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गुरुवार, 1 जुलाई 2021

नवगीत-सुबह की गंध by विनय विक्रम सिंह

चल सुबह की गंध सूँघें, 
थक रहा है तन।

रख नहीं छोटे क़दम तू,
दूर उसका घर।
हर क़दम में लाँघ राही,
हाँफने के स्वर।
राह में काँटे बिछाते,
नींद के सागर।
खुम्भियों की छाँव बेचें,
चैन की भाँवर।
बाँध देते ये भुलावे, 
पाँव में बन्धन।
चल सुबह की गंध सूँघें, 
थक रहा है तन।१।

हो रहा हर पाट चौड़ा,
धार नित कमतर।
वसन काले ढँक चुके हैं,
अंग उसका हर।
बुदबुदाकर भर रही वो,
बुदबुदों में स्वर।
मंत्र साबर साधती है,
रेत में धँसकर।
टोटके सी साँस सूखी,
ढो रही जीवन।
चल सुबह की गंध सूँघें, 
थक रहा है तन।२।

लय अधूरे थाप लेती,
गद्य सी ढलकर।
भाव में लोहा मिलाकर,
वज़न पैदाकर।
लोच जीवन की थकी है,
सोच में मर कर।
पृष्ठ हैं पुस्तक नहीं हैं,
ठग रहे पोस्टर।
गेयता छुपकर वनों में,
लेपती चंदन।
चल सुबह की गंध सूँघें, 
थक रहा है तन।३।

गल रहे हिमशैल उजले,
दिख रही माटी।
नग्नता के ढोल बजते,
सिर धुने थाती।
बंजरों में दीप जलते,
खेत बिन बाती।
बिक रही हैं रोटियाँ,
दाँत से काटी।
अब नदी के पाँव जलते, 
रेत हर आँगन।।
चल सुबह की गंध सूँघें, 
थक रहा है तन।४।

