बड़ी बात कि वे कॉपी पेस्ट से बचती गई हैं।उनमें वैचारिक मौलिकता है।
      कवयित्री वस्तुतः स्त्री विमर्श को ठोस आधार देती हैं।मूक वातावरण के बीच हवा की चुप्पी का अपना ही दर्द है।यह हवा स्त्री का प्रतीक है।वे स्त्री को प्राप्त हुए उस रेतीले धरातल को बखूबी जानती और पहचानती हैं जिसमें औरत को विभिन्न सम्बन्धों और बन्धनों की जकड़न से निजात नहीं मिल सकी।स्त्री के जीवन को वे मृगतृष्णा मानती हैं।पूनम जी कहती हैं- 
"बाँध दिया गया उन्हें
और कहा गया
इसी बंधन में है तुम्हारी मुक्ति।" 
      कवयित्री स्त्री के मन की व्यथाओं से गहनता से जुड़ी हुई हैं। वे कहती हैं कि तकनीकी और अभियांत्रिकी में दुनिया ने बहुत विकास भले ही कर लिया है लेकिन वैज्ञानिकों को आज तक चेहरा और मन पढ़ने का यंत्र बनाने में सफलता नहीं मिल सकी है।
        रचनाकार का धर्म और कर्तव्य दोनों है कि वो निकट में घटती हुई घटनाओं को महसूस करे।उथल पुथल को जाने,समझे और बयान करे अपनी रचनाओं में। लेकिन कविताओं को बयान बनने से बचाये।पूनम शुक्ला इससे पूरी तरह वाकिफ हैं।उनकी कविताओं में सड़कों का वाचालपन भी है और हवा की चुप्पी भी। उनकी आलमारी में रखे हुए पति-पत्नी के वस्त्र भी आपस में बोलते बतियाते हैं- 
 "दोनों ही आलमारियों में
रहते हैं हम दोनों के सामान
ताकि घुले मिले
हमारी हर एक चीज
धीरे धीरे आपस में
इनके बतियाने से
न छाया रहे मौन।" 
        कवयित्री जीवन को रनिंग धारावाहिक के रूप में प्रस्तुत करती हैं और उस में आनेवाली घुटन को दूर करने के लिए उनके पास प्रेम का गुलाबी रंग भी है।'नहीं लाऊँगी बोनसाई' कविता में वे बोनसाई को गृहिणी के प्रतीक के तौर पर इस्तेमाल करती हैं। 'जब थम जाएगी मेरी हँसी' कविता एक प्रश्न छोड़ जाती है-
"मगर उस दिन क्या होगा
जब थम जाएगी मेरी हँसी"
       "बिन घरनी घर भूत का डेरा" यह एक कहावत पूनम जी की कविता 'कुल सात लोग रहते हैं घर में' पर पूर्णतः लागू होती है।एक गृहिणी के बीमार होने से घर में उत्पन्न दुर्व्यवस्था का यथार्थ चित्रण इस कविता में है-
"कोई बड़बड़ा रहा है,
कोई लड़खड़ा रहा है
गीली तौलिया तरस रही धूप की खातिर
धूल की चादर ओढ़े फर्श ऊंघ रही है
नल आधे बन्द हैं,टपक रहा है पानी
रसोई में कुछ बना है कुछ होटल से आया है
रात होने को है,दरवाजा खुला है
बीमार है बस एक स्त्री उस घर की
और कुल सात लोग रहते हैं घर में।
    यह एक ऐसा यथार्थपरक चित्रण है जो हर घर में अभिव्याप्त है।
          केवल शब्दों का कोलाज़ बनाने और शब्दों की स्फीति गढ़ने से ही कविता कहलाने का सफर तय नहीं होता बल्कि उसमें भाव अथवा कथ्य की उपस्थिति की आवश्यकता होती है।कवयित्री अनभिज्ञ नहीं इससे।वे व्यथित हैं रोजमर्रा की उस जिंदगी से जिसमें सड़कों पर आते जाते हुए बगल से आकर कोई कुछ भी बोल जाता है।वे इस स्थिति को 'मैं वह हरा बोर्ड नहीं हूँ' कविता में आक्रोशित होकर व्यक्त करते हुए कहती हैं-
"सुनो! आज चीखकर
कहना चाहती हूँ सबसे
कि मैं सड़क के किनारे लगा हुआ
वह हरा बोर्ड नहीं हूँ
जिस पर लिखा है कि
यह हुड्डा की हरित पट्टी है
यहाँ कूड़ा फेंकना मना है
और ठीक
उस बोर्ड के नीचे ही
लगा हुआ है कूड़े का ढेर..."
           समाज में सबसे अधिक पीड़ित कोई वर्ग है तो वह है वृद्धजनों का।संग्रह की एक कविता 'बुजुर्गों के बीच' में बुजुर्गों के अकेलेपन और उपेक्षा के प्रति कवयित्री संवेदनशील है- 
"मैं अक्सर बैठ जाती हूँ 
उनके बहुत पास
और निहारती हूँ 
उनके चेहरों की रेखाएं
जो होती हैं कहीं सीधी 
कहीं आड़ी कहीं तिरछी
जिनमें समाहित होती हैं 
उनकी सारी पीड़ाएँ"
         संग्रह की दो कविताएं 'प्रतीक्षा करना' और 'समाधान' सामाजिक और आर्थिक रूप से दलित एवं मजदूर वर्ग की समस्याओं की बात भी कर रही हैं और उनकी स्थिति से आँखें मूँदे हुए समाज के आभिजात्य वर्ग की उस सोच को भली भाँति खोलकर रख दे रही हैं जिस सोच में दलित वर्ग उनकी इच्छापूर्ति का साधन मात्र है। 'अत्याधुनिक' होने की वृद्धिदर ने विकास का मीटर भले ही सही किया हो लेकिन इस विकास ने किसानों की किसानी पर ग्रहण लगा दिया है
"किसानों के खेतों पर
उगने लगी हैं अब
मल्टीनेशनल कम्पनियां।" 
          वर्तमान कविता में वक्रोक्ति या व्यंजनात्मकता की प्रमुखता होती है। उत्तर आधुनिकता में भी परम्परागत वैचारिकता की पोषक मानव प्रवृत्ति को 'अत्याधुनिक' कविता के इस अंश में इसी व्यंजना का रूपाकार मिला है। देखें- 
"आधुनिक इतना कि खुली रह जाएं पतलूनें
सम्पन्नता ऐसी कि चौंधियां जाएं आँखें
शिक्षा ऐसी की खाली हो जाएं जेबें।" 
         संग्रह की शीर्षक कविता 'उन्हीं में पलता रहा प्रेम' में कवयित्री की भावकल्पना बिम्बधर्मी है।पूनम जी हाथ से हस्तलिपि को पढवाती हैं। हृदय से वेदना को महसूसती हैं।आँखें आंसुओं की गति को समझती हैं तो कलाइयाँ चूड़ियों की भाषा को।इन्हीं सबके मध्य में नफरत के बोये गए बीज भी उग रहे हैं लेकिन कविता प्रेम की सकारत्मकता की वकालत सशक्त होकर कर रही है।'तरक्की' कविता निजी स्कूलों के स्टॉफ की समस्याओं को सामने रखती है।स्त्री का सौंदर्य भी कष्टकारी है उसके लिए।'कुकुरमुत्तों की भीड़ में' कविता में काली और गोरी लड़की का तुलनात्मक विवेचन किया गया है। 'उपवास' कविता में मानव मानसिकता के बदलते पर्याय की ओर इंगित किया गया है।'चार स्त्रियां', 'कुछ नया हुआ इस बार', 'तुम्हारा स्पर्श', 'दूर से', 'चरित्रहीन', 'बच्चे सीख रहे हैं', 'आज सुबह' आदि कविताएं भी मनोमस्तिष्क को छूती हैं।
        संग्रह में भाषा की सहजता है।क्लिष्ट शब्दों का प्रयोग लगभग नहीं ही है।तात्पर्य कि कविताओं में ऐसे शब्द नहीं हैं कि पाठक को शब्दकोश की आवश्यकता पड़े।कपोल कल्पना भी नहीं है।कविता में यथार्थ अभिव्यक्ति को ही महसूस किया जा सकता है।कवयित्री अभ्यासी हैं और अध्ययनशीलता भी है लिहाजा शब्दों और वाक्यों के अनावश्यक विस्तार की अपेक्षा उनसे विषयों और विषयवस्तु के विस्तार की अपेक्षा अवश्य है।जहाँ पर शब्दों की सीमाएं समाप्त होती हैं वहीं से कविता आरंभ होती है। आधुनिक कविताओं में शब्दों के जाल बुनने की चतुराई अधिक है। लेकिन पूनम शुक्ला इससे लगभग स्वतंत्र हैं।वे शब्दों की सीमाओं को कविता की आधारभूत आवश्यकता स्वीकार करती हैं।वैचारिक दृष्टि से इसे विरल काव्य बोध कहना ही उपयुक्त है।आशा है कि अगले संग्रह में यह काव्यबोध और पुष्ट होगा तथा अपेक्षित कविताएं पढ़ने को मिलेंगी।

समीक्षक- 
अवनीश त्रिपाठी
गरयें,सुलतानपुर उ.प्र. 227304
9451554243

ग्राम्य कथा का वर्तमान परिदृश्य और उपन्यास 'अँगूठे पर वसीयत' by अवनीश त्रिपाठी

समीक्षित पुस्तक: अँगूठे पर वसीयत (उपन्यास)
लेखक: शोभनाथ शुक्ल
प्रकाशक: साक्षी प्रकाशन संस्थान
1274/28 बढ़ैयावीर 
सिविल लाइन 2 सुलतानपुर उप्र
संस्करण: 2020 प्रथम
मूल्य:₹300 सजिल्द, पृष्ठ:252

