सोमवार, 28 जून 2021

मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों से संवाद की सार्थक अभिव्यक्ति 'चुप्पियों को तोड़ते हैं' by अवनीश त्रिपाठी

मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक सरोकारों से संवाद की सार्थक अभिव्यक्ति 'चुप्पियों को तोड़ते हैं'
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नवगीत संग्रह- 'चुप्पियों को तोड़ते हैं'
नवगीतकार- योगेन्द्र प्रताप मौर्य (9454931667)
पृष्ठ-124      मूल्य-₹150 (पेपरबैक)
बोधि प्रकाशन,जयपुर मो. 9829018087
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        "स्वप्नजीवी गीत सत्यमवद हुए,आत्मनेपद थे परस्मैपद हुए" स्मृतिशेष देवेंद्र शर्मा इंद्र ने यह पंक्तियाँ यों ही नहीं कही थीं..गीतों के आत्मपरक स्वभाव से समष्टिगत परिवर्तन की नवता को महसूस करते हुए नवगीतों के परिप्रेक्ष्य में यह उक्ति दी थी। मानवीय संवेदनाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम है गीत...जो कि दीर्घकाल से अद्यतन निरन्तर प्राणियों के जीवन मूल्यों, चुनौतियों, विसंगतियों, सामाजिक सरोकारों और पारस्परिक अंतर्विरोधों को अपनी लय में बाँधकर प्रस्तुत होता चला आ रहा है।विभिन्न सांसारिक विषमताओं के मध्य आघातों और प्रतिघातों के युगीन द्वंद्वों को भी अतीव सहजता से प्रस्तुत कर रहा है और स्वयं इन थपेड़ों को सरलता से सहन कर रहा है।मानवीय अनुभूतियों की नव रागात्मक अभिव्यक्ति संवेदनशील होकर गीत से नवगीत की ओर दिशा तय करती है।नवगीत की भाषा की सहजता और उसका बिम्बात्मक स्वर अपने लोकधर्म का और समयसापेक्ष यथार्थ का मूल्यांकन भी करता है और साथ ही मानवमन में दहकती अनुभूतियों को सार्वजनिक रूप से निरूपित भी करता है।इस तरह की रचना धर्मिता से गीत का एकांगीपन सर्वांगीणता का आकार धर लेता है,जिससे गीत स्व से आगे बढ़कर सर्वस्व का स्वर धारता है।गीत की इसी निष्पक्षता को नवगीत कहना उचित होगा।ऐसा करते हुए रचनात्मक लय और गीत की लय भी परिपक्व अवस्था में होनी चाहिए।
          नवगीत जीवन का यथार्थवादी चित्रण व्यञ्जनात्मक रूप में करता है।इसमें अनुभूति का सम्मिश्रण होने से लय और गेयता में वृद्धि होती है।संवेदना की सघनता और भावों का आवेग एक साथ मिलकर गीतकार के शब्दचयन द्वारा एक अलग ही अर्थविन्यास से युक्त नवगीत प्रकट करते हैं।गीत केवल लय और गेयता का प्रकाशन ही नहीं करता है बल्कि वह मानव के आरंभिक और आधुनिक संस्कारों  के साथ लोकजीवन के सम्बन्धों को जोड़ने का एक माध्यम भी है,एक सेतु भी है।