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सोमवार, 5 जुलाई 2021

नवगीत-भरा हुआ संत्रास by आशुतोष कुमार आशू

जटा बढ़ाए बंजारा मन 
ढूढ़ रहा नित ठौर..!!

बना रहा है आज उजालों पर अँधियारा धाक,
डाँट पिलाता है हाथों को कुम्भकार का चाक,
छूटा जाता है हाथों से 
मुँह तक आया कौर..!!

सुख-जीवन चल रहे रात-दिन जैसे रेल पटरियाँ,
दुःख-जीवन इस तरह घुले हैं ज्यों धागे में लड़ियाँ,
जितना ऊब गया जीवन से
उतना जीना और..!!

सब होठों की एक शिकायत, भरा हुआ संत्रास,
किन्तु मूल में कारण ढूढें, है किसको अवकाश,
बस हर मानव कोस रहा है 
वर्तमान का दौर..!!

आज गर्त में गिरा पड़ा है यह अपना परिवेश,
मूल्य रखे हैं गिरवी सारे भरा हुआ बस क्लेश,
इठलाते हैं कि अतीत में,
हम सब थे सिरमौर..!!

- आशुतोष कुमार आशू

सोमवार, 28 जून 2021

दिन कटे हैं धूप चुनते : समकालीनता के निकष पर by बृजनाथ श्रीवास्तव


समीक्षक:-बृजनाथ श्रीवास्तव
                          
             मेरा यह मानना है और मैने अपने विभिन्न आलेखों एवं समीक्षाओं मे इस बात को कई बार कहा भी है कि समकालीन साहित्य आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रामाणिक दस्तावेज होता है . कलाकार और मूलत: साहित्यकार ही एकमात्र वह व्यक्ति होता है जो समाज, उसकी संस्कृति, उसके मूल्यों और तत्कालीन महापुरुषों को अपने लेखन द्वारा अमरता प्रदान करता है. अनेक  तत्सम्बन्धित कथाओं के माध्यम से देश-काल और भावी पीढ़ियों के लिए उन्हें जीवित रखता है . कहना असंगत न होगा कि महर्षि वाल्मीकि जी की रामायण और महर्षि वेदव्यास की जय संहिता ( भारत –महाभारत )  के कारण ही जीवित हैं राम और कृष्ण और जीवित है तत्कालीन समाज और संस्कृति .एक साहित्यकार की महत्ता को इससे अधिक और क्या मूल्यांकित किया जा सकता है .   
            आज का समय विगत आदिम एवं रूढ़ समय से हजारों साल आगे निकल चुका है वह भी अपनी अनेक अद्यतन व्यवस्थाओं एवं परिवर्तित विशेषताओं के साथ. आज वैश्विक स्तर पर  सामाजिक, आर्थिक ,राजनीतिक और धार्मिक  परिदृश्य में हो रहे  बदलावों को देखा जा सकता है। आज औद्योगीकरण , नगरीकरण , यातायात-परिवहन ,संचार ,सत्वर मशीनीकरण , कम्प्यूटरीकरण ,पूंजी का निजीकरण , वैश्वीकरण , जनस्ंख्या विस्फोट , बाजारों का चीनीकरण, अर्थव्यवस्था का अमेरिकीकरण ,परमाणु विस्फोट , आतंकवाद ,  संस्कृति का पाश्चात्यीकरण, ब्रेन-ड्रेन, सरकारी दायित्वहीनता इत्यादि  परिवर्तनों से घर-परिवार से लेकर सम्पूर्ण समाज का ढांचा ही बदल गया. जहाँ इन बदलावों से कुछ लाभ भी हुए किंतु हानियाँ अधिक हुईं . बुजुर्ग पीढ़ी अकेली तथा असहाय हो गई. , अशिक्षा ,बेरोजगारी ,नशाखोरी , मँहगाई ,दैहिक एवं मानसिक रोगों ने जनसंख्या के अधिकांश भाग को अपने पाश में जकड़ लिया. जीवन के सभी क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचार, शोषण और प्रदूषण व्याप्त हो गये. भौतिकता की अन्धी दौड़ ने हत्या ,डकैती ,अपहरण ,बलात्कार ,रंगदारी, हफ्ता वसूली , जमीनों-मकानों पर बलात्कब्जा करना जैसे जघन्य अपराधों को आम कर दिया . सामाजिक नियंत्रण के सभी साधन बौने प्रतीत होने लगे . आज सर्वत्र भ्रष्टाचार और शोषण एवं विभिन्न अपराध सामाजिक मूल्य के रूप में स्वीकार किये जाने लगे हैं . देश जिम्मेदार व्यक्तियों की दायित्वहीनता के विषम दौर से गुजर रहा है. यहाँ कुएँ ही में भाँग पड़ी है.
              इन सभी उपयुक्त-अनुपयुक्त बदलावों से साहिय जगत भला अछूता कैसे रह सकता है . इसी संदर्भ में प्रतिष्ठित नवगीतकार स्व. दिनेश सिंह ने अपने नवगीत संग्रह ‘ समर करते हुए ‘ में कुछ इस प्रकार कहा है...
             “जो रचना अपने समय का साक्ष्य बनने की शक्ति नहीं रखती ,जिसमें जीवन की बुनियादी सच्चाइयॉ केन्द्रस्थ नहीं होतीं ,जिसका विजन स्पष्ट और जनधर्मी नहीं होता वह अपनी कलात्मकता के बावजूद अप्रासंगिक रह जाती है “
 
             आज साठ वर्ष से ऊपर की  यात्रापथ वाले नवगीत के विशद इतिहास में न जाकर कहना चाहूँगा कि आज समकालीन हिंदी गीत-अर्थात नवगीत की यात्रापथ में अनेक रचनाकारों के बीच एक जाना-पहचाना नाम है समृद्ध नवगीतकार  अवनीश त्रिपाठी  का . वे समय तथा समाज के सशक्त एवं जागरूक अक्षरशिल्पी हैं.अवनीश त्रिपाठी का जन्म  27  दिसम्बर 1980  को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जनपद के ‘ गरये ‘ नामक ग्राम में हुआ था .आपके पिता स्व. रामानुज त्रिपाठी जी एक समृद्ध गीतकार थे .अवनीश जी ने विरासत को दो कदम और आगे बढ़कर  नये परिवेश में अपने को ढालते हुए इसे सँभाला . अभी-अभी वर्ष 2019 में उनका प्रथम नवगीत संग्रह  “ दिन कटे हैं धूप चुनते “ प्रकाशित हुआ जिसे मैने कई बार पढ़ा और मुझे लगा कि कवि आभ्यंतर एवं बाह्य जगत तक की दैनंदिनी पर सूक्ष्म दृष्टि रखे हुए है जिसमें उसके साथ जीवंत हो उठा है समूचा समाज ,समूची प्रकृति . लगता है कि कवि ने अपने अनुभवों को गीतों का आकार देने के मार्ग में अपनी उम्र के केवल उनतालिस  बसंत ही नहीं देखे हैं , उनतालिस पतझड़ भी देखे हैं , कड़कड़ाती ठंड में हाड़ कपाऊ पूस की उनतालिस रातें भी देखी हैं ,और सहनी पड़ी  हैं जेठ की उनतालिस चिलचिलाती दोपहरियॉ, उनतालिस  दीपोत्सव एवं उनतालिस रंगीन फागुनी फुहारें  और  बचपन से उम्र के इस पड़ाव तक देखे हैं , सहे हैं  जीवन के अनेक उतार- चढ़ाव. यही देखे ,सुने ,पढ़े , सहे, समझे, जिये  अनुभव ही कवि के सम्पन्न नवगीतों की  मूल्यवान  पूँजी है अर्थात कवि की धरोहर .           
          यह सच है कि अवनीश त्रिपाठी की रचनाओं का वैचारिक फलक बहुआयामी और विस्तृत है . समाज के विभिन्न संघटकों –सामाजिक ,आर्थिक ,राजनीतिक ,धार्मिक आयामों की समकालीनता  को कवि ने बड़ी ही गहन  और सूक्ष्म दृष्टि से जाँचा, परखा एवं बिलोका है . ‘दिन कटे हैं धूप चुनते ‘ नवगीत संग्रह में कुल अड़तालीस नवगीत रचनाएं संग्रहीत हैं . इन गीतों में जहाँ एक ओर कवि को आपाधापी वाले भौतिकवाद से दिन पर दिन क्षरण हो रहे  अपने सांस्कृतिक मूल्यों की धरोहर को बचाने की जद्दोजहद है जो धीरे-धीरे वैचारिक मुठभेड़ में तब्दील होती जा रही है  तो दूसरी ओर न चाहते हुए भी अपरिहार्य हो जाता है वर्तमान से तादात्म्य रखने की कवायद. जीवन की तमाम संगतियाँ –विसंगतियाँ इसी दोराहे पर आंदोलित होती रहती हैं. इन गीतों में करुणा की सघन सांद्रता है .बेदर्द समय की दुख भरी कथाओं की लम्बी फेहरिस्त है इन गीतों में. ‘अम्मा-बाबू’ में बुजुर्ग पीढ़ी के दुख हैं , ‘ गहरा सूनापन’ ,’सो नहीं पाया मुँगेरी’ , ‘विक्रम हैं बेहाल’ , ‘खिड़की छली गई’ , ‘फिर समय लँगड़ा खड़ा’, ‘भीतर है पुरवाई’ जैसी सशक्त वैचारिक रचनाएँ हैं जो समाज के विभिन्न आयामों के मूल्यह्रास की सच्चाइयों को बयान करती हैं .इन गीतों में जीवंत हो उठे हैं राजनीतिक षड्यंत्र, छल-कपट , मशीनीकरण से उपजी अव्यवस्थायें और अंतत: ऐसा मालूम देता है कि आज पूरी तौर पर  व्यवस्था असमर्थ हो चुकी है बहुत कुछ सँभालने में . ‘ खड़े तथागत सोच रहे हैं ‘ जैसी रचना में व्यवस्थाजन्य असहयोग से उपजी किंकर्तव्यमूढ़ता परिलक्षित होती है ,’ कहाँ गये सब ज्ञानी ‘ में कवि समाज नियामकों और नियंत्रकों की दायित्वहीनता का काला चिट्ठा अनावृत्त करता है. उसे पता ही नहीं चल पाता है कि समाज के जीवन में कब सुख आया . ‘ मंत्र पढ़ें वैदिक’  के माध्यम से  सात्विक और सार्थक आशावाद का संचार होता है . अपराधीकरण और अराजकता इस कदर व्याप्त है कि ‘ बचावें राम रमैया ‘ तक नौबत आ गई है किंतु कवि प्रजापति होता है वह सत्य ,निर्माण एवं मानुषी आस्थाओं के पथ से कभी भी विचलित नहीं हो सकता है और जागरण का आह्वान करते हुए कह उठता है कि ‘ हम मौसम से युद्ध करेंगे ‘  
       संकलन की प्रथम रचना ‘ दिन कटे हैं धूप चुनते ‘ नांदी पाठ करते हुए उपस्थित होती है और संकलन के गीतों की वैचारिकी की बानगी पेश कर देती है .कवि का कहना है कि वह रात भर बहुआयामी कल्पना लोक में विचरता है और दिन कट जाता है धूप के साये ओढ़े अर्थात न तो साकार हो पाती हैं रातों में उपजी सुखमयी कल्पनाएँ और न ही फलवंत हो पाते हैं दिवसों के सकर्मक प्रयास .जो छायाएँ –आश्रय मिलते भी हैं वे होते हैं केवल धूपायी . यही सांसारिकता है और हालत यह कि---
“ रात कोरी कल्पना में दिन कटे हैं धूप चुनते 
भक्ति बैठी रो रही अब तक धुएँ का मंत्र सुनते    
दु:ख हुए संतृप्त लेकिन सुख रहे हर रोज घुनते  “