   शोभनाथ शुक्ल के सद्यः प्रकाशित उपन्यास 'अँगूठे पर वसीयत' को पढ़ते हुए ग्राम्य कथा का वर्तमान परिदृश्य सचित्र आँखों के सामने जीवंत हो उठा।प्रेमचंद जैसे उपन्यासकार 'उपन्यास' को मानवचरित्र की प्रतिच्छवि के रूप में देखते थे।सच्चाई है कि यही उनका उद्देश्य भी रहा था।लेकिन इसका यह आशय नहीं था कि वे कथा की रोचकता की वकालत नहीं करते थे।उपन्यास में यथार्थवाद और यथार्थवाद का संगठनात्मक स्वरूप तो होना ही चाहिए लेकिन साथ ही कथा की रोचकता,प्रभावक्षमता और रसवत्ता आदि गुणों के प्रति भी लेखक को सजग रहने की आवश्यकता है।शोभनाथ शुक्ल के उपन्यास 'अँगूठे पर वसीयत' को इस रूप में भी कम अंक नहीं मिलते।यह उपन्यास आँचलिक ग्राम्य कथा पर केंद्रित है।जिसकी केंद्रीय कथावस्तु है फतेहपुर का एक गाँव।इसमें वही घटनायें और वही विचार हैं जिनसे कथा का माधुर्य बढ़ता जाता है और साथ ही प्लॉट भी विकसित होता जाता है।इससे यह बात हुई है कि उपन्यास के चरित्रों के गुप्त मनोभाव खुलकर प्रदर्शित होते गए हैं और गंभीर औपन्यासिक मंथन की परतें खुलती गईं हैं।लेखक ने केवल मनबहलाव की कथा के रूप इसे नहीं प्रस्तुत किया बल्कि सच्चा प्रभाव लाने के लिए भावयंत्र को सूक्ष्म और सजग बनाये रखा है। 'नवीनता' सापेक्ष शब्द है जिसकी जीवंतता बनी रहनी चाहिए।कुल्लीभाट,आधा गाँव,चाक और अँगूठे पर वसीयत को देखें तो निराला,राही मासूम रज़ा,मैत्रेयी पुष्पा में निश्चित ही कालसापेक्ष अंतर मिलेगा।इन सभी लेखकों से वही अंतर शोभनाथ शुक्ल में भी होगा।इसे हम चित्र के क्रमिक बदलाव की स्थिति कह सकते हैं।इसीलिए उक्त सभी उपन्यास अपने समय के प्रति जागरूक,कर्मचेतना या संघर्षचेतना के प्रति सजग रहे हैं और विस्फोटक यथार्थ का डटकर सामना करने हेतु पाठक को तैयार रहने के लिए भी कहते हैं।
         प्रयाग में एक कार्यक्रम में प्रगतिशील आलोचक प्रो. राजेन्द्र कुमार ने कहा कि 'प्रेमचंद के होरी की दशा तो विगत 80 वर्षों में काफी कुछ  बदली हुई है लेकिन हमें तलाश करनी चाहिए गोबर की,देखना होगा कि आजकल गोबर किस स्थिति में है और क्या कर रहा है।' अँगूठे पर वसीयत कहीं न कहीं उसी गोबर की जद्दोजहद से रूबरू है।बीसवीं सदी के आरम्भ में मराठी चिंतक विश्वनाथ राजवाड़े ने अपने आलेख में लिखा कि 'उपन्यास के मूल में यथार्थ की विचारधारा जरूर होनी चाहिए लेकिन उपन्यास की कलात्मकता में अद्भुत का स्पर्श भी होना चाहिए'।इस उपन्यास में रामबरन दुर्बल है यह यथार्थ है लेकिन जीवनी शक्ति और विलक्षण संघर्ष क्षमता अप्रत्याशित और अद्भुत है।उसकी पत्नी और सुमीता की भी वही दशा है।लेकिन जिजीविषा गज़ब की है इन तीनों में।लेखक ने इस उपन्यास में यथार्थ और अयथार्थ, यथार्थ और कल्पना, यथार्थ और अद्भुत, साधारण और अप्रत्याशित का योग किया है, इसे अपने अनुभव,आस्वाद और पाठ के अनुसार जाँचा-परखा जा सकता है।
         यह उपन्यास विभिन्न पात्रों के चरित्र का प्रतिनिधित्व करता है।जिसमें सामाजिक चरित्र और प्रातिनिधिक चरित्र उपस्थित हैं।इसमें लेखक ने व्यक्तिवाद चरित्र से बचने का प्रयास किया है।इस तरह के पात्रों को वर्ग (Type) कहना ही उचित होगा।गोदान का होरी एक सामाजिक और प्रातिनिधिक चरित्र है तो रामबरन गरीब भी उसी प्रकार का है।होरी के चरित्र से पाठकों को भारतीय किसान की झलक मिलती है तो रामबरन गरीब का दुःख समाज के एक बड़े वर्ग का दुःख है।केंद्रीय पात्र के साथ ही अन्य पात्र भी वर्गीय चेतना के साथ साथ व्यक्ति चेतना के प्रतिनिधि बन गए हैं।सामाजिक और प्रातिनिधिक चरित्र औपन्यासिक रचनात्मकता का महत्वपूर्ण पक्ष हैं।उपन्यास एक साहित्यिक रूप है और जाहिर है कि उसका स्वरूप ऐतिहासिक मात्र नहीं होगा बल्कि उसके निर्माण में पूँजीवाद से प्रभावित अथवा युक्त दोनों प्रकार के वर्गीय मूल्यों की भूमिका भी होगी ही।इसीलिए उपन्यासों में चरित्र 'टाइप' (Type) या वर्गीय होते हैं। इस उपन्यास में भी रामबरन, परधानिन बुआ, चौबे, सुमीता ये सभी वर्ग विशेष के प्रतीक हैं।बल्लू का भी समाज में अपना ही एक अलग वर्ग है। अँगूठे पर वसीयत में हम समाज की वर्गीय संरचना और उसकी जटिलताओं को सहजता से देख-समझ सकते हैं।
        अँगूठे पर वसीयत जिस भूगोल पर केंद्रित है उसकी विशेषता ही इसके कथानक का रूप और अंतर्वस्तु निर्धारण कर रही है।कथानक के महत्वपूर्ण घटकों में देशकाल का उल्लेख होता चला गया है।यहाँ स्थान और समय दोनों महत्वपूर्ण है।इसमें कालविपर्यय और कथासमय का त्वरण महत्वपूर्ण है।रामबरन,बलराम,चौबे,सुमित्रा और सुमीता के अपने-अपने संघर्ष हैं जो कि ख़ास स्थान और समय के भीतर ही घटित हो रहे हैं जो कि इस उपन्यास का एक परिप्रेक्ष्य या फलक तैयार कर रहे हैं।
      उपन्यास की रचना प्रक्रिया में आचरण-सिद्धांतों और सौन्दर्य-सिद्धान्तों के मध्य एक जैसा सम्बन्ध होता है।जार्ज लुकाच के शब्दों में-"जहाँ तक उपन्यास का सम्बंध है,आचरण सिद्धांत अर्थात 'आचरण सिद्धांत से सम्बंधित आशय' प्रत्येक विवरण की बुनावट में दिखलाई पड़ता है,इसलिए वह अपनी अधिकतम मूर्त वस्तु में स्वयं कृति का एक संरचनात्मक तत्व होता है।" उपन्यासकार शोभनाथ शुक्ल की सृजन चेतना में आभ्यन्तरिकता विकसित रूप में है जो बाह्य जगत के शक्ति संगठनों का विरोध करते हुए अपनी ललक में व्याप्त विषयों की छाप बाहरी संसार पर छोड़ने की सफल चेष्टा कर रही है।यही कारण है कि यह उपन्यास चेतना और वस्तु के परस्पर असम्बन्धित परिवेशों की अमूर्त और सीमित प्रकृति को पहचान रहा है।साथ ही उक्त परिवेश के अस्तित्व की आवश्यक शर्तों के रूप को देख समझकर उसके मूल चरित्र को प्रस्तुत कर रहा है।
          इस उपन्यास की कथा कितनी ही स्वाभाविक,सहज और यथार्थपरक क्यों न लगे,अंततः उपन्यासकार ने एक परियोजना के अनुरूप ही उसे ढाल दिया है।उन्होंने कथावस्तु का एक यथार्थ ढाँचा कल्पित किया होगा, पात्रों की चयनप्रक्रिया के विषय में सोचा होगा और फिर देशकाल को तय करके उसे सम्बद्ध करते हुए इस उपन्यास को प्रस्तुत किया होगा।एक ऋणग्रस्त किसान रामबरन गरीब को गाँव गिरांव से ही सम्बद्ध कर सकते हैं, इसलिए ग्रामीणांचल का चुनाव किया गया। लेकिन वहीं चौबे और बल्लू हैं तो उसी अंचल के किंतु शहरी परिवेश से जुड़े हैं इसलिए वे उस झोपड़ी में रहना पसंद नहीं करते हैं।यद्यपि वे वहाँ रह सकते हैं जैसे कि धनाढ्य परधानिन बुआ सुमित्रा गाँव में रह रही हैं,जिसके यहाँ रहने के विषय में लेखक ने समुचित वजह बताया है।अँगूठे पर वसीयत की कथा काल्पनिक न होकर यथार्थपरक, स्वाभाविक और विश्वसनीय लग रही है।उसमें बनावटीपन नहीं है।नाटकीयता नहीं है।आख़िर में अस्पताल में बेड पर कोमा में पड़ा हुआ रामबरन, बल्लू द्वारा उपेक्षित होते हुए अतिउत्तेजना की अवस्था में अचानक से उठकर वसीयत को फाड़ देता है और चीखकर अस्पताल से बाहर चला जाता है।चिकित्सा विज्ञान में इस तरह की घटना अविश्वसनीय और अकल्पनीय जैसी लगेगी।लेकिन उक्त क्षण में उपन्यास का आंतरिक तर्क इस संभावना को भी स्वाभाविक बना दे रहा है।उपन्यासकार ने कथा विकास और चरित्र निर्माण के सारे सूत्रों को अपने हाथ में लिया हुआ है और कथा के कलात्मक संयम को बरकरार रखते हुए पात्रों को उनके मनोविज्ञान के अनुसार तथा अपनी भावनाओं और विचारों के अनुसार बहने दिया है।लेकिन कथा में झोल और दरारें नहीं आने दी हैं।जबकि लेखन के समय नये विकल्पों की परतें खूब खुली होंगी और उन्हें चुनौतीपूर्ण फैसले करने पड़े होंगे।
         उपन्यासों के विषय में एक वास्तविकता यह भी है कि भावों और विश्लेषण की उपेक्षा तथा व्यक्ति के अंतर्मुखी पक्ष को न देख सकने के कारण उपन्यास सूझबूझ और कल्पना दोनों ही स्थितियों से वंचित रह जाता है।शायद इसीलिए शोभनाथ शुक्ल ने समूचे कार्यक्षेत्र को व्यक्ति की चेतना में केंद्रित नहीं किया है बल्कि सच्चाई के साथ मानव हृदय की अत्यंत गहनतम भावनाओं की परतें खोलने का सराहनीय कार्य किया है।यही कारण है कि आलोचकीय दृष्टि से इस उपन्यास में 'क्यों' का उत्तर भी है और 'कैसे' का उत्तर भी।अठारहवीं सदी में डेफो 'कैसे' पर अधिक ध्यान केंद्रित करके उपन्यास लिखता था लेकिन वहीं दोस्तोवस्की छोटी घटना के चारों ओर 'क्यों' का उत्तर खोजते हुए पूरा उपन्यास गढ़ देता था।अँगूठे पर वसीयत दोनों रूपों में प्रस्तुत हुआ है।
         गद्य की भाषा में वर्णन और विश्लेषण की क्षमता होती है और उपन्यास में इन क्षमताओं का उपयोग अवश्य होना चाहिए।यह उपन्यास वर्णन (Narration),विवरण (Description)और विश्लेषण (Analysis) तीनों विशेषताओं से युक्त है।साथ ही इसमें विस्तार (Details) भी है।लेखक ने बाह्य स्थितियों के साथ ही पात्रों के आंतरिक मनोभावों का वर्णन भी समुचित रूप से करने का प्रयास किया है। उपन्यास में बिम्बों को यथावत प्रस्तुत किया गया है।इसमें फिल्मों की तरह के दृश्य-बिम्ब 'रूप' (Morph) में निर्मित किये गए हैं,खासतौर पर बाहरी स्थितियों के वर्णन में दृश्यात्मकता को शब्दबद्ध करते हुए गतिशीलता और रूप रंग की विशिष्टता को अभिव्यक्त किया गया है।उपन्यास पढ़ते हुए आंचलिक भाषा-बोली का नितांत अभाव खटक रहा है।ऐसा नहीं है कि इस उपन्यास में बोलचाल की भाषा नहीं है,वह है, लेकिन खड़ी बोली में।पात्रों के बतियाने में भाषा के गँवईपन की महक कहीं न कहीं रिक्तता दे जाती है।भाषा का भ्रंशन होना नितांत आवश्यक है।फिलहाल इसे छोड़ दें तो पूरे उपन्यास में भाषा कभी सहज,कभी नाटकीय,कभी भावपूर्ण,कभी परुष,कभी कटु,कभी करुणायुक्त तो कभी व्यंग्यपूर्ण बनती रही है।उपन्यास की भाषा जनभाषा के करीब है।इसमें तद्भव और देशज शब्दों के साथ आम बोलचाल की लोकोक्तियों का पुट भी उपलब्ध है।समग्र रूप में यह ऐसी भाषा बनी है जो स्वाभाविक,सहज,सरल और पारदर्शी है एवं पात्रों,स्थितियों और भावनाओं के अनुरूप है।
         इस उपन्यास का राजनैतिक उद्देश्य पंचायत चुनावों के वर्णन से सफल हो उठा है।इसमें राजनीति केंद्र में नहीं है लेकिन चुनावी माहौल होने से यह रंग काफी हद तक उपन्यास के मध्य भाग में पाठक को बांधे रखने में सफल रहा है।इस दौरान चौबे और परधानिन बुआ के पर्चा दाखिला होने के बाद के ग्रामीण परिदृश्य में जो स्थिति बन सकती है उस पर लेखक की दृष्टि बनी हुई है और वे चुनावों की चोंचलेबाजी को उद्घाटित करने में लगभग सफल रहे हैं।
        कोई भी उपन्यास केवल एक ही समस्या को केंद्र में रखकर लिखा जाए यह जरूरी नहीं,शायद इसीलिए शोभनाथ शुक्ल ने एक साथ कई सामाजिक प्रश्नों को अपने उपन्यास में उठाया है।मसलन-सुमीता और रोशन के माध्यम से अंतरजातीय विवाह एवं चौबे और सुमित्रा के माध्यम से विधवा सुमित्रा का पुनर्विवाह,बल्लू और उसकी पत्नी के माध्यम से सन्तानों द्वारा रामबरन गरीब और उसकी पत्नी के रूप में बुजुर्गों की उपेक्षा,सुमीता के माध्यम से सगे चाचा नोहरी द्वारा बलात्कार की यातना और पंचायत की जातिगत पक्षधरता।समाज और व्यक्ति के बीच के अंतर्द्वंद्व को कथा का विषय बनाया गया है।जो भी हो यह उपन्यास स्त्री स्वातंत्र्य,दलित उत्थान और सामाजिक दायित्व के बीच संतुलन बनाते हुए व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा का प्रश्न उठाते हुए सामाजिक जीवन के केंद्र में है।
        अँगूठे पर वसीयत का उपन्यासकार मनोविज्ञान को अच्छे से समझता,परखता हुआ प्रतीत हुआ।ऐसा इसलिए कहना पड़ा क्योंकि उसने पात्रों के चारित्रिक विकास को यथार्थवादी ढंग से चित्रित करने में मनोवैज्ञानिकता की गहरी मदद ली है।जिससे कि पात्रों के मन,वचन और कर्म में निहित अनेकता को पहचानना और उसके कारणों को समझना भी आसान हुआ है।इस पद्धति के उपयोग से चेतन,उपचेतन और अवचेतन मन के विभिन्न स्तरों और मुक्त चेतना प्रवाह का चित्रण करते हुए पात्रों की मनोदशाओं को कथा विकास में सहायक बनाया गया है।इस तरह की शैली को प्रेमचंद, जैनेंद्र कुमार,अज्ञेय और इलाचन्द्र जोशी ने विकसित किया है।शोभनाथ शुक्ल उसी शैली के आगे के उपन्यासकार हैं।
       अँगूठे पर वसीयत के औपन्यासिक परिप्रेक्ष्य में यहाँ मुझे मैक्सिम गोर्की का उपन्यास 'माँ' (Mother) याद आ रहा है जिसका नायक जहाँ कहीं भी अपनी मध्यवर्गीय संवेदनशीलता के चलते अनेक बार हतोत्साहित होता है,निराश या परेशान होता है, वहाँ उसकी अपढ़ माँ उसे समर्थन देकर थामती है।यह रूसी दृढ़ता का प्रतीक है।कमोवेश यही स्थिति रामबरन की भी है वह भी हतोत्साहित,निराश,परेशान है,उसे सहारा देती है उसकी पत्नी,परधानिन बुआ और खेत खरीदकर ही सही चौबे भी उसे समर्थन देकर सहारा बनते हैं।सुमीता की विषम परिस्थिति में भी रौशन का साथ मिलता है।उपन्यास की संरचना में यह भारतीय दृढ़ता का प्रतीक है।शोभनाथ शुक्ल अपने लेखकीय परिप्रेक्ष्य को लेकर जरा भी संशयशील नहीं हैं।वे पाठक को समाजवादी भविष्य की मानवीय कल्पना के लिए तैयार करते हैं।
        यह उपन्यास भारतीय समाज में नारी की स्थिति का चित्रांकन और मूल्यांकन भी कर रहा है।यह उपन्यासकार की प्रगतिशीलता और विकासशील चेतना का प्रमाण भी है।उपन्यासों में परम्परा के चौखट में सुधारवाद के साथ शुरू किये गये प्रयास को शोभनाथ शुक्ल ने नारी के स्वतंत्र अस्तित्व और अस्मिता की पहचान के लिए संघर्षरत पात्रों की ओर मोड़ दिया है।वे सुमित्रा और सुमीता के चरित्र के बहाने से स्त्री को उसकी ही दृष्टि से देखने,पहचानने और जानने का प्रयास करते हुए एक नया यथार्थ उपस्थित कर रहे हैं,जिसमें दोनों अपने अलग अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं।इस उपन्यास को पढ़ते हुए यह लगा कि जिसे हम सहज संस्कार और सामान्य व्यवहार मानकर चल रहे थे वह कितना असहज,असामान्य और शोषण पर आधारित है।परधानिन बुआ के चरित्र द्वारा स्त्री के व्यक्तित्व के इस पक्ष से परिचित करवाकर लेखक ने उपन्यास के स्तर को और मजबूत और दृढ़ किया है।इस उपन्यास की स्त्री नई परिस्थितियों से जूझती नारी है जो न केवल परम्परागत मान्यताओं को तोड़ती है बल्कि अपने व्यक्तित्व को सकारात्मक दिशा में आगे भी बढ़ाती है।
       वस्तुतः लेखक ने इस उपन्यास की आंतरिक अन्विति को बहुस्तरीय एवं संश्लिष्ट रूप दे रखा है।उसकी परस्पर लिपटी तहों में गुंथे हुए प्रसंग,घटनावलियाँ और मनोस्थितियों के आवर्त अपने पारस्परिक रचाव में ही सारी विद्रूपता एवं जटिलता को द्योतित करते हैं।यह एक अनिवार्य सत्य है कि कला का व्यापक तथा संभावनापूर्ण रूप हमें ग्रामीण परिवेश के उपन्यासों में ही मिलता है।इन्हीं उपन्यासों में ग्राम-चेतना के विविध आयामों की आंतरिकता अपनी समग्रता के साथ अनुभूत्यात्मक स्वर पर अभिव्यक्ति हुई है।
इस उपन्यास के माध्यम से लेखक ने उस क्षेत्र या जनपद के स्थानों, आवासों, विचरण-स्थानों, भोज्यपदार्थों, वस्त्राभूषणों,परिवार व्यवस्थाओं,जातिव्यवस्था, जातीय विभेद, मनोविनोद के साधनों,उत्सवों, लोकाचारों, मान्यताओं, राजनीतिक मान्यताओं, साम्प्रदायिक विचारों, दार्शनिक विचारों तथा जीवन के प्रति दृष्टिकोणों आदि तथ्यों का विश्लेषण और प्रत्यक्ष या परोक्ष चित्रण किया है।
     'अँगूठे पर वसीयत' को पढ़ते हुए ऐसा महसूस हुआ कि यह उपन्यास मानो हृदय में उस क्षेत्र या उस प्रदेश की कसमसाती हुई जीवनानुभूति को वाणी देने का एक अनिवार्य प्रयास है। इसीलिए शायद यह उक्त ग्राम्य अंचल के जीवन का उपन्यास बन सका है।
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गरयें,सुलतानपुर उ.प्र.-227304
मो.9451554243