शब्दों की यही लय जब संवेगात्मक भाषा के माध्यम से अर्थ की प्रतीकात्मक और बिम्बात्मक भाषा में अभिव्यक्ति करती है तो नवगीत मुखर हो उठता है।वैचारिक प्रच्छन्नता की मुखरता से नवगीत की मार्मिकता बढ़ जाती है और वह अधिक प्रभावशाली हो जाता है।भाषा की सहजता से सघन अर्थ की अभिव्यक्ति की संवेदनात्मक तरलता से युक्त गीत में बिम्बात्मकता, प्रतीकयोजना और व्यंजनात्मकता का सुनियोजन करते हुए ताज़गी ला देने की जो कला अब के गीतों में विकसित हो रही है वह पूर्वार्द्ध के गीतों में उतनी सटीक नहीं दिखाई देती है।समय सापेक्ष संवेदना के स्वर की गूँज नई सदी और नई पीढ़ी के गीतों में अधिक है।
      नवगीत का वर्तमान परिवेश विभिन्न भ्रान्तियों से ग्रस्त है।कोई क्षेत्रीय बोलियों के शब्दों की आधिक्यता से युक्त रचना को नवगीत घोषित कर रहा है तो कोई अंग्रेजी के शब्दों के अधिकाधिक बिम्ब पिरोने को ही नवगीत कह रहा है।प्रयोगों के नाम पर विभिन्न व्हाट्सएप और अन्य सोशल मीडिया के समूहों में नवगीत की अपनी ही तरह की परिभाषाएं और अपने तरीके के व्याकरण गढ़े जाने लगे हैं।इन्हीं विसंगतियों के मध्य जूझते हुए नवगीत के क्षेत्र में वर्तमान नवयुवक रचनाकारों की पीढ़ी उतरी, जो कि बीसवीं सदी के चौथे कालखण्ड में जन्मी और जिसने विभिन्न समस्याओं से पनपे हुए परिवेश की रुग्णता में आँखें खोलीं।ऐसे परिवेश में उनकी कलम भी सामाजिक विसंगतियों, विद्रूपताओं, राजनैतिक विक्षोभ, धार्मिक उन्माद से उपजते जाति-पाँति के झगड़ों,भूख-प्यास से बिलखते दलित-शोषित वर्गों, पथभ्रष्ट होते युवाओं के ऊपर केंद्रित होकर गीत सृजन की ओर उन्मुख हैं।
              इक्कीसवीं सदी में नवगीत लेखन में उतरी नई पीढ़ी के नवगीतकारों अवनीश सिंह चौहान,कृष्ण नन्दन मौर्य,रविशंकर मिश्र,गरिमा सक्सेना,राहुल शिवाय,शुभम् श्रीवास्तव ओम और चित्रांश वाघमारे के साथ ही एक नाम आता है भाई योगेन्द्र प्रताप मौर्य का। 'चुप्पियों को तोड़ते हैं' उनका पहला नवगीत संग्रह है।योगेन्द्र जी के नवगीतों में विचारों की नवता भी है तो भाषा की लचक भी।कथ्य को बिम्बों और प्रतीकों के साथ प्रस्तुत करने की कला भी है और सपाटबयानी से रहित भाषिक सहजता भी।संग्रह के नवगीतों को पढ़ते समय योगेन्द्र जी की प्रतिभा की बानगी, व्युत्पत्ति की विशालता एवं उनके अभ्यासी होने के गुणों से परिचय करने का पूर्ण अवसर मिलता है।वे अभिव्यक्ति को उचित रूप में प्रकट करना जानते हैं।विभिन्न समस्याओं पर एक युवा योद्धा की तरह विजय पाने की कला से वाकिफ़ योगेन्द्र जी के संग्रह 'चुप्पियों को तोड़ते हैं' से शीर्षक गीत की कुछ पंक्तियाँ:-

