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सोमवार, 25 अप्रैल 2016

गीतिका की अवधारणा को पुष्ट करने वाली प्रचुर गीतिकाओं का एक लक्षण ग्रंथ-'गीतिकालोक'

गीतिका की अवधारणा को पुष्ट करने वाली प्रचुर गीतिकाओं का एक लक्षण ग्रंथ-'गीतिकालोक'
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समीक्ष्य कृति – गीतिकालोक, कृतिकार – ओम नीरव (पृष्ठ – 280, पेपर कवर, मूल्य – 300 रूपये, संपर्क – 07526063802) 
समीक्षक - दिनेश कुशभुवनपुरी, सुलतानपुर उ.प्र.
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             हिन्दी में ग़ज़ल लिखने का कार्य एक लम्बे समय से होता रहा है और ऐसी रचनाओं को ‘हिन्दी ग़ज़ल’, ‘युग्मिका’, ‘गीतिका’ आदि नाम दिये जाते रहे हैं किन्तु हिन्दी साहित्य में इसकी कोई अलग पहचान आजतक नहीं बन पायी है, अधिकांश प्रयास केवल भाषान्तर या नामान्तर तक ही सीमित होकर रह गये हैं। हिन्दी कविता के मर्मज्ञ ओम नीरव ने हिन्दी ग़ज़ल को कुछ विशिष्ट मानकों के साथ ‘गीतिका’ नाम से एक स्वतंत्र विधा के रूप में स्थापित करने की दिशा में अपने ढंग का एक अनूठा प्रयास किया है, जिसकी एक सुखद एवं शिखर परिणति है काव्यकृति ‘गीतिकालोक’।

                 कृति के आकर्षक मुख पृष्ठ पर इंगित ‘गीतिका विधा एवं गीतिका संकलन’ देखकर ही आभास होने लगता है कि पुस्तक में कुछ विशेष अवश्य है। भीतर की सामग्री को देखकर सुखद आश्चर्य होता है कि यह कृति जहाँ एक ओर नव-सृजित गीतिका विधा की सांगोपांग व्याख्या के साथ हिन्दी काव्य का एक लक्षण ग्रंथ प्रस्तुत करती है, वहीं दूसरी ओर गीतिका की अवधारणा को पुष्ट करने वाली प्रचुर गीतिकाओं का संकलन भी प्रस्तुत करती है। इसके प्रथम भाग में गीतिका विधा और इससे संबन्धित सभी काव्य तत्वों की सोदाहरण सरल सुबोध व्याख्या की गयी है जैसे ‘तकनीकी शब्दावली’ में पद, युग्म, मुखड़ा, मनका, समान्त, पदान्त, मापनी, आधार छन्द आदि को परिभाषित किया गया है, परिवर्तन तालिका में स्वरक, लगावली, मात्राक्रम और रुक्न के आपसी संबंध को समझाया गया है, अगले आलेखों में ‘मात्राभार’, ‘तुकान्त विधान’, मापनी, आधार छन्द, छंदों का मापनी के आधार पर वर्गीकरण, गीतिका का तानाबाना, मुक्तक का मर्म आदि विषयों का सरल भाषा में विवेचन किया गया है। ‘गीतिका का तानाबाना’ आलेख के अनुसार ‘गीतिका विधा’ सामान्य हिन्दी ग़ज़ल नहीं है , अपितु वह हिन्दी ग़ज़ल है जिसमें हिन्दी भाषा की प्रधानता हो, हिन्दी व्याकरण की अनिवार्यता हो और मापनियों के साथ-साथ हिन्दी छंदों का अधिकाधिक समादर हो। इसी क्रम में आलेख ‘गीतिका की भाषा’, ‘गीतिका और उर्दू ग़ज़ल’ और ‘गीतिका नाम ही क्यों’ प्रतिपाद्य विषय को पूर्णता प्रदान करने में समर्थ हैं। ‘प्रचलित मापनियाँ और आधार छन्द’ शीर्षक आलेख में विस्तार से स्पष्ट किया गया है कि किसप्रकार प्रचलित मापनियाँ वास्तव में हिन्दी छंदों का रूपान्तरण मात्र हैं। इस कृति में मात्रिक और वर्णिक छंदों का मापनियों के साथ तालमेल आद्योपांत देखते ही बनता है और यह प्रयोग निश्चित रूप से छंदों को लोकप्रिय बनाने में सहायक सिद्ध होगा, ऐसा मेरा विश्वास है।

