समीर परिमल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
समीर परिमल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 31 मई 2016

समीर परिमल जी के चंद उम्दा शेर

SAMIR PARIMAL
-----------------------

1. तेरी बुनियाद में शामिल कई मासूम चीख़ें हैं
    इमारत बन रही होगी तो क्या मंज़र रहा होगा

2. इक फ़क़त तेरे सिवा दोनों जहाँ को जीतकर
    रूह से लिपटी मेरी पाकीज़गी रोती रही

3. ज़ुबाँ चुप है मगर आँखों में तैरे है वही मंज़र
    मेरे दर पर तड़पती, चीख़ती, दम तोड़ती दुनिया

4. जब सियासी गली से गुज़रा है
    सचबयानी ने ओढ़ ली चादर

5. काश महसूस कभी आप भी करते साहिब
    दर्द देता है बहुत गैरज़रूरी होना

6. आख़िरी कश है ये ज़िंदगी का सनम
    आज तस्वीर तेरी धुआँ बन गई

7. याद की बदली जो छाई, जल उठे दिल में दिये
    इन हवाओं पर तेरी सूरत बनाई, देख ली

8. करीबी वो बहुत होने लगा है
    गिराएगा मुझे अपनी नज़र से

9. मुझे अश्क़ों को पीने का हुनर आता नहीं यारों
    छुपा लूँ किस तरह आँखों से ये बहते हुए चेहरे

10. है मयस्सर चंद लोगों को ख़ुदा की नेमतें
       मुफ़लिसों के वास्ते ताज़िन्दगी रमज़ान है

© समीर परिमल पटना

मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

समीर परिमल की एक उम्दा और मेरी पसंदीदा ग़ज़ल


वही है बस्ती, वही हैं गलियाँ, 
बदल गया है मगर ज़माना
नए परों के नए परिंदे, 
नई उड़ानें, नया फ़साना।


चलो भुला दें तमाम वादे, 
तमाम कसमें, तमाम यादें
न मैं मुहब्बत, न तुम इबादत, 
न याद करना, न याद आना।


करीब आके, नज़र मिलाके, 
मुझे चुराके चला गया वो
पता न उसका, ख़बर न अपनी, 
भटक रहा है कोई दिवाना।


न सुबह ही अब तो शबनमी है, 
न शाम ही अब वो सुरमई है
हवाएँ गुमसुम, फ़िज़ाएं बेदम, 
रहा न मौसम वो आशिक़ाना।


दुआ किसी की बनी मुहाफ़िज़, 
उसी के साए में हम खड़े हैं
गुज़र चुकी है यहाँ से आँधी, 
मगर सलामत है आशियाना।


समीर परिमल
पटना, बिहार

समीर परिमल की ग़ज़लें

        


  ग़ज़ल - 1
 

गर मुहब्बत जवान हो जाए
ये ज़मीं आसमान हो जाए
सबकी मीठी ज़ुबान हो जाए
खूबसूरत जहान हो जाए
बन गया मैं अज़ान मस्जिद की
तू भी मुरली की तान हो जाए
आरज़ू मुख़्तसर सी है अपनी
दिल ये हिंदोस्तान हो जाए
हौसलों के परों को खोलो भी
आसमां तक उड़ान हो जाए
इक नज़र देख ले इधर साक़ी
ज़ब्त का इम्तहान हो जाए
राहे उल्फ़त में चल पड़ा 'परिमल'
चाहे मुश्किल में जान हो जाए

        
 ग़ज़ल - 2


बड़ा जबसे घराना हो गया है
ख़फ़ा सारा ज़माना हो गया है

हुई मुद्दत किए हैं ज़ब्त आंसू
निगाहों में खज़ाना हो गया है

मुहब्बत की नज़र मुझपर पड़ी थी
वो खंज़र क़ातिलाना हो गया है

जड़ें खोदा किए ताउम्र जिसकी
शजर वो शामियाना हो गया है

दिवाली-ईद पर भाई से मिलना
सियासत का निशाना हो गया है

चलो 'परिमल' की ग़ज़लें गुनगुनाएं
कि मौसम शायराना हो गया है

        
          ग़ज़ल - 3          


ग़मे-इश्क़ पूछो न कैसी बला है
अभी इब्तिदा है, अभी इंतेहा है

मैं उससे ख़फ़ा हूँ, वो मुझसे ख़फ़ा है
ये बरसों पुराना हसीं सिलसिला है

निगाहों में दरिया, लबों पर तबस्सुम
मुहब्बत का यारों अजब फ़लसफ़ा है

संभालोगे रिश्तों का तुम बोझ कैसे
फ़लक से भी ऊँची तुम्हारी अना है

हुनर बेवफ़ाई का मुझको सिखा दे
मुझे भी ज़माने का दिल तोड़ना है

लिपटकर चिराग़ों से शब् रो रही है
जुदाई का सूरज चला आ रहा है

न दौलत की चिंता, न शोहरत की चाहत
फ़क़ीरी का अपना अलग ही मज़ा है



           ग़ज़ल - 4           


प्यार देकर भी मिले प्यार, ज़रूरी तो नहीं
हर दफ़ा हम हों ख़तावार, ज़रूरी तो नहीं

खून रिश्तों का बहाने को ज़ुबाँ काफी है
आपके हाथ में तलवार ज़रूरी तो नहीं

एक मंज़िल है मगर राहें जुदा हैं सबकी
एक जैसी रहे रफ़्तार, ज़रूरी तो नहीं

आपके हुस्न के साए में जवानी गुज़रे
मेरे मालिक, मेरे सरकार, ज़रूरी तो नहीं

दीनो-ईमां की ज़रुरत है आज दुनिया में
सर पे हो मज़हबी दस्तार, ज़रूरी तो नहीं

एक दिन आग में बदलेगी यही चिंगारी
ज़ुल्म सहते रहें हर बार, ज़रूरी तो नहीं



© समीर परिमल
राजकीय कन्या मध्य विद्यालय,
राजभवन (पटना)
मोबाइल - 9934796866
ईमेल samir.parimal@gmail.com