वेदना मन में जगी है
किन्तु कब ये नैन रोते,
हम धधकती भट्टियों में
हैं सृजन के बीज बोते,
बादलों की मटकियों को
कंकड़ों से फोड़ते हैं।
हम नहीं हैं मूक मानव
चुप्पियों को तोड़ते हैं।

        वरिष्ठ आलोचक नचिकेता कहते हैं-"सम्पूर्ण मानवीय संवेदना के सर्वोच्च निचोड़ की सार्थक और संगीतात्मक अभिव्यक्ति गीत है।" योगेन्द्र मौर्य जौनपुर के खाँटी ग्रामीण परिवेश से आते हैं।उन्हें मानवीय संवेदना की गहरी अनुभूति है।रोजाना ही कृषि क्षेत्र से जुड़े श्रमिकों और किसानों की समस्याओं से रूबरू होना ही पड़ता है।मजदूर वर्ग की लाचारी को प्रत्यक्षतः महसूस करना और उस पर रिएक्ट करना एक कवि का धर्म भी है और नैतिक दायित्व भी।संग्रह का पहला ही नवगीत समाज के कठोरतम यथार्थ से अवगत कराता है:-

श्रम के हिस्से रोज पसीना
लाल हुई हैं आँखें
कटी हमेशा ही नभ में
उड़ती चिड़िया की पाँखें
धँसा पीठ में फिर धोखे से
खंज़र अत्याचारी
कभी गाँव में
कभी शहर में
भटक रही लाचारी।

             अपने समय के आम आदमी की तकलीफ़ों और उसके जीवन संघर्ष को कविता और साहित्य की केंद्रीय अंतर्वस्तु स्वीकार करना कवि/साहित्यकार का नैतिक कर्तव्य है।ग्रामीण परिवेश हो या शहरी,दोनों जगहों पर अभावों का जो विस्तार दिखाई देता है उसकी वास्तविकता को यथातथ्यात्मकता के साथ प्रस्तुत करने में योगेन्द्र भी पीछे नहीं हटते हैं:-

उगती हुई भोर पर भारी
दरवाजों के साये
बैठी रही रसोई दुख से
अपना मुँह लटकाये
उसकन ऐंठी जिद के मारे
काले पड़े भगौने
माँ बच्चों का मन बहलाने
पाये कहाँ खिलौने!
                (चुभते रहे बिछौने)

        किसी समय पर जॉर्ज बर्नार्ड शॉ ने अपने ही अन्दाज़ में जनतंत्र प्रणाली पर तीखी टिप्पणी की थी "Democracy is a government, of the fools, for the fools, by the fools." भीड़तंत्र में सब कुछ अच्छा कैसे रह सकता है।जहाँ शासन और प्रशासन, कुशासन से जुड़े हों और मूर्खों के हाथों में हों, वहाँ न्याय की उम्मीद धराशायी हो जाती है और केवल अट्टहास करता हुआ भ्रष्टतंत्र खड़ा दिखाई देता है।आम आदमी का दुःख, कुंठाग्रस्तता,उसका जीवन संघर्ष कितना जटिल हो जाता है कि वो न्याय पाने के लिए किस दरवाजे पर दस्तक दे यह उसे समझ ही नहीं आता।न्याय व्यवस्था भी इसी तथाकथित जनतंत्र के हाथ की कठपुतली बनकर नर्तन करने लगा है।इस विकराल स्थिति से योगेन्द्र जी भी पूरी तरह अवगत हैं और 'मौन खड़ा कानून' गीत में हमें स्वमूल्यांकन के लिए कहते हुए दिखाई पड़ते हैं कि सही व्यक्ति का चुनाव न करने का दंश कितना भयानक है:-

छूट गया हत्यारा खंज़र
पीकर मनभर खून
अपनी आँखों पट्टी बाँधे
मौन खड़ा कानून
सरकारी फरमान हो रहे
केवल हवा हवाई।