- विनय विक्रम सिंह

सोमवार, 28 जून 2021

आधुनिक जनजीवन के अत्यंत करीब-दिन कटे हैं धूप चुनते by राहुल शिवाय

आधुनिक जनजीवन के अत्यंत करीब- दिन कटे हैं धूप चुनते
■■
समीक्षक-राहुल शिवाय

         साहित्य की सभी विधाओं में गीत, लोकमन और जीवन के सबसे समीप रहा है। सभ्यता के प्रथम सोपान पर नृत्यगीत के रूप में गीत विकसित हुआ तो वेदों में ऋचाओं के रूप में। गीत भारतीय उपमहाद्वीप में वह माध्यम रहा है जिसके द्वारा जनसाधारण ने अपने सभी सुख-दुःख, हर्ष-विषाद, उत्साह-उमंग, जय-पराजय, संघर्ष की चेतना और मुक्ति की भावना को अभिव्यक्त किया है। लोकगीत हों, मध्यकालीन भक्ति गीत हों, छायावादी गीत हों या फिल्मी गीत, ये अपनी अभिव्यंजना और गेयता से लोकजीवन में सदा व्याप्त रहे हैं और आगे भी व्याप्त रहेंगे। पर इसके बाद भी एक ओर गीत ने जहाँ असीमित प्यार, दुलार एवं स्नेह पाया है वहीं दूसरी ओर साहित्य की मुख्य धारा से गीत को अलग रखने का प्रयास भी निरंतर चलता आ रहा है। विडम्बना तो यह भी है कि इसमें प्रारंभ के वे गीतकार भी शामिल हैं जो अनुभूति की तीव्रता, गीतात्मक ऋजुता, व्याकरण और शिल्प के स्वरूप को संभाल नहीं पाये।
साठ के दशक के आस-पास जब कविता नई कविता के रूप में विकसित हो रही थी तो गीत को यह कहकर भारतीय साहित्य की मुख्य धारा से, गंभीर साहित्य-विमर्श से अलग करने का प्रयास किया जाने लगा कि गीत में रूमानियत और निजीपन है। आधुनिक बोध और अभिव्यक्ति के लिहाज से गीत की विषय वस्तु को अनुपयुक्त घोषित कर दिया गया। यही वह समय था जब गीत, नवगीत के रूप में विकसित हुआ। नया कथन, नई प्रस्तुति, प्रगतिवादी सोच, नए उपमान, नए प्रतीक, नए बिम्ब, समकालीन समस्याएँ और परिस्थितियाँ प्रस्तुत करते हुए नवगीतकारों ने ढेरों नवगीत लिखे और साहित्य की मुख्य धारा में आने का एक संघर्ष प्रारंभ हुआ जो आज साठ वर्षों का हो चुका है।
इस दौरान हिन्दी गीत/नवगीत के सफर में 2000 ई- के बाद एक नया अध्याय जुड़ने लगा। यह वह समय था जब शायद पिछले कई दशकों से अधिक गीतकार सक्रिय रूप से गीत/नवगीत लिखने लगे। इनमें ही एक नाम है अवनीश त्रिपाठी जी का। अवनीश त्रिपाठी जी के नवगीतों में जहाँ विचारों की नवता है वहीं भाषा का लचीलापन भी। इनके पास कथ्य और बिंबों को प्रयोग में लाने की कला है और हम सब जानते हैं कि नवगीत एक बिंबप्रधान काव्य-रूप है। इसमें सहजता तो अभिप्रेय है लेकिन सपाटबयानी नहीं। इसमें कथ्य और बिंबों में नयापन तथा भाषा में एक अलग तरह की मिठास एक साथ गुंथी हुई होती है, जो अवनीश जी के गीतों में सहजता से ही प्राप्य है। इनके गीतों की यह विशेषता है कि वे अपनी बात प्रतीकों, संकेतों, बिम्बों के माध्यम से रखते हैं। ‘उनका काव्य व्यंजना का काव्य है।’ यथा-‘धूप चुनना’, ‘क्षुब्ध आहुतियाँ’, ‘प्यास बोना’, ‘छाँव के भी पाँव में छाले’, ‘थोथे मुखौटे’, ‘धुएँ का मंत्र’, ‘वस्त्र के झीने झरोखे’ और उन झरोखों को ‘टाँकती अवहेलना’ जैसे प्रयोग।
प्रतिभा, व्युत्पत्ति और अभ्यास-ये साहित्यकारों के तीन अपरिहारी गुण हैं। अवनीश जी में ये तीनों गुण हैं। इनमें कारयित्री प्रतिभा की अभिनवता, व्युत्पत्ति की विशदता और अभ्यास की उत्कट अभीप्सा है। इन्हीं गुणों के कारण तो इनमें यश पाने की हड़बड़ी नहीं है। यदि कुछ है तो सम्पूर्णता का भाव। शायद इस कारण ही ये निरंतर सीखते रहना चाहते हैं। ये अभ्यासी हैं, जो इनके नवगीतों को मधुर, मर्मस्पर्शी, बोधगम्य तथा प्रेषणीय बनाते हैं। ‘शैली ही व्यक्ति है और व्यक्ति ही शैली है’ के कथन को चरितार्थ करते हुए अवनीश त्रिपाठी जी अपने नवगीतों में अभिव्यक्ति को स्वतंत्र स्वरूप प्रदान करते हैं। राजनीतिक विडंबनाओं, सामाजिक विसंगतियों, मानव की यथार्थ विचारधाराओं, प्रकृति प्रेम आदि विषयों पर इनकी कलम बेधड़क चलती है। गाँव की जड़ों से लिपटी सौंधी मिट्टðी इनकी कलम की धार है। वास्तविकता में ये नवगीत सिर्फ लिखे हुए नहीं, जिये हुए नवगीत लगते हैं। तभी तो अवनीश जी अपने नवगीत में कहते हैं कि उनका दिन धूप को चुनते हुए अर्थात कठिन परिश्रम करते हुए बीता है। अवनीश जी अपने शीर्षक गीत में उस श्रमिक वर्ग का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं जो संघर्ष करते हुए अच्छे दिन
की कोरी कल्पना में जी रहे हैं-
सौंपकर थोथे मुखौटे
और कोरी वेदना,
वस्त्र के झीने झरोखे
टाँकती अवहेलना,
दुःख हुए संतृप्त लेकिन
सुख रहे हर रोज घुनते।
रात कोरी कल्पना में
दिन कटे हैं धूप चुनते।
अपने समय के आम आदमी के संघर्षों, तकलीफों और संकल्पों को आज के सजग जिम्मेदार कवियों के काव्य संसार की केंद्रीय अंतर्वस्तु के रूप में देखा जाता है। अंतर्वस्तु के आलोक में उनकी काव्य यात्र की जटिलताओं को भी समझा जाता है। इस दृष्टि से अवनीश त्रिपाठी जी के नवगीतों पर विचार करें तो उनकी निरंतर गतिशील रचना यात्र हमें उस पड़ाव पर ले जाती है जहाँ से उनके
नवगीत प्रौढ़ता की ओर अभिमुख होते हैं।
स्वप्नों की समिधायें लेकर
मन्त्र पढ़ें कुछ वैदिक
अभिशापित नैतिकता के घर
आओ हवन करें।
आज समाज में मानवीय मूल्यों का पतन बहुत तेजी से हो रहा है, मनुष्य की मानवीय संवेदना धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। लोग अपने स्वार्थ सिद्धि के लिये किसी हद तक जाने को तैयार हैं, परिवार एकल हो गये हैं। ऐसे में रिश्तेदार फेसबुक पर खोजे जाने लगे हैं। यह समय रिश्तों की अनदेखी करने लगा है, बच्चे सोशल नेटवर्किंग, मोबाइल गेम्स की ओर इस प्रकार झुक गये हैं कि उन्हें दादा-दादी की कहानियाँ, नीति-परक् बातें बेकार-सी लगने लगीं हैं, इस परिस्थिति ने न सिर्फ बच्चों को प्रभावित किया है, अपितु बुजुर्गों का भी सुख छीन लिया है। आिखर दादा-दादी, नाना-नानी, के िखलौने बच्चे ही तो होते हैं। इस सामयिक विसंगति को शब्द देते हुये अवनीश त्रिपाठी जी लिखते
हैं-
बेटे का घर घर में बच्चे
हाथों में मोबाइल पकड़े
गेम, चैट, नेट पर सीमित वे
तकनीकी युग में हैं जकड़े
गँवई देशी, ठेठ देहाती
बोली-भाषा वाले दोनों
भरे हुए घर में एकाकी
कथा-कहानी किसे सुनाएँ?
‘अम्मा बाबू’ अपनी हालत
किससे बोलें, किसे बताएँ।
हमारा समाज, जहाँ माता-पिता ईश्वर माने जाते हैं। वहां आज दिन-ब-दिन वृद्धाश्रमों की संख्या में वृद्धि होती जा रही है। आम जीवन में पश्चिमीकरण का इस प्रकार प्रवेश हो गया है कि हम दो-हमारे दो को ही हम अपना सम्पूर्ण संसार मानने लगे हैं। हमें आँगन की बूढ़ी खाँसी शोर की तरह प्रतीत होने लगी है। इस भाव को केंद्र में रखते हुए
अवनीश जी लिखते हैं-
सहयात्री के साथ नया
अनुबन्ध नहीं हो पाया
छतें, झरोखे, अलगनियों
के साथ नहीं रो पाया
पीड़ाओं का अंतर भी अब
है घनघोर उदासी
सही नहीं जाती है घर को
आँगन की बूढ़ी खाँसी।
महानगर की चकाचौंध युवा पीढ़ी को बहुत आकर्षित करती है, इसी आकर्षण के वशीभूत वे अपने गांव, खेत, खलिहान सबको छोड़कर शहर की भीड़ का हिस्सा बन जाते हैं, वास्तविकता में यह भीड़, ऐसे मानवों की भीड़ है जो सभ्यता, मानवता, सहानुभूति, अपनापन आदि बातों को भूलकर धनप्राप्ति हेतु एक दौड़ जी रहे हैं। यहाँ प्रेम और हमदर्दी के अभाव में सामाजिक मूल्य बार-बार आहत होते रहते हैं। इस शहरीपन पर चोट करते हुए अवनीश त्रिपाठी जी
लिखते हैं-
रात दिन बस पोपले मुख
बुदबुदाहट, आहटें
बिस्तरों से बात करती हैं
यहाँ खिसियाहटें
गेट दीवारें पड़ी सूनी
सड़क तू आह मत भर
यह रईसों का मुहल्ला है
जरा आवाज कम कर।
या
मेज, फाईलें, बिखरे कागज
फारवर्डिंग सिग्नेचर
कसे हुए दिन खाना-पीना
रुकना-पिछड़ापन
इंटरनेट, सोशल साईट से
रिश्ता-अपनापन
टी-वी- चेहरे/मुस्कानों के
महँगे विज्ञापन
ऐसा नहीं है कि अवनीश त्रिपाठी जी के गीत सिर्फ समस्याओं के शोकगीत ही हैं वे आज के भयावह जिंदगी के खुरदुरे यथार्थ का चित्रण करते हुए हाथ, हाथ को परचम बना देने की वकालत करते हैं। चारों तरफ फैली समस्याओं के जाल से घिरी मेहनतकश जनता को शोषण के विरुद्ध आवाज उठाने की प्रेरणा देते हैं। इनके नवगीत इस बात को सिद्ध करते हैं कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। ये नवगीत विभिन्न वर्गों में व्याप्त विषमताओं को उद्धृत करने में निश्चित रूप से सफल हुए हैं। ये सांप्रदायिक और परंपरावादी नहीं है। ये भावुक हैं और इनकी भावुकता निश्चल है जो यह आभास देती है कि यह नवगीतकार प्रकृति, मनुष्य और हर पल बदलते हुए देश काल के प्रति सजग है और अपने ढंग से लिखना चाहता है। इनका संघर्ष किसी और के साथ का
इंतजार नहीं करता है। तभी तो ये कहते हैं-
धुंध बहुत है
तुम छुप जाओ
हम मौसम से युद्ध करेंगे।
थियोडोर आडोर्नाे ने कहा है- ‘‘गीत की पुकार का मर्म वही समझ सकता है जो उसकी आत्मपरकता में अन्तर्निहित मानवीयता की आवाज सुन पाता है।’’ अवनीश जी के नवगीतों की आवाज- गंभीरता, पीड़ा और जटिलताओं का बोध उसे मानवीय संवेदनाओं से जोड़ता है। मानवीय मूल्यों की पक्षधरता, हार्दिक सहजता, गहरी सम्वेदनशीलता इनकी विशिष्ट पहचान है। ये अपने आस-पास होनेवाले हादसे, अमानवीय व्यवहार, दमन, दहन आदि को गीत के केंद्र में रखते हैं। ये जीवजगत की अत्यानिवार्य समस्याओं पर चिंतन करते हैं। ये अपने दायित्वों को भलीभाँति समझते हैं और शायद इसलिए ही विसंगतियों में दबे-फँसे इस समाज को मुक्ति की राह दिखाते नजर आते हैं। ये चिंतन और चिंता के गीतकार हैं। इनके गीतों में वसुंधरा एवं नभ दोनों को बचाने की चिंता है। शाश्वत मूल्यों की प्रतिष्ठा, नैतिकता की पुनर्स्थापना की चेष्टा इनके गीतों को अन्य से भिन्न करती है। इनके गीत लोक सामान्य भावभूमि पर मन-मन का रागात्मक संबंध स्थापित करते हैं जो वास्तविकता में गीत की अन्तश्चेतना भी है। ये जैसे भावों और विचारों को फटककर गीत प्रस्तुत करते हैं और अपने प्रयास से समाज को बदलना चाहते हैं।
यथा-
नभ तक पारदर्शिता वाली
अर्थ समझती सीढ़ी होगी
मिथ्याओं का परिवर्तन कर
बस यथार्थ की पीढ़ी होगी
मन में बैठा वहम मिटाकर
हर चेहरे को बुद्ध करेंगे।
पिछले कई दशकों से जहाँ एक तरफ नई कविता/गद्य कविता के हितैषी आलोचकों ने छंद को विशेष रूप से गीत/नवगीत को साहित्य की मुख्य धरा से वंचित रखने का कुकृत्य किया है वहीं दूसरी तरफ नवगीतकारों ने नवगीत की अपनी-अपनी परिभाषाएँ भी गढ़ ली हैं। प्रयोग और नवगीत का सौंदर्य साधन ही नवगीत की आत्मा कही जाने लगी है। तत्सम शब्दों का प्रयोग देखते ही नवगीतों को छायावादी गीत की संज्ञा दी जाने लगी है। तथ्य का महत्त्व दूसरे स्थान पर रह गया है।
अवनीश जी इस परिस्थिति को समझते हैं और लिखते हैं-
नवप्रयोगों की धरा पर
छटपटाता हूँ निरन्तर
गीत हूँ, नवगीत या जनगीत हूँ
क्या हूँ बता दो।
जैसा कि हम सब जानते हैं मानव इतिहास के प्राचीनतम साहित्य ऋग्वेद में मानव इतिहास के सर्वप्रथम गीत पाए गए हैं। जहाँ प्रकृति-वर्णन विभिन्न भावों की सूक्ष्म व्यंजनायें, नारी हृदय की कोमलता, दुर्बलता, काम-पिपासा, आशा, निराशा, विरह वेदना सभी गीत के रूप में ही अभिव्यक्त हुए हैं। रीतिकाल और छायावादी काल में भी लौकिक प्रेम के पर्याप्त और उच्चस्तरीय गीत प्राप्त होते हैं और क्यों न हाें? आिखर प्रेम जीवन का अविभाज्य/विकल्पहीन अंग है। इस बात को समझने, जानने वाले अवनीश त्रिपाठी जी प्रेम और सौंदर्य को भी अपने नवगीतों से विलग नहीं करते अपितु इसे प्रकृति से जोड़कर अमरता
प्रदान करने का प्रयास करते हैं। यथा-
नेह की पगडंडियों पर
फागुनी पदचाप सुन
झूमती डाली लता की
महमहाई रात भर।
या
झाँक रहीं किरणें कनखी से
इच्छाएँ मधुवन की
काजल ओढ़े नयन पढ़ रहे
परिभाषाएँ मन की
नई गुदगुदी उठकर कब से
पोर-पोर तक पहुँची
खिली मंजरी फुनगी चहकी
कली-कली इँगुराई।
अवनीश जी के नवगीत बड़ी सजगता के साथ विकल्पों की तलाश कर रहे हैं। ये किसी विशेष राजनीतिक या सामाजिक पक्ष की तरफदारी में खड़े नहीं हैं। ये तो शब्दों को बोझिल किये बिना विषमता के अहम् रूपी गुब्बारे में छोटी पिन चुभो देते हैं। इनमें समकालीन जीवन यथार्थ अत्यधिक सजग और संवेदनशील है। प्राकृतिक बिम्बों के अलावा ऐतिहासिक प्रतीकों के प्रयोग से भी ये समकालीन तथ्य को
बड़ी ही सफलता के साथ प्रस्तुत करते हैं। यथा-
फिर कलिंग को जीतें हम सब
फिर से भिक्षुक बुद्ध बनें
पाटलिपुत्र चलाएँ मिलकर
तथाकथित ही, शुद्ध बनें
चन्द्रगुप्त-पोरस बन जायें
अरे नवागत! आओ गायें
या
कितने रावण जलते हैं पर
सीताहरण नहीं रुक पाया
या
मछली अच्छी
मगरमच्छ या
बगुला भगत समर्पण
इस चिंतन में कई दिनों से
विक्रम हैं बेहाल
इस पुस्तक की मूल संवेदना की बात करें तो यह पुस्तक आधुनिक जनजीवन के अत्यंत करीब जान पड़ती है जो पाठकों को समस्याओं से अवगत कराती है तथा निदान का उपाय भी सुझाती है। यहाँ गीतकार ने समग्रता से अनुभवजन्य भावों को लेखनी से शब्दबद्ध किया है। अंत में मैं यही कहूंगा अवनीश जी के समय सहचर गीतों का काव्य बहुआयामी है। जिन आँखों से ये कटु यथार्थ तलाशते परखते हैं, उन्हीं आँखों में मीठे सपने भी पालते हैं। इस संकलन की सफलता हेतु इन्हें अग्रिम बधाई।