मंगलवार, 29 जून 2021

कथ्य और शिल्प की दृष्टि से सशक्त और विशुद्ध दोहा संग्रह:सिसक रहा उपसर्ग by प्रभु त्रिवेदी

श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित दोहा संग्रह ‘सिसक रहा उपसर्ग’ श्री अवनीश त्रिपाठी का प्रथम दोहा संग्रह है। यद्यपि इससे पूर्व उनका एक नवगीत संग्रह प्रकाशित हो चुका है। वे सम्वेत् प्रकाशनों में भी छप चुके हैं। लेकिन ‘सिसक रहा उपसर्ग’ अपने नाम को चरितार्थ करता है। समीक्ष्य कृति पर भूमिका के रूप में भास्कर दृष्टि वरेण्य साहित्यकार रामबाबू रस्तोगी (रायबरेली ) की है तथा विस्तार से लिखा है नवगीतकार व ‘दोहों के सौ रंग’ की सम्पादक गरिमा सक्सेनाजी (बैंगलोर) ने।
 
एक लम्बे समय के बाद कथ्य और शिल्प की दृष्टि से सशक्त और विशुद्ध दोहा संग्रह देखने-पढ़ने को मिला। रचनाकार ने विषय-वैविध्य के साथ छंद-शास्त्र का पूर्णरूपेण परिपालन किया है। उनकी तत्सम् शब्दावली कथ्य को तीक्ष्ण व्यंजना प्रदान करती है। वे कबीर-रहीम-बिहारी की परम्परा से इतर अत्याधुनिक संदर्भों के साथ विषंगतियों पर प्रहार करते हैं। उनके दोहे अर्थगर्भी होकर पूर्ण संप्रेषणीयता के साथ मारक व भेदक हैं। भाषायी दृष्टि से उनके सृजन में कोई परहेज नहीं है। उन्होंने विजातीय शब्दों का भी प्रयोग किया है। लेकिन ऐसा करते समय दोहे का दोहापन जीवित रखा है। अन्त्यानुप्रास के प्रयोग पर उनकी सावधानियाँ उन्हें विशिष्टता प्रदान करती हैं। नवीन बिम्ब प्रयोग उनका नवगीतकार मन दोहों में भी ले आता है। ये समस्त विशेषताएँ उन्हें अन्य दोहाकारों से अलग पहचान देती हैं। यथार्थ से जोड़ता उनका एक भावपूर्ण दोहा पढ़ियेगा कि बूढ़ी माँ जब बोलती हैं, तो उनके हर शब्द के साथ साँस की भी आवाज़ आती है:-
बूढ़ी आँखों में नहीं, सन्दर्भों का स्वर्ग।
अम्मा के हर शब्द में, साँसों का उपसर्ग।।

आज समाज में सोशल मीडिया का बोलबाला है। यही आपसी व्यवहार और भावी रणनीति तय करता है। किस तरह शब्द हिंसक बनकर आग पैदा कर देते हैं। इस पर एक दोहा पढें :---
भाषा मरुथल-सी हुई, शब्द हो गये नाग।
बिन तीली के जल रही, हर समाज में आग।।

सामाजिक समानता और समान अधिकार के नाम पर हमारी आधुनिकता ने पारिवारिक अवसाद को जन्मा है। अनेक बार सामाजिकता को निगला है। पारिवारिक सौहार्द्र भंग किया है। ऐसे में गृहलक्ष्मी का गरिमापूर्ण चित्र उभर आता है। निम्न दोहा यही कह रहा है:----
तक्षशीला की पुस्तकें, नालंदा का ज्ञान।
गृहिणी के विज्ञान पर, ये सब हैं कुर्बान।।

ऐसे अनेक दोहे, जो समकालीन संदर्भों को अभिव्यक्त करते हैं, संग्रह में यत्र-तत्र भरे पड़े हैं। जिन्हें पढ़े बिना पाठक रह नहीं सकता। प्रांजल भाषा के साथ व्यंजनापूर्ण सुकोमल भावाभिव्यक्ति और पिंगल के प्रति सतर्क व सन्नद्ध रचनाकार श्री अवनीश त्रिपाठीजी इस संग्रह द्वारा साहित्यिक समाज में यश अर्जित करें, यह कृति समादृत हो, उन्हें बधाई। 

समीक्षक- प्रभु त्रिवेदी
पुस्तक----
श्वेतवर्णा प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित 104 पृष्ठ का 430 दोहों वाला यह पैपर बैक संस्करण वर्तनी की अशुद्धियों से मुक्त होकर, मात्र 125/-रुपये मूल्य का है। सम्पर्क :- 8447540078

सोमवार, 28 जून 2021

दिन कटे हैं धूप चुनते : समकालीनता के निकष पर by बृजनाथ श्रीवास्तव


समीक्षक:-बृजनाथ श्रीवास्तव
                          
             मेरा यह मानना है और मैने अपने विभिन्न आलेखों एवं समीक्षाओं मे इस बात को कई बार कहा भी है कि समकालीन साहित्य आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रामाणिक दस्तावेज होता है . कलाकार और मूलत: साहित्यकार ही एकमात्र वह व्यक्ति होता है जो समाज, उसकी संस्कृति, उसके मूल्यों और तत्कालीन महापुरुषों को अपने लेखन द्वारा अमरता प्रदान करता है. अनेक  तत्सम्बन्धित कथाओं के माध्यम से देश-काल और भावी पीढ़ियों के लिए उन्हें जीवित रखता है . कहना असंगत न होगा कि महर्षि वाल्मीकि जी की रामायण और महर्षि वेदव्यास की जय संहिता ( भारत –महाभारत )  के कारण ही जीवित हैं राम और कृष्ण और जीवित है तत्कालीन समाज और संस्कृति .एक साहित्यकार की महत्ता को इससे अधिक और क्या मूल्यांकित किया जा सकता है .   
            आज का समय विगत आदिम एवं रूढ़ समय से हजारों साल आगे निकल चुका है वह भी अपनी अनेक अद्यतन व्यवस्थाओं एवं परिवर्तित विशेषताओं के साथ. आज वैश्विक स्तर पर  सामाजिक, आर्थिक ,राजनीतिक और धार्मिक  परिदृश्य में हो रहे  बदलावों को देखा जा सकता है। आज औद्योगीकरण , नगरीकरण , यातायात-परिवहन ,संचार ,सत्वर मशीनीकरण , कम्प्यूटरीकरण ,पूंजी का निजीकरण , वैश्वीकरण , जनस्ंख्या विस्फोट , बाजारों का चीनीकरण, अर्थव्यवस्था का अमेरिकीकरण ,परमाणु विस्फोट , आतंकवाद ,  संस्कृति का पाश्चात्यीकरण, ब्रेन-ड्रेन, सरकारी दायित्वहीनता इत्यादि  परिवर्तनों से घर-परिवार से लेकर सम्पूर्ण समाज का ढांचा ही बदल गया. जहाँ इन बदलावों से कुछ लाभ भी हुए किंतु हानियाँ अधिक हुईं . बुजुर्ग पीढ़ी अकेली तथा असहाय हो गई. , अशिक्षा ,बेरोजगारी ,नशाखोरी , मँहगाई ,दैहिक एवं मानसिक रोगों ने जनसंख्या के अधिकांश भाग को अपने पाश में जकड़ लिया. जीवन के सभी क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार, शोषण और प्रदूषण व्याप्त हो गये. भौतिकता की अन्धी दौड़ ने हत्या ,डकैती ,अपहरण ,बलात्कार ,रंगदारी, हफ्ता वसूली , जमीनों-मकानों पर बलात्कब्जा करना जैसे जघन्य अपराधों को आम कर दिया . सामाजिक नियंत्रण के सभी साधन बौने प्रतीत होने लगे . आज सर्वत्र भ्रष्टाचार और शोषण एवं विभिन्न अपराध सामाजिक मूल्य के रूप में स्वीकार किये जाने लगे हैं . देश जिम्मेदार व्यक्तियों की दायित्वहीनता के विषम दौर से गुजर रहा है. यहाँ कुएँ ही में भाँग पड़ी है.
              इन सभी उपयुक्त-अनुपयुक्त बदलावों से साहिय जगत भला अछूता कैसे रह सकता है . इसी संदर्भ में प्रतिष्ठित नवगीतकार स्व. दिनेश सिंह ने अपने नवगीत संग्रह ‘ समर करते हुए ‘ में कुछ इस प्रकार कहा है...
             “जो रचना अपने समय का साक्ष्य बनने की शक्ति नहीं रखती ,जिसमें जीवन की बुनियादी सच्चाइयॉ केन्द्रस्थ नहीं होतीं ,जिसका विजन स्पष्ट और जनधर्मी नहीं होता वह अपनी कलात्मकता के बावजूद अप्रासंगिक रह जाती है “
 