                     ‘मापनी विज्ञान’ कृतिकार का अपना शोध है जिसमें यह दिखाया गया है कि किस प्रकार लघु-गुरु की एक ही तरंग से अनेक मापनियों और छंदों का निर्माण होता है। फिल्मी गीतों से प्रारम्भ करते हुए किसप्रकार गीतिका रचने की कला सीखी जा सकती है, इसे सटीक उदाहरण के साथ ‘आओ रचें गीतिका’ शीर्षक आलेख में बड़े रोचक ढंग से समझाया गया है। इस कृति में हिन्दी छंदों का एक नए प्रकार से वर्गीकरण किया गया है जिसके अनुसार समस्त छंदों को दो भागों में विभाजित किया गया है – मापनीयुक्त और मापनीमुक्त। मापनी युक्त मात्रिक और वर्णिक छंदों को क्रमशः वाचिक और वर्णिक मापनियों के आधार पर सटीक उदाहरणों के द्वारा निरूपित करते हुये कृतिकार ने स्पष्ट किया है कि ऐसे छंदों की मापनी जान लेने के बाद पूरा शिल्प समझ में आ जाता है और अन्य बातें जानने की आवश्यकता ही नहीं रहती है। आलेख ‘मुक्तक का मर्म’ में प्रचलित मुक्तक रचने की कला को समझाते हुए मुक्तक के अन्य संदर्भ भी दिये गये हैं। ‘तुकान्त विधान’ एक अपने ढंग का अलग आलेख है जो गीतिका के साथ-साथ छांदस काव्य की समस्त विधाओं में उपयोगी है। इस प्रकार ‘गीतिकालोक’ कृति का प्रथम भाग जहां एक ओर ‘गीतिका-विधा’ का सम्यक निरूपण करता है, वहीं दूसरी ओर छंदस काव्य की अन्य विधाओं के लिए भी सृजनोपयोगी सामग्री प्रदान करता है।

                    मेरा विश्वास है कि हिन्दी कविता को समर्पित साहित्यसेवी ओम नीरव प्रणीत समीक्ष्य काव्यकृति ‘गीतिकालोक’ समकालीन लेखनी का दिशाबोध करते हुए गीतिका विधा के संदर्भ ग्रंथ के रूप में हिन्दी साहित्य में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने में सफल होगी। अनंती शुभकामनाओं के साथ,गीतिकलोक के दूसरे भाग ‘गीतिका संकलन’ में सत्तासी गीतिकाकारों की 161 बहुआयामी गीतिकाओं का संकलन है जो कि इस दृष्टि से अद्वितीय है कि इसमें प्रत्येक गीतिका के साथ उसका शिल्प विधान भी दिया गया है जिसमें आधार छन्द, मापनी, समान्त और पदान्त का उल्लेख किया गया है। मुझे हिन्दी काव्य संकलनों के इतिहास में ऐसा प्रयास प्रथम बार देखने को मिला है। मेरा विश्वास है कि यह प्रयास नव रचनाकारों का मार्गदर्शन करने में विशेष सहायक सिद्ध होगा और साथ ही एक नयी परम्परा का सूत्रपात भी करेगा। पृष्ठ के उपलब्ध रिक्त स्थान में उसी रचनाकार के मुक्तक को समायोजित किया गया है और उसका भी शिल्प विधान विधिवत दिया गया है। गीतिकाओं और मुक्तकों के सुगठित शिल्प, सार्थक कथ्य और प्रखर सम्प्रेषण को देखते हुए लगता है कि कृति के दूसरे भाग का सम्पादन विशेष सतर्कता और परिश्रम के साथ किया गया है।
                  समग्रतः देखा जाये तो यह कृति वस्तुतः एक काव्यशाला है जिसके द्वारा कोई भी जिज्ञासु न केवल गीतिकाविधा को आत्मसात कर सकता है अपितु सामान्य काव्य कला में भी पारंगत हो सकता है !
समीक्षक : दिनेश कुशभुवनपुरी, सुल्तानपुर, उ.प्र.