 ‘ प्यास बोना चाहता है’ में रचनाकार की शिकायत है कि समय का सूरज क्षितिज के द्वंद्व में ही अटक गया वह क्षितिज से ऊपर उठकर ,बाहर निकलकर अभी तक नहीं आ सका है . अर्थात देश को आजादी मिले इस दीर्घ समयांतराल में भी नये दिनों का सूरज ( के सूरज ) अपने सत्ता जंजाल के क्षितिज में ही उलझा पड़ा है उसे जनकल्याण के लिए धूप और प्रकाश लेकर जन सामान्य के बीच आने की जरूरत ही नहीं पड़ी और इधर सूरज और उसके प्रकाश अर्थात जनकल्याणकारी कार्यों के अभाव में पसरा हुआ है घोर सन्नाटा ,असमंजस ,किंकर्तव्यविमूढ़ता . ऐसे में यह अपरिहार्य सत्य हो जाता है कि आम जनजीवन की पीड़ाओं से सराबोर दशा सदैव पुरातनपंथी बंदिशों रूपी फटे-पुराने कपड़ों में ही लिपटी रहे और इस दायित्वहीनता से उपजे समाज में घोर अमानुषता अपराध और भयंकर खून-खराबा अनवरत व्याप्त होता रहे और वह भी सब हठधर्मिता का लबादा ओढ़े तथाकथित ज्ञानियों के द्वारा . दृश्य चित्र देखें ---
“ दूर क्षितिज पर सोया सूरज / सन्नाटों ने लिखीं व्यथाएँ
फटे-पुराने कपड़ों में ही  / लिपटी रहीं सदा पीड़ाएँ    
फिर हठीला ज्ञान रसवंती नदी में / रक्त रंजित हाथ धोना चाहता है “ 
                  
                आज शहरों में अनेक पॉश एरिया विकसित हो चुके हैं जहाँ गगनचुम्बी मल्टीस्टोरीज फ्लैट्स हैं और विशालकाय राजमहल सरीखे भवन . ऐसे माहौल में रहने वालों के चरित्र बड़े ही अमानुष और विचित्र होते हैं .इनके पास असीमित धन-दौलत है ,बँगला है ,कारें हैं-ड्राइवर हैं ,नौकर हैं मोबाइल फोन हैं .इन्हें समाज ,सामाजिकता और आदमी की कोई जरूरत नहीं है और न ही ये किसी से कोई सरोकार ही रखते हैं .एक ही फ्लैट्स में और यहाँ तक कि बगल में ही रहने के बावदूद एक दूसरे से जान –पहचान तक नहीं होती है . न तो कोई मिलता-जुलता है ,न बतियाते हैं. यहाँ के तथाकथित सम्भ्रांत लोगों की सुबहें चाय पीने बाहर नहीं निकलतीं अर्थात बोन चाइना की क्रॉकरी में चाय परोसते हैं नौकर और शामें गुजरती हैं रेस्तराँ अथवा होटलों में इसीलिए कूकरों को सीटियों के बजाने का आदेश ही कहाँ मिलता है  , अय्याशी भरे इस जीवन में चूड़ियों की खनखनाहट और पायलों की रुनझुन की सद्गृहस्थी वाली आवाजो के लिए गुंजाइश ही कहाँ . बल्कि लिफाफों में बंद चिट्ठियाँ ,इशारे और फुसफुसाहटें ही यहाँ की असलियत की दास्तानें कहते हैं . ऐसा महसूस होता है कि प्रकारांतर कवि का आशय है कि ऐसे क्षेत्रों में अवैध देह-व्यापार धड़ल्ले से चलता है .ऐसे एरिया में बुजुर्गों की हालत तो और भी दयनीय होती है .वे अंदर ही अंदर घुटते हैं ,बुदबुदाते हुए अपने दिन काटते हैं ,खिसियाते हैं अपनी आत्मकथा के सुख-दुख किससे बाँटें . घर के सदस्यों के पास इतनी फुर्सत ही कहाँ कि इनसे हाल-चाल पूछें. पॉश एरिया की इस अमानवीय ,एकाकी दशा का शब्दांकन अवनीश की रचना ‘ आवाज कम कर ‘ में देखें ---
“ यह रईसों का मुहल्ला है , आवाज कम कर 
चाय पीने पर निकलती भी नहीं हैं चुस्कियाँ 
अब नहीं बजतीं घरों में कूकरों की सीटियाँ 

टिकटिकाती भी नहीं कोई घड़ी चलती निरंतर 
फुसफुसाती हैं महज अब पायलें औ’ चूड़ियाँ 
बस इशारों में समझते हैं लिफाफे चिट्ठियाँ 
गिट्टियों –सीमेंट वाले मन हुए हैं ईंट पत्थर 
रात दिन बस पोपले मुख बुदबुदाहट ,आहटें 
बिस्तरों से बात करती हैं यहाँ खिसियाहटें 
गेट दीवारें पड़ी सूनी सड़क तू आह मत भर “ 

   ‘ गहरा सूनापन ‘  गीत आम और खास आदमी के बीच विभिन्न क्रिया-कलापों  और जीवन शैली के अंतर के विभिन्न मानकों को लेकर उपस्थित होता है जिसमें वर्तमान भौतिकवादी सत्वर मशीनीकरण – इंटरनेट, सोशल साइट ,टी.वी. विज्ञापन में उलझे हुए आम लोगों की कथा-व्यथा है . आज लोकतंत्र का अधिकांश भाग अपने समय का अधिकांश भाग इन्हीं गतिविधियों में उलझाये रखता है. आम आदमियों के लिए   सरकारी आफिसों की कार्यप्रणाली तो बदलने का नाम ही नहीं ले रही वही मेज ,फाइलों का ढेर , बिखरे कागज , प्रार्थना पत्रों पर फारवर्डिंग दस्तखत, काम में अड़ंगेबाजी और खाने-पीने के नाम पर सुविधा शुल्क लेकर फाइल को आगे बढ़ाना . इसी तरह  विकास के नाम पर अंधाधुंध मशीनीकरण ,सड़्कें ,ट्रक-बसें  उनसे उपजे वायु ,जल और ध्वनि प्रदूषण के आक्षितिज फैले दृश्य चारों ओर समाज में व्याप्त दिखायी पड़ते हैं . यही बहुत कुछ पड़ा है आम आदमी के हिस्से में और खास आदमी के हिस्से में ह्विस्की- शैम्पेन सुरा , बड़ी-बड़ी पार्टियाँ , चियर ,बँगले और नौकर-चाकर अर्थात अय्याशी . देखें अवनीश त्रिपाठी के कवि ने इसे कैसे चित्रित किया है--- 

“ इण्टरनेट ,सोशल साइट से रिश्ता अपनापन 
टी वी चेहरे , मुस्कानों के मँहगे विज्ञापन 
धूप रेत काँटों के ,जंगल ढेरों नागफनी 
एक बूँद बंजर  जमीन पर गाँड़र ,कुश ,बभनी 
धुआँ ,मशीनें , बोल्ट , घिरनियाँ ,केबिन गहरी बातें 
सड़क ट्रकें , शोरगुल चीखें और धुआँती रातें 
व्हिस्की –शैम्पेन ,बड़ी पार्टियाँ आवाजों के चीयर 
बँगले-नौकर ,बूढ़ी खाँसी , गहरा सूनापन  “         
     ‘मंत्र पढ़ें कुछ वैदिक ‘ में कवि के सामने समय के कुछ अमानुष चित्र नर्तन कर रहे हैं ‘ बरगद के नीचे पौधों का टूट रहा सम्मोहन ‘ अर्थात अनुभवसिद्ध पुरानी पीढ़ी से नई पीढ़ी के कोई सरोकार ही नहीं रह गये हैं . नई पीढ़ी अद्यतन के नयेपन में इतना व्यस्त है या यूँ कहें कि अंधी है कि पुरानी पीढ़ी के मान-सम्मान और अनुभव की उसे बिल्कुल ही जरूरत ही नहीं है. दोनो पीढ़ियों की मान्यतायें और जीवन मूल्य इतने अलग-अलग हैं . आखिर बदलते समाज की दिशा लगता अधोमुखी हो चली है . इसी चिंता से ग्रस्त कवि नवनिर्माण के स्वप्न सँजोये समाज के जीवन में नवाशा का संचार करने के लिए हवन करने को आतुर और उद्यत है...
“स्वप्नों की 
समिधाएँ लेकर   
मंत्र पढ़ें कुछ वैदिक,
अभिशापित नैतिकता के घर 
आओ हवन करें “
            हवन के द्वारा अपावन नैतिकता का यह शुद्धीकरण अकारण नहीं है. समाज में व्याप्त इसके अनेक अस्वास्थ्यकर कारण हैं जिन्हें ‘ सो नहीं पाया मुँगेरी ‘के माध्यम से  सपनों की जंजाल-वीथी में उलझाये रखा गये आम आदमी के सरोकार हैं क्योंकि हरे-हरे सब्ज बागों के दिखाये गये सपने उसे  छलते रहे हैं .आज के राजधर्म का यही नंगा चरित्र है. इतना ही नहीं छद्म विकास की आँड़ में सत्वर और विशाल मशीनीकरण ने आम आदमी को बेरोजगार कर दिया है ऊपर से नियामक और नियंताओं का तुर्रा यह कि विकास जोरों पर है और कार्य प्रगति पर है .अब राजधर्म को चिंता है आम आदमी के भूखा की प्रकारांतर से न स्वास्थ्य की , न शिक्षा की ,न जानमाल की सुरक्षा की और न ही रोजगार की .कवि ने यह सब दीन दशा कुछ ही शब्दों में बयां कर दी हैं ...
“ छल रहे कुछ स्वप्न जिसको
नींद की चादर तले 
सो नहीं पाया मुँगेरी 
जागता ही रह गया ” 
तथा---
“ घोर आलोचक समय का 
सुर्खियों में आजकल है 
युग मशीनों का हुआ जब 
भूख की बातें विफल हैं “
    इस अमानुष वक्त में छल-कपटी अराजक तत्वों अर्थात आग और लकड़ी की सभी क्षेत्रों में सत्ता के साथ पुख्ता साँठ-गाँठ है “ साँठ-ग़ाँठ अच्छी है अब तो चूल्हे से लकड़ी तक “ और सत्ता प्रपंच केवल कोरे आश्वासनों तक ही अपनी सीमा बनाये हुए है . आखिर ” भूरे बादल का टुकड़ा “ लू होती इन गर्म हवाओं तक कब और कैसे पहुँचे और अगर उससे जूझना भी चाहे तो भला कैसे जूझे . आज बहुमुखी और बहुआयामी  वृष्टि के अभाव में पड़ गई हैं दरारें अंदर से बाहर तक   अर्थात भूख से पेट की आँतें जितनी खाली-खाली हैं उससे अधिक ही प्यास बढ़ गई है खेतों की. देखिये अवनीश के कवि ने इसे कितने ही कारुणिक शब्दों  में व्यक्त किया है ---
“ जूझ रहा है निपट अकेला / गर्म हवाओं से अब तक 
कहें अभागा या संतोषी / भूरे बादल का टूकड़ा 
तथा---
सूखी आतें खेतों में भी  / पड़ी दरारें मोटी गहरी 
पेट-पीठ में फर्क नहीं कुछ / पिचकी देह, पोपला मुखड़ा “
           