             आज साठ वर्ष से ऊपर की  यात्रापथ वाले नवगीत के विशद इतिहास में न जाकर कहना चाहूँगा कि आज समकालीन हिंदी गीत-अर्थात नवगीत की यात्रापथ में अनेक रचनाकारों के बीच एक जाना-पहचाना नाम है समृद्ध नवगीतकार  अवनीश त्रिपाठी  का . वे समय तथा समाज के सशक्त एवं जागरूक अक्षरशिल्पी हैं.अवनीश त्रिपाठी का जन्म  27  दिसम्बर 1980  को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जनपद के ‘ गरये ‘ नामक ग्राम में हुआ था .आपके पिता स्व. रामानुज त्रिपाठी जी एक समृद्ध गीतकार थे .अवनीश जी ने विरासत को दो कदम और आगे बढ़कर  नये परिवेश में अपने को ढालते हुए इसे सँभाला . अभी-अभी वर्ष 2019 में उनका प्रथम नवगीत संग्रह  “ दिन कटे हैं धूप चुनते “ प्रकाशित हुआ जिसे मैने कई बार पढ़ा और मुझे लगा कि कवि आभ्यंतर एवं बाह्य जगत तक की दैनंदिनी पर सूक्ष्म दृष्टि रखे हुए है जिसमें उसके साथ जीवंत हो उठा है समूचा समाज ,समूची प्रकृति . लगता है कि कवि ने अपने अनुभवों को गीतों का आकार देने के मार्ग में अपनी उम्र के केवल उनतालिस  बसंत ही नहीं देखे हैं , उनतालिस पतझड़ भी देखे हैं , कड़कड़ाती ठंड में हाड़ कपाऊ पूस की उनतालिस रातें भी देखी हैं ,और सहनी पड़ी  हैं जेठ की उनतालिस चिलचिलाती दोपहरियॉ, उनतालिस  दीपोत्सव एवं उनतालिस रंगीन फागुनी फुहारें  और  बचपन से उम्र के इस पड़ाव तक देखे हैं , सहे हैं  जीवन के अनेक उतार- चढ़ाव. यही देखे ,सुने ,पढ़े , सहे, समझे, जिये  अनुभव ही कवि के सम्पन्न नवगीतों की  मूल्यवान  पूँजी है अर्थात कवि की धरोहर .           
          यह सच है कि अवनीश त्रिपाठी की रचनाओं का वैचारिक फलक बहुआयामी और विस्तृत है . समाज के विभिन्न संघटकों –सामाजिक ,आर्थिक ,राजनीतिक ,धार्मिक आयामों की समकालीनता  को कवि ने बड़ी ही गहन  और सूक्ष्म दृष्टि से जाँचा, परखा एवं बिलोका है . ‘दिन कटे हैं धूप चुनते ‘ नवगीत संग्रह में कुल अड़तालीस नवगीत रचनाएं संग्रहीत हैं . इन गीतों में जहाँ एक ओर कवि को आपाधापी वाले भौतिकवाद से दिन पर दिन क्षरण हो रहे  अपने सांस्कृतिक मूल्यों की धरोहर को बचाने की जद्दोजहद है जो धीरे-धीरे वैचारिक मुठभेड़ में तब्दील होती जा रही है  तो दूसरी ओर न चाहते हुए भी अपरिहार्य हो जाता है वर्तमान से तादात्म्य रखने की कवायद. जीवन की तमाम संगतियाँ –विसंगतियाँ इसी दोराहे पर आंदोलित होती रहती हैं. इन गीतों में करुणा की सघन सांद्रता है .बेदर्द समय की दुख भरी कथाओं की लम्बी फेहरिस्त है इन गीतों में. ‘अम्मा-बाबू’ में बुजुर्ग पीढ़ी के दुख हैं , ‘ गहरा सूनापन’ ,’सो नहीं पाया मुँगेरी’ , ‘विक्रम हैं बेहाल’ , ‘खिड़की छली गई’ , ‘फिर समय लँगड़ा खड़ा’, ‘भीतर है पुरवाई’ जैसी सशक्त वैचारिक रचनाएँ हैं जो समाज के विभिन्न आयामों के मूल्यह्रास की सच्चाइयों को बयान करती हैं .इन गीतों में जीवंत हो उठे हैं राजनीतिक षड्यंत्र, छल-कपट , मशीनीकरण से उपजी अव्यवस्थायें और अंतत: ऐसा मालूम देता है कि आज पूरी तौर पर  व्यवस्था असमर्थ हो चुकी है बहुत कुछ सँभालने में . ‘ खड़े तथागत सोच रहे हैं ‘ जैसी रचना में व्यवस्थाजन्य असहयोग से उपजी किंकर्तव्यमूढ़ता परिलक्षित होती है ,’ कहाँ गये सब ज्ञानी ‘ में कवि समाज नियामकों और नियंत्रकों की दायित्वहीनता का काला चिट्ठा अनावृत्त करता है. उसे पता ही नहीं चल पाता है कि समाज के जीवन में कब सुख आया . ‘ मंत्र पढ़ें वैदिक’  के माध्यम से  सात्विक और सार्थक आशावाद का संचार होता है . अपराधीकरण और अराजकता इस कदर व्याप्त है कि ‘ बचावें राम रमैया ‘ तक नौबत आ गई है किंतु कवि प्रजापति होता है वह सत्य ,निर्माण एवं मानुषी आस्थाओं के पथ से कभी भी विचलित नहीं हो सकता है और जागरण का आह्वान करते हुए कह उठता है कि ‘ हम मौसम से युद्ध करेंगे ‘  
       संकलन की प्रथम रचना ‘ दिन कटे हैं धूप चुनते ‘ नांदी पाठ करते हुए उपस्थित होती है और संकलन के गीतों की वैचारिकी की बानगी पेश कर देती है .कवि का कहना है कि वह रात भर बहुआयामी कल्पना लोक में विचरता है और दिन कट जाता है धूप के साये ओढ़े अर्थात न तो साकार हो पाती हैं रातों में उपजी सुखमयी कल्पनाएँ और न ही फलवंत हो पाते हैं दिवसों के सकर्मक प्रयास .जो छायाएँ –आश्रय मिलते भी हैं वे होते हैं केवल धूपायी . यही सांसारिकता है और हालत यह कि---
“ रात कोरी कल्पना में दिन कटे हैं धूप चुनते 
भक्ति बैठी रो रही अब तक धुएँ का मंत्र सुनते    
दु:ख हुए संतृप्त लेकिन सुख रहे हर रोज घुनते  “

 ‘ प्यास बोना चाहता है’ में रचनाकार की शिकायत है कि समय का सूरज क्षितिज के द्वंद्व में ही अटक गया वह क्षितिज से ऊपर उठकर ,बाहर निकलकर अभी तक नहीं आ सका है . अर्थात देश को आजादी मिले इस दीर्घ समयांतराल में भी नये दिनों का सूरज ( के सूरज ) अपने सत्ता जंजाल के क्षितिज में ही उलझा पड़ा है उसे जनकल्याण के लिए धूप और प्रकाश लेकर जन सामान्य के बीच आने की जरूरत ही नहीं पड़ी और इधर सूरज और उसके प्रकाश अर्थात जनकल्याणकारी कार्यों के अभाव में पसरा हुआ है घोर सन्नाटा ,असमंजस ,किंकर्तव्यविमूढ़ता . ऐसे में यह अपरिहार्य सत्य हो जाता है कि आम जनजीवन की पीड़ाओं से सराबोर दशा सदैव पुरातनपंथी बंदिशों रूपी फटे-पुराने कपड़ों में ही लिपटी रहे और इस दायित्वहीनता से उपजे समाज में घोर अमानुषता अपराध और भयंकर खून-खराबा अनवरत व्याप्त होता रहे और वह भी सब हठधर्मिता का लबादा ओढ़े तथाकथित ज्ञानियों के द्वारा . दृश्य चित्र देखें ---
“ दूर क्षितिज पर सोया सूरज / सन्नाटों ने लिखीं व्यथाएँ
फटे-पुराने कपड़ों में ही  / लिपटी रहीं सदा पीड़ाएँ    
फिर हठीला ज्ञान रसवंती नदी में / रक्त रंजित हाथ धोना चाहता है “ 
                  
                आज शहरों में अनेक पॉश एरिया विकसित हो चुके हैं जहाँ गगनचुम्बी मल्टीस्टोरीज फ्लैट्स हैं और विशालकाय राजमहल सरीखे भवन . ऐसे माहौल में रहने वालों के चरित्र बड़े ही अमानुष और विचित्र होते हैं .इनके पास असीमित धन-दौलत है ,बँगला है ,कारें हैं-ड्राइवर हैं ,नौकर हैं मोबाइल फोन हैं .इन्हें समाज ,सामाजिकता और आदमी की कोई जरूरत नहीं है और न ही ये किसी से कोई सरोकार ही रखते हैं .एक ही फ्लैट्स में और यहाँ तक कि बगल में ही रहने के बावदूद एक दूसरे से जान –पहचान तक नहीं होती है . न तो कोई मिलता-जुलता है ,न बतियाते हैं. यहाँ के तथाकथित सम्भ्रांत लोगों की सुबहें चाय पीने बाहर नहीं निकलतीं अर्थात बोन चाइना की क्रॉकरी में चाय परोसते हैं नौकर और शामें गुजरती हैं रेस्तराँ अथवा होटलों में इसीलिए कूकरों को सीटियों के बजाने का आदेश ही कहाँ मिलता है  , अय्याशी भरे इस जीवन में चूड़ियों की खनखनाहट और पायलों की रुनझुन की सद्गृहस्थी वाली आवाजो के लिए गुंजाइश ही कहाँ . बल्कि लिफाफों में बंद चिट्ठियाँ ,इशारे और फुसफुसाहटें ही यहाँ की असलियत की दास्तानें कहते हैं . ऐसा महसूस होता है कि प्रकारांतर कवि का आशय है कि ऐसे क्षेत्रों में अवैध देह-व्यापार धड़ल्ले से चलता है .ऐसे एरिया में बुजुर्गों की हालत तो और भी दयनीय होती है .वे अंदर ही अंदर घुटते हैं ,बुदबुदाते हुए अपने दिन काटते हैं ,खिसियाते हैं अपनी आत्मकथा के सुख-दुख किससे बाँटें . घर के सदस्यों के पास इतनी फुर्सत ही कहाँ कि इनसे हाल-चाल पूछें. पॉश एरिया की इस अमानवीय ,एकाकी दशा का शब्दांकन अवनीश की रचना ‘ आवाज कम कर ‘ में देखें ---
“ यह रईसों का मुहल्ला है , आवाज कम कर 
चाय पीने पर निकलती भी नहीं हैं चुस्कियाँ 
अब नहीं बजतीं घरों में कूकरों की सीटियाँ 

टिकटिकाती भी नहीं कोई घड़ी चलती निरंतर 
फुसफुसाती हैं महज अब पायलें औ’ चूड़ियाँ 
बस इशारों में समझते हैं लिफाफे चिट्ठियाँ 
गिट्टियों –सीमेंट वाले मन हुए हैं ईंट पत्थर 
रात दिन बस पोपले मुख बुदबुदाहट ,आहटें 
बिस्तरों से बात करती हैं यहाँ खिसियाहटें 
गेट दीवारें पड़ी सूनी सड़क तू आह मत भर “ 

   ‘ गहरा सूनापन ‘  गीत आम और खास आदमी के बीच विभिन्न क्रिया-कलापों  और जीवन शैली के अंतर के विभिन्न मानकों को लेकर उपस्थित होता है जिसमें वर्तमान भौतिकवादी सत्वर मशीनीकरण – इंटरनेट, सोशल साइट ,टी.वी. विज्ञापन में उलझे हुए आम लोगों की कथा-व्यथा है . आज लोकतंत्र का अधिकांश भाग अपने समय का अधिकांश भाग इन्हीं गतिविधियों में उलझाये रखता है. आम आदमियों के लिए   सरकारी आफिसों की कार्यप्रणाली तो बदलने का नाम ही नहीं ले रही वही मेज ,फाइलों का ढेर , बिखरे कागज , प्रार्थना पत्रों पर फारवर्डिंग दस्तखत, काम में अड़ंगेबाजी और खाने-पीने के नाम पर सुविधा शुल्क लेकर फाइल को आगे बढ़ाना . इसी तरह  विकास के नाम पर अंधाधुंध मशीनीकरण ,सड़्कें ,ट्रक-बसें  उनसे उपजे वायु ,जल और ध्वनि प्रदूषण के आक्षितिज फैले दृश्य चारों ओर समाज में व्याप्त दिखायी पड़ते हैं . यही बहुत कुछ पड़ा है आम आदमी के हिस्से में और खास आदमी के हिस्से में ह्विस्की- शैम्पेन सुरा , बड़ी-बड़ी पार्टियाँ , चियर ,बँगले और नौकर-चाकर अर्थात अय्याशी . देखें अवनीश त्रिपाठी के कवि ने इसे कैसे चित्रित किया है--- 

