संध्या सिंह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
संध्या सिंह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

नवगीत-तप कर हम कुंदन निकलेंगे by संध्या सिंह

मुस्कानों को अगर हटाया 
दबे हुए क्रंदन निकलेंगे 
अभी मौन की भट्टी में है 
तपकर हम कुंदन निकलेंगे

भरसक शब्द दिये चिंतन को 
लेकिन बचा बहुत कुछ बाकी 
भीग भीग कर भी नामुमकिन 
बूँद बूँद पढ़ना बरखा की

ज़रा झुर्रियों में झांको तो 
छुपे हुए बचपन निकलेंगे

हवा छुपी पत्तों के पीछे 
धूप बादलों में दुबकी है 
दिन को कैसे पता चलेगा 
रात कहाँ कितनी सुबकी है 

उत्सव के महलों के भीतर 
पीड़ा के आंगन निकलेंगे 

यायावरी बहुत की बाहर
अब अंदर का सफ़र ज़रूरी 
जाने कितना समय लगेगा 
खुद से खुद की मीलों दूरी 

भीतर एक मथानी चलती 
बनकर हम मक्खन निकलेंगे

--- संध्या सिंह, लखनऊ

मंगलवार, 21 जून 2016

सन्ध्या सिंह जी का हृद्य गीत

' बरखा ‘
☔☔
बहक बहक कर आज सम्भाला
बडे दिनों के बाद
खुली गगन में इक मधुशाला
बड़े दिनों के बाद
☁☁
सड़कों पर बूंदों की छम छम
घुंघरू सी झंकार हुई
भीग भीग कर टहनी झूमी
बरखा ज्यों त्यौहार हुई

आज भरा पोखर का प्याला
बड़े दिनों के बाद
खुली गगन में इक मधुशाला
बड़े दिनों के बाद
🌂🌂
आज पुरानी रस्म तोड़ कर
लहर किनारे लांघ रही
मिट्टी ने पानी में घुल कर
मन की सारी बात कही

दरिया आज हुआ मतवाला
बड़े दिनों के बाद
खुली गगन में इक मधुशाला
बड़े दिनों के बाद
🌈🌈
पत्तों को चढ़ गयी खुमारी 
झोंकों ने पहचान लिया
घूँट-घूँट ये शुद्ध सोमरस
पेड़ों ने रसपान किया

छलक उठी कुदरत की हाला
बड़े दिनों के बाद
खुली गगन में इक मधुशाला
बड़े दिनों के बाद
💧💧
©® संध्या सिंह
       लखनऊ, उत्तर प्रदेश