        किसी एक युग या कालखण्ड की विधा या विचार कालजयी नहीं हो सकते हैं।इसीलिए कुछ अरसा बाद कविता की हर विधा में कुछ नवीनता लाने के लिए उसके मूल रूप और स्वरूप में किंचित ही सही, परिवर्तन होता ही है।नवगीत दशक एक की भूमिका में डॉ शम्भूनाथ सिंह ने लिखा है "एक युग में किसी विधा से जो नवीनता और मौलिकता दिखाई पड़ती है, वहीं वह अगले परिवर्तित युग में घिसी-पिटी और बासी प्रतीत होने लगती है।तब नए कवि अपने युग की आवश्यकता और जीवन दृष्टि के अनुरूप तथा अन्तर्दृष्टिमूलक कल्पना के सहारे उस विधा में नवीन सौंदर्य और नई चमक उत्पन्न करते हुए नवीन तथा आत्मानुभूत सत्य की अभिव्यक्ति करने लगते हैं।" योगेन्द्र मौर्य जी अपने समय से भी परिचित हैं और अपने पूर्वकाल से भी।समाज के आंतरिक और बाह्य ढाँचे में होते बदलावों को वे समझ रहे हैं।अतः अपने साहित्यिक परिवेश में भी वे परम्परा के सार्थक परिवर्तन के पक्षधर दिखाई देते हैं।नवीनता का पोषक होना कविकर्म का आवश्यक अंग स्वीकार करने में कोई गुरेज भी नहीं है।इसी के चलते वे केवल नकारात्मक या समस्यात्मक नवगीत ही नहीं रचते बल्कि वे समाधान के भी गीत रचते हुए अपने समय के प्रवाह में आशा का दीप जलाते हुए नैराश्य को मिटाने का भी प्रयास करते हुए खड़े हैं:-

नन्हें हाथों में लौटीं हैं
सतरंगी फुलझड़ियाँ,
अंधियारों को जीत रही हैं
उम्मीदों की लड़ियाँ,
मुँह की खाकर 
विवश निराशा अपने हाथ मले
इस धरती पर
त्योहारों की खुशियाँ रोज पलें।
      
           चर्चित गीतकवि कैलाश गौतम का एक गीत बहुत ही प्रसिद्ध हुआ था जिसकी एक पँक्ति -"सुरसतिया की लाश मिली है नदी किनारे" से तत्कालीन ग़रीबी में जन्मी गँवई स्त्री की नियति और दबंगों की नीयत का सम्पूर्ण लेखा जोखा सहजता से मिल जाता है।लेकिन तब से अब तक आते आते स्त्री की जीवन शैली में कितना परिवर्तन आया है। यद्यपि पौरुषीय दंभ अब भी वही है लेकिन आज की स्त्री अपने अस्तित्व को समझने लगी है। कैलाश गौतम का वह गीत पिछली सदी का है और योगेन्द्र जी का प्रस्तुत गीत नई सदी का है,दोनों के परिवेशगत अंतर को सहज ही समझा जा सकता है:-

तोड़ प्रथाएँ निकली घर से
अब तो बाहर बेटी,
जैसे मुट्ठी में यह दुनिया
उसने आज समेटी,
जल-थल नाप
उड़ाती नभ में
देखो आज विमान।
निश दिन गढ़तीं
यहाँ बेटियाँ
नये नये प्रतिमान।
      
         गीत चाहे व्यक्तिपरक हो या फिर समष्टिपरक, दोनों स्थितियों में वह समूह के संवेग को ही प्रकट करता है।थियोडोर अडोर्नो ने इस विषय में लिखा है "गीत की पुकार का मर्म वही जान सकता है जो इसकी अंतर्निहित मानवीयता के स्वर को सुन सकता है।" योगेन्द्र जी के गीतों में मानवीयता को जानने समझने की अद्भुत क्षमता है।वे मिट्टी से जुड़े हुए व्यक्ति हैं तो निश्चित रूप से उसके प्रति उनका अनुराग और जुड़ाव रहेगा ही और जब उस मिट्टी से लोगों की दूरी बनती है तो वे कह उठते हैं:-

आनाकानी सावन करता
लोकगीत को भूला
और गाँव से रूठ न जाने 
कहाँ गया है झूला
जारी है अब 
संस्कृतियों का
लगातार अपकर्ष
लील गई 
मिट्टी की खुशबू
कंकरीट की फर्श।