-राहुल शिवाय
उपनिदेशक-कविता कोश
मो-824029705

'दिन कटे हैं धूप चुनते' में नए बिम्बों-प्रतीकों की तलाश अदभुत है by डॉ शोभनाथ शुक्ल

समीक्षक-डॉ शोभनाथ शुक्ल
'दिन कटे हैं धूप चुनते ' कवि अवनीश त्रिपाठी का पहला नवगीत संग्रह है, पर नए बिम्बों-प्रतीकों की तलाश में इन्होंने अदभुत सफलता हासिल की है...।लोकजीवन के बीच अपनी अमिट छाप डालने वाले गीतों के लंबे जीवन के पीछे का प्रमुख कारण ही रहा है उसकी श्रम से जुड़ी लयात्मकता और जन भावनाओं की अभिव्यक्ति..।गीत अपनी पारंपरिक विरासत के साथ आज के नवगीत के यथार्थ तक आ पहुंचा है, जहां सम्पूर्ण सामाजिक प्रतिबद्धताओं, मानव मन के खोखलेपन और नए मुखौटों की ओट में संस्कारहीन होते जाते चेहरों की पहचान सम्भव हो पाई है जब कि पहले के मुकाविले आज जीवन की जटिलताएं अधिक बढ़ गई हैं, आर्थिक उदारीकरण और नए कारपोरेट जगत के आपसी ताने-बाने के बीच जिस कठिन और खंडित व्यक्तित्व की पहचान मुश्किल हो गई है ,वह आज के समय की सबसे बड़ी चुनौती रही है। आज के सजग लेखक की सजग लेखनी इस चुनौती का सामना यदि नहीं कर पा रही है तो इसे लेखकीय दायित्व के प्रति विफलता ही कहा-समझा जाएगा..। 'दिन कटे हैं धूप चुनते ' में संकलित अड़तालीस नवगीतों को पढ़ने के बाद यही लगता है अवनीश त्रिपाठी अपने समय को सिर्फ जी ही नहीं हैं बल्कि आततायी होते जाते समय-समाज की नब्ज पर अपनी पकड़ बनाने में कामयाब भी रहे हैं...। 
   कवि कर्म उत्तरदायित्व पूर्ण होता है, कारुणिक संवेगों का अहसास ही लोकमंगल के प्रति चिंतन को प्रेरित करता है.. यही चिंतन कवि के कवित्व को सार्वभौमिक बनाता है.. यहां कवि अवनीश त्रिपाठी अपनी कविता में मानवीय जीवन की त्रासद परिस्थितियों के साथ साथ जीवन के उल्लास और उमंग को भी आत्मसात करते हैं और जो कुछ भी अहितकारी है उस पर शब्द-हथौड़ों से चोट भी करते हैं ...।
  ये कविताएं आज के दौर की ताकत हैं जो प्रत्यक्षता मानव के साथ, अपने को, अपने आसपास को और व्यवस्था के जटिल तंत्र को पहचानने हेतु सिर्फ प्रशिक्षित ही नहीं करतीं बल्कि लोकधर्मी चेतना के साथ व्यवस्था से भिड़ने का आवाह्न भी करती हैं। आजादी के 70 वर्षों बाद भी मनुष्य को मनुष्य के रूप में प्रतिस्थापित न कर पाने की व्यवस्थागत विडंबनाओं और काइयाँपन को जिस तरह कवि अभिव्यक्ति देता है वह निसंदेह कविता की मूल आत्मा को छूने जैसा ही रहा है.......
' संबादों की अर्थी लेकर आई नई सदी, अंधियारों ने उजियारों के बिस्तर बांध दिए, 'मूल्य भी लाचार लेटा है नदी के घाट पर, ' देह की निष्ठा अभागिन जल उठी संकोच बुनते, ' हम रहे अनजान हरदम ही यहां हाथ के तोते अचानक उड़ गए, ' भीड़ संशय में खड़ी बतिया रही रास्ते चुपचाप जाके मुड़ गए जैसी पंक्तियां सुप्त नसों में भी रक्त प्रवाह तेज कर देती हैं।
   यह देखा जाना जरूरी होता है कि आखिर रचनाकार की रचना किसी पाठक को क्यों? किन कारणों से आकर्षित करती है। कथ्य का नयापन पाठक को आकर्षित तो करता ही है, बिम्बों के सटीक प्रयोग से जब शब्दों के व्यापक अर्थ खुलते हैं तो कविता की ओर पाठक खुद ब  खुद दौड़ पड़ता है... अवनीश बिल्कुल नए बिम्बों-प्रतीकों के जरिये घर के कोनों के संकेतों से पूरे देश-समाज को समझने की दृष्टि विकसित करते हैं.....
  'तनिक नहीं अफसोस तवे की रोटी भले जली, ' कोने हैं चुपचाप घरों के रोई गली-गली,  'सूखी आँतें पड़ी दरारें खेतों में मोटी गहरीं, ' मूल्य भी लाचार लेटा है नदी के घाट पर, ' सही नहीं जाती है घर को आंगन की बूढ़ी खांसी, 'अभिशापित नैतिकता के घर आओ हवन करें, मिट्टी महंगी बिकती लेकिन सस्ता हुआ जमीर,जैसी काव्य पंक्तियां हमें सोचने को विवश करती हैं।
   कविता उम्मीदें छोड़ नहीं सकती और न ही सत्ता सुख की गोद में बैठ कर अठखेलियाँ ही कर सकती है ..कविता प्रतिरोध को जन्म देती है और संघर्ष का आवाह्न करती है ..मनुष्य के पक्ष में जो कुछ भी सकारात्मक है, उसकी सार्थकता बनाये रखना कविता अपना धर्म समझती है....
'बेलगाम हो चुकी समस्या बौने संवेदन से, ' टुकड़े टुकड़े बांट रहे हम खुशियां भी वेमन से,  'रात कोरी कल्पना में दिन कटे हैं धूप चुनते, ' बोझिल चेहरा थका हुआ है सुख -दुख का अंतर ढ़ोने में,आदि पंक्तियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं...।
    सही अर्थों में यहां अवनीश त्रिपाठी जनकवि की भूमिका का निर्वाह करते हैं' दिन कटे हैं धूप चुनते '  के नवगीत आज के समय से संवाद करने में मुखर हैं। 'सतहों  पर मौसम की बेटी करती है अठखेली, झुके पेड़ सब नाप रहे हैं पानी की गहराई'...इसी गहराई को नापने की  जरूरत महसूसने वाला कवि प्रकृति,प्रेम और सौंदर्य के प्रति भी सजग है जो जीवन के लिए जरूरी है ' नेह  में गुलदाउदी रह-रह नहाई रात भर '  इसी का अप्रतिम उदाहरण है...,।
 उम्मीद की जानी चाहिए कि अवनीश त्रिपाठी की पहचान इन्हीं सार्थक जन अभिव्यक्ति के लिए किए गए सार्थक प्रयास के कारण ही बनेगी...और जो कुछ भी छूट रहा है -बाकी रह गया है यहां,अगले संग्रह में और अधिक सार्थक-बेहतर होकर आएगा....।
    