           आपाधापी , भौतिकता की अंधी भाग-दौड़,व्यवस्था का पश्चिमीकरण  इन सबकी सच्चाइयों का पारदर्शी लेखा-जोखा और घर की पोर-पोर टूटन की दास्तानें   ‘ बोझिल चेहरा ‘ और ‘आँगन की बूढ़ी खाँसी’   में  जैसे कितने ही गीतों में शब्दों का आकार ले सकी हैं .कवि के जीवन में कब सुख आया  उसे पता ही नहीं चल पाया है .’ भीतर है पुरवाई ‘ में पाश्चात्यीकरण की बाह्य वशीकरण , पछुवाई ,पुरवाई  के द्वंद्व और हवा-हवाई होती नैतिकता में फँसे अद्यतन की बड़ा ही रोचक और सटीक चित्रण किया है .जिसमें  कवि को बड़ी चिंता है बुजुर्ग पीढ़ी के और मूल्यहीनता का लबादा ओढ़े विगलित होते समाज की .यहाँ तक कि सहयात्री के अभाव में और घर के सदस्यों के बीच में ही उन्हें अकेले एकांतवासी करके छोड़ दिया गया है .न समय से उपयुक्त भोजन-पानी और न ही अपनेपन की प्यार बतकही . शब्द दर शब्द कितना सुंदर चित्र उकेरे हैं अवनीश के करुणाप्लुत हृदय ने –--
“ सही नहीं जाती है घर को / आँगन की बूढ़ी खाँसी /धोखे में ही बीत गया है /अरसा लम्बा हिस्सा / बीमारी के दलदल में ही /जीवन भर का किस्सा / वसा विटामिन रहित सदा ही / मिलता भोजन बासी / सहयात्री के साथ नया / अनुबंध नहीं हो पाया / छतें ,झरोखे , अलगनियों के / साथ नहीं रो पाया / पीड़ाओं का अंतर भी अब / है घनघोर उदासी  “ 
      अद्यतन अपावन ,अराजक और अमानुष परिवेश के संजाल में फँसे आम आदमी की दीन-दशा से रचनाकार पूर्णतया वाकिफ है .यह समाज और समय कवि की अपनी आँखों से देखा हुआ है जाँचा-परखा और भोगा हुआ है . समाज के नियंताओं की कार्यशैली और षडयंत्रों को जीता हुआ कवि किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है और आखिर में कह उठता है कि “ बचावें राम रमैया “ क्योंकि जीवन के विभिन्न आयामों में अपनी दृष्टि के सम्मुख हो रहे अपावन से उपजी विकल्पहीनता की स्थति को कुछ इस तरह बयां करता है कि---
“ अपने पूरे रोब दाब से / चढ़ा करेला नीम / बचावें राम रमैया / टूट गई खटिया की पाटी / बैठें सोयें किस पर / अब उधार की बात करे क्या / गिरवीं छानी –छप्पर  / लेटे हैं टूटे मचान पर / चुप्पी और नसीम / बचावें राम रमैया /बंधक है लाचार व्यवस्था /किससे व्यथा सुनाये /हाल हस्तिनापुर जैसा अब / दुर्योधन धमकाये / राजनीति की दशा हो गई / जैसे नीम हकीम / बचावें राम रमैया / मंदिर-मस्जिद / चर्च हर जगह /आडम्बर-सम्मोहन /माँग और आपूर्ति धार्मिक / व्यापारों के बंधन /टोकड़े-टुकड़े गये बिखेरे /कितने राम-रहीम /बचावें राम-रमैया “ 
         आज विक्रम का सिंहासन प्रश्नों के घेरे में आबद्ध है और अमानुष व्य्वस्था का बैताल प्रश्न पर प्रश्न किये जा रहा है .प्रश्नों के उत्तर और हल की गुंजाइश कहीं  दूर-दूर तक नहीं दिखाई दे रही है .विविध आयामी इन सभी द्वंद्वों से जूझते कवि के पास है अदम्य साहस की पूँजी .साहित्यकार होने के नाते वह उत्तरदायी है साहित्य और समाज के प्रति और कुरुक्षेत्र के मैदान में खड़े किंकर्तव्यविमूढ़  अर्जुन की भाँति आखिर में सार्थक निर्णय लेते हुए उद्घोष करता है कि ---
“ धुंध बहुत है / तुम छुप जाओ / हम मौसम से युद्ध करेंगे / जलता एक अलाव हमारे / मन में हरदम साथ रहेगा / वृक्षों पर्वत घाटी सबके / संतापों का क्रम बदलेगा / कुहरे की आदत गंदी है / अबकी उसको शुद्ध करेंगे / नभ तक पारदर्शिता वाली / अर्थ समझती सीढ़ी होगी / मिथ्याओं का परिवर्तन कर / बस यथार्थ की पीढ़ी होगी / मन में बैठा वहम मिटाकर / हर चेहरे को बुद्ध करेंगे /   नदी ताल पोखर की भाषा / रेत नहीं ,पानी समझेगा / पुलिनों – पगडंडी का अंतर /झीलों का ज्ञानी समझेगा / थरथर करती धाराओं में /जोश भरेंगे क्रुद्ध करेंगे  “ 
         अंततोगत्वा इन बहुआयामी समस्याओं का हल और कल्याणकारी , मानवतावादी ,मानवीय सम्बंधों से रचे-बसे समाज की पुनर्संरचना केवल बुद्धत्व अर्थात बुद्ध दर्शम में ही दिखाई पड़ती है ,ऐसा अवनीश त्रिपाठी के कवि मन का मानना है और उन्होंने कहा भी है कि  “ हर चेहरे को बुद्ध करेंगे “ तथा “ अरे नवागत ! आओ गायें “ आह्वानपूर्ण रचनाओं के माध्यम से . निष्कर्ष और उपसंहारस्वरूप संकलन का अंतिम आह्वानगीत देखें ---
“ विदा-अलविदा कहें-कहायें / अरे नवागत आओ गायें 
फिर कलिंग को जीतें हम सब / फिर से भिक्षुक बुद्ध बनें 
पाटलिपुत्र चलाएँ मिलकर / तथाकथित ही शुद्ध बनें 
चंद्रगुप्त-पोरस बन जायें 
मुस्कानों के कुमकुम मल दें / रूखे-सूखे चेहरों पर 
दुविधाओं के जंगल काटें / संशय की तस्वीरों पर 
कुहरा छाटें , धूप उगायें 
खाली बस्तों में किताब रख / तक्षशिला को जीवित कर दें 
विश्वभारती उगने दें हम / फिर विवेक आनंदित कर दें 
परमहंस के गीत सुनायें
        संकलन के आद्योपांत अनुशीलन के उपरांत मुझे यह कहने में कोई भी संकोच नहीं है कि संकलन की सभी रचनाएँ भाषा एव शिल्प की दृष्टि से कसी हुई एवं समृद्ध हैं जो समकालीनता क्जे निकष पर खरी उतरती हैं . इनमें देहरी के अंदर और देहरी के बाहर विस्तृत संसार के विभिन्न आयामों को बड़ी ही निपुणता ,भावात्मकता, यथार्थता और संजीदगी से जिया गया है . समकालीनता के निकष पर ये गीत पूरी तौर पर खरे उतरते हैं .बड़े अचरज और खुशी की बात है कि अवनीश जी का कवि गौरी-गणेश की परिक्रमा के बजाय जगत के कल्याणार्थ मानुषी आस्थाओं से लबालब बुद्धत्व का आह्वान किया है , वह निस्पृह बुद्ध भिक्षु बनने का आह्वान कर रहे हैं वह अद्यतन राजत्व को कठघरे में खड़ा करते हैं और ‘ पाटलिपुत्र चलायें मिलकर ‘ सामाजिक भेदरहित व्यवस्था की पक्षधरता की बात करते हैं . रचनाओं में मिथकों का प्रयोग न के बराबर है जो कहना है स्पष्ट शब्दावली का आश्रय ग्रहण करते हैं . बचावें राम रमैया जैसी लोकोक्तियों का  यत्र-तत्र प्रयोग दिखायी पड़ता है . भाषा सहज , सरल मनोरम बोधगम्य और सम्प्रेषणीय है . शेष पाठकों के हिस्से में. रचनाओं को पढ़ें ,अनुशीलन करें तदनुसार स्वस्थ समाज के निर्माण में रचनाओं की भागीदारी सुनिश्चित करें . मुझे विश्वास है कि संकल की रचनाएँ अपनी महत्ता को स्वत: प्रमाणित करेंगी.

समीक्षक:---
बृजनाथ श्रीवास्तव 
21, चाणक्यपुरी         
ई- श्याम नगर ,न्यू पी. ए.सी लाइंस
कानपुर-208015
मोबा: 09795111907

पुस्तक का शीर्षक : दिन कटे हैं धूप चुनते  
रचनाकार : अवनीश त्रिपाठी              
वर्ष-2019                                        
प्रकाशक : बेस्ट बुक बडीज टेक्नोलॉजीज प्रा.लि. नई दिल्ली    
मूल्य : रुपये 200/= मात्र

'दिन कटे हैं धूप चुनते' : समकालीन विसंगति एवं खुरदुरे यथार्थ का सूक्ष्म अवलोकन by सत्यम भारती

समीक्षक-सत्यम भारती, जे एन यू
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" गीतों की परंपरा तो सभ्य - असभ्य सब जातियों में अत्यंत प्राचीन काल से ही चली आ रही है । सब जातियों ने लिखित साहित्य के भीतर भी उनका समावेश किया है ....... किसी देश की काव्यधारा के मूल प्राकृतिक स्वरूप का परिचय हमें चिरकाल से चले आते हुए इन्हीं गीतों से मिल सकता है । " ( हिंदी साहित्य का इतिहास, कला मुद्रण, 2005 पृष्ठ संख्या 109 ) 

अचार्य रामचंद्र शुक्ल का यह कथन, गीतों की लंबी एवं चलायमान परंपरा की तरफ ध्यान आकर्षित करता है । जब कोई व्यक्ति खुश होता है तो वह गीत गाता है और जब दुख में होता है तब भी; गांव में ऐसे उदाहरण हमें मिल जाते हैं । मल्हार, मर्सिया, लोकगीत, उत्सव गीत,  रोपाई के गीत, कजरी, ठुमरी आदि समाज में गायन की पद्धति है जो वर्षों से चली आ रही है । इन गीतों की बुनावट एवं स्वरूप पर  अगर ध्यान दें तो हमें मानवता का जीवंत इतिहास, विजय यात्रा,संघर्ष गाथा तथा नैतिकता एक साथ दिखते हैं । इन गीतों में समय-समय पर परिवर्तन होता गया और यह लोकगीत, गीत, छायावादी गीत होते हुए  नवगीत तक आ पहुंचा है । "नवगीत" अपने शिल्प में नवीन प्रयोग, गहन संवेदना ,यथार्थ बोध एवं  संगीतात्मकता के लिए जाना जाता है । अवनीश त्रिपाठी की पुस्तक "दिन कटे हैं धूप चुनते" नवगीतों का वह गुलदस्ता है जिसमें 48 गीतों के संग्रह हैं । सारे गीत मारक, व्यंजनाप्रधान, लोक संवेदना के करीब तथा  समाज की जटिल विसंगतियों एवं मन की द्वंद्वात्मक अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने वाले हैं। 
             इनके गीतों की मुख्य विषय वस्तु की बात करें तो यथार्थ बोध एवं समकालीन सामाजिक समस्याएँ प्रमुख हैं। इनके गीत समाज के खुरदुरे यथार्थ का जीवंत चित्रण करने के साथ-साथ वैयक्तिक मन तथा समाज की विसंगतियों का भी वर्णन करने वाले हैं। एक तरफ गीतकार सत्ता एवं पूंजी के गठजोड़ से उत्पन्न हुई समाज की विसंगतियों का जिक्र करता है तो वहीं दूसरी तरफ आधुनिक मूल्यों एवं पाश्चात्य संस्कृति के दुष्प्रभाव के कारण व्यक्ति के मन में चलने वाली उधेड़बुन ,असमंजस, द्वंद्व आदि को भी समाहित करता है। किसानों की समस्या ,लोकतंत्र में भ्रष्टाचार, दंगा - फसाद, संयुक्त परिवार का विघटन, वैचारिक द्वंद्व ,बाजारवाद का दुष्परिणाम, वृद्धों की स्थिति आदि जैसी समस्याएँ उनके यथार्थ वर्णन की मुख्य विषय वस्तु रही है। यह अनुभूति कपोल-कल्पना कम, व्यापक जीवन अनुभव से ज्यादा प्रभावित नजर आती है -

कितने रावण जलते हैं पर 
सीताहरण नहीं रुक पाया, 
असुरों के विकराल आचरण 
से असहज विकृत हर काया  ।

          किसानों की स्थिति देश में काफी दयनीय है ;दूसरों का पेट भरने वाला किसान, खुद परिस्थितियों का मार झेलता है। न बाजार उसकी भलाई चाहता है और न ही सत्ता। उसके पास आत्महत्या के सिवा कोई दूसरा ऑप्शन नहीं बचता है। भारतीय किसानों की कंगाली एवं परिस्थितियों का जिक्र करते हुए गीतकार उनकी निर्धनता का सटीक चित्र खींचता है-

सूखी आंतें, 
खेतों में भी 
पड़ी दरारें मोटी - गहरी, 
पेट पीठ 
में फर्क नहीं कुछ 
पिचकी देह, पोपला मुखड़ा । 
          चुनाव के समय कितने वादे किए जाते हैं, अगर उसका कुछ हिस्सा भी धरातल पर उतर जाए तो देश का विकास हो जाएगा। कागज पर होने वाले विकास, मुद्दों से भटकाव ,नेताओं का दोहरा-चरित्र तथा स्वार्थपूर्ण नीति लोकतंत्र को खोखला करते जा रहे हैं। जनता निरीह बन गई है, उसे सिर्फ चुनाव के समय याद किया जाता है। जनता का शासन आज उसी के गले का फंदा बनता जा रहा है। कोई भी घटना हो सबसे ज्यादा कीमत जनता को ही चुकानी पड़ती है। गीतकार लोकतंत्र के  इस रवैये से वाकिफ है- 