        योगेन्द्र जी के नवगीतों में यथार्थ आनुभूतिक संवेदना में सामाजिक सरोकारों की प्रगतिशील विचारधारा भी उपस्थित होती है जो उनके नवगीतों को शाश्वत बनाती है और बिम्बधर्मिता नए आयामों की गहराई को और विस्तार देती है।प्रकृति का साहचर्य भी इन नवगीतों को प्राप्त होता है भले ही प्राकृतिक आपदा के रूप में ही क्यों न हो।यह स्थिति भी हमारी स्वयं की ही देन है।कहीं पर भारी बारिश तो कहीं पर सूखा।इस प्राकृतिक असन्तुलन को लेकर लिखे गए इस नवगीत ने थोड़े में ही बहुत कुछ कहने का बीड़ा उठाया है-

जबरदस्ती घुस गया जल
ले रहा घर की तलाशी,
चेहरों पर हड़बड़ी की
है गहन छायी उदासी,
कैम्प में लेती शरण हैं
हाँफती सी हड्डियाँ,
हो कुपित अब बादलों ने
खोल दी हैं मुट्ठियाँ।

         वैश्विक परिवेश में पूँजीवाद का उदय होने से समाज में धीरे धीरे विभाजन और विघटन होता गया।जिसका प्रभाव यह पड़ा कि पूँजी का वर्चस्व समाज पर बढ़ने लगा तो श्रम विभाजन और वर्ग विभाजन की प्रक्रिया जटिल हो गई।तत्कालीन स्थिति से आज तक उस मानसिकता से सम्पूर्ण समाज उबर न सका।जनसंख्या की अधिकता और रोजगार की कमी से लगभग हर देश पीड़ित है।भारतीय उपमहाद्वीप में रहते हुए जनसँख्याधिक्य से डिग्रियों को लेकर बेरोजगार युवा दर ब दर की ठोकरें खाते हुए भटकने को मजबूर हो जाते हैं।ख़ासकर उत्तर प्रदेश जैसे स्थान पर तो यह स्थिति और अधिक विकराल है।इस विषम स्थिति से योगेन्द्र जी भी पीड़ित हैं:-

धूल उड़ाती पगडंडी से 
कौन जुबान लड़ाये,
जानबूझकर लँगड़ी मारे
चलते पाँव गिराये,
आखिर कब तक
भार सहेंगे बूढ़े बोझिल कंधे?
डिगरी वाली फ़ाइल लेकर
रोज भटकते बंदे।

       धार्मिक और सामाजिक रूढ़िवादिता से सम्पूर्ण समाज का अंधानुकरण घातक है।नवगीत भारतीय सभ्यता और संस्कृति का पोषक भी है और अंधविश्वास और कुरीतियों के वितंडावाद का धुर विरोधी भी।मानवमूल्यों के विरुद्ध आचरण का परिपोषण और समर्थन मानवसमाज के हित में है ही नहीं।स्त्री पुरुष के पारस्परिक सम्बन्धों में बिखराव का योगेन्द्र जी ने अपने अन्यानेक नवगीतों में इस परंपरा का विरोध किया है।एक उद्धरण दृष्टव्य है:-

सम्बन्धों में आड़े आते
अक्सर तीन तलाक़,
खुशियाँ लेतीं छीन रिवाज़ें
ये होतीं नापाक
चारों तरफ खड़ा दिखता है
अंधापन-अतिवाद।
रोज समस्या समाधान में
छिड़ा वाद-प्रतिवाद।

    नवगीतों में एक चिंता सर्वाधिक दिखाई दे रही है इन दिनों पर्यावरणीय प्रदूषण की।उद्योगों की अधिकता और वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से मृदाक्षरण होने लगा है जिससे मिट्टी का उपजाऊपन खतरे में है और ऑक्सीजन की कमी से कार्बन की मात्रा बढ़ गई है।जिससे पृथ्वी पर पर्यावरण असन्तुलन की स्थिति विकराल रूप धारण कर चुकी है।योगेन्द्र जी पेशे से शिक्षक भी हैं तो उन्हें भी इसकी चिंता होनी स्वाभाविक है:-