समीक्षक-
डॉ०शोभनाथ शुक्ल, 
सम्पादक-कथा समवेत
सुलतानपुर
9415136267

संवेदना के आलोक में 'दिन कटे हैं धूप चुनते' by मुकेश सिन्हा

समीक्षा:-दिन कटे हैं धूप चुनते (नवगीत संग्रह)
नवगीतकार:- अवनीश त्रिपाठी
प्रकाशक-बेस्ट बुक बडीज
पृष्ठ-128 सजिल्द मूल्य-₹200
समीक्षक:- मुकेश कुमार सिन्हा 
■■■
         नवगीत का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। फिर भी, नवगीत आज जन-जन में पैठ बना लिया है। सहजता, सरलता और इसके प्रवाह ने कवियों को नवगीत लिखने को उत्प्रेरित किया। गीत की तरह नवगीत भी प्यार और दुलार पाने की राह में है। आखिर कब तक इसे ‘किनारा’ किया जाता रहेगा? अवनीश त्रिपाठी जैसे साहित्य साधक की बदौलत नवगीत आज लोगों की जुबां पर है।
अवनीश त्रिपाठी का सतत् लेखन महज एक दशक से ही जारी है। कुछेक गीत और कविताओं का सृजन पहले हुआ था, लेकिन परिस्थितिवश कलम सोयी पड़ी थी। हाँ, परिवार में साहित्य का माहौल था। पिता स्व. रामानुज त्रिपाठी जी उच्च कोटि के साहित्यकार थे। अवनीश के प्रथम साहित्यिक गुरु उनके पिता ही थे, जिनकी स्मृतियांँ पुस्तक को समर्पित है। 
आदमी परिस्थितियों से विवश हो जाता है। पिता की वर्ष 2004 में मौत के बाद नवगीतकार का सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों के निर्वहण की वजह से कलम से दूरी बढ़ी, ऐसा होना स्वभाविक भी था। किंतु, पिता की प्रेरणा ने नवगीतकार अवनीश को फिर से लेखनी की ओर मोड़ा। उनकी अनवरत् काव्य साधना का प्रतिफल है-‘दिन कटे हैं धूप चुनते’। यह पुस्तक नवगीतों का संग्रह है। इसके पूर्व कविता संग्रह ‘शब्द पानी हो गये’ प्रकाशित है। मसलन, निरंतर लेखनी ने किताबों के सृजन का सिलसिला शुरू कर दिया है, जो शुभ संदेश है!
क्या धूप को चुना जा सकता है? आप प्रश्न पूछने वाले को पागल करार दे सकते हैं, आपकी मर्जी? लेकिन, शीर्षक कविता में मेहनतकशों के परिश्रम का चित्रण किया गया है। धूप को मेहनतकश ही चुनते हैं। गहलौर पहाड़ी का नाम सुना है न! आते-जाते लोगों को खूब चोटिल किया करती। लेकिन, धुनी दशरथ ने गहलौर पहाड़ी के सीना को महज छेनी-हथौड़ी से तोड़ डाली। तोड़ दिया पहाड़ी का गुरूर, पहाड़ी का अभिमान। दशरथ जैसे लोग धूप चुनते हैं-
दुःख हुए संतृप्त लेकिन
सुख रहे हर रोज घुनते
रात कोरी कल्पना में
दिन कटे हैं धूप चुनते।

अब किसी को किसी के दुख से मतलब नहीं रहा है। आप भूख से मरते हैं। आप चोटिल होते हैं, तो होते रहिए? क्या फर्क पड़ता है! आँखें भी सपने नहीं सजाती हैं, क्योंकि आँखें जानती हैं उसके सपनों का मर जाना ही लिखा है। मध्यम और गरीब वर्ग सपने देखकर करे भी तो क्या करे, वह बेचारा है! नवगीतकार को तकलीफ है-
द्वार देहरी 
सुबह साँझ सब
लगते हैं रूठे
दिन का थोड़ा दर्द समझती
ऐसी रात नहीं।
आगे-
अँधियारे का
रिश्ता लेकर
द्वार खड़ी रातें
ड्योढ़ी पर
जलते दीपक की
आस हुई अब कम।
 
गाँव में संवेदना है, गाँव में अपनापन है, गाँव में भोलापन है। गाँव में प्यार है, गाँव में दुलार है। फिर भी गाँव को दुत्कारती नई पीढ़ी शहर की ओर भाग रही है। शहर संवेदनशील नहीं है। बावजूद, शहर की चकाचौंध युवाओं को अपनी ओर खींच रहा है। युवा मन बहक रहा है। शहरी मादकता उसे पागल कर रही है। शहर के लोग प्रेमगीत नहीं गाते, वहाँ चौपाल नहीं लगता, वहाँ समस्याएँ नहीं सुलझतीं, वहाँ बच्चे मिट्टी में नही लोटते। वहाँ सन्नाटा है अपनापन का, सन्नाटा है प्यार और दुलार का। नवगीतकार आगाह करते हैं-
यह रईसों का
मुहल्ला है जरा
आवाज कम कर
गिट्टियों सीमेंट
वाले मन
हुए हैं ईंट पत्थर।

शहर लाख तरक्की कर ले, लेकिन गाँव से शहर गये लोग उबने लगते हैं। शहर में गाँव की तरह स्वच्छ हवा नहीं मिलती! नहीं मिलती मखमली घास, हरे-भरे खेत, दादी माँ के नुस्खे। हाँ, शहर में नागफनी मिलती है। मेज, फाइलें, बिखरे हुए कागज, कसा हुआ दिन, खाना-पीना, धुआँ, सड़क, ट्रक, शोर-गुल और कामकाजी रातें मिलती हैं, लेकिन प्यार का अभाव रहता है! नवगीतकार ने लिखा-
बूढ़ी खाँसी
गहरी सूनापन।

यह केवल पंक्ति नहीं है, बल्कि इसमें दर्द छिपा हुआ है। खाँसी बूूढ़ी हो गयी है, लेकिन कोई देखनहार नहीं है। किसे फुर्सत? शहर तो भागना पसंद करता है, वह ‘ठहरना’ नहीं चाहता। जबकि, गाँव ठहर-ठहर कर लोगों से पूछता है। कोई पीछे छूट न जाये, इसलिए सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करता है। शहर में गंवई संस्कृति में पले-बढे़ बुजुर्गोंं की सचबयानी है-‘अम्मा-बाबू’। शहर के घर में आँगन कहाँ? बैठकी कहाँ? अब तो फ्लैटों में जिंदगी सिमट गयी। बच्चांे के हाथ में मोबाइल है, जो व्यस्त हैं गेम खेलने में, चैटिंग करने में। दादा-दादी कोने में सिमटे पड़े हैं। कोई दो बोली बोल दे उनसे? यह भी नसीब नहीं। रोटी खाने वाला मुँह पिज्जा-बर्गर से कैसे संतुष्ट होगा भला? बुजुर्गों की हालत पर नवगीतकार की लेखनी सच में पाठकों को रूला देगी। यह कलम की सार्थकता है।
 पड़े हुए 
 घर के कोने में
टूटे-फूटे बर्तन जैसे
‘अम्मा-बाबू’
अपनी हालत
किससे बोलें, किसे बताएँ
सुबह-शाम
दिन रात दर्द से
टूट चुके हैं अम्मा-बाबू,
हाथ जोड़कर रोकर कहते
हे ईश्वर! अब हमें उठाएँ।