भोजपत्रों पर कई अनुबंध
अब तक हैं अधूरे
पृष्ठ पर बातें हुईं बस 
अर्थ के आधार की  ।

        गीतकार इन समस्याओं से निजात पाने के लिए हमें समकालीन बनने की सलाह देते हैं। समकालीन से तात्पर्य- शिक्षित, तार्किक,  स्वाबलंबी बनने, सोच - विचार की क्षमता विकसित करने,सवाल पूछने की ताकत, विमर्श तथा आधुनिक होने  से है-

कथ्यों को 
प्रामाणिक कर दें
गढ़ दें अक्षर - अक्षर, 
अंधकूप से बाहर निकलें
थोड़ा और नवीन बनें । 

           लेखक गीतों के माध्यम से आधुनिक मानव - मन में चलने वाले विभिन्न प्रकार की उधेड़बुन एवं चुभन का जिक्र करते हैं। पैसे की चाह, मशीनीकरण, कृत्रिमता, प्रतिस्पर्धा तथा बाजारवादी नीति ने लोगों के मन में कई तरह की समस्याओं को जन्म दिया है। जैसे- कुंठा, संत्रास, आत्महत्या, रिश्तों की टूटन, अनंत  इच्छा, वासना, सूनापन  आदि। उनके गीतों के केंद्र में मध्यवर्गीय परिवार नजर आता है, जो ऑफिस में काम कर कर के थक जाता है। उसके पास अपने परिवार के लिए वक्त नहीं है,वह इंटरनेट और सोशल मीडिया पर सुकून ढूंढना चाहता है , व्हिस्की और शैम्पेन से मन का सूनापन मिटाना चाहता है, मशीनों से दोस्ती करना चाहता है । विडंबना यह है कि उसे घर में वृद्धों की खांसी से परहेज  है-

व्हिस्की - शैम्पेन
बड़ी पार्टियाँ
आवाजों में चीयर, 
बंगले-नौकर 
बूढ़ी खांसी
गहरा सूनापन । 

            चुप्पी, मौन,मन का सूनापन, अवसाद, अपराध बोध आदि वह समस्या है जो व्यक्ति को टूटने पर मजबूर करती है। ऐसे में उसे एक दोस्त की जरूरत महसूस होती है, एक ऐसा दोस्त जिसके साथ वह सुख दुख को बांट सके। पर आज मानव इतना स्वार्थी और एकाकी हो चुका है कि उससे बात करने के लिए सिर्फ कमरे की दीवारें ही बची हैं, कोई अपना नहीं। बुलंदियों पर पहुंच कर भी क्या फायदा जब आपके साथ उस बुलंदी को सेलिब्रेट करने वाला कोई न बचा हो। मन के सूनेपन का अवनीश जी सुंदर वर्णन करते हैं-

धूप तिकोनी, परछाई से 
बातें करती रोती
बाहर पछुआ भले चल रही
भीतर है पुरवाई  ।

" पश्चिमी सभ्यता " कैसे व्यक्ति को चकाचौंध एवं कृत्रिमता में जनता को फंसा कर, उसके मन को ग्रास रहा है; इसका सुंदर वर्णन अवनीश जी के गीतों में मिल जाता है -

कंक्रीट के 
जंगल में अब 
पैकेट का फैशन पसरा है, 
पिज़्ज़ा ,बर्गर 
पेट भर रहे 
मन भूखा कैसे समझाएँ ? 

          व्यक्ति भले ही बाह्य रूप से कितना भी आधुनिक क्यों न हो जाए लेकिन वह विचारों से आज भी  संकीर्ण है। वह एक तरफ  स्त्रियों की अस्मिता एवं मुक्ति पर मंचों पर लंबे- चौड़े भाषण देता है ,लेकिन वही अपने घर में स्त्रियों के साथ भेदभाव करता हैं।  कथनी - करनी में फर्क  और दोहरा मानदंड बीसवीं सदी के मानवों की वृत्ति  बनती जा रही है। यह मध्यवर्गीय परिवार में ज्यादा देखने को मिलता है। एक तरफ समाज स्त्रियों को देवी मान कर पूजा करता है तो वहीं दूसरी ओर उसे डायन बताकर प्रताड़ित । लड़के- लड़कियों के पालन-पोषण में आज भी आर्थिक भेदभाव किया जाता हैं। गीतकार इस बात को प्रतीकों के सहारे कहते नजर आते हैं- 

 दरवाजों ने हिस्से
 बांटे 
 खिड़की  गई  छली ।

           वे समसामयिक विसंगतियों से मुक्ति के लिए अतीत की ओर लौटने की बात करते हैं। अतीत की ओर लौटने से मतलब विचारों से पुरातन होना नहीं है बल्कि अतीत के ज्ञान , नैतिकता एवं शाश्वत मूल्यों को जीवन में उतारने से है, आशावादी बनने से है , प्रकृति के करीब जाने से है, अपनी सभ्यता, संस्कृति, ज्ञान -परंपरा एवं पुरखों पर गर्व करने से है- 

खाली बस्तों में किताब रख
तक्षशिला को जीवित कर दें 
विश्वभारती उगने दें हम
फिर  विवेक आनंदित कर दें  ।

         व्यंग्य का तीखापन उनके गीतों का प्रधान बिंदु रहा है। वे गीतों में व्यंग्यात्मक-शैली का प्रयोग कर उसे और भी चित्त के करीब ला देते हैं।पाठक, भाव- व्यंजना में प्रयुक्त चुटीलेपन से काफी प्रभावित होते हैं । वे शिष्ट समाज पर व्यंग्य करते हुए लिखते हैं -

यह रईसों का
मोहल्ला है जरा
आवाज कम कर । 

             गीतकार की सहानुभूति समाज के निम्न, दमित एवं शोषित वर्ग के लोगों से है। और हो भी क्यों न, वर्षों से यह समाज दमनचक्र का शिकार होता आया है। समाज में जीने वाले हर जाति के गरीब लोग दलित होते हैं, कभी उसे सरकार प्रताड़ित करती है तो कभी महाजन-

केवल धन के उद्बोधन से 
विस्फोटित हैं सभी दिशाएँ, 
शोषित का अवहेलन करतीं
भाव स्नेह की सभी ऋचाएँ । 

           इस पुस्तक का शिल्प हमें काफी प्रभावित करता है ; वाक्य विन्यास छोटे-छोटे हैं लेकिन शब्दों की कसावट उसमें जान डाल देती है । तत्सम ,लोक भाषा, तद्भव, अंग्रेजी के शब्दों का सुंदर प्रयोग यहाँ मिल जाता है। गीतकार संस्कृत के श्लोकों तथा सूक्तों का अपने गीतों में प्रयोग कर नवीन प्रयोग करने की कोशिश करते हैं -

' कर्मयोग निष्काम नहीं है '
 कलयुग की अपनी परिभाषा ,
' स्वस्य हेतवे ' जीवन दर्शन 
स्वर- अक्षर सबकी यह भाषा  ।

          संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, शब्द आदि जैसे व्याकरणिक शब्दों का भावों के धरातल पर नवीन प्रयोग देखें-

अपशब्दों की भीड़ बढ़ी है
आज विशेषण के आंगन में, 
सर्वनाम रावण हो बैठा
संज्ञा शिष्ट नहीं है मन में । 

         अनुप्रास, उपमा ,यमक, उत्प्रेक्षा आदि का सुंदर उदाहरण इनके गीतों में मिलता है;  अनुप्रास का प्रयोग जहाँ वह लयात्मकता लाने के लिए करते हैं तो वहीं उपमा और मानवीकरण आदि अलंकारों का प्रयोग सौन्दर्य निर्माण में। मानवीकरण का एक सुंदर उदाहरण देखें -

धरती के 
मटमैलेपन में
इंद्रधनुष बोने से पहले, 
मौसम के अनुशासन की
परिभाषा का विश्लेषण कर लो।

        अगर कहें कि यह पुस्तक बिंब एवम प्रतीकों का खजाना है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।बिंब और प्रतीक इनके गीतों का प्राण तत्व है ,चाहे लक्षणा एवं व्यंजना शब्द- शक्ति हो या व्यंग्य हो सब जगह प्रतीक एवं बिंब का सजीव प्रयोग मिलता है। इनके प्रतीक परंपरागत, लोक  के करीब तथा वैज्ञानिक है तो वहीं  बिंब ऐन्द्रिय हैं। भावों का सिनेमा दिखाने में इनके यहाँ प्रतीक प्रोड्यूसर का काम करता है तो वहीं बिंब डायरेक्टर का। एक उदाहरण देखें-

बरगद के नीचे
पौधों का
टूट रहा सम्मोहन,
भोजपत्र की 
देवनागरी 
लिपि जैसा है जीवन । 

अंततः यह कहा जा सकता है कि यह पुस्तक  भाव एवं शिल्प दोनों रूप से सुदृढ़ है तथा समकालीन विसंगतियों एवं खुरदुरे  यथार्थ का अवलोकन करती है । यह पुस्तक यथार्थ की समस्याओं से टकराकर भविष्य का मार्ग भी  दिखाती है। 

 # समीक्षक :-
सत्यम भारती 
परास्नातक द्वितीय वर्ष छात्र
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय
नई दिल्ली, 110067
मो. - 8677056002.