मंगलवार, 1 मार्च 2016

दिनेश कुशभुवनपुरी का गीत

            गीत

नाम नहीं लूँ किसी एक का,
यहाँ सभी जन गुरू हमारे।
साहित्यिक कुछ ज्ञान नहीं है,
सीख रहा हूँ लिए सहारे।

डाल सकूँ मैं भाव गीत में,
हरदम यही कामना रहती।
सुर लय ताल नहीं मैं जानूँ,
कलम स्वयं ही कविता कहती।
नहीं ज्ञात है मुझको कुछ भी,
शब्द निकलते उर से सारे।
नाम नहीं लूँ................😊

मात्राभार  मापनी  लेकर,
मुक्तक छन्द गीतिका लिखता।
दिल में जो भी रच बस जाए,
गीत वही तो मैं हूँ रचता।
शब्दों से श्रृंगार करूँ जब,
गढ़ता हूँ तब चाँद सितारे।
नाम नहीं लूँ.................😊

मुझमें कमी अभी है बाकी
खुले आम स्वीकार करूँ मैं।
छोटे बड़े कहें जो मुझसे,
बातें उनकी ध्यान धरूँ मैं।
कोई भी व्यवधान अगर है,
दूर करूँ मैं बिना विचारे॥
नाम नहीं लूँ.................😊

दिनेश कुशभुवनपुरी
बरौंसा, सुलतानपुर उ प्र

बुधवार, 20 जनवरी 2016

दिनेश कुशभुवनपुरी की दो रचनाएँ

           गीतिका-एक
       आधार छंद-दिगपाल
मापनी-221 2122 221 2122
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ये जिंदगी हमारी,
हर पल हमें सिखाती।
जो हम भटक गए तो,
वह राह भी बताती॥
📚📚📚📚📚📚
चलती सदा हमारे,
आगे कदम बढ़ाकर।
जो हम थके कहीं भी,
तो हौसला बढ़ाती॥
📚📚📚📚📚📚
दो चार पग चले हम,
जो साथ जिंदगी के।
इक रंग उन पलों में,
हर बार है दिखाती॥
📚📚📚📚📚📚
आकाश की ऊँचाई,
पाताल की गहनता।
ये जिंदगी गिराकर,
फिर से हमें उठाती॥
📚📚📚📚📚📚
नाराज भी न होती,
ये जिंदगी  किसी से।
बस कर्म ही हमारा,
आ लौट कर सताती॥
📼📼📼📼📼📼📼

          गीतिका-दो
  आधार छंद- शक्ति छंद
मापनी- 122 122 122 12
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हमें प्यार से तुम सताया करो।
सदा स्वप्न हमको दिखाया करो॥
📚📚
कभी रूठ जाऊं अगर मैं प्रिये।
सदा प्रेम से तुम मनाया करो॥
📚📚
कठिन राह होती चली जा रही।
कदम दर कदम संग आया करो॥
📚📚
भरे खूब कंटक यहाँ राह में।
सुमन राह में तुम बिछाया करो॥
📚📚
कहीं खो न जाना किसी भीड़ में।
डगर में न कर तुम छुड़ाया करो॥
📚📚
लुटेरे खड़े हैं सभी मोड़ पर।
अकेले नगर में न जाया करो॥
📚📚
रहूँगा सदा संग दिल में प्रिये।
हमें प्यार से तुम बुलाया करो।
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दिनेश कुशभुवनपुरी
चाँदपुर-बरौंसा, सुलतानपुर(उ.प्र.)
चलभाष-07891771737