बचपन, जवानी, अधेड़, बुढ़ापा ये चार चरण हैं। बचपन जी-भर खेलने में गुजर जाता है। जवानी की अपनी मस्तानी चाल है। तीसरे चरण में शरीर साथ छोड़ना शुरू कर देता है और चौथे चरण में बीमारियाँ उभर आती हैं। नतीजतन, मानव शरीर में कष्ट होने लगते हैं। चिंताएँ बढ़ जाती हैं। कभी आवाज में तेजी होती, लेकिन एकदम मद्धिम पड़ जाती है। घर-आँगन, खिड़की-दरवाजे, जो जवानी में इंसान की खनक देख चुका है, वो बुढ़ापा का निसहाय रूप देखकर विचलित हो उठता है। बुजुर्गों की उपेक्षा, बुजुर्गों की दारुण-दशा पर नवगीतकार की लेखनी-
दीवारों, खिड़कियाँ
सीढ़ियाँ
लेने लगीं उबासी।
अंतर भी अब
है घनघोर उदासी
वसा विटामिन
रहित सदा ही
मिलता भोजन बासी
सही नहीं
जाती है घर को
आँगन की बूढ़ी खाँसी।

हम वर्तमान में होकर भी वर्तमान में नहीं रहते। वर्तमान में नहीं जीते, वर्तमान में साँस नहीं लेते। हमारी सोच पुरातन रहती है। अब भला कम्प्यूटर युग में ‘टाइपराइटर’ लिए बैठिएगा, तो पीछे छूट जाना लाजिमी है। कम्प्यूटर युग में ‘कम्प्यूटर’ बनना पड़ेगा। जरूरत है समय के साथ चलने की, समय के साथ दौड़ने की। समकालीन बनने की नसीहत जरूरी है-
चुभन
बहुत है वर्तमान में
कुछ विमर्श की बातें हों अब
तर्क-वितर्कों से पीड़ित हम
आओ! समकालीन बनें।
कथ्यांे को
प्रामाणिक कर दें
गढ़ दें अक्षर-अक्षर,
अँधकूप से बाहर निकले
थोड़ा और नवीन बनें

हम मशीन हो गये हैं। मशीनीकरण में हम जी रहे हैं। मशीनी युग में मशीन न बने, तो पीछे छूट जायेंगे, यथार्थ है। मशीनी युग में इंसान के शब्द कोश से नैतिकता, वैचारिकता, इंसानियत जैसे शब्दों का गायब होना चिंता का विषय है। अब दुख पर चर्चा नहीं होती, कोई नहीं पूछता-इतना अपराध क्यों है? पेट का दर्द कोई समझना भी नहीं चाहता। ऐसे में नवगीतकार ने करारा व्यंग्य किया है-
युग मशीनों का
हुआ जब
भूख की बातें विफल हैं।

दिन हमें विचलित करता है। रातें हमें डरा रही है। डर के वातावरण में हम जी रहे हैं। साँस पर गहरा पहरा है। हम ‘तीसरे नेत्र’ की गिरफ्त में हैं। हम मछली से दोस्ती नहीं कर सकते हैं और मगरमच्छ तो मगरमच्छ ठहरा। मतलब, भरोसा नाम की चीज ही नहीं है। कई प्रश्न हैं, जो हमें खाये जा रही है। अपनेपन में भी स्वार्थ की बू आ रही है। नवगीतकार ने लिखा-
माँस नोचते
लाशों के 
व्यापारी सुबहो-शाम

आगे-
गली नुक्कड़ों
चौराहों पर
सहम रही हैं रातें
आगे-
चीख रहे हैं भरी भीड़ में
ममता, दया, स्नेह, आँचल सब

दुनिया इतनी नासमझ नहीं है। उसे मालूम है कि कौन मौत का सौदागर है। कौन जख्म पर नमक डालने को तैयार बैठा है? लेकिन, क्रांति क्यों नहीं? क्यों चुप्पी साधे हुए लोग हैं? बंजर धरती को लहलहाने वाले मौन क्यों हैं? बस्तियों में आखेट का भया क्यों? रातें लंबी क्यों? जानलेवा हवाओें से नवगीतकार बेचैन हैं और लिखते हैं-
कथनी करनी के
अंतर को समझ गये जो
नए चाँद-सूरज भी
क्या अब निकलेंगे?
आगे-
शीतयुद्धों में झुलसती
जा रहीं संवेदनायें
कब उठेगा शोर, किस दिन?
चुप्पियों के मरुस्थल में
बड़बड़ाती हैं हवाएँ
कब उठेगा शोर, किस दिन?

गीतकार उलाहना देता है। कहता है रहनुमा से, क्यों चुप रहा जाये? सपनों का महल ढह रहा है। आशाएँ खंडित हो रहीं हैं। निराशाओं के जंगल में आखिर कब तक सिसकते रहेंगे? गरीब मारा-मारा फिर रहा है, मड़ई के लिए, रोटी के लिए, अंगा के लिए। फिर भी सूख की चादर मयस्सर नहीं। समाज की चुप्पी पर कलम की उलाहना-
मीट्रिक टन-क्विंटल ने आखिर
कुचल दिया माशा-रत्ती को
चुप बैठो, मत कहो किसी से
हत्यारी हो गईं हवायें
नोच रहीं पत्ती-पत्ती को
चुप बैठो, मत कहो किसी से।

कलमकार चुप नहीं बैठ सकता, उसकी कलम खामोश नहीं रह सकती। कलम पैदा ही हुई है सत्ता से टकराने की खातिर। उसकी कलम डरती नहीं, बमों के गोलों से, बंदूक की गोलियों से, बल्कि खुलेआम कहती है-
धूल फाँक हम भूख मिटाते
प्यास बुझाते आँसू से जब
गीत पनपने लगता है तब।
शोषित चीखें खिसियाहट में
सत्ता से टकरातीं हैं जब
गीत उपजने लगता है तब।

गरीब ज्यादा नहीं माँगता? उसके पास सोचने की बहुत ज्यादा संभावना भी नहीं है। वह तो चाहता है कि उसकी मड़ई बची रहे, उसे और उसके परिवार को दो जून की रोटी मिल जाये, बस। दो जून की रोटी के लिए ही वो प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ता है। गर्म हवाओं को पराजित करने के क्रम में कई बार वो खुद जलता है, लेकिन पेट के लिए उसका लड़ना जरूरी है और मजबूरी भी। किसान को कौन नहीं छलता? नीचे के हाकिम से लेकर ऊपर के भगवान तक। गरीब और बेबसी पर नवगीतकार की कलम-
सूखी आँतें
खेतों में भी
पड़ीं दरारें मोटी
पेट-पीठ
में फर्क नहीं कुछ
पिचकी देह, पोपला मुखड़ा।

चिंता करने की परंपरा रही है। चिंतन करना भी जरूरी है, क्योंकि चिंतन करने से ही असफल पुरुष सीख लेता है। घुड़सवार लक्ष्य तक पहुुँच पाता है, बिना रूकावट वैतरणी पार। भारत आध्यात्मिक देश है। ऋषि-मुनियों का गढ़ रहा है आर्यावर्त में। तब परिवेश पर चर्चा होती थी, चिंतन होता। लेकिन अब चिंता करे कौन? चिंतन भी बाजारवाद का शिकार हो गया है। स्थिति सामने है? बाजारी चिंतन से मानवीय हित पर गहरा आघात पहुँच रहा है। सच कहा नवगीतकार ने-
मार्केट वैल्यू
वाले ही अब
संवादों के मीटर
चिंतन भी तो
अर्थवाद से
हो बैठा इंस्पायर।

हम मंगल और मिसाइल की बातें करते हैं। करनी भी चाहिए, लेकिन जड़ को छोड़कर नहीं। हम जड़ को छोड़ रहे हैं। अपनी संस्कृति, अपना संस्कार भूल गये हैं। भारत की ऐसी संस्कृति रही है कि इसका लोग अनुसरण करते हैं, लेकिन वर्तमान पीढ़ी ‘मॉड’ हो गयी है। उसे रोटी पसंद नहीं, भात नहीं खाता, उसका पेट भरता है पिज्जा-बर्गर और चाउमिन से। अब चिट्ठी कौन लिखता? बुजुर्गों से ‘अक्षरज्ञान’ कौन पाता? बुझा-बुझौव्व्वल, बड़ों की सीख के अब मायने कहाँ? ‘भीतर है पुरवाई’ के माध्यम से नवगीतकार ने भारतीय संस्कृति पर संकट के मंडराते बादल को रेखांकित करने की ईमानदार कोशिश की है। कहा-
पीढ़ी नई नहीं सुनती अब
ज्ञान, ध्यान की बातें
अंतर्जाल, फेसबुक, ट्वीटर
की गहरी परछाई
तकनीकी युग में नैतिकता
होती हवा हवाई
पश्चिम की आँधी शहरों से
गाँवांे तक है आई।

कवि की पीड़ा-
संस्कार की भाषा बदली
परम्परा की थाती
नूतनता की कड़ी बोलियाँ
कूट रही हैं छाती।