'दिन कटे हैं धूप चुनते' : भोगे हुए यथार्थ से परिचित कराते नवगीत by नीलोत्पल रमेश

समीक्षित पुस्तक-दिन कटे हैं धूप चुनते
नवगीतकार-अवनीश त्रिपाठी
वर्ष-2019
पृष्ठ: 128
मूल्य: ₹200 (सजिल्द)
प्रकाशक: बेस्ट बुक बडीज टेक्नोलॉजीज प्रा०लि०,नई दिल्ली-110019
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समीक्षक-नीलोत्पल रमेश
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        भारत उत्सवधर्मी देश रहा है। प्राचीन काल से ही विभिन्न उत्सवों के लिए अलग-अलग गीत गाये जाते रहे हैं। मानव सभ्यता के विकास के साथ-ही-साथ गीत भी विकास पाते गये हैं। वैदिक काल के समय से ही गीतों की परम्परा प्रारंभ हो गई थी। ऋग्वेद में मानव इतिहास के आरम्भिक गीत पाए गए हैं। जिनमें प्रकृति वर्णन, नारी हृदय की कोमलता, दुर्बलता, काम-पिपासा, आशा, निराशा, विरह-वेदना आदि के भाव अभिव्यक्त हुए हैं। ये सभी भाव मनुष्य के विभिन्न कार्य व्यापारों को चित्रित करने में सफल हुए हैं। 
        ऋग्वेद से प्रारंभ हुई गीत की परम्परा हिन्दी साहित्य के इतिहास में विभिन्न कालों से गुजरते हुए आगे बढ़ते-बढ़ते आधुनिककाल तक पहुँच गई। इस अवधि में कई उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं। छायावादी काल के गीतों में इतनी दुरूहता आ गई कि ये गीत आम जनों की समझ से दूर होते चले गए। संस्कृतनिष्ठ शब्दों की भरमार से सामान्य जन इससे अलग होते गए। यही कारण है कि नवगीत की परंपरा प्रारंभ हुई।निराला की एक रचना 'बाँधो न नाव इस ठाँव बंधु, देखेगा सारा गाँव बंधु' से नवगीत का प्रारंभ माना जाता है। यह रचना निराला के एक संग्रह में संकलित है जिसका प्रकाशन 1952 ई0 में हुआ था। इसके बाद 'नवगीत' शीर्षक से राजेन्द्र प्रसाद सिंह ने एक संकलन प्रकाशित किया था। फिर इसी नाम से डॉ0 शंभुनाथ सिंह ने नवगीत दशक ' नामक पुस्तक के तीन खण्ड प्रकाशित किये। लेकिन जिस सहजता के लिए नवगीत लेखन की शुरूआत की गई थी, वह सहजता 1990 ई0 के बाद प्रारंभ हुई। 
        डॉ0 शंभुनाथ सिंह ने नवगीत के संदर्भ में लिखा है कि "नवगीत का मूल अर्थ है गीत की परम्परा को युगानुरूप दिशा में मोड़कर उसे सार्थक और सोद्देश्य बनाया जाये तथा पूर्ववर्ती मध्यकालीन प्रवृत्तियों और आधुनिक रहस्यवादी घेरों से बाहर निकालकर यथार्थ पर प्रतिष्ठित किया जाये।" वहीं कुमार रवीन्द्र ने लिखा है कि "नया गीत चिंतन परक है साथ ही उसने रागात्मकता के नये आयाम भी खोजे हैं। ये आयाम उसकी वस्तु परक दृष्टि से उपजे हैं जिसमें अनुभूति और चिंतन का अधिक प्रौढ़ परिपाक हुआ है।" मधुकर अष्ठाना ने नवगीत के बारे में लिखा है कि "यदि समस्त काव्य रूपों को एक घड़े में रखकर मथा जाये तो जो नवनीत उत्पन्न होगा, उसे नवगीत की संज्ञा दी जाएगी।" राहुल शिवाय ने बहुत ही अच्छे ढंग से गीत-नवगीत को परिभाषित करने की कोशिश की है। उन्होंने लिखा है कि "साठ के दशक के आस-पास जब कविता नई कविता के रूप में विकसित हो रही थी तो गीत को यह कहकर भारतीय साहित्य की मुख्य धारा से, गंभीर साहित्य-विमर्श से अलग करने का प्रयास किया जाने लगा कि गीत में रूमानियत और निजीपन है। आधुनिक बोध और अभिव्यक्ति के लिहाज से गीत की विषयवस्तु को अनुपयुक्त घोषित कर दिया गया। यह वह समय था जब गीत, नवगीत के रूप में विकसित हुआ। नया कथन, मई प्रस्तुति, प्रगतिवादी सोच, नए उपलब्धी नए प्रतीका नए बिम्ब, समकालीन समस्याएँ और परिस्थितियाँ प्रस्तुत करते हुए नवगीतकारों ने ढ़ेरों नवगीत लिखे।" 
       1960 ई0 में नवगीत को साहित्य की मुख्यधारा में लाने का जो प्रयास प्रारंभ हुआ। वह आज भी अनवरत जारी है। इसी कड़ी को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभानेवाले नवगीतकार हैं अवनीश त्रिपाठी इनके नवगीतों में सपाट बयानी नहीं है। यही कारण है कि इनके नवगीतों में नयापन साफ-साफ देखा जा सकता है। 
         'दिन कटे हैं धूप चुनते' अवनीश त्रिपाठी का पहला नवगीत संग्रह है। इसके पहले इनका एक कविता-संग्रह' शब्द पानी हो गए' प्रकाशित हो चुका है। अवनीश त्रिपाठी के नवगीतों में नवगीत के जितने भी रूप हैं, वे सब किसी-न-किसी रूप में विद्यमान हैं। देश के प्रमुख नवगीतकारों में शामिल अवनीश त्रिपाठी के नवगीत हमारे आस पास के परिवेश को अभिव्यक्त करने में सफल हुए हैं। ये नवगीत गीतकार के भोगे हुए यथार्थ का बोध कराते हैं। वे अपनी बातें संकेतों, प्रतीकों और बिंबों के माध्यम से कहने में सफल हुए हैं। 
'दिन कटे हैं धूप चुनते' शीर्षक नामित नवगीत से ही अपनी बात प्रारंभ करता हूँ। इस नवगीत में नवगीतकार अवनीश त्रिपाठी ने लिखा है कि उनका समय कठिन परिश्रम करते हुए बीत रहा है। जीने के लिए जिस सहजता की आवश्यकता पड़ती है, वह सहजता आज के दौर में गायब होती जा रही है। यही कारण है कि श्रमिक वर्ग अच्छे दिन की कोरी कल्पना में ही अपना दिन काट रहा है। वे लिखते हैं कि–
सौंपकर थोथे मुखौटे 
और कोरी वेदना 
वस्त्र के झीने झरोखे
टाँकती अवहेलना 
दुख हुए संतृप्त लेकिन 
सुख रहे हर रोज घुनते। 
रात कोरी कल्पना में 
दिन कटे हैं धूप चुनते। " 

 'महमहाई रात भर' गीत के माध्यम से गीतकार ने रात के बाद प्रकृति में जो परिवर्तन हुआ है, उसका जीवंत चित्र प्रस्तुत किया है। बात में फागुन की फगुनाहट अपने उठान पर है। उस दौरान गीतकार ने जो महसूस किया है, उसे इस प्रकार प्रस्तुत किया है–
" फागुनी अठखेलियों में 
कब महावर चू गया, 
बाँसुरी के अधर चुपके 
राग कोई छू गया, 
धूप की पगडंडियों पर 
फागुनी पदचाप सुन, 
झूमती डाली लता की
महमहाई रात भर। " 

'कहाँ गए सब ज्ञानी' नवगीत के माध्यम से अवनीश त्रिपाठी ने आज के कवियों और नवगीतकारों पर व्यंग्य किया है। वे कहते है कि आज के ये लोग अपने को तीसमार खाँ समझते हैं। ये अपने को इतना महान मानने लगे हैं कि इनके आगे हमारे पूर्वज कहीं नजर नहीं आते हैं। वे लिखते हैं कि–
" फ़ैज और मजरूह साथ ही 
गालिब, केशव, दिनकर, 
इनसे कम ये नहीं मानते 
शिल्प भर रहा पानी। 
चंदन घिसते तुलसी बाबा 
औ कबीर की बानी, 
राम, रहीम सभी आतुर हैं 
कहाँ गए सब ज्ञानी' " 

'खिड़की छली गई' नवगीत के माध्यम से नवगीतकार ने टूटते परिवार की ओर संकेत किया है। एक समय था कि संयुक्त परिवार प्रतिष्ठा का आधार माना जाता था। लेकिन समय इस गति से बदला है कि एकल परिवार ही अब मुख्य हो गया है। इसी दर्द को गीतकार ने इस नवगीत में वाणी देने की कोशिश की है। जिस सामूहिकता का बोलबाला था, वह अब नहीं रहा। वे लिखते हैं:-

"शब्द-अर्थ से दूर रसोई 
करती है अन्वेषण, 
भावों की भावुकता लेकर 
कथ्यों का संप्रेषण। 
दरवाजों ने हिस्से बाँटे 
खिड़की गई छली। " 

'क्या हूँ बता दो' नवगीत के माध्यम से अवनीश त्रिपाठी नवगीत के विषय में व्याप्त भ्रान्तियों पर पूर्व की पीढ़ी से नवगीत के लिए प्रश्न करते हैं कि मैं क्या हूँ? क्योंकि नवगीत के विषय में नवगीतकारों ने इतने वर्गीकरण कर दिए हैं कि नवगीत उलझ गया है।इसीलिए अवनीश का आक्रोशित होना और प्रश्न उठाना स्वाभाविक ही है–

" बिम्ब का प्रतिबिम्ब हूँ या 
नव्यता हूँ, रीति हूँ 
मैं प्रतीकों की चुभन हूँ 
या छुवन हूँ, प्रीति हूँ? 
नवप्रयोगों की धरा पर 
छटपटाता हूँ निरंतर, 
गीत हूँ, नवगीत या जनगीत हूँ 
क्या हूँ बता दो? " 

'अम्मा-बाबू' नवगीत के माध्यम से नवगीतकार ने आज की पीढ़ी की बड़े-बुजुर्गों के प्रति बदलते रवैये का जिक्र किया है। यह पीढ़ी घर के बुजुर्गों पर ध्यान नहीं देती है। घर का बना खाना भी इन्हे पसंद नहीं है। ये दिनभर मोबाइल पर गुजार देते हैं, पर दादा-दादी के पास नहीं जाते हैं। ये सब गंवई संस्कार से दूर होते जा रहे हैं। इनकी जीवन-शैली पिज्जा-बर्गर की होकर रह गई है। अम्मा-बाबू के दुख-दर्द को नवगीतकार ने इस प्रकार व्यक्त किया है–
"सुबह-शाम दिन-रात दर्द से 
टूट चुके हैं अम्मा-बाबू, 
हाथ जोड़कर रोकर कहते 
हे ईश्वर! अब हमें उठाएँ। " 

'भीतर है पुरवाई' नवगीत के माध्यम से अवनीश त्रिपाठी ने पाश्चात्य सभ्यता की गिरफ्त में जकड़ी भारतीय संस्कृति की ओर पाठकों का ध्यान दिलाया है। आज की पीढ़ी अंधी दौड़ में शामिल हो चुकी है। इसी वेदना को नवगीतकार ने इस प्रकार व्यक्त किया है–
" संस्कार की भाषा बदली 
परम्परा कि थाती, 
नूतनता की कड़ी बोलियाँ 
कूट रही हैं छाती, 
चलचित्रों की ओछी हरकत 
से किशोरमन बदला 
मोबाइल के अंधकार में 
खोई है तरूणाई। 
धूप तिकोनी, परछाई से 
बातें करती रोती 
बाहर पछुआ भले चल रही 
भीतर है पुरवाई। " 

'जाग उठी फिर व्यथा पुरानी' नवगीत के माध्यम से नवगीतकार ने सीताहरण का उदाहरण देकर कहना चाहा है कि यह पुरानी कथा आज भी दुहराई जा रही है। सीताहरण के समय तो एक ही रावण था, लेकिन आज तो हजारों रावण हैं जो नित्य-प्रतिदिन सीताओं का हरण कर रहे हैं। इसी को अवनीश त्रिपाठी ने यों व्यक्त किया है–
" कितने रावण जलते हैं 
पर सीताहरण नहीं रूक पाया, 
असुरों के विकराल आचरण 
से असहज विकृत हर काया। 
अक्षर-अक्षर दीप जले हैं 
शब्द-शब्द में राम कहानी 
जाग उठी फिर व्यथा पुरानी। " 

'अरे नवागत! आओ गायें' नवगीत के माध्यम से नवगीतकार ने चंद्रगुप्त के कलिंग-विजय के बाद बौद्ध भिक्षुक बनकर पाटलिपुत्र का राज सिहांसन चलाने की ओर पाठकों का ध्यान दिलाया है। चंद्रगुप्त मौर्य ने जिस प्रकार युद्ध से अपने को अलग कर लिया था, उसी प्रकार से राज सिंहासन चलाने की आवश्यकता है। अवनीश त्रिपाठी लिखते हैं–
"फिर कलिंग को जीतें हम सब 
फिर से भिक्षुक बुद्ध बने' , 
पाटलिपुत्र चलाएँ मिलकर 
तथाकथित ही, शुद्ध बनें, 
चंद्रगुप्त-पोरस बन जायें 
विदा-अलविदा कहें-कहायें 
अरे नवागत! आओ गायें। " 

'दिन कटे हैं धूप चुनते' नवगीत-संग्रह के माध्यम से अवनीश त्रिपाठी ने सहज और सरल भाषा में अपने आस पास और परिवेश को पाठकों के सामने प्रस्तुत करने में ' सफलता पायी है। ये नवगीत हमारे सामने उपस्थित चुनौतियों से लड़ने की प्रेरणा भी देते हैं और उसका समाधान भी करते हैं। यही कारण है कि वर्तमान में लेखनरत नवगीतकारों में अवनीश त्रिपाठी का स्थान अग्रणी है। पुस्तक की छपाई साफ-सुथरी है और प्रूफ की गलतियाँ नहीं के बराबर हैं।

समीक्षक:-
नीलोत्पल रमेश
पुराना शिव मंदिर , बुध बाजार , गिद्दी -ए, जिला - हजारीबाग 
झारखंड - 829108
मोबाइल - 09931117537,08709791120
neelotpalramesh@gmail.com