“ इण्टरनेट ,सोशल साइट से रिश्ता अपनापन 
टी वी चेहरे , मुस्कानों के मँहगे विज्ञापन 
धूप रेत काँटों के ,जंगल ढेरों नागफनी 
एक बूँद बंजर  जमीन पर गाँड़र ,कुश ,बभनी 
धुआँ ,मशीनें , बोल्ट , घिरनियाँ ,केबिन गहरी बातें 
सड़क ट्रकें , शोरगुल चीखें और धुआँती रातें 
व्हिस्की –शैम्पेन ,बड़ी पार्टियाँ आवाजों के चीयर 
बँगले-नौकर ,बूढ़ी खाँसी , गहरा सूनापन  “         
     ‘मंत्र पढ़ें कुछ वैदिक ‘ में कवि के सामने समय के कुछ अमानुष चित्र नर्तन कर रहे हैं ‘ बरगद के नीचे पौधों का टूट रहा सम्मोहन ‘ अर्थात अनुभवसिद्ध पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी के कोई सरोकार ही नहीं रह गये हैं . नई पीढ़ी अद्यतन के नयेपन में इतना व्यस्त है या यूँ कहें कि अंधी है कि पुरानी पीढ़ी के मान-सम्मान और अनुभव की उसे बिल्कुल ही जरूरत ही नहीं है. दोनो पीढ़ियों की मान्यतायें और जीवन मूल्य इतने अलग-अलग हैं . आखिर बदलते समाज की दिशा लगता अधोमुखी हो चली है . इसी चिंता से ग्रस्त कवि नवनिर्माण के स्वप्न सँजोये समाज के जीवन में नवाशा का संचार करने के लिए हवन करने को आतुर और उद्यत है...
“स्वप्नों की 
समिधाएँ लेकर   
मंत्र पढ़ें कुछ वैदिक,
अभिशापित नैतिकता के घर 
आओ हवन करें “
            हवन के द्वारा अपावन नैतिकता का यह शुद्धीकरण अकारण नहीं है. समाज में व्याप्त इसके अनेक अस्वास्थ्यकर कारण हैं जिन्हें ‘ सो नहीं पाया मुँगेरी ‘के माध्यम से  सपनों की जंजाल-वीथी में उलझाये रखा गये आम आदमी के सरोकार हैं क्योंकि हरे-हरे सब्ज बागों के दिखाये गये सपने उसे  छलते रहे हैं .आज के राजधर्म का यही नंगा चरित्र है. इतना ही नहीं छद्म विकास की आँड़ में सत्वर और विशाल मशीनीकरण ने आम आदमी को बेरोजगार कर दिया है ऊपर से नियामक और नियंताओं का तुर्रा यह कि विकास जोरों पर है और कार्य प्रगति पर है .अब राजधर्म को चिंता है आम आदमी के भूखा की प्रकारांतर से न स्वास्थ्य की , न शिक्षा की ,न जानमाल की सुरक्षा की और न ही रोजगार की .कवि ने यह सब दीन दशा कुछ ही शब्दों में बयां कर दी हैं ...
“ छल रहे कुछ स्वप्न जिसको
नींद की चादर तले 
सो नहीं पाया मुँगेरी 
जागता ही रह गया ” 
तथा---
“ घोर आलोचक समय का 
सुर्खियों में आजकल है 
युग मशीनों का हुआ जब 
भूख की बातें विफल हैं “
    इस अमानुष वक्त में छल-कपटी अराजक तत्वों अर्थात आग और लकड़ी की सभी क्षेत्रों में सत्ता के साथ पुख्ता साँठ-गाँठ है “ साँठ-ग़ाँठ अच्छी है अब तो चूल्हे से लकड़ी तक “ और सत्ता प्रपंच केवल कोरे आश्वासनों तक ही अपनी सीमा बनाये हुए है . आखिर ” भूरे बादल का टुकड़ा “ लू होती इन गर्म हवाओं तक कब और कैसे पहुँचे और अगर उससे जूझना भी चाहे तो भला कैसे जूझे . आज बहुमुखी और बहुआयामी  वृष्टि के अभाव में पड़ गई हैं दरारें अंदर से बाहर तक   अर्थात भूख से पेट की आँतें जितनी खाली-खाली हैं उससे अधिक ही प्यास बढ़ गई है खेतों की. देखिये अवनीश के कवि ने इसे कितने ही कारुणिक शब्दों  में व्यक्त किया है ---
“ जूझ रहा है निपट अकेला / गर्म हवाओं से अब तक 
कहें अभागा या संतोषी / भूरे बादल का टूकड़ा 
तथा---
सूखी आतें खेतों में भी  / पड़ी दरारें मोटी गहरी 
पेट-पीठ में फर्क नहीं कुछ / पिचकी देह, पोपला मुखड़ा “
           
           आपाधापी , भौतिकता की अंधी भाग-दौड़,व्यवस्था का पश्चिमीकरण  इन सबकी सच्चाइयों का पारदर्शी लेखा-जोखा और घर की पोर-पोर टूटन की दास्तानें   ‘ बोझिल चेहरा ‘ और ‘आँगन की बूढ़ी खाँसी’   में  जैसे कितने ही गीतों में शब्दों का आकार ले सकी हैं .कवि के जीवन में कब सुख आया  उसे पता ही नहीं चल पाया है .’ भीतर है पुरवाई ‘ में पाश्चात्यीकरण की बाह्य वशीकरण , पछुवाई ,पुरवाई  के द्वंद्व और हवा-हवाई होती नैतिकता में फँसे अद्यतन की बड़ा ही रोचक और सटीक चित्रण किया है .जिसमें  कवि को बड़ी चिंता है बुजुर्ग पीढ़ी के और मूल्यहीनता का लबादा ओढ़े विगलित होते समाज की .यहाँ तक कि सहयात्री के अभाव में और घर के सदस्यों के बीच में ही उन्हें अकेले एकांतवासी करके छोड़ दिया गया है .न समय से उपयुक्त भोजन-पानी और न ही अपनेपन की प्यार बतकही . शब्द दर शब्द कितना सुंदर चित्र उकेरे हैं अवनीश के करुणाप्लुत हृदय ने –--
“ सही नहीं जाती है घर को / आँगन की बूढ़ी खाँसी /धोखे में ही बीत गया है /अरसा लम्बा हिस्सा / बीमारी के दलदल में ही /जीवन भर का किस्सा / वसा विटामिन रहित सदा ही / मिलता भोजन बासी / सहयात्री के साथ नया / अनुबंध नहीं हो पाया / छतें ,झरोखे , अलगनियों के / साथ नहीं रो पाया / पीड़ाओं का अंतर भी अब / है घनघोर उदासी  “ 
      अद्यतन अपावन ,अराजक और अमानुष परिवेश के संजाल में फँसे आम आदमी की दीन-दशा से रचनाकार पूर्णतया वाकिफ है .यह समाज और समय कवि की अपनी आँखों से देखा हुआ है जाँचा-परखा और भोगा हुआ है . समाज के नियंताओं की कार्यशैली और षडयंत्रों को जीता हुआ कवि किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है और आखिर में कह उठता है कि “ बचावें राम रमैया “ क्योंकि जीवन के विभिन्न आयामों में अपनी दृष्टि के सम्मुख हो रहे अपावन से उपजी विकल्पहीनता की स्थति को कुछ इस तरह बयां करता है कि---
“ अपने पूरे रोब दाब से / चढ़ा करेला नीम / बचावें राम रमैया / टूट गई खटिया की पाटी / बैठें सोयें किस पर / अब उधार की बात करे क्या / गिरवीं छानी –छप्पर  / लेटे हैं टूटे मचान पर / चुप्पी और नसीम / बचावें राम रमैया /बंधक है लाचार व्यवस्था /किससे व्यथा सुनाये /हाल हस्तिनापुर जैसा अब / दुर्योधन धमकाये / राजनीति की दशा हो गई / जैसे नीम हकीम / बचावें राम रमैया / मंदिर-मस्जिद / चर्च हर जगह /आडम्बर-सम्मोहन /माँग और आपूर्ति धार्मिक / व्यापारों के बंधन /टोकड़े-टुकड़े गये बिखेरे /कितने राम-रहीम /बचावें राम-रमैया “ 
         आज विक्रम का सिंहासन प्रश्नों के घेरे में आबद्ध है और अमानुष व्य्वस्था का बैताल प्रश्न पर प्रश्न किये जा रहा है .प्रश्नों के उत्तर और हल की गुंजाइश कहीं  दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रही है .विविध आयामी इन सभी द्वंद्वों से जूझते कवि के पास है अदम्य साहस की पूँजी .साहित्यकार होने के नाते वह उत्तरदायी है साहित्य और समाज के प्रति और कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े किंकर्तव्यविमूढ़  अर्जुन की भाँति आखिर में सार्थक निर्णय लेते हुए उद्घोष करता है कि ---
“ धुंध बहुत है / तुम छुप जाओ / हम मौसम से युद्ध करेंगे / जलता एक अलाव हमारे / मन में हरदम साथ रहेगा / वृक्षों पर्वत घाटी सबके / संतापों का क्रम बदलेगा / कुहरे की आदत गंदी है / अबकी उसको शुद्ध करेंगे / नभ तक पारदर्शिता वाली / अर्थ समझती सीढ़ी होगी / मिथ्याओं का परिवर्तन कर / बस यथार्थ की पीढ़ी होगी / मन में बैठा वहम मिटाकर / हर चेहरे को बुद्ध करेंगे /   नदी ताल पोखर की भाषा / रेत नहीं ,पानी समझेगा / पुलिनों – पगडंडी का अंतर /झीलों का ज्ञानी समझेगा / थरथर करती धाराओं में /जोश भरेंगे क्रुद्ध करेंगे  “ 
         अंततोगत्वा इन बहुआयामी समस्याओं का हल और कल्याणकारी , मानवतावादी ,मानवीय सम्बंधों से रचे-बसे समाज की पुनर्संरचना केवल बुद्धत्व अर्थात बुद्ध दर्शम में ही दिखाई पड़ती है ,ऐसा अवनीश त्रिपाठी के कवि मन का मानना है और उन्होंने कहा भी है कि  “ हर चेहरे को बुद्ध करेंगे “ तथा “ अरे नवागत ! आओ गायें “ आह्वानपूर्ण रचनाओं के माध्यम से . निष्कर्ष और उपसंहारस्वरूप संकलन का अंतिम आह्वानगीत देखें ---
“ विदा-अलविदा कहें-कहायें / अरे नवागत आओ गायें 
फिर कलिंग को जीतें हम सब / फिर से भिक्षुक बुद्ध बनें 
पाटलिपुत्र चलाएँ मिलकर / तथाकथित ही शुद्ध बनें 
चंद्रगुप्त-पोरस बन जायें 
मुस्कानों के कुमकुम मल दें / रूखे-सूखे चेहरों पर 
दुविधाओं के जंगल काटें / संशय की तस्वीरों पर 
कुहरा छाटें , धूप उगायें 
खाली बस्तों में किताब रख / तक्षशिला को जीवित कर दें 
विश्वभारती उगने दें हम / फिर विवेक आनंदित कर दें 
परमहंस के गीत सुनायें
        संकलन के आद्योपांत अनुशीलन के उपरांत मुझे यह कहने में कोई भी संकोच नहीं है कि संकलन की सभी रचनाएँ भाषा एव शिल्प की दृष्टि से कसी हुई एवं समृद्ध हैं जो समकालीनता क्जे निकष पर खरी उतरती हैं . इनमें देहरी के अंदर और देहरी के बाहर विस्तृत संसार के विभिन्न आयामों को बड़ी ही निपुणता ,भावात्मकता, यथार्थता और संजीदगी से जिया गया है . समकालीनता के निकष पर ये गीत पूरी तौर पर खरे उतरते हैं .बड़े अचरज और खुशी की बात है कि अवनीश जी का कवि गौरी-गणेश की परिक्रमा के बजाय जगत के कल्याणार्थ मानुषी आस्थाओं से लबालब बुद्धत्व का आह्वान किया है , वह निस्पृह बुद्ध भिक्षु बनने का आह्वान कर रहे हैं वह अद्यतन राजत्व को कठघरे में खड़ा करते हैं और ‘ पाटलिपुत्र चलायें मिलकर ‘ सामाजिक भेदरहित व्यवस्था की पक्षधरता की बात करते हैं . रचनाओं में मिथकों का प्रयोग न के बराबर है जो कहना है स्पष्ट शब्दावली का आश्रय ग्रहण करते हैं . बचावें राम रमैया जैसी लोकोक्तियों का  यत्र-तत्र प्रयोग दिखायी पड़ता है . भाषा सहज , सरल मनोरम बोधगम्य और सम्प्रेषणीय है . शेष पाठकों के हिस्से में. रचनाओं को पढ़ें ,अनुशीलन करें तदनुसार स्वस्थ समाज के निर्माण में रचनाओं की भागीदारी सुनिश्चित करें . मुझे विश्वास है कि संकल की रचनाएँ अपनी महत्ता को स्वत: प्रमाणित करेंगी.