मोबाइल से तरुणाई खो रही है। चलचित्रों की ओछी हरकत से किशारों का मन बदल रहा है। शर्म और संकोच के भाव खत्म हो गये। समस्याएँ बेलगाम हो गयीं हैं। खुशियाँ भी टुकड़ों-टुकड़ों में बँटा है। ऐसी स्थिति में उम्मीद की किरण दिखायी नहीं देती। नवगीतकार चिंतित होकर कहता है-
बढ़ती सीलन बूढ़ा सूरज
कैसे कितना सोखे।

भारत लोकतांत्रिक देश है। यहाँ सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लेकिन, लोकतंत्र के बाद भी लोक से तंत्र दूर हो गया है। यह सबसे बड़ी विडम्बना है कि जनता द्वारा चुने गये जनप्रतिनिधि भी जनता से मुँह चुराने लगे हैं। उनके वादे खोखले साबित हो रहे हैं। ऐसे में नाराजगी स्वभाविक है। गीतकार साफ-साफ लिखते हैं-
मिट्टी महँगी बिकती लेकिन
सस्ता हुआ जमीर।
समस्याओं पर साहेब की उपेक्षा पर व्यंग्य-
पर कानों में तेल डालकर
सोया हुआ वजीर।

किस पर भरोसा किया जाये। हर मोड़ पर छलने को हाथ तैयार खड़ा है। राजनीति...न बाबा न। उस पर भरोसा कैसे? व्यवस्था, अजी जनाब उसकी भी हालत लचर है। ऐसे में गरीब अपनी फरियाद लेकर कहाँ जाये? धरती के इंसान से जब भरोसा उठ जाता है, तो ऊपर बैठे भगवान से आशा टिक जाती है। राम-रमैया बचायेंगे, यह तो अलग प्रश्न है, लेकिन यह पीड़ा है उस गरीब की, जो अच्छे दिन के इंतजार में पता नहीं कब से छला रहा है।
टूट गई
खटिया की पाटी
बैठे, सोये किस पर
अब उधार
की बात करे क्या
गिरवी छानी-छप्पर।
आगे-
केवल धन के उद्बोधन से
विस्फोटित हैं सभी दिशाएँ
शोषित का अवहेलना करतीं
भाव स्नेह की सभी ऋचाएँ
आगे-
खाली पेट रहेंगे सोते
किस्सों में है
राजा रानी।

नवगीतकार व्यथाओं से दुखी हैं। पता नहीं कब से व्यथा की वजह से आँखों में पानी है, लेकिन व्यथा है कि छूटने का नाम ही नहीं ले रही। रावण प्रतीक है बुराई का। हर साल हम रावण के पुतले जलाकर इठलाते हैं। लेकिन क्या घर-घर में राम है? आज इंसानी शक्ल में रावण गली-गली नहीं, बल्कि घर की चहारदीवारी के भीतर ठहाका मार रहा है। नवगीतकार की वेदना-
कितने रावण जलते हैं पर
सीताहरण नहीं रूक पाया,
असुरों के विकराल आचरण
से असहज विकृत काया।

दुनिया मौन है। ऐसे में चिल्लाने से क्या फायदा। नवगीतकार ने लिखा-
बोलते ही
रह गए हम
मंच पर संवाद केवल।

नवगीतकार चित्र गढ़ना चाहता है, लेकिन वो गढ़े कैसे? उसके सामने विवशता है। ईंट अहंकार लिये बैठा है और हर बार ब्रश को मात देने की जुगत में हैं। यहाँ ईंट को प्रतीक के तौर पर रखा गया है। समाज की दशा ऐसी ही है। अहंकार चहूँओर है। ऐसे में स्वस्थ और सबल समाज की परिकल्पना बेमानी ही होगी।
बेड़ी जकड़ी हुई
पाँवों में
कैसे पाँव बढें़?
ऊबड़-खाबड़
दीवारों पर
कैसे चित्र गढ़ें?

इंसान का हमेशा दुख से वास्ता रहता है। दुख ही सच्चा साथी है। सुख तो झलक दिखला जा है। झलक दिखलाकर सुख चला जाता है। आदमी के पाँव में इतने काँटे चूभे होते हैं कि उसे पता ही नहीं चलता कि कब उसके पाँव मखमली चादर पर पड़े हैं।
दुख की पाती पढ़ते-पढ़ते
सुख आया कब पता नहीं
अक्षर-’अक्षर जीवन का मैं
पढ़ पाया कब पता नहीं

साहित्य को साधना चाहिए। जो जितना सधा, उसकी लेखनी उतनी ही प्रखर हुई। ‘सोशल मीडिया’ के प्रभाव से कथित तौर पर लेखकों और कवियों की संख्या बढ़ी है। लेकिन, साहित्य के नाम पर फास्ट फुड रचनाएँ परोसी जा रहीं हैं। कविता में न शिल्प है, न कथ्य, न छंद हैं, न मात्रा। बस जो मर्जी आये, लिख दिये और चिपका दिये सोशल मीडिया पर। आह, वाह, बहुत अच्छा जैसी प्रतिक्रिया पाकर लोग खुद को महाकवि तक समझने लगते हैं। साहित्य क्या है? काव्य क्या है? छंद क्या है? इन चीजों की जानकारी नहीं है, लेकिन धड़ल्ले से रचनाएँ रचीं जा रहीं हैं। नवगीतकार ने साहित्य के घायल होने की स्थिति में पूछा-कहाँ गए सब ज्ञानी?
आज तलक
साहित्य जिन्होंने
कभी नहीं देखा,
उनके हाथों
पर उगती अब
कविताओं की रेखा।

साहित्यकार साहित्य के माध्यम से समाज की बेहतरी चाहता है। उसकी चाहत रहती है कि समाज ज्ञानवान हो! समाज बुद्धिमान हो! समाज में समस्याएँ नहीं, बल्कि विकास हो! नवगीतकार इंसानी मन में बैठे वहम को मिटाना चाहता है, ताकि हर चेहरा ‘बुद्ध’ हो जाये। जो कुहरा आसमान में है, उसको ‘शुद्ध’ करना चाहता है। उसे खुद पर भरोसा है, इसलिए खुलेआम कहता है-
धुंध बहुत है
तुुम छुप जाओ
हम मौसम से युद्ध करेंगे।

साहित्यकार यह कहते रहते हैं कि जब तक कुछ लिख न लूँ, नींद नहीं आती! दिल को चैन नहीं मिलता। मतलब, जिंदगी बेरंग-सी हो जाती है लेखनी के बगैर। सच है कि जब हृदय वेदनाओं से भर उठता है, तो मन को सुकून तभी मिलता है, जब कुछ लिख लिया जाये! हर साहित्यकार की पीड़ा एक सी है। नवगीतकार ने कविता को शुक्रिया कहा और कहा-‘आज तुम्हारी वजह से मेरे जीवन में गीत हैं!’
हर बसन्त था मरुथल जैसा
नीरवता कलरव की प्यासी
थिरकन चहकन भूल गया मैं
भरी भीड़ में गहन उदासी।
हे कविता!
जीवन्त जीवनी
तुमने मुझको गीत बनाया।
छूकर बुझते
अहसासों को
तुुमने मन खंजन चहकाया।

गीत कर्णप्रिय हैं। घर-घर में गीत गाये जाते हैं। लेकिन साहित्य के कथित पुरोधाओं ने इसे मुख्य धारा से अलग करने की कोशिश की। उनके अपने तर्क थे। यह मान्यता थी कि यह गंभीर साहित्य नहीं है। फिर साहित्य के क्रांतिवीरों ने नवगीत रचकर उनलोगों के मुँह पर ताला जड़ा। लेकिन, आज भी वैसा तबका नाक-भौं सिकोड़ता है। वैसे लोगों से नवगीतकार पूछता है-
लेखनी की 
पीर हूँ या
द्वन्द्व हूँ, प्रतिरोध हूँ,
हाशिये पर
हूँ टँगा या
पृष्ठ का प्रतिशोध हूँ?
नव प्रयोगों की धरा पर
छटपटाता हूँ निरन्तर
गीत हूँ, नवगीत हूँ
या जनगीत हूँ
क्या हूँ बता दो?