आस-पास सब धुआँ धुआँ है
एक अजब भारीपन
उभरा हुआ दमा ढोना है
उकताया सा जीवन,
मानव और प्रकृति में होती
अक्सर हाथापाई
खड़ी चिमनियों से बेलों की
हँसी यहाँ मुरझाई।

और

बड़ी निर्दयी आरी करती
तन की बोटी बोटी
ठेकेदार बढ़ाकर बोली
रकम वसूले मोटी,
अपने दुर्दिन देख बगीचे
रहते बहुत निराश।

        नामवर सिंह जब गीत की आलोचना करने का मन बनाते हैं तो अलग ही पृष्ठभूमि तय करने लगते हैं:- "गीत और लिरिक में आप दुःख-दर्द और वियोग की वेदना के साथ जीवनदर्शन को अच्छी तरह से प्रस्तुत कर सकते हैं लेकिन जैसे ही उसमें गरीबी,उत्पीड़न और आक्रोश की बात करने लगते हैं,उसकी गेयता नष्ट हो जाती है और वह song हो जाता है।" अब इसे दुर्भाग्य ही कह सकते हैं जो आलोचक व्यष्टिपरक गीत को liric और समष्टिपरक गीत को song कहते हुए नवगीत को अगेय घोषित करने पर लगा हो,उसने निश्चित रूप से नवगीतों को बिना पढ़े हुए गैरजिम्मेदारी से यह टिप्पणी दी है,यह कहने में संकोच नहीं किया जा सकता है।नवगीतों में छन्दों की संगीतात्मक लय और गेयता की अद्भुतं उपस्थिति रहती ही है।योगेन्द्र मौर्य के नवगीत निजी और आत्मपरक नहीं हैं,वे वैयक्तिकता से दूर भौमिकता के पूर्णरूपेण विवेचक हैं।इनके नवगीतों में वैचारिक ताज़गी है।उक्त आलोचकीय दृष्टि को नकारते हुए बहुत से गीत इस संकलन में हैं।एक गीत के अंश को यहाँ उद्धृत करना चाहूँगा:-

लगी पटखनी फिर सूखे से
धान हुए पाई
एक बार फिर से बिटिया की
टाली गई सगाई
गला घोंटती यहाँ निराशा
टूट रहे अरमान
धरी रह गई यहाँ किसानी
खाली हैं खलिहान।

        अब इससे अधिक अभाव की पीड़ा व्यक्त करते हुए नवगीत में लयात्मकता और गेयता का जो पुट भरा है उसे नकारना उचित तो नहीं है। नवगीत रचना की शैली के विषय में नचिकेता जी कहते हैं-"आनुभूतिक संरचना,भाषा,शिल्प,लय, छन्द, विषयवस्तु और संवेदना के धरातल पर गीत रचना की शैली एक जैसी ही है।" कहने का तात्पर्य है कि गेयता हर समय गीत का विशेष अंग रहा है और योगेन्द्र जी के नवगीतों में यह बात मुख्यतः उपस्थित है।
       संस्कारों की नग्नता,पश्चिम की आँधी में बहता और भटकता युवावर्ग,मन को मथती हुईं अखबारों की हेडलाइन्स, इक्कीसवीं सदी में भी ग्रामीण परिवेश का अभावग्रस्त जीवन,फैशन का प्रसार और नैतिक क्षरण,आम जन की पीड़ा,सामाजिक और धार्मिक विसंगति,राजनैतिक विक्षोभ,पारिवारिक विघटन और स्नेह की कमी,सद्भावना का क्षरण,संवेदनहीनता,आतंकवाद,बेरोज़गारी, नशायुक्त युवा,शिक्षा की बेपटरी व्यवस्था आदि लगभग सभी मुद्दों से योगेन्द्र जी का साबका भी है और सरोकार भी।यही कारण है कि उनके लगभग गीतों का मुख्य स्वर इन्हीं विषयों पर केंद्रित है लेकिन इसका तात्पर्य नहीं है कि उनमें केवल नकारात्मक अभिव्यक्ति घर कर गई है।बहुत से गीत इन विसंगतियों से निबटने को उत्कण्ठित भी हैं।विभिन्न सकारात्मक विषयों के माध्यम से उन्होंने नवगीत में आशा और सम्भावनाओं को भी विस्तार दिया है।इसीलिए जब वे यह कहते हैं- "जीवन में कब/मिला मुनाफ़ा/सिर्फ मिला है घाटा" तो वहीं अगले ही क्षण वे ही यह भी कहते हैं-"सुबह-सुबह/उठकर पगडण्डी/करती चहल पहल है।" इन सबके साथ ही हिन्दी भाषा की चिंता भी उन्हें है।वे हिंदी की उपेक्षा उसके घर में होते हुए देखकर पीड़ित हैं और कहते हैं-