संवेदना के आलोक में 'दिन कटे हैं धूप चुनते' by मुकेश सिन्हा

समीक्षा:-दिन कटे हैं धूप चुनते (नवगीत संग्रह)
नवगीतकार:- अवनीश त्रिपाठी
प्रकाशक-बेस्ट बुक बडीज
पृष्ठ-128 सजिल्द मूल्य-₹200
समीक्षक:- मुकेश कुमार सिन्हा 
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         नवगीत का इतिहास बहुत पुराना नहीं है। फिर भी, नवगीत आज जन-जन में पैठ बना लिया है। सहजता, सरलता और इसके प्रवाह ने कवियों को नवगीत लिखने को उत्प्रेरित किया। गीत की तरह नवगीत भी प्यार और दुलार पाने की राह में है। आखिर कब तक इसे ‘किनारा’ किया जाता रहेगा? अवनीश त्रिपाठी जैसे साहित्य साधक की बदौलत नवगीत आज लोगों की जुबां पर है।
अवनीश त्रिपाठी का सतत् लेखन महज एक दशक से ही जारी है। कुछेक गीत और कविताओं का सृजन पहले हुआ था, लेकिन परिस्थितिवश कलम सोयी पड़ी थी। हाँ, परिवार में साहित्य का माहौल था। पिता स्व. रामानुज त्रिपाठी जी उच्च कोटि के साहित्यकार थे। अवनीश के प्रथम साहित्यिक गुरु उनके पिता ही थे, जिनकी स्मृतियांँ पुस्तक को समर्पित है। 
आदमी परिस्थितियों से विवश हो जाता है। पिता की वर्ष 2004 में मौत के बाद नवगीतकार का सामाजिक और पारिवारिक दायित्वों के निर्वहण की वजह से कलम से दूरी बढ़ी, ऐसा होना स्वभाविक भी था। किंतु, पिता की प्रेरणा ने नवगीतकार अवनीश को फिर से लेखनी की ओर मोड़ा। उनकी अनवरत् काव्य साधना का प्रतिफल है-‘दिन कटे हैं धूप चुनते’। यह पुस्तक नवगीतों का संग्रह है। इसके पूर्व कविता संग्रह ‘शब्द पानी हो गये’ प्रकाशित है। मसलन, निरंतर लेखनी ने किताबों के सृजन का सिलसिला शुरू कर दिया है, जो शुभ संदेश है!
क्या धूप को चुना जा सकता है? आप प्रश्न पूछने वाले को पागल करार दे सकते हैं, आपकी मर्जी? लेकिन, शीर्षक कविता में मेहनतकशों के परिश्रम का चित्रण किया गया है। धूप को मेहनतकश ही चुनते हैं। गहलौर पहाड़ी का नाम सुना है न! आते-जाते लोगों को खूब चोटिल किया करती। लेकिन, धुनी दशरथ ने गहलौर पहाड़ी के सीना को महज छेनी-हथौड़ी से तोड़ डाली। तोड़ दिया पहाड़ी का गुरूर, पहाड़ी का अभिमान। दशरथ जैसे लोग धूप चुनते हैं-
दुःख हुए संतृप्त लेकिन
सुख रहे हर रोज घुनते
रात कोरी कल्पना में
दिन कटे हैं धूप चुनते।

अब किसी को किसी के दुख से मतलब नहीं रहा है। आप भूख से मरते हैं। आप चोटिल होते हैं, तो होते रहिए? क्या फर्क पड़ता है! आँखें भी सपने नहीं सजाती हैं, क्योंकि आँखें जानती हैं उसके सपनों का मर जाना ही लिखा है। मध्यम और गरीब वर्ग सपने देखकर करे भी तो क्या करे, वह बेचारा है! नवगीतकार को तकलीफ है-
द्वार देहरी 
सुबह साँझ सब
लगते हैं रूठे
दिन का थोड़ा दर्द समझती
ऐसी रात नहीं।
आगे-
अँधियारे का
रिश्ता लेकर
द्वार खड़ी रातें
ड्योढ़ी पर
जलते दीपक की
आस हुई अब कम।
 
गाँव में संवेदना है, गाँव में अपनापन है, गाँव में भोलापन है। गाँव में प्यार है, गाँव में दुलार है। फिर भी गाँव को दुत्कारती नई पीढ़ी शहर की ओर भाग रही है। शहर संवेदनशील नहीं है। बावजूद, शहर की चकाचौंध युवाओं को अपनी ओर खींच रहा है। युवा मन बहक रहा है। शहरी मादकता उसे पागल कर रही है। शहर के लोग प्रेमगीत नहीं गाते, वहाँ चौपाल नहीं लगता, वहाँ समस्याएँ नहीं सुलझतीं, वहाँ बच्चे मिट्टी में नही लोटते। वहाँ सन्नाटा है अपनापन का, सन्नाटा है प्यार और दुलार का। नवगीतकार आगाह करते हैं-
यह रईसों का
मुहल्ला है जरा
आवाज कम कर
गिट्टियों सीमेंट
वाले मन
हुए हैं ईंट पत्थर।

शहर लाख तरक्की कर ले, लेकिन गाँव से शहर गये लोग उबने लगते हैं। शहर में गाँव की तरह स्वच्छ हवा नहीं मिलती! नहीं मिलती मखमली घास, हरे-भरे खेत, दादी माँ के नुस्खे। हाँ, शहर में नागफनी मिलती है। मेज, फाइलें, बिखरे हुए कागज, कसा हुआ दिन, खाना-पीना, धुआँ, सड़क, ट्रक, शोर-गुल और कामकाजी रातें मिलती हैं, लेकिन प्यार का अभाव रहता है! नवगीतकार ने लिखा-
बूढ़ी खाँसी
गहरी सूनापन।

यह केवल पंक्ति नहीं है, बल्कि इसमें दर्द छिपा हुआ है। खाँसी बूूढ़ी हो गयी है, लेकिन कोई देखनहार नहीं है। किसे फुर्सत? शहर तो भागना पसंद करता है, वह ‘ठहरना’ नहीं चाहता। जबकि, गाँव ठहर-ठहर कर लोगों से पूछता है। कोई पीछे छूट न जाये, इसलिए सबको साथ लेकर चलने में विश्वास करता है। शहर में गंवई संस्कृति में पले-बढे़ बुजुर्गोंं की सचबयानी है-‘अम्मा-बाबू’। शहर के घर में आँगन कहाँ? बैठकी कहाँ? अब तो फ्लैटों में जिंदगी सिमट गयी। बच्चांे के हाथ में मोबाइल है, जो व्यस्त हैं गेम खेलने में, चैटिंग करने में। दादा-दादी कोने में सिमटे पड़े हैं। कोई दो बोली बोल दे उनसे? यह भी नसीब नहीं। रोटी खाने वाला मुँह पिज्जा-बर्गर से कैसे संतुष्ट होगा भला? बुजुर्गों की हालत पर नवगीतकार की लेखनी सच में पाठकों को रूला देगी। यह कलम की सार्थकता है।
 पड़े हुए 
 घर के कोने में
टूटे-फूटे बर्तन जैसे
‘अम्मा-बाबू’
अपनी हालत
किससे बोलें, किसे बताएँ
सुबह-शाम
दिन रात दर्द से
टूट चुके हैं अम्मा-बाबू,
हाथ जोड़कर रोकर कहते
हे ईश्वर! अब हमें उठाएँ।

बचपन, जवानी, अधेड़, बुढ़ापा ये चार चरण हैं। बचपन जी-भर खेलने में गुजर जाता है। जवानी की अपनी मस्तानी चाल है। तीसरे चरण में शरीर साथ छोड़ना शुरू कर देता है और चौथे चरण में बीमारियाँ उभर आती हैं। नतीजतन, मानव शरीर में कष्ट होने लगते हैं। चिंताएँ बढ़ जाती हैं। कभी आवाज में तेजी होती, लेकिन एकदम मद्धिम पड़ जाती है। घर-आँगन, खिड़की-दरवाजे, जो जवानी में इंसान की खनक देख चुका है, वो बुढ़ापा का निसहाय रूप देखकर विचलित हो उठता है। बुजुर्गों की उपेक्षा, बुजुर्गों की दारुण-दशा पर नवगीतकार की लेखनी-
दीवारों, खिड़कियाँ
सीढ़ियाँ
लेने लगीं उबासी।
अंतर भी अब
है घनघोर उदासी
वसा विटामिन
रहित सदा ही
मिलता भोजन बासी
सही नहीं
जाती है घर को
आँगन की बूढ़ी खाँसी।

हम वर्तमान में होकर भी वर्तमान में नहीं रहते। वर्तमान में नहीं जीते, वर्तमान में साँस नहीं लेते। हमारी सोच पुरातन रहती है। अब भला कम्प्यूटर युग में ‘टाइपराइटर’ लिए बैठिएगा, तो पीछे छूट जाना लाजिमी है। कम्प्यूटर युग में ‘कम्प्यूटर’ बनना पड़ेगा। जरूरत है समय के साथ चलने की, समय के साथ दौड़ने की। समकालीन बनने की नसीहत जरूरी है-
चुभन
बहुत है वर्तमान में
कुछ विमर्श की बातें हों अब
तर्क-वितर्कों से पीड़ित हम
आओ! समकालीन बनें।
कथ्यांे को
प्रामाणिक कर दें
गढ़ दें अक्षर-अक्षर,
अँधकूप से बाहर निकले
थोड़ा और नवीन बनें

हम मशीन हो गये हैं। मशीनीकरण में हम जी रहे हैं। मशीनी युग में मशीन न बने, तो पीछे छूट जायेंगे, यथार्थ है। मशीनी युग में इंसान के शब्द कोश से नैतिकता, वैचारिकता, इंसानियत जैसे शब्दों का गायब होना चिंता का विषय है। अब दुख पर चर्चा नहीं होती, कोई नहीं पूछता-इतना अपराध क्यों है? पेट का दर्द कोई समझना भी नहीं चाहता। ऐसे में नवगीतकार ने करारा व्यंग्य किया है-
युग मशीनों का
हुआ जब
भूख की बातें विफल हैं।

दिन हमें विचलित करता है। रातें हमें डरा रही है। डर के वातावरण में हम जी रहे हैं। साँस पर गहरा पहरा है। हम ‘तीसरे नेत्र’ की गिरफ्त में हैं। हम मछली से दोस्ती नहीं कर सकते हैं और मगरमच्छ तो मगरमच्छ ठहरा। मतलब, भरोसा नाम की चीज ही नहीं है। कई प्रश्न हैं, जो हमें खाये जा रही है। अपनेपन में भी स्वार्थ की बू आ रही है। नवगीतकार ने लिखा-
माँस नोचते
लाशों के 
व्यापारी सुबहो-शाम

आगे-
गली नुक्कड़ों
चौराहों पर
सहम रही हैं रातें
आगे-
चीख रहे हैं भरी भीड़ में
ममता, दया, स्नेह, आँचल सब

दुनिया इतनी नासमझ नहीं है। उसे मालूम है कि कौन मौत का सौदागर है। कौन जख्म पर नमक डालने को तैयार बैठा है? लेकिन, क्रांति क्यों नहीं? क्यों चुप्पी साधे हुए लोग हैं? बंजर धरती को लहलहाने वाले मौन क्यों हैं? बस्तियों में आखेट का भया क्यों? रातें लंबी क्यों? जानलेवा हवाओें से नवगीतकार बेचैन हैं और लिखते हैं-
कथनी करनी के
अंतर को समझ गये जो
नए चाँद-सूरज भी
क्या अब निकलेंगे?
आगे-
शीतयुद्धों में झुलसती
जा रहीं संवेदनायें
कब उठेगा शोर, किस दिन?
चुप्पियों के मरुस्थल में
बड़बड़ाती हैं हवाएँ
कब उठेगा शोर, किस दिन?