गीतकार की जिद है-
अपनी ढपली पर हरदम ही
अपने दुखड़े गाता हूँ
राग बेसुरा बुरा भले हो
फिर भी गीत सुनाता हूँ।

उत्कृष्ट शब्दों के धनी अवनीश त्रिपाठी जी ने अंतर्मन से नवगीत रचे हैं। अंतर्मन से रची रचनाएँ ज्यादा पुष्ट होती हैं। लेकिन एक सवाल है कि क्या वाक्य को और सरल या सहज नहीं बनाया जा सकता था? हाँ, नवगीतों में प्रयोग किये गये शब्दों से साहित्यिक पाठकों को नये-नये शब्द मिलेंगे? लेकिन, उन्हें शब्दकोश में अर्थ ढूंढने पड़ेंगे। गीत और नवगीत में सरल और सहज शब्द का प्रयोग आवश्यक है, ताकि उसे पढ़कर एक बार में ही सहजता से समझा जा सके। 
अरे नवागत! आओ गायें।
कुहरा छाँटे, धूप उगायें।।

समीक्षक:-
✍️मुकेश कुमार सिन्हा
                बिहार

समीक्षा: 'दिन कटे हैं धूप चुनते' हौसले से स्वप्न बुनते by संजीव वर्मा सलिल

'दिन कटे हैं धूप चुनते' हौसले से स्वप्न बुनते 
.....
धरती के 
मटमैलेपन में 
इंद्रधनुष बोने से पहले,
मौसम के अनुशासन की 
परिभाषा का विश्लेषण कर लो। 

साहित्य की जमीन में गीत की फसल उगाने से पहले देश, काल, परिस्थितियों और मानवीय आकांक्षाओं-अपेक्षाओं के विश्लेषण का आव्हान करती उक्त पंक्तियाँ गीत और नवगीत के परिप्रेक्ष्य में पूर्णत: सार्थक हैं। तथाकथित प्रगतिवाद की आड़ में उत्सवधर्मी गीत को रुदन का पर्याय बनाने की कोशिश करनेवालों को यथार्थ का दर्पण दिखाते नवगीत संग्रह "दिन कटे हैं धूप चुनते" में नवोदित नवगीतकार अवनीश त्रिपाठी ने गीत के उत्स "रस" को पंक्ति-पंक्ति में उँड़ेला है। मौलिक उद्भावनाएँ, अनूठे बिम्ब, नव रूपक, संयमित-संतुलित भावाभिव्यक्ति और लयमय अभिव्यक्ति का पंचामृती काव्य-प्रसाद पाकर पाठक खुद को धन्य अनुभव करता है। 

स्वर्ग निरंतर उत्सव में है  
मृत्युलोक का चित्र गढ़ो जब,
वर्तमान की कूची पकड़े 
आशा का अन्वेषण कर लो। 

मिट्टी के संशय को समझो 
ग्रंथों के पन्ने तो खोलो,
तर्कशास्त्र के सूत्रों पर भी
सोचो-समझो कुछ तो बोलो।  
हठधर्मी सूरज के सम्मुख 
फिर तद्भव की पृष्ठभूमि में 
जीवन की प्रत्याशावाले
तत्सम का पारेषण कर लो।  

मानव की सनातन भावनाओं और कामनाओं का सहयात्री गीत-नवगीत केवल करुणा तक सिमट कर कैसे जी सकता है? मनुष्य के अरमानों, हौसलों और कोशिशों का उद्गम और परिणिति डरे, दुःख, पीड़ा, शोक में होना सुनिश्चित हो तो कुछ करने की जरूरत ही कहाँ रह जाती है? गीतकार अवनीश 'स्वर्ग निरंतर उत्सव में है' कहते हुए यह इंगित करते हैं कि गीत-नवगीत को उत्सव से जोड़कर ही रचनाकार संतुष्टि और सार्थकता के स्वर्ग की अनुभूति कर सकता है। 

नवगीत के अतीत और आरंभिक मान्यताओं का प्रशस्तिगान करते विचारधारा विशेष के प्रति  प्रतिबद्ध गीतकार जब नवता को विचार के पिंजरे में कैद कर देते हैं तो "झूमती / डाली लता की / महमहाई रात भर" जैसी जीवंत अनुभूतियाँ और अभिव्यक्तियाँ गीत से दूर हो जाती हैं और गीत 'रुदाली' या 'स्यापा' बनकर जिजीविषा की जयकार करने का अवसर न पाकर निष्प्राण हो जाता है। अवनीश ने अपने नवगीतों में 'रस' को मूर्तिमंत किया है-

गुदगुदाकर 
मंजरी को 
खुश्बूई लम्हे खिले, 
पंखुरी के 
पास आई 
गंध ले शिकवे-गिले,
नेह में 
गुलदाउदी 
रह-रह नहाई रात भर। 

कवि अपनी भाव सृष्टि का ब्रम्हा होता है। वह अपनी दृष्टि से सृष्टि को निरखता-परखता और मूल्यांकित करता है। "ठहरी शब्द-नदी" उसे नहीं रुचती। गीत को वैचारिक पिंजरे में कैद कर उसके पर कुतरने के पक्षधरों पर शब्दाघात करता कवि कहता है-

"चुप्पी साधे पड़े हुए हैं
कितने ही प्रतिमान यहाँ
अर्थ हीन हो चुकी समीक्षा 
सोई चादर तान यहाँ 

कवि के  मंतव्य को और अधिक स्पष्ट करती हैं निम्न पंक्तियाँ- 

अक्षर-अक्षर आयातित हैं 
स्वर के पाँव नहीं उठते हैं 
छलते संधि-समास पीर में 
रस के गाँव नहीं जुटते हैं। 
अलंकार ले 
चलती कविता 
सर से पाँव लदी। 

अलंकार और श्रृंगार के बिना केवल करुणा एकांगी है। अवनीश एकांगी परिदृश्य का सम्यक आकलन करते हैं -

सौंपकर 
थोथे मुखौटे 
और कोरी वेदना,
वस्त्र के झीने झरोखे 
टाँकती अवहेलना,
दुःख हुए संतृप्त लेकिन 
सुख रहे हर रोज घुनते। 

सुख को जीते हुए दुखों के काल्पनिक और मिथ्या नवगीत लिखने के प्रवृत्ति को इंगित कर कवि कहता है- 
भूख बैठी प्यास की लेकर व्यथा 
क्या सुनाये सत्य की झूठी कथा 
किस सनातन सत्य से संवाद हो 
क्लीवता के कर्म पर परिवाद हो 

और 

चुप्पियों ने मर्म सारा  
लिख दिया जब चिट्ठियों में, 
अक्षरों को याद आई
शक्ति के संचार की

अवनीश के नवगीतों की कहन सहज-सरल और सरस होने के निकष पर सौ टका खरी है। वे गंभीर बात भी इस तरह कहते हैं कि वह बोझ न लगे -

क्यों जगाकर 
दर्द के अहसास को 
मन अचानक मौन होना चाहता है? 

पूर्वाग्रहियों के ज्ञान को नवगीत की रसवंती नदी में काल्पनिक अभावों और संघर्षों से रक्त रंजीत हाथ दोने को तत्पर देखकर वे सजग करते हुए कहते हैं- 

फिर हठीला 
ज्ञान रसवंती नदी में 
रक्त रंजित हाथ धोना चाहता है।  

नवगीत की चौपाल के वर्तमान परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए वे व्यंजना के सहारे अपनी बात सामने रखते हुए कहते हैं कि साखी, सबद, रमैनी का अवमूल्यन हुआ है और तीसमारखाँ मंचों पर तीर चला कर अपनी भले ही खुद ठोंके पर कथ्य और भावों के नानी याद आ रही है- 

रामचरित की 
कथा पुरानी 
काट रही है कन्नी 
साखी-शबद 
रमैनी की भी 
कीमत हुई अठन्नी 

तीसमारखाँ 
मंचों पर अब 
अपना तीर चलाएँ ,
कथ्य-भाव की हिम्मत छूटी 
याद आ गई नानी। 

और 

आज तलक 
साहित्य  जिन्होंने 
अभी नहीं देखा है,
उनके हाथों 
पर उगती अब 
कविताओं की रेखा।  

नवगीत को दलितों की बपौती बनाने को तत्पर मठधीश दुहाई देते फिर रहे हैं कि नवगीत में छंद और लय की अपेक्षा दर्द और पीड़ा का महत्व अधिक है। शिल्पगत त्रुटियों, लय भंग अथवा छांदस त्रुटियों को छंदमुक्ति के नाम पर क्षम्य ही नहीं अनुकरणीय कहने वालों को अवनीश उत्तर देते हैं- 

मात्रापतन 
आदि दोषों के
साहित्यिक कायल हैं 
इनके नव प्रयोग से सहमीं 
कवितायेँ घायल हैं 
गले फाड़ना 
फूहड़ बातें 
और बुराई करना,
इन सब रोगों से पीड़ित हैं 
नहीं दूसरा सानी। 