समीक्षक:---
बृजनाथ श्रीवास्तव 
21, चाणक्यपुरी         
ई- श्याम नगर ,न्यू पी. ए.सी लाइंस
कानपुर-208015
मोबा: 09795111907

पुस्तक का शीर्षक : दिन कटे हैं धूप चुनते  
रचनाकार : अवनीश त्रिपाठी              
वर्ष-2019                                        
प्रकाशक : बेस्ट बुक बडीज टेक्नोलॉजीज प्रा.लि. नई दिल्ली    
मूल्य : रुपये 200/= मात्र

आज के युग का आईना:दिन कटे हैं धूप चुनते by हरिनारायण सिंह हरि

कृति : दिन कटे हैं धूप चुनते
नवगीतकार : अवनीश त्रिपाठी 
प्रकाशक : बेस्ट बुक बडीज नयी दिल्ली
पृष्ठ  : 128, मूल्य : 200/-
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         मेरे एक नवगीत की दो प्रारंभिक पंक्तियाँ हैं, "एसी में बैठ-बैठ के लिखते हो मीत,गीत! मिट्टी की गंध चाहते औ' गाँव के संगीत! "
        इसके उलट जो गीतकार /नवगीतकार ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं और अपनी जड़ से आज तक जुड़े हुए हैं, सही मायने में उनके ही नवगीतों में वर्त्तमान बदलते समाज की खामियों और खूबियों का दर्शन हो सकता है ।सायास साहित्य रचनेवालों की रचनाओं में वह धार नहीं आ सकती, जो धार प्रातिभ और अनुभव-संपन्न रचनाकारों की रचनाओं में संभव है ।ऐसी रचनाओं(गजलें भी रचनाएँ ही हैं) के संदर्भ में ही दुष्यंत ने कहा था -
   जिसे मैं ओढ़ता-बिछाता हूँ 
   वो गजल आपको सुनाता हूँ 
         अवनीश त्रिपाठी ऐसे ही प्रातिभ और अनुभव-संपन्न नवगीतकार हैं ।इनके 48 नवगीतों का संग्रह 'दिन कटे हैं धूप चुनते ' इसका प्रमाण है ।जैसा कि पुस्तक के नाम से स्पष्ट हो जाता है कि अनुभव की तीखी धूप में पककर ही ये नवगीत अवनीश त्रिपाठी के मनोजगत में आये और फिर उनकी लेखनी ने उन्हें साकार किया ।
          आज समाज के हर क्षेत्र में; चाहे वह सामाजिक, राजनीतिक या साहित्यिक हो; में तेजी से गिरावट आयी है ।सभी जगह विसंगतियों का बोलबाला है ।नैतिकता तो भूतकाल के विचार मात्र रह गये हैं ।भ्रष्टाचार को समाज द्वारा लगभग मान्यता मिल चुकी है ।ऐसे सारे तथ्य और कथ्य संवेदना के धरातल पर इस पुस्तक के नवगीतों में उपस्थित हो पाये हैं ।स्वार्थ से ऊपर उठकर परमार्थ के लिए सोचनेवालों का युग समाप्त हो चुका है । उल्टे ऐसे लोगों को उपेक्षा और अवहेलना का दंश झेलना पड़ता है ।पुस्तक के शीर्षक गीत में ही अवनीश त्रिपाठी ने अपने इस तरह के अनुभव को वाणी दी है -
    "छाँव के भी 
     पाँव में अब 
     अनगिनत छाले पड़े,
     धुंध-कुहरे 
     धूप को फिर 
     राह में घेरे खड़े,"
  और,
      " दु:ख हुए संतृप्त लेकिन 
        सुख रहे हर रोज घुनते ।
        रात कोरी कल्पना में 
        दिन कटे हैं धूप चुनते ।"
    आज के सामाज पर भौतिकता का ऐसा नशा चढ़ा है कि सारे रिश्ते-नाते मृतप्राय -से हो गये हैं ।बेशक, वे साथ-साथ रहते हैं किन्तु उनमें एक-दूसरे के लिए स्पंदन नहीं, संवेदना नहीं । वे आपस में बात नहीं करते ।'भूख चली पीहर' शीर्षक नवगीत की पंक्तियाँ देखिये -
  "द्वार-देहरी 
   सुबह -साँझ सब 
   लगते हैं रूठे,
   दिन का थोड़ा दर्द समझती 
   ऐसी रात नहीं ।"
और,
    "दीवारों के कान हो गये 
     अवचेतन बहरे, 
     बात करें किससे हम मिलकर
     दर्द हुए गहरे,"
  आज प्रसार-माध्यमों का बोलबाला है ।विश्व ग्लोबल हो चला है ।और हम वाचाल और अनर्गल प्रलापी हो चले हैं ।संयत भाषा का दामन छोड़ हमने उच्छृंखल भाषा का प्रयोग करना सीख लिया है ।एक -दूसरे की भावनाओं को ठेस पहुँचाने में ही हम अपनी सारी काबिलियत झोंक दे रहे हैं ।बड़े-छोटे की मर्यादा तार-तार हो चुकी है ।अवनीश ने अपने नवगीत 'ठहरी शब्द नदी ' में इसका बखूबी बयान किया है कि -
  "अपशब्दों की भीड़ बढ़ी है 
    आज विशेषण के आँगन में, 
    सर्वनाम रावण हो बैठा 
    संज्ञा शिष्ट नहीं है मन में।

     संवादों की 
     अर्थी लेकर आयी नयी सदी।"

  ऐसे युग में हम आ गये हैं कि हमें अब अपने सपने भी छलने लगे, और तो छल ही रहे थे ।ऐसे में हमारी नींद उचट चुकी है।हम करवटें बदल रहे हैं, क्योंकि हमें अपने सपनों पर भी विश्वास नहीं ।आखिर जीने के लिए तो कम-से-कम सपनों का, आशाओं का तो संबल चाहिए ही चाहिए -
  "छल रहे कुछ स्वप्न जिसको 
   नींद की चादर तले, 
   सो नहीं पाया मुँगेरी 
   जागता ही रह गया ।"
      मुंगेरी लाल के हसीन सपने टूट चुके हैं ।सारी उम्मीदें लँगड़ी हो चुकी हैं ।हाँ, किन्तु झूठे उम्मीदों के बीज आज भी बोये जा रहे हैं ।सत्य के विजय की नाटक किये जा रहे हैं ,वे सफल भी हो रहे हैं ।तालियाँ बज रही हैं ।गरीब छले जा रहे हैं ।अमीरों के घर में जश्न मनाये जा रहे हैं और उसे ही देख-देखकर आम आदमी भी भ्रम में पड़ा है कि हम भी आगे बढ़ रहे हैं, हमारे भी सपने साकार हो रहे हैं --
  "अलगनी पर टाँगकर उम्मीद सारी
   देहरी पर फिर समय लँगड़ा खड़ा
   
    सिर्फ अभिनय ही रहा है वर्षभर,
    नाटकों का भी 
    सफल मंचन हुआ,
    कथ्य की 
    संवाद से दूरी बढ़ी 
    दर्शकों की दृष्टि का 
    मंथन हुआ ।

     बज रहे करताल ऊँची कोठियों में 
     न्याय पर अन्याय का पर्दा पड़ा ।"
        ' तमसो मा ज्योतिर्मय ' वाली सूक्ति को हमने ताक पर रख दी है और उस तोते की तरह जो 'बहेलिया आयेगा, जाल बिछायेगा, लोभ से उसमें फँसना नहीं' कहते-
कहते उसमें फँसता जा रहा वाली बात हो रही है ।हम सायास तम(ठंढक) की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन उजाले की, ऊष्मा की बात कर रहे हैं ।कवि अविनीश ने इस परिदृश्य पर बड़ा ही सटीक उल्लेख किया है , अपने नवगीत 'तृप्ति का हठ हाशिये पर' में किया है कि -
   "धुंध की चादर लपेटे धूप अलसाई हुई 
    बात लेकिन हो रही है ताप के विस्तार की ।"
        और, नवगीत 'भोजपत्रों के गये दिन ' में भी नवगीतकार ने आज के समाजिक परिदृश्य को बड़ी ही बारीकी से चित्रित किया है -
    "और चिंतन का चितेरा 
      बन गया जब से अँधेरा 
      फुनगियों पर शाम को बस 
      रौशनी आती हैंं पल-छिन ।"

   क्योंकि, चिंतन-मनन करनेवाली सबसे बड़ी संस्था संसद, विधानसभायें ही जब ऐसे चिंतकों से भर गयी है, तो अन्य संस्थाओं का क्या हाल होगा? 
     "सभासदों के अपनेपन में
      निष्ठुर स्वार्थ झलकता, 
      चौखट के समीप में कोई
      अग्निबीज है उगता ।

      परिचयपत्रों पर फोटो के 
      ऊपर फोटो रखकर, 
      जनता की आँखों से काॅपी 
      मंत्री रहा निकाल।"
                  (विक्रम है बेहाल)

   कवि की दृष्टि केवल सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों तक ही नहीं गयी, बल्कि धार्मिक उन्माद और विसंगति की ओर भी गयी है ।इसी नवगीत में वह आगे इसका पर्दाफाश करता है - 
    "समय धार्मिक चिन्तनवाला 
     कीचड़ रहा उछाल।"
                (विक्रम है बेहाल)
       प्रस्तुत नवगीत संग्रह आज के युग का आईना है ।आज के समाज में जो-जो घट रहा है, उसकी तस्वीरें यहाँ रखी गयी हैं ।अवनीश त्रिपाठी युग के चितेरे हैं ।उन्होंने अपने नवगीत 'खिड़की छली गयी 'में आपसी विश्वास की हिलती चूलों, स्वार्थ के पसरते पाँवों का अद्भुत  चित्र उकेरा है- 
   " नहीं तनिक अफसोस तवे को 
     रोटी भले जली ।
      ×                ×            ×
    "दरवाजों ने हिस्से बाँटे 
     खिड़की गयी छली ।"
  आज के तथाकथित विकासशील 
भारतीय समाज की एक विडंबना यह है कि घर के युवकों को घर के आसपास रोजगार नहीं मिलते ।इसके लिए उन्हें सुदूर शहरों में जाना पड़ता है ।इससे घर में तो पैसे आ रहे हैं, समृद्धि बढ़ती जा रही है, किन्तु बुजुर्ग अकेले होते जा रहे हैं ।वे घर में बीमार हैं, उनकी तीमारदारी करनेवाला कोई उसके पास नहीं । इतना ही नहीं बल्कि बुजुर्ग की उपस्थिति अब नागवार गुजर रही है, नयी पीढ़ी को । इसका प्रतीक के जरिये अवनीश त्रिपाठी ने अद्भुत् चित्रण किया है -
   "सही नहीं जाती है घर को 
    आँगन की बूढ़ी खाँसी ।"
 ×                ×              ×
    "पड़े हुए घर के कोने में 
     टूटे फूटे बर्तन जैसे, 
     'अम्मा बाबू'
      अपनी हालत किससे बोलें 
      किसे बतायें!"

     लेकिन,अवनीश विडंबनाओं का  अरण्य-रोदन या विधवा -विलाप कर हताश नहीं हो जाते बल्कि उन्हें अब भी बदलाव की आशा है और वे उस दिन की राह देख रहे हैं कि कब इन विडंबनाओं, अनाचारों के  खिलाफ लोग उठ खड़े होंगे -
    "कहकहों के क्रूर चेहरे 
      क्रोध में सारी दिशायें, 
      रक्तरंजित हो चुकी हैं 
      विश्ववंदित सभ्यतायें।
   
      शीतयुद्धों में झुलसती 
      जा रही संवेदनायें 
      कब उठेगा शोर,किस दिन?"
  इन सबसे व्यथित कवि-मन नयी पीढ़ी से आह्वान करते नहीं चुकता कि वह पूर्वजों से सीख ले, उस जैसा नैतिक, परोपकारी, प्रजारंजक और कुहरे को छाँटकर प्रकाश की ओर अग्रसर हो ।संग्रह का अंतिम नवगीत पढ़ें -
   " मुस्कानों के कुमकुम मल दें
     रूखे-सूखे चेहरों पर, 
     दुविधाओं के जंगल काटें 
     संशय की तस्वीरों पर
     कुहरा छाँटें, धूप उगायें! 