गीतकार उलाहना देता है। कहता है रहनुमा से, क्यों चुप रहा जाये? सपनों का महल ढह रहा है। आशाएँ खंडित हो रहीं हैं। निराशाओं के जंगल में आखिर कब तक सिसकते रहेंगे? गरीब मारा-मारा फिर रहा है, मड़ई के लिए, रोटी के लिए, अंगा के लिए। फिर भी सूख की चादर मयस्सर नहीं। समाज की चुप्पी पर कलम की उलाहना-
मीट्रिक टन-क्विंटल ने आखिर
कुचल दिया माशा-रत्ती को
चुप बैठो, मत कहो किसी से
हत्यारी हो गईं हवायें
नोच रहीं पत्ती-पत्ती को
चुप बैठो, मत कहो किसी से।

कलमकार चुप नहीं बैठ सकता, उसकी कलम खामोश नहीं रह सकती। कलम पैदा ही हुई है सत्ता से टकराने की खातिर। उसकी कलम डरती नहीं, बमों के गोलों से, बंदूक की गोलियों से, बल्कि खुलेआम कहती है-
धूल फाँक हम भूख मिटाते
प्यास बुझाते आँसू से जब
गीत पनपने लगता है तब।
शोषित चीखें खिसियाहट में
सत्ता से टकरातीं हैं जब
गीत उपजने लगता है तब।

गरीब ज्यादा नहीं माँगता? उसके पास सोचने की बहुत ज्यादा संभावना भी नहीं है। वह तो चाहता है कि उसकी मड़ई बची रहे, उसे और उसके परिवार को दो जून की रोटी मिल जाये, बस। दो जून की रोटी के लिए ही वो प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ता है। गर्म हवाओं को पराजित करने के क्रम में कई बार वो खुद जलता है, लेकिन पेट के लिए उसका लड़ना जरूरी है और मजबूरी भी। किसान को कौन नहीं छलता? नीचे के हाकिम से लेकर ऊपर के भगवान तक। गरीब और बेबसी पर नवगीतकार की कलम-
सूखी आँतें
खेतों में भी
पड़ीं दरारें मोटी
पेट-पीठ
में फर्क नहीं कुछ
पिचकी देह, पोपला मुखड़ा।

चिंता करने की परंपरा रही है। चिंतन करना भी जरूरी है, क्योंकि चिंतन करने से ही असफल पुरुष सीख लेता है। घुड़सवार लक्ष्य तक पहुुँच पाता है, बिना रूकावट वैतरणी पार। भारत आध्यात्मिक देश है। ऋषि-मुनियों का गढ़ रहा है आर्यावर्त में। तब परिवेश पर चर्चा होती थी, चिंतन होता। लेकिन अब चिंता करे कौन? चिंतन भी बाजारवाद का शिकार हो गया है। स्थिति सामने है? बाजारी चिंतन से मानवीय हित पर गहरा आघात पहुँच रहा है। सच कहा नवगीतकार ने-
मार्केट वैल्यू
वाले ही अब
संवादों के मीटर
चिंतन भी तो
अर्थवाद से
हो बैठा इंस्पायर।

हम मंगल और मिसाइल की बातें करते हैं। करनी भी चाहिए, लेकिन जड़ को छोड़कर नहीं। हम जड़ को छोड़ रहे हैं। अपनी संस्कृति, अपना संस्कार भूल गये हैं। भारत की ऐसी संस्कृति रही है कि इसका लोग अनुसरण करते हैं, लेकिन वर्तमान पीढ़ी ‘मॉड’ हो गयी है। उसे रोटी पसंद नहीं, भात नहीं खाता, उसका पेट भरता है पिज्जा-बर्गर और चाउमिन से। अब चिट्ठी कौन लिखता? बुजुर्गों से ‘अक्षरज्ञान’ कौन पाता? बुझा-बुझौव्व्वल, बड़ों की सीख के अब मायने कहाँ? ‘भीतर है पुरवाई’ के माध्यम से नवगीतकार ने भारतीय संस्कृति पर संकट के मंडराते बादल को रेखांकित करने की ईमानदार कोशिश की है। कहा-
पीढ़ी नई नहीं सुनती अब
ज्ञान, ध्यान की बातें
अंतर्जाल, फेसबुक, ट्वीटर
की गहरी परछाई
तकनीकी युग में नैतिकता
होती हवा हवाई
पश्चिम की आँधी शहरों से
गाँवांे तक है आई।

कवि की पीड़ा-
संस्कार की भाषा बदली
परम्परा की थाती
नूतनता की कड़ी बोलियाँ
कूट रही हैं छाती।

मोबाइल से तरुणाई खो रही है। चलचित्रों की ओछी हरकत से किशारों का मन बदल रहा है। शर्म और संकोच के भाव खत्म हो गये। समस्याएँ बेलगाम हो गयीं हैं। खुशियाँ भी टुकड़ों-टुकड़ों में बँटा है। ऐसी स्थिति में उम्मीद की किरण दिखायी नहीं देती। नवगीतकार चिंतित होकर कहता है-
बढ़ती सीलन बूढ़ा सूरज
कैसे कितना सोखे।

भारत लोकतांत्रिक देश है। यहाँ सबसे बड़ा लोकतंत्र है। लेकिन, लोकतंत्र के बाद भी लोक से तंत्र दूर हो गया है। यह सबसे बड़ी विडम्बना है कि जनता द्वारा चुने गये जनप्रतिनिधि भी जनता से मुँह चुराने लगे हैं। उनके वादे खोखले साबित हो रहे हैं। ऐसे में नाराजगी स्वभाविक है। गीतकार साफ-साफ लिखते हैं-
मिट्टी महँगी बिकती लेकिन
सस्ता हुआ जमीर।
समस्याओं पर साहेब की उपेक्षा पर व्यंग्य-
पर कानों में तेल डालकर
सोया हुआ वजीर।

किस पर भरोसा किया जाये। हर मोड़ पर छलने को हाथ तैयार खड़ा है। राजनीति...न बाबा न। उस पर भरोसा कैसे? व्यवस्था, अजी जनाब उसकी भी हालत लचर है। ऐसे में गरीब अपनी फरियाद लेकर कहाँ जाये? धरती के इंसान से जब भरोसा उठ जाता है, तो ऊपर बैठे भगवान से आशा टिक जाती है। राम-रमैया बचायेंगे, यह तो अलग प्रश्न है, लेकिन यह पीड़ा है उस गरीब की, जो अच्छे दिन के इंतजार में पता नहीं कब से छला रहा है।
टूट गई
खटिया की पाटी
बैठे, सोये किस पर
अब उधार
की बात करे क्या
गिरवी छानी-छप्पर।
आगे-
केवल धन के उद्बोधन से
विस्फोटित हैं सभी दिशाएँ
शोषित का अवहेलना करतीं
भाव स्नेह की सभी ऋचाएँ
आगे-
खाली पेट रहेंगे सोते
किस्सों में है
राजा रानी।

नवगीतकार व्यथाओं से दुखी हैं। पता नहीं कब से व्यथा की वजह से आँखों में पानी है, लेकिन व्यथा है कि छूटने का नाम ही नहीं ले रही। रावण प्रतीक है बुराई का। हर साल हम रावण के पुतले जलाकर इठलाते हैं। लेकिन क्या घर-घर में राम है? आज इंसानी शक्ल में रावण गली-गली नहीं, बल्कि घर की चहारदीवारी के भीतर ठहाका मार रहा है। नवगीतकार की वेदना-
कितने रावण जलते हैं पर
सीताहरण नहीं रूक पाया,
असुरों के विकराल आचरण
से असहज विकृत काया।

दुनिया मौन है। ऐसे में चिल्लाने से क्या फायदा। नवगीतकार ने लिखा-
बोलते ही
रह गए हम
मंच पर संवाद केवल।

नवगीतकार चित्र गढ़ना चाहता है, लेकिन वो गढ़े कैसे? उसके सामने विवशता है। ईंट अहंकार लिये बैठा है और हर बार ब्रश को मात देने की जुगत में हैं। यहाँ ईंट को प्रतीक के तौर पर रखा गया है। समाज की दशा ऐसी ही है। अहंकार चहूँओर है। ऐसे में स्वस्थ और सबल समाज की परिकल्पना बेमानी ही होगी।
बेड़ी जकड़ी हुई
पाँवों में
कैसे पाँव बढें़?
ऊबड़-खाबड़
दीवारों पर
कैसे चित्र गढ़ें?

इंसान का हमेशा दुख से वास्ता रहता है। दुख ही सच्चा साथी है। सुख तो झलक दिखला जा है। झलक दिखलाकर सुख चला जाता है। आदमी के पाँव में इतने काँटे चूभे होते हैं कि उसे पता ही नहीं चलता कि कब उसके पाँव मखमली चादर पर पड़े हैं।
दुख की पाती पढ़ते-पढ़ते
सुख आया कब पता नहीं
अक्षर-’अक्षर जीवन का मैं
पढ़ पाया कब पता नहीं

साहित्य को साधना चाहिए। जो जितना सधा, उसकी लेखनी उतनी ही प्रखर हुई। ‘सोशल मीडिया’ के प्रभाव से कथित तौर पर लेखकों और कवियों की संख्या बढ़ी है। लेकिन, साहित्य के नाम पर फास्ट फुड रचनाएँ परोसी जा रहीं हैं। कविता में न शिल्प है, न कथ्य, न छंद हैं, न मात्रा। बस जो मर्जी आये, लिख दिये और चिपका दिये सोशल मीडिया पर। आह, वाह, बहुत अच्छा जैसी प्रतिक्रिया पाकर लोग खुद को महाकवि तक समझने लगते हैं। साहित्य क्या है? काव्य क्या है? छंद क्या है? इन चीजों की जानकारी नहीं है, लेकिन धड़ल्ले से रचनाएँ रचीं जा रहीं हैं। नवगीतकार ने साहित्य के घायल होने की स्थिति में पूछा-कहाँ गए सब ज्ञानी?
आज तलक
साहित्य जिन्होंने
कभी नहीं देखा,
उनके हाथों
पर उगती अब
कविताओं की रेखा।

साहित्यकार साहित्य के माध्यम से समाज की बेहतरी चाहता है। उसकी चाहत रहती है कि समाज ज्ञानवान हो! समाज बुद्धिमान हो! समाज में समस्याएँ नहीं, बल्कि विकास हो! नवगीतकार इंसानी मन में बैठे वहम को मिटाना चाहता है, ताकि हर चेहरा ‘बुद्ध’ हो जाये। जो कुहरा आसमान में है, उसको ‘शुद्ध’ करना चाहता है। उसे खुद पर भरोसा है, इसलिए खुलेआम कहता है-
धुंध बहुत है
तुुम छुप जाओ
हम मौसम से युद्ध करेंगे।

साहित्यकार यह कहते रहते हैं कि जब तक कुछ लिख न लूँ, नींद नहीं आती! दिल को चैन नहीं मिलता। मतलब, जिंदगी बेरंग-सी हो जाती है लेखनी के बगैर। सच है कि जब हृदय वेदनाओं से भर उठता है, तो मन को सुकून तभी मिलता है, जब कुछ लिख लिया जाये! हर साहित्यकार की पीड़ा एक सी है। नवगीतकार ने कविता को शुक्रिया कहा और कहा-‘आज तुम्हारी वजह से मेरे जीवन में गीत हैं!’
हर बसन्त था मरुथल जैसा
नीरवता कलरव की प्यासी
थिरकन चहकन भूल गया मैं
भरी भीड़ में गहन उदासी।
हे कविता!
जीवन्त जीवनी
तुमने मुझको गीत बनाया।
छूकर बुझते
अहसासों को
तुुमने मन खंजन चहकाया।

गीत कर्णप्रिय हैं। घर-घर में गीत गाये जाते हैं। लेकिन साहित्य के कथित पुरोधाओं ने इसे मुख्य धारा से अलग करने की कोशिश की। उनके अपने तर्क थे। यह मान्यता थी कि यह गंभीर साहित्य नहीं है। फिर साहित्य के क्रांतिवीरों ने नवगीत रचकर उनलोगों के मुँह पर ताला जड़ा। लेकिन, आज भी वैसा तबका नाक-भौं सिकोड़ता है। वैसे लोगों से नवगीतकार पूछता है-
लेखनी की 
पीर हूँ या
द्वन्द्व हूँ, प्रतिरोध हूँ,
हाशिये पर
हूँ टँगा या
पृष्ठ का प्रतिशोध हूँ?
नव प्रयोगों की धरा पर
छटपटाता हूँ निरन्तर
गीत हूँ, नवगीत हूँ
या जनगीत हूँ
क्या हूँ बता दो?