'दिन कटे हैं धूप चुनते' का कवि केवल विसंगतियों अथवा भाषिक अनाचार के पक्षधरताओं को कटघरे में नहीं खड़ा करता अपितु क्या किया जाना चाहिए इसे भी इंगित करता है। संग्रह के भूमिकाकार मधुकर अष्ठाना भूमिका में लिखते हैं "कविता का उद्देश्य समाज के सम्मुख उसकी वास्तविकता प्रकट करना है, समस्या का यथार्थ रूप रखना है। समाधान खोजना तो समाज का ही कार्य है।' वे यह नहीं बताते कि जब समाज अपने गीतकार के माध्यम से समस्या को उठाता है तो वही समाज उसी गीतकार के माध्यम से समाधान क्यों नहीं बता सकता? समाधान, उपलब्धु, संतोष या सुख के आते ही सृजन और सृजनकार को नवगीत और नवगीतकारों के बिरादरी के बाहर कैसे खड़ा किया जा सकता है?  अपनी विचारधारा से असहमत होनेवालों को 'जातबाहर' करने का अधिकार किसने-किसे-कब दिया? विवाद में न पड़ते हुए अवनीश समाधान इंगित करते हैं- 

स्वप्नों की 
समिधायें लेकर 
मन्त्र पढ़ें कुछ वैदिक,
अभिशापित नैतिकता के घर 
आओ, हवन करें। 

शमित सूर्य को 
बोझिल तर्पण 
आयासित संबोधन,
आवेशित 
कुछ घनी चुप्पियाँ 
निरानंद आवाहन। 
निराकार 
साकार व्यवस्थित 
ईश्वर का अन्वेषण,
अंतरिक्ष के पृष्ठों पर भी 
क्षितिज चयन करें। 

अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए नवगीतकार कहता है- 

त्रुटियों का 
विश्लेषण करतीं
आहत मनोव्यथाएँ  
अर्थहीन वाचन की पद्धति 
चिंतन-मनन करें। 
और 
संस्कृत-सूक्ति 
विवेचन-दर्शन 
सूत्र-न्याय संप्रेषण 
नैसर्गिक व्याकरण व्यवस्था 
बौद्धिक यजन करें। 

बौद्धिक यजन की दिशा दिखाते हुए कवि लिखता है -

पीड़ाओं 
की झोली लेकर 
तरल सुखों का स्वाद चखाया...
 .... हे कविता!
जीवंत जीवनी 
तुमने मुझको गीत बनाया। 

सुख और दुःख को धूप-छाँव की तरह साथ-साथ लेकर चलते हैं अवनीश त्रिपाठी के नवगीत। नवगीत को वर्तमान दशक के नए नवगीतकारों ने पूर्व की वैचारिक कूपमंडूकता से बाहर निकालकर ताजी हवा दी है। जवाहर लाल 'तरुण', यतीन्द्र नाथ 'राही, कुमार रवींद्र, विनोद निगम, निर्मल शुक्ल, गिरि मोहन गुरु, अशोक गीते, संजीव 'सलिल', गोपालकृष्ण भट्ट 'आकुल', पूर्णिमा बर्मन, कल्पना रामानी, रोहित रूसिया, जयप्रकाश श्रीवास्तव, मधु प्रसाद, मधु प्रधान, संजय शुक्ल, संध्या सिंह, धीरज श्रीवास्तव, रविशंकर मिश्र, बसंत कुमार शर्मा, अविनाश ब्योहार आदि के कई नवगीतों में करुणा से इतर वात्सल्य, शांत, श्रृंगार आदि रसों की छवि-छटाएँ ही नहीं दर्शन की सूक्तियों और सुभाषितों से सुसज्ज पंक्तियाँ भी नवगीत को समृद्ध कर नई दिशा दे रही है। इस क्रम में गरिमा सक्सेना और अवनीश त्रिपाठी का नवगीतांगन में प्रवेश नव परिमल की सुवास से नवगीत के रचनाकारों, पाठकों और श्रोताओं को संतृप्त करेगा।  

वैचारिक कूपमंडूकता के कैदी क्या कहेंगे इसका पूर्वानुमान कर नवगीत ही उन्हें दशा दिखाता है-
चुभन 
बहुत है वर्तमान में 
कुछ विमर्श की बातें हों अब,
तर्क-वितर्कों से पीड़ित हम 
आओ समकालीन बनें। 

समकालीन बनने की विधि भी जान लें-

कथ्यों को 
प्रामाणिक कर दें 
गढ़ दें अक्षर-अक्षर,
अंधकूप से बाहर निकलें 
थोड़ा और नवीन बनें। 

'दर्द' की देहरी लांघकर 'उत्सव' के आँगन में कदम धरता नवगीत यह बताता है की अब परिदृश्य परिवर्तित हो गया है- 

खोज रहे हम हरा समंदर,
मरुथल-मरुथल नीर,
पहुँच गए फिर, चले जहाँ से, 
उस गड़ही के तीर  .

नवगीत विसंगतियों को नकारता नहीं उन्हें स्वीकारता है फिर कहता है- 
चेत गए हैं अब तो भैया 
कलुआ और कदीर। 

यह लोक चेतना ही नवगीत का भविष्य है। अनीति को बेबस ऐसे झेलकर आँसू बहन नवगीत को अब नहीं रुच रहा। अब वह ज्वालामुखी बनकर धधकना और फिर आनंदित होने-करने के पथ पर चल पड़ा है -

'ज्वालामुखी हुआ मन फिर से
आग उगलने लगता है जब  
गीत धधकने लगता है तब   
और 
खाली बस्तों में किताब रख 
तक्षशिला को जीवित कर दें 
विश्व भारती उगने दें हम 
फिर विवेक आनंदित कर दें
परमहंस के गीत सुनाएँ 

नवगीत को नव आयामों में गतिशील बनाने के सत्प्रयास हेतु अवनीश त्रिपाठी बधाई के पात्र हैं। उन्होंने साहित्यिक विरासत को सम्हाला भर नहीं है, उसे पल्लवित-पुष्पित भी किया है। उनकी अगली कृति की उत्कंठा से प्रतीक्षा, मेरा समीक्षक मन ही नहीं वरन पाठक भी करेगा। 

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[संपर्क: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष ७९९९५५९६१८, ईमेल : salil.sanjiv@gmail.com]

[कृति विवरण : दिन कटे हैं धूप चुनते, नवगीत संग्रह, अवनीश त्रिपाठी, प्रथम संस्करण २०१९, आईएसबीएन ९७८९३८८९४६२१६- बेस्ट बुक बडीज टेक्नोलॉजीस प्रा. लि. नई दिल्ली, कृतिकार संपर्क - ग्राम गरएं, जनपद सुल्तानपुर २२७३०४,
मो:- 9451554243]

मंगलवार, 22 जून 2021

नवगीत-अकाज के दिन - गरिमा सक्सेना

गरिमा समकालीन गीत, नवगीत के परिदृश्य में एकदम नये नामों में से एक है। पिछले तीन वर्षों में शायद सबसे अधिक पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली गीतकार कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इन वर्षों में उन्होंने लगभग हर मुद्दे पर गीत लिखे हैं। एक तरफ जहाँ गीत का एक संसार पूराने ढांचे को प्रयोगिक नवता देने में जुटा है वहीं गरिमा जी भोगे और दिखाई देने वाले यथार्थ को लिख रही हैं। उनके गीतों में विवधता के साथ नवता की तलाश भाषा के यूरोपीकरण तक दम नहीं तोड़ती.. वह तो विषयगत कुछ नया करने का सोचती हैं। समस्या को समाधान तक ले जाना, उसकी तलाश भी इसी नवता का अंग है।
प्रस्तुत गीतों में कुछ गीत नवगीत के पुराने ढर्रे के हैं जो स्थिति का शोकगायन कर रहे हैं.. वहीं कई गीतों में चेतना और बदलाव की आकांक्षा भी है.. उनके गीतों में.. परदे और डर का लिबास.. स्त्री और यौन शोषण को कितने सलीके से अभिव्यक्त कर रहे हैं.. झूठी क्रांतियाँ ललकार रही हैं..  वो पूछ रही हैं कब तक इन पत्थर के झूठे देवताओं पर चढ़ावा चढ़ाते रहोगो..  क्योंकि ये बरगद तुम्हें पनपने नहीं देंगे अपनी छांव में....-राहुल शिवाय

जठरानल के हिस्से आये 
हैं अकाज के दिन

दौड़ रहीं प्रतिभाएँ
फाइल ले दफ्तर-दफ्तर
कितने सपनों को सलीब-सा
ढोतीं काँधे पर

सदियों जैसे बीत रहे हैं 
जीवन के पल-छिन

लोकतंत्र भी भुना रहा है
बस आशाओं को
सुखमय, अच्छे दिन वाली ही
दंतकथाओं को

आँखों की जेबों से रिस-रिस 
टपक रहे दुर्दिन

सरकारी रिक्तियाँ अधूरी,
झूठे हैं वादे
सुविधाओं के बल पर आगे
निकल रहे प्यादे

ऊपर से शिक्षा-ऋण की 
युवकों को गड़ती पिन

-गरिमा सक्सेना