   अवनीश त्रिपाठी के लिए कविता करना को शौक नहीं है ।यह उनकी आवश्यकता है, अपनी जीवनसंगिनी की तरह । जिस तरह एक अच्छी  प्रेयसी या पत्नी एक पुरुष के जीवन में प्रेम का रस घोल उसे प्रेमिल बना देती है, वैसे ही कविता ने कवि को गीत जैसा सरस और संवेदनशील बना दिया, तभी तो दुनिया भर की पीड़ाओं को अपने गीतों /नवगीतों में पिरो सका है -
   "हृदय वियोग ने जीवन में 
    दावानल का दौर जिया है 
    भावों के निष्ठुर नियोग का 
     चीख-चीख कर घूँट पिया है ।
     पीड़ाओं की झोली लेकर
     तरल सुखों का स्वाद चखाया ।
     हे कविता!
     जीवंत संगिनी 
     तुमने मुझको गीत बनाया।"
   अवनीश त्रिपाठी आज के आवश्यक समकालीन गीतकार हैं ।
                   ●
समीक्षक:-
हरिनारायण सिंह हरि
जौनापुर, मोहीउद्दीन नगर
समस्तीपुर (बिहार)-848501
मोबाइल -9771984355

मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों से संवाद की सार्थक अभिव्यक्ति 'चुप्पियों को तोड़ते हैं' by अवनीश त्रिपाठी

मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों से संवाद की सार्थक अभिव्यक्ति 'चुप्पियों को तोड़ते हैं'
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नवगीत संग्रह- 'चुप्पियों को तोड़ते हैं'
नवगीतकार- योगेन्द्र प्रताप मौर्य (9454931667)
पृष्ठ-124      मूल्य-₹150 (पेपरबैक)
बोधि प्रकाशन,जयपुर मो. 9829018087
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        "स्वप्नजीवी गीत सत्यमवद हुए,आत्मनेपद थे परस्मैपद हुए" स्मृतिशेष देवेंद्र शर्मा इंद्र ने यह पंक्तियाँ यों ही नहीं कही थीं..गीतों के आत्मपरक स्वभाव से समष्टिगत परिवर्तन की नवता को महसूस करते हुए नवगीतों के परिप्रेक्ष्य में यह उक्ति दी थी। मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है गीत...जो कि दीर्घकाल से अद्यतन निरन्तर प्राणियों के जीवन मूल्यों, चुनौतियों, विसंगतियों, सामाजिक सरोकारों और पारस्परिक अंतर्विरोधों को अपनी लय में बाँधकर प्रस्तुत होता चला आ रहा है।विभिन्न सांसारिक विषमताओं के मध्य आघातों और प्रतिघातों के युगीन द्वंद्वों को भी अतीव सहजता से प्रस्तुत कर रहा है और स्वयं इन थपेड़ों को सरलता से सहन कर रहा है।मानवीय अनुभूतियों की नव रागात्मक अभिव्यक्ति संवेदनशील होकर गीत से नवगीत की ओर दिशा तय करती है।नवगीत की भाषा की सहजता और उसका बिम्बात्मक स्वर अपने लोकधर्म का और समयसापेक्ष यथार्थ का मूल्यांकन भी करता है और साथ ही मानवमन में दहकती अनुभूतियों को सार्वजनिक रूप से निरूपित भी करता है।इस तरह की रचना धर्मिता से गीत का एकांगीपन सर्वांगीणता का आकार धर लेता है,जिससे गीत स्व से आगे बढ़कर सर्वस्व का स्वर धारता है।गीत की इसी निष्पक्षता को नवगीत कहना उचित होगा।ऐसा करते हुए रचनात्मक लय और गीत की लय भी परिपक्व अवस्था में होनी चाहिए।
          नवगीत जीवन का यथार्थवादी चित्रण व्यञ्जनात्मक रूप में करता है।इसमें अनुभूति का सम्मिश्रण होने से लय और गेयता में वृद्धि होती है।संवेदना की सघनता और भावों का आवेग एक साथ मिलकर गीतकार के शब्दचयन द्वारा एक अलग ही अर्थविन्यास से युक्त नवगीत प्रकट करते हैं।गीत केवल लय और गेयता का प्रकाशन ही नहीं करता है बल्कि वह मानव के आरंभिक और आधुनिक संस्कारों  के साथ लोकजीवन के सम्बन्धों को जोड़ने का एक माध्यम भी है,एक सेतु भी है।शब्दों की यही लय जब संवेगात्मक भाषा के माध्यम से अर्थ की प्रतीकात्मक और बिम्बात्मक भाषा में अभिव्यक्ति करती है तो नवगीत मुखर हो उठता है।वैचारिक प्रच्छन्नता की मुखरता से नवगीत की मार्मिकता बढ़ जाती है और वह अधिक प्रभावशाली हो जाता है।भाषा की सहजता से सघन अर्थ की अभिव्यक्ति की संवेदनात्मक तरलता से युक्त गीत में बिम्बात्मकता, प्रतीकयोजना और व्यंजनात्मकता का सुनियोजन करते हुए ताज़गी ला देने की जो कला अब के गीतों में विकसित हो रही है वह पूर्वार्द्ध के गीतों में उतनी सटीक नहीं दिखाई देती है।समय सापेक्ष संवेदना के स्वर की गूँज नई सदी और नई पीढ़ी के गीतों में अधिक है।
      नवगीत का वर्तमान परिवेश विभिन्न भ्रान्तियों से ग्रस्त है।कोई क्षेत्रीय बोलियों के शब्दों की आधिक्यता से युक्त रचना को नवगीत घोषित कर रहा है तो कोई अंग्रेजी के शब्दों के अधिकाधिक बिम्ब पिरोने को ही नवगीत कह रहा है।प्रयोगों के नाम पर विभिन्न व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया के समूहों में नवगीत की अपनी ही तरह की परिभाषाएं और अपने तरीके के व्याकरण गढ़े जाने लगे हैं।इन्हीं विसंगतियों के मध्य जूझते हुए नवगीत के क्षेत्र में वर्तमान नवयुवक रचनाकारों की पीढ़ी उतरी, जो कि बीसवीं सदी के चौथे कालखण्ड में जन्मी और जिसने विभिन्न समस्याओं से पनपे हुए परिवेश की रुग्णता में आँखें खोलीं।ऐसे परिवेश में उनकी कलम भी सामाजिक विसंगतियों, विद्रूपताओं, राजनैतिक विक्षोभ, धार्मिक उन्माद से उपजते जाति-पाँति के झगड़ों,भूख-प्यास से बिलखते दलित-शोषित वर्गों, पथभ्रष्ट होते युवाओं के ऊपर केंद्रित होकर गीत सृजन की ओर उन्मुख हैं।
              इक्कीसवीं सदी में नवगीत लेखन में उतरी नई पीढ़ी के नवगीतकारों अवनीश सिंह चौहान,कृष्ण नन्दन मौर्य,रविशंकर मिश्र,गरिमा सक्सेना,राहुल शिवाय,शुभम् श्रीवास्तव ओम और चित्रांश वाघमारे के साथ ही एक नाम आता है भाई योगेन्द्र प्रताप मौर्य का। 'चुप्पियों को तोड़ते हैं' उनका पहला नवगीत संग्रह है।योगेन्द्र जी के नवगीतों में विचारों की नवता भी है तो भाषा की लचक भी।कथ्य को बिम्बों और प्रतीकों के साथ प्रस्तुत करने की कला भी है और सपाटबयानी से रहित भाषिक सहजता भी।संग्रह के नवगीतों को पढ़ते समय योगेन्द्र जी की प्रतिभा की बानगी, व्युत्पत्ति की विशालता एवं उनके अभ्यासी होने के गुणों से परिचय करने का पूर्ण अवसर मिलता है।वे अभिव्यक्ति को उचित रूप में प्रकट करना जानते हैं।विभिन्न समस्याओं पर एक युवा योद्धा की तरह विजय पाने की कला से वाकिफ़ योगेन्द्र जी के संग्रह 'चुप्पियों को तोड़ते हैं' से शीर्षक गीत की कुछ पंक्तियाँ:-

वेदना मन में जगी है
किन्तु कब ये नैन रोते,
हम धधकती भट्टियों में
हैं सृजन के बीज बोते,
बादलों की मटकियों को
कंकड़ों से फोड़ते हैं।
हम नहीं हैं मूक मानव
चुप्पियों को तोड़ते हैं।

        वरिष्ठ आलोचक नचिकेता कहते हैं-"सम्पूर्ण मानवीय संवेदना के सर्वोच्च निचोड़ की सार्थक और संगीतात्मक अभिव्यक्ति गीत है।" योगेन्द्र मौर्य जौनपुर के खाँटी ग्रामीण परिवेश से आते हैं।उन्हें मानवीय संवेदना की गहरी अनुभूति है।रोजाना ही कृषि क्षेत्र से जुड़े श्रमिकों और किसानों की समस्याओं से रूबरू होना ही पड़ता है।मजदूर वर्ग की लाचारी को प्रत्यक्षतः महसूस करना और उस पर रिएक्ट करना एक कवि का धर्म भी है और नैतिक दायित्व भी।संग्रह का पहला ही नवगीत समाज के कठोरतम यथार्थ से अवगत कराता है:-

श्रम के हिस्से रोज पसीना
लाल हुई हैं आँखें
कटी हमेशा ही नभ में
उड़ती चिड़िया की पाँखें
धँसा पीठ में फिर धोखे से
खंज़र अत्याचारी
कभी गाँव में
कभी शहर में
भटक रही लाचारी।

             अपने समय के आम आदमी की तकलीफ़ों और उसके जीवन संघर्ष को कविता और साहित्य की केंद्रीय अंतर्वस्तु स्वीकार करना कवि/साहित्यकार का नैतिक कर्तव्य है।ग्रामीण परिवेश हो या शहरी,दोनों जगहों पर अभावों का जो विस्तार दिखाई देता है उसकी वास्तविकता को यथातथ्यात्मकता के साथ प्रस्तुत करने में योगेन्द्र भी पीछे नहीं हटते हैं:-

उगती हुई भोर पर भारी
दरवाजों के साये
बैठी रही रसोई दुख से
अपना मुँह लटकाये
उसकन ऐंठी जिद के मारे
काले पड़े भगौने
माँ बच्चों का मन बहलाने
पाये कहाँ खिलौने!
                (चुभते रहे बिछौने)

        किसी समय पर जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने अपने ही अन्दाज़ में जनतंत्र प्रणाली पर तीखी टिप्पणी की थी "Democracy is a government, of the fools, for the fools, by the fools." भीड़तंत्र में सब कुछ अच्छा कैसे रह सकता है।जहाँ शासन और प्रशासन, कुशासन से जुड़े हों और मूर्खों के हाथों में हों, वहाँ न्याय की उम्मीद धराशायी हो जाती है और केवल अट्टहास करता हुआ भ्रष्टतंत्र खड़ा दिखाई देता है।आम आदमी का दुःख, कुंठाग्रस्तता,उसका जीवन संघर्ष कितना जटिल हो जाता है कि वो न्याय पाने के लिए किस दरवाजे पर दस्तक दे यह उसे समझ ही नहीं आता।न्याय व्यवस्था भी इसी तथाकथित जनतंत्र के हाथ की कठपुतली बनकर नर्तन करने लगा है।इस विकराल स्थिति से योगेन्द्र जी भी पूरी तरह अवगत हैं और 'मौन खड़ा कानून' गीत में हमें स्वमूल्यांकन के लिए कहते हुए दिखाई पड़ते हैं कि सही व्यक्ति का चुनाव न करने का दंश कितना भयानक है:-

छूट गया हत्यारा खंज़र
पीकर मनभर खून
अपनी आँखों पट्टी बाँधे
मौन खड़ा कानून
सरकारी फरमान हो रहे
केवल हवा हवाई।

        किसी एक युग या कालखण्ड की विधा या विचार कालजयी नहीं हो सकते हैं।इसीलिए कुछ अरसा बाद कविता की हर विधा में कुछ नवीनता लाने के लिए उसके मूल रूप और स्वरूप में किंचित ही सही, परिवर्तन होता ही है।नवगीत दशक एक की भूमिका में डॉ शम्भूनाथ सिंह ने लिखा है "एक युग में किसी विधा से जो नवीनता और मौलिकता दिखाई पड़ती है, वहीं वह अगले परिवर्तित युग में घिसी-पिटी और बासी प्रतीत होने लगती है।तब नए कवि अपने युग की आवश्यकता और जीवन दृष्टि के अनुरूप तथा अन्तर्दृष्टिमूलक कल्पना के सहारे उस विधा में नवीन सौंदर्य और नई चमक उत्पन्न करते हुए नवीन तथा आत्मानुभूत सत्य की अभिव्यक्ति करने लगते हैं।" योगेन्द्र मौर्य जी अपने समय से भी परिचित हैं और अपने पूर्वकाल से भी।समाज के आंतरिक और बाह्य ढाँचे में होते बदलावों को वे समझ रहे हैं।अतः अपने साहित्यिक परिवेश में भी वे परम्परा के सार्थक परिवर्तन के पक्षधर दिखाई देते हैं।नवीनता का पोषक होना कविकर्म का आवश्यक अंग स्वीकार करने में कोई गुरेज भी नहीं है।इसी के चलते वे केवल नकारात्मक या समस्यात्मक नवगीत ही नहीं रचते बल्कि वे समाधान के भी गीत रचते हुए अपने समय के प्रवाह में आशा का दीप जलाते हुए नैराश्य को मिटाने का भी प्रयास करते हुए खड़े हैं:-

नन्हें हाथों में लौटीं हैं
सतरंगी फुलझड़ियाँ,
अंधियारों को जीत रही हैं
उम्मीदों की लड़ियाँ,
मुँह की खाकर 
विवश निराशा अपने हाथ मले
इस धरती पर
त्योहारों की खुशियाँ रोज पलें।
      
           चर्चित गीतकवि कैलाश गौतम का एक गीत बहुत ही प्रसिद्ध हुआ था जिसकी एक पँक्ति -"सुरसतिया की लाश मिली है नदी किनारे" से तत्कालीन ग़रीबी में जन्मी गँवई स्त्री की नियति और दबंगों की नीयत का सम्पूर्ण लेखा जोखा सहजता से मिल जाता है।लेकिन तब से अब तक आते आते स्त्री की जीवन शैली में कितना परिवर्तन आया है। यद्यपि पौरुषीय दंभ अब भी वही है लेकिन आज की स्त्री अपने अस्तित्व को समझने लगी है। कैलाश गौतम का वह गीत पिछली सदी का है और योगेन्द्र जी का प्रस्तुत गीत नई सदी का है,दोनों के परिवेशगत अंतर को सहज ही समझा जा सकता है:-