न्याय माँगती है संसद से
बैठ राष्ट्र की भाषा,
कानूनी अड़चन में उलझी
अंतर की अभिलाषा,
देवनागरी बड़ी दुःखी है
खुद की देख ठगाई
ए बी सी डी रंग बिरंगी
चले बांधकर टाई।

         डॉ जीवन प्रकाश जोशी शिल्प के छः अंग स्वीकार करते हैं-"भाषा,अलंकरण तत्व,संगीत,बिम्बधर्मिता, प्रतीक और रूपक यही छः गीत के शिल्प को सुदृढ़ बनाते हैं।भाषा में शब्दशक्ति,शब्द समाहार,ऋजुता,ध्वन्यात्मकता और रसात्मकता को सम्मिलित करना चाहिए।अभिव्यंजना की नवीनता ही सृजन की मौलिकता का मानदण्ड है।" उक्त मानकों के क्रम में योगेन्द्र प्रताप मौर्य जी के लगभग सभी नवगीत पुष्ट हैं।नवगीत के विषय में उनकी मौलिक अवधारणाएं हैं जो वर्तमान के सापेक्ष रहकर प्रतिरोध को सुदृढ़ करती हैं।जिनके नवगीतों की शैली में समभिव्याहार का गुण उपस्थित है।इनकी इसी शैली के चलते इनके नवगीतों को अन्य के नवगीतों से सहज ही अलग करके देखा और परखा जा सकता है।
          गीतों के प्रति अज्ञेय ने "यूँ तो हिंदी में अब भी गीत लिखे जाते हैं और नई कविता के साथ नवगीत की भी धारा चलाई जाती है,लेकिन गीत की धारा कभी हिंदी काव्य की मुख्य धारा नहीं हो सकती" कहकर इतना अधिक उकसा दिया था कि भाववादी और आधुनिकतावादी आलोचकों के साथ साथ मार्क्सवादी आलोचकों ने भी गीत का विरोध ही किया।स्थिति तो यह रही थी कि नामवर सिंह और मैनेजर पाण्डेय तक ने इस विधा के प्रति दोहरी मानसिकता अपनाई। फिलहाल इन्हीं आलोचकों की तानाशाही के मध्य नवगीत पिछले साठ वर्ष से निरन्तर जनमानस में प्रवाहित है और अद्यतन नवगीतकारों के संकलनों के प्रकाशन से परिपुष्ट है। योगेन्द्र प्रताप मौर्य का यह संग्रह भी उसी कड़ी का एक सजीव हिस्सा है।जिसके नवगीतों में संवेदनाएं युगबोध से अभिव्यंजित हैं।विषयों के अनुकूल भाषा गढ़ने की कला और रसों का प्रतिबिम्ब खड़ा करने का हुनर भी इन्हें खूब आता है।कथ्यात्मकता कि प्रस्तुति के तरीके भी विशेष हैं।अपने समय के सच को टटोलते हुए यह नवगीत संग्रह अवश्य ही पाठकों और साहित्यकारों के मध्य अपनी पहचान बनायेगा और इसका स्वागत होगा।

समीक्षक-
अवनीश त्रिपाठी
सुलतानपुर, उ.प्र.
9451554243

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