तोड़ प्रथाएँ निकली घर से
अब तो बाहर बेटी,
जैसे मुट्ठी में यह दुनिया
उसने आज समेटी,
जल-थल नाप
उड़ाती नभ में
देखो आज विमान।
निश दिन गढ़तीं
यहाँ बेटियाँ
नये नये प्रतिमान।
      
         गीत चाहे व्यक्तिपरक हो या फिर समष्टिपरक, दोनों स्थितियों में वह समूह के संवेग को ही प्रकट करता है।थियोडोर अडोर्नो ने इस विषय में लिखा है "गीत की पुकार का मर्म वही जान सकता है जो इसकी अंतर्निहित मानवीयता के स्वर को सुन सकता है।" योगेन्द्र जी के गीतों में मानवीयता को जानने समझने की अद्भुत क्षमता है।वे मिट्टी से जुड़े हुए व्यक्ति हैं तो निश्चित रूप से उसके प्रति उनका अनुराग और जुड़ाव रहेगा ही और जब उस मिट्टी से लोगों की दूरी बनती है तो वे कह उठते हैं:-

आनाकानी सावन करता
लोकगीत को भूला
और गाँव से रूठ न जाने 
कहाँ गया है झूला
जारी है अब 
संस्कृतियों का
लगातार अपकर्ष
लील गई 
मिट्टी की खुशबू
कंकरीट की फर्श।

        योगेन्द्र जी के नवगीतों में यथार्थ आनुभूतिक संवेदना में सामाजिक सरोकारों की प्रगतिशील विचारधारा भी उपस्थित होती है जो उनके नवगीतों को शाश्वत बनाती है और बिम्बधर्मिता नए आयामों की गहराई को और विस्तार देती है।प्रकृति का साहचर्य भी इन नवगीतों को प्राप्त होता है भले ही प्राकृतिक आपदा के रूप में ही क्यों न हो।यह स्थिति भी हमारी स्वयं की ही देन है।कहीं पर भारी बारिश तो कहीं पर सूखा।इस प्राकृतिक असन्तुलन को लेकर लिखे गए इस नवगीत ने थोड़े में ही बहुत कुछ कहने का बीड़ा उठाया है-

जबरदस्ती घुस गया जल
ले रहा घर की तलाशी,
चेहरों पर हड़बड़ी की
है गहन छायी उदासी,
कैम्प में लेती शरण हैं
हाँफती सी हड्डियाँ,
हो कुपित अब बादलों ने
खोल दी हैं मुट्ठियाँ।

         वैश्विक परिवेश में पूँजीवाद का उदय होने से समाज में धीरे धीरे विभाजन और विघटन होता गया।जिसका प्रभाव यह पड़ा कि पूँजी का वर्चस्व समाज पर बढ़ने लगा तो श्रम विभाजन और वर्ग विभाजन की प्रक्रिया जटिल हो गई।तत्कालीन स्थिति से आज तक उस मानसिकता से सम्पूर्ण समाज उबर न सका।जनसंख्या की अधिकता और रोजगार की कमी से लगभग हर देश पीड़ित है।भारतीय उपमहाद्वीप में रहते हुए जनसँख्याधिक्य से डिग्रियों को लेकर बेरोजगार युवा दर ब दर की ठोकरें खाते हुए भटकने को मजबूर हो जाते हैं।ख़ासकर उत्तर प्रदेश जैसे स्थान पर तो यह स्थिति और अधिक विकराल है।इस विषम स्थिति से योगेन्द्र जी भी पीड़ित हैं:-

धूल उड़ाती पगडंडी से 
कौन जुबान लड़ाये,
जानबूझकर लँगड़ी मारे
चलते पाँव गिराये,
आखिर कब तक
भार सहेंगे बूढ़े बोझिल कंधे?
डिगरी वाली फ़ाइल लेकर
रोज भटकते बंदे।

       धार्मिक और सामाजिक रूढ़िवादिता से सम्पूर्ण समाज का अंधानुकरण घातक है।नवगीत भारतीय सभ्यता और संस्कृति का पोषक भी है और अंधविश्वास और कुरीतियों के वितंडावाद का धुर विरोधी भी।मानवमूल्यों के विरुद्ध आचरण का परिपोषण और समर्थन मानवसमाज के हित में है ही नहीं।स्त्री पुरुष के पारस्परिक सम्बन्धों में बिखराव का योगेन्द्र जी ने अपने अन्यानेक नवगीतों में इस परंपरा का विरोध किया है।एक उद्धरण दृष्टव्य है:-

सम्बन्धों में आड़े आते
अक्सर तीन तलाक़,
खुशियाँ लेतीं छीन रिवाज़ें
ये होतीं नापाक
चारों तरफ खड़ा दिखता है
अंधापन-अतिवाद।
रोज समस्या समाधान में
छिड़ा वाद-प्रतिवाद।

    नवगीतों में एक चिंता सर्वाधिक दिखाई दे रही है इन दिनों पर्यावरणीय प्रदूषण की।उद्योगों की अधिकता और वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से मृदाक्षरण होने लगा है जिससे मिट्टी का उपजाऊपन खतरे में है और ऑक्सीजन की कमी से कार्बन की मात्रा बढ़ गई है।जिससे पृथ्वी पर पर्यावरण असन्तुलन की स्थिति विकराल रूप धारण कर चुकी है।योगेन्द्र जी पेशे से शिक्षक भी हैं तो उन्हें भी इसकी चिंता होनी स्वाभाविक है:-

आस-पास सब धुआँ धुआँ है
एक अजब भारीपन
उभरा हुआ दमा ढोना है
उकताया सा जीवन,
मानव और प्रकृति में होती
अक्सर हाथापाई
खड़ी चिमनियों से बेलों की
हँसी यहाँ मुरझाई।

और

बड़ी निर्दयी आरी करती
तन की बोटी बोटी
ठेकेदार बढ़ाकर बोली
रकम वसूले मोटी,
अपने दुर्दिन देख बगीचे
रहते बहुत निराश।

        नामवर सिंह जब गीत की आलोचना करने का मन बनाते हैं तो अलग ही पृष्ठभूमि तय करने लगते हैं:- "गीत और लिरिक में आप दुःख-दर्द और वियोग की वेदना के साथ जीवनदर्शन को अच्छी तरह से प्रस्तुत कर सकते हैं लेकिन जैसे ही उसमें गरीबी,उत्पीड़न और आक्रोश की बात करने लगते हैं,उसकी गेयता नष्ट हो जाती है और वह song हो जाता है।" अब इसे दुर्भाग्य ही कह सकते हैं जो आलोचक व्यष्टिपरक गीत को liric और समष्टिपरक गीत को song कहते हुए नवगीत को अगेय घोषित करने पर लगा हो,उसने निश्चित रूप से नवगीतों को बिना पढ़े हुए गैरजिम्मेदारी से यह टिप्पणी दी है,यह कहने में संकोच नहीं किया जा सकता है।नवगीतों में छन्दों की संगीतात्मक लय और गेयता की अद्भुतं उपस्थिति रहती ही है।योगेन्द्र मौर्य के नवगीत निजी और आत्मपरक नहीं हैं,वे वैयक्तिकता से दूर भौमिकता के पूर्णरूपेण विवेचक हैं।इनके नवगीतों में वैचारिक ताज़गी है।उक्त आलोचकीय दृष्टि को नकारते हुए बहुत से गीत इस संकलन में हैं।एक गीत के अंश को यहाँ उद्धृत करना चाहूँगा:-

लगी पटखनी फिर सूखे से
धान हुए पाई
एक बार फिर से बिटिया की
टाली गई सगाई
गला घोंटती यहाँ निराशा
टूट रहे अरमान
धरी रह गई यहाँ किसानी
खाली हैं खलिहान।

        अब इससे अधिक अभाव की पीड़ा व्यक्त करते हुए नवगीत में लयात्मकता और गेयता का जो पुट भरा है उसे नकारना उचित तो नहीं है। नवगीत रचना की शैली के विषय में नचिकेता जी कहते हैं-"आनुभूतिक संरचना,भाषा,शिल्प,लय, छन्द, विषयवस्तु और संवेदना के धरातल पर गीत रचना की शैली एक जैसी ही है।" कहने का तात्पर्य है कि गेयता हर समय गीत का विशेष अंग रहा है और योगेन्द्र जी के नवगीतों में यह बात मुख्यतः उपस्थित है।
       संस्कारों की नग्नता,पश्चिम की आँधी में बहता और भटकता युवावर्ग,मन को मथती हुईं अखबारों की हेडलाइन्स, इक्कीसवीं सदी में भी ग्रामीण परिवेश का अभावग्रस्त जीवन,फैशन का प्रसार और नैतिक क्षरण,आम जन की पीड़ा,सामाजिक और धार्मिक विसंगति,राजनैतिक विक्षोभ,पारिवारिक विघटन और स्नेह की कमी,सद्भावना का क्षरण,संवेदनहीनता,आतंकवाद,बेरोज़गारी, नशायुक्त युवा,शिक्षा की बेपटरी व्यवस्था आदि लगभग सभी मुद्दों से योगेन्द्र जी का साबका भी है और सरोकार भी।यही कारण है कि उनके लगभग गीतों का मुख्य स्वर इन्हीं विषयों पर केंद्रित है लेकिन इसका तात्पर्य नहीं है कि उनमें केवल नकारात्मक अभिव्यक्ति घर कर गई है।बहुत से गीत इन विसंगतियों से निबटने को उत्कण्ठित भी हैं।विभिन्न सकारात्मक विषयों के माध्यम से उन्होंने नवगीत में आशा और सम्भावनाओं को भी विस्तार दिया है।इसीलिए जब वे यह कहते हैं- "जीवन में कब/मिला मुनाफ़ा/सिर्फ मिला है घाटा" तो वहीं अगले ही क्षण वे ही यह भी कहते हैं-"सुबह-सुबह/उठकर पगडण्डी/करती चहल पहल है।" इन सबके साथ ही हिन्दी भाषा की चिंता भी उन्हें है।वे हिंदी की उपेक्षा उसके घर में होते हुए देखकर पीड़ित हैं और कहते हैं-

न्याय माँगती है संसद से
बैठ राष्ट्र की भाषा,
कानूनी अड़चन में उलझी
अंतर की अभिलाषा,
देवनागरी बड़ी दुःखी है
खुद की देख ठगाई
ए बी सी डी रंग बिरंगी
चले बांधकर टाई।

         डॉ जीवन प्रकाश जोशी शिल्प के छः अंग स्वीकार करते हैं-"भाषा,अलंकरण तत्व,संगीत,बिम्बधर्मिता, प्रतीक और रूपक यही छः गीत के शिल्प को सुदृढ़ बनाते हैं।भाषा में शब्दशक्ति,शब्द समाहार,ऋजुता,ध्वन्यात्मकता और रसात्मकता को सम्मिलित करना चाहिए।अभिव्यंजना की नवीनता ही सृजन की मौलिकता का मानदण्ड है।" उक्त मानकों के क्रम में योगेन्द्र प्रताप मौर्य जी के लगभग सभी नवगीत पुष्ट हैं।नवगीत के विषय में उनकी मौलिक अवधारणाएं हैं जो वर्तमान के सापेक्ष रहकर प्रतिरोध को सुदृढ़ करती हैं।जिनके नवगीतों की शैली में समभिव्याहार का गुण उपस्थित है।इनकी इसी शैली के चलते इनके नवगीतों को अन्य के नवगीतों से सहज ही अलग करके देखा और परखा जा सकता है।
          गीतों के प्रति अज्ञेय ने "यूँ तो हिंदी में अब भी गीत लिखे जाते हैं और नई कविता के साथ नवगीत की भी धारा चलाई जाती है,लेकिन गीत की धारा कभी हिंदी काव्य की मुख्य धारा नहीं हो सकती" कहकर इतना अधिक उकसा दिया था कि भाववादी और आधुनिकतावादी आलोचकों के साथ साथ मार्क्सवादी आलोचकों ने भी गीत का विरोध ही किया।स्थिति तो यह रही थी कि नामवर सिंह और मैनेजर पाण्डेय तक ने इस विधा के प्रति दोहरी मानसिकता अपनाई। फिलहाल इन्हीं आलोचकों की तानाशाही के मध्य नवगीत पिछले साठ वर्ष से निरन्तर जनमानस में प्रवाहित है और अद्यतन नवगीतकारों के संकलनों के प्रकाशन से परिपुष्ट है। योगेन्द्र प्रताप मौर्य का यह संग्रह भी उसी कड़ी का एक सजीव हिस्सा है।जिसके नवगीतों में संवेदनाएं युगबोध से अभिव्यंजित हैं।विषयों के अनुकूल भाषा गढ़ने की कला और रसों का प्रतिबिम्ब खड़ा करने का हुनर भी इन्हें खूब आता है।कथ्यात्मकता कि प्रस्तुति के तरीके भी विशेष हैं।अपने समय के सच को टटोलते हुए यह नवगीत संग्रह अवश्य ही पाठकों और साहित्यकारों के मध्य अपनी पहचान बनायेगा और इसका स्वागत होगा।

समीक्षक-
अवनीश त्रिपाठी
सुलतानपुर, उ.प्र.
9451554243