गीतकार की जिद है-
अपनी ढपली पर हरदम ही
अपने दुखड़े गाता हूँ
राग बेसुरा बुरा भले हो
फिर भी गीत सुनाता हूँ।

उत्कृष्ट शब्दों के धनी अवनीश त्रिपाठी जी ने अंतर्मन से नवगीत रचे हैं। अंतर्मन से रची रचनाएँ ज्यादा पुष्ट होती हैं। लेकिन एक सवाल है कि क्या वाक्य को और सरल या सहज नहीं बनाया जा सकता था? हाँ, नवगीतों में प्रयोग किये गये शब्दों से साहित्यिक पाठकों को नये-नये शब्द मिलेंगे? लेकिन, उन्हें शब्दकोश में अर्थ ढूंढने पड़ेंगे। गीत और नवगीत में सरल और सहज शब्द का प्रयोग आवश्यक है, ताकि उसे पढ़कर एक बार में ही सहजता से समझा जा सके। 
अरे नवागत! आओ गायें।
कुहरा छाँटे, धूप उगायें।।

समीक्षक:-
✍️मुकेश कुमार सिन्हा
                बिहार

प्रश्नों के मध्य उत्तर तलाशती कृति : दिन कटे हैं धूप चुनते' by अनिल पांडेय


'प्रश्नों के मध्य उत्तर तलाशती कृति : दिन कटे हैं धूप चुनते'
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समीक्षक-अनिल पांडेय
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               नवगीत विधा ने निश्चित तौर पर गीतों की शुष्कता को समाप्त करते हुए विषयों के चयन और कहन को विशिष्ट बनाया है| समाज का अंतिम आदमी से लेकर अंतिम स्थिति तक इस विधा के अभिव्यक्ति-दायरे में है| पाठक यहाँ आने के बाद रोता और हँसता नहीं अपितु समय की शिला पर बैठकर बदलते समाज की रंगतों पर चिंतन करने के लिए विवश होता है| यह विवशता इसलिए नहीं है कि कोई मजबूर कर रहा है उसे अपितु इसलिए है क्योंकि यथार्थ परिदृश्य यथास्थिति को त्याग कर बदलाव की मांग पर है| यह मांग मनुष्य को मनुष्यता के मार्ग पर लाने की तो है ही उसे निराशा के गहरे खोहों से बाहर निकालकर उत्सवधर्मी बनाने की भी है|
यह सच है कि समाज का अधिकांश अभावों से भरा जीवन जीने के लिए अभिशप्त है लेकिन सच यह भी है कि अधिकांश जीवन-निर्वहन के प्रति गैर-जिम्मेदार और अव्यावहारिक है| यह अव्यावहारिकता कहीं और से नहीं आई है हमारे अपने परिवेश ने दिया है| उस परिवेश ने जहाँ सूचना क्रांति का उत्सव मनाया जा रहा है| डिजिटल इण्डिया की तैयारियां की जा रही हैं| जन्म और मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की खोज की जा रही है| जीवन को किस तरीके संतुलित रखा जाए इस पर कम, किस तरीके उसे झंझावातों में उलझा कर झूलने के लिए प्रेरित किया जाए, इस पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है|
इन सभी स्थितियों पर विचार करते हुए हम इस पर भी विचार करते हैं कि आम आदमी के जीवन में छांव के कितने भी सुखद एहसास उसके हृदय को उत्सवधर्मी बनाते हों लेकिन छाओं की ईर्ष्या में “दिन कटे हैं धूप चुनते” इस सच से वह इंकार नहीं कर सकता| यह स्वीकार ही कविता का स्थापत्य है और रचनाकार का दायित्वबोध| अवनीश त्रिपाठी का रचनाकार मन इस दायित्वबोध से कितने गहरे में जुड़ा हुआ है वह अपने संघर्षों के उन लम्हों में जाकर आप देख-पढ़ सकते हैं जहाँ “दिन कटे हैं धूप चुनते|” यह संग्रह बेस्ट बुक बडीज, नई दिल्ली से प्रकाशित होकर आया है| 
             अवनीश के पास अपने समय को लेकर कई प्रश्न हैं| सृजन से लेकर समाज की संगति-विसंगति में हो रहे परिवर्तन उन्हें व्यथित करते हैं तो गति-दुरगति के प्रति एक जिम्मेदार भी बनाते हैं| जब उनका व्यथित कवि-हृदय जानना चाहता है कि----
 “क्यों जगाकर
दर्द के अहसास को
मन अचानक मौन होना चाहता है? 
     तो यह प्रश्न भी सहज रूप में जन्म लेता है कि 
“चन्दन घिसते
तुलसी बाबा 
औ’ कबीर की बानी
राम रहीम सभी आतुर हैं 
कहाँ गए सब ज्ञानी?” 
       इधर जिस तरह से ज्ञान का विस्फोट हुआ है हर तरफ वक्ताओं की नई फ़ौज खड़ी दिखाई दे रही है| हर कोई समय का अपनी तरह से अनुवाद कर रहा है लेकिन सार्थक मुद्दों तक न तो पहुँच पा रहा है और न ही तो किसी को पहुँचने दे रहा है| अवनीश यह मानते हैं हवा-हवाई हाथ झटकने से कुछ भी नहीं होने वाला है--
चुभन बहुत है 
वर्तमान में 
कुछ विमर्श की बातें हों अब 
तर्क-वितर्कों से 
पीड़ित हम
आओ समकालीन बनें|
      जब हम समकालीन बनेंगे तो हमारे पास समय की जरूरतों पर विमर्श करने का विवेक विकसित होगा न कि विद्वता दिखाने की मूर्खता| 
        समकालीन होने की स्थिति में अवनीश युवा हैं इसलिए संघर्ष की अधिकांश चिंता अभी-अभी समाज में आए विसंगतियों को लेकर है| यह विसंगतियाँ मीठे में पड़े उस जहर के समान हैं जिन्हें हम खाए जा रहे हैं और यह नहीं समझ पा रहे हैं कि हमारा अंत हो रहा है--
"इंटेरनेट, /सोशल साईट से /रिश्ता-अपनापन" बढ़ाकर “टी.वी. चेहरे/मुस्कानों के/मँहगे विज्ञापन” में हम मशगूल होते जा रहे हैं| यही दुनिया है और यही संसार है|        
        प्यार-तकरार से लेकर मान-मनुहार तक की स्थितियां यहीं घटित हो रहीं हैं और यहीं पर समाप्त हो जा रही हैं| समाज और समुदाय की खोज-खबर तो दूर घर-परिवार में क्या कुछ चल रहा है यह भी देखने-समझने का समय हमारे पास नहीं है| परिणाम यह है कि हमारे सामने “धूप-रेत/ काँटों के जंगल/ ढेरों नागफनी” उग आईं हैं और “एक बूँद/ बंजर जमीन पर/ गाँड़र, कुश, बभनी” फ़ैल चुकी हैं|
            भारत देश में ‘जमीन की उर्वरता’ वैसे भी एक समस्या थी इन समस्याओं ने सामाजिकों को और अधिक उलझा दिया है| जो कुछ ‘खाद, पानी, बिसार’ पूर्वजों के हिस्से से मिल रहे थे उसे इन नव्य माध्यमों ने मृतप्राय कर दिया है| यहाँ आकर जब अवनीश कहते हैं कि “भोजपत्रों के गये दिन” तो यह समझते देर नहीं लगती-
“खुरदरी
होने लगीं जब से
समय की सीढ़ियाँ
स्याह 
होती रात की
 बढ़ने लगीं खामोशियाँ
और 
चिंतन का चितेरा
बन गया जब से अँधेरा
फुनगियों
पर शाम को बस
रौशनी आती है पलछिन
एक बूढ़ी-सी उदासी
काटती है जब घरों में
सिलवटें,आहट, उबासी
सुगबुगाहट बिस्तरों में|” 
       रातें खामोश होती गयीं और सुबहें निराशा में तब्दील| ‘एक बूढ़ी-सी उदासी’ घरों में जो फैली उसके लिए सम्वादहीनता कारण बनी| घर का हर आदमी अपरिचित लगने लगा| कवि यह चिंता उसे अपने समय के यथार्थ से गहरे में जोडती है|  
            सामाजिक संरचना वर्तमान की कुछ ऐसी ही है| परिवेश और परिवार की बदहाली में जातीय विभेदता भी अपना महत्त्वपूर्ण रोल निभा रही है| यहाँ मनुष्य मनुष्य को नहीं देखना चाहता| इस अर्थ में कवि अपने समय की राजनीतिक दुरभिसंधियों से गहरे में पीड़ित रहा| जनता जिस तरीके से वोट का हेतु बनाई जाती है उससे यह तो प्रमाणित हो ही जाता है कि--
‘जीत हार के
पाटों में हम
घुन जैसे पिसते हैं
भींच मुट्ठियाँ
कान छेदतीं
दुत्कारें सहते हैं|” 
      इस दुत्कार में स्वाभिमान तो जाता ही है अस्तित्व के समाप्त होने का भय भी बना रहता है| भय से बचाव के रास्ते में भारतीय ‘लोक’ ‘तंत्र’ से बेदखल तो पहले से था इधर गायब होता जा रहा है| ‘टूटी खटिया पर नेता जी/ बैठ रहे हैं जान-बूझकर/ खेत और खलिहान झूमते/ बोतल, वादे हरी नोट पर/ टुन्न पड़ा है रामखिलावन|” अब यहाँ ऐसा नहीं है कि रामखिलावन पागल या नादान है; दरअसल वह राजनीतिक षड्यंत्रों का शिकार है| देने वाले नेता दारु की बोतल पकड़ा सकते हैं लेकिन उनके जीवन-यापन के साधन उपलब्ध नहीं करवा सकेंगे| इन्हीं विसंगतियों में पड़कर आम आदमी गायब हो जाता है| 
              लोक के गायब होने में ‘अर्थ’ की भूमिका केन्द्र में रही जहाँ ‘क्रूर ग्रहों के कालचक्र में/ फूले-पिचके तन हैं मन हैं|’  ग्रह न रूठते तो कोई गरीब क्योंकर बनता? आम आदमी के पास शक्ति ही क्या है आखिर? वह अभी उठ ही रहा था कि“मीट्रिक टन-क्विंटल ने आखिर/ कुचल दिया माशा-रत्ती को|”  ये रत्ती कोई और नहीं इस अर्थतन्त्र का सबसे अहम् अंग है-आम आदमी| वह खटता रहा और उसे वास्तविक स्थिति से दूर ही रखा गया| जिन्होंने कुछ किया नहीं उसे सब कुछ सौंप कर मुक्त हो जाने का आश्वासन दिया गया| जब अवनीश कहते हैं कि “हम रहे अनजान/ हरदम ही यहाँ/ हाथ के तोते/ अचानक उड़ गये” तो ठगा हुआ चेहरा अपना वर्तमान हो उठता है| विकसित हो रहे समय में यहाँ सामाजिकता नहीं अर्थ महत्त्वपूर्ण है|   
           इधर जब से ‘अंधियारों ने उजियारों के बिस्तर बाँध दिये’ तभी से पर्यावरण की समस्याएँ अपने मूल रूप में वर्तमान है| पूरा ‘सावन रीत’ जाता है बूंद तक का अता-पता नहीं होता| किसानों से लेकर परयावरण पारिस्थितिकी तक के संकट को शब्दों में कह जाना सहज नहीं है क्योंकि इधर ‘चीख, तल्खियों वाले मौसम हैं, बरसात नहीं|” जिस दिन बरसात होगी उस दिन“नदी-ताल-पोखर की भाषा/ रेत नहीं, पानी समझेगा|” यहीं उम्मीदें हरी होंगी और यहीं समय अपने हरेपन में होने का एहसास कर सकेगा| यह एहसास ही उम्मीदों को पंख देने के लिए पर्याप्त हैं| 
           ऐसी बहुत-सी चिंताएं हैं अवनीश त्रिपाठी की जिनके आसपास हम और आप मंडरा रहे हैं| ऐसी बहुत-सी स्थापनाएं हैं इस संग्रह की जो आपको सोचने के लिए विवश करती हैं| बहुत-बातें हैं जिनके माध्यम से आप अपने समय और समाज को दो कदम पीछे हटकर देखने का प्रयास करते हैं तो दो चार कदम आगे बढ़कर उनमें आ रही परिवर्तनों को मानव-जगत के अनुकूल बनाने का साहस करते हैं| यह साहस जितनी सिद्दत से वर्तमान है इस संग्रह में उसका स्वागत किया जाना चाहिए| गीत की भावुकता से दूर तर्कशील प्रश्नों को लाने की वजह से भाषा थोड़ी दुरूह जरूर हुई है लेकिन सम्प्रेषण बहुत सुन्दर बन पड़ा है| यहाँ पाठन के समय शब्दों की खनखन आराम सुनी जा सकती है|

डॉ अनिल कुमार पाण्डेय
हिंदी-विभाग, समाज विज्ञान एवं भाषा संकाय 
लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी, पंजाब 
 मो-8528833317

मंगलवार, 22 जून 2021

नवगीत-साधो यह कैसी सरकार by अक्षय पांडेय

असल में नवगीत की ताकत यही अक्षय पांडेय सरीखे ही स्वर बनेंगे। सत्ता के चरणों में लुढ़के उन महात्माओं को नज़रअंदाज़ करना ही बेहतर, जिन को बुद्धि तक से दुश्मनी है. जुमलों से सत्ता पर काबिज़ होकर क्रूरता की हदें लांघना जिनकी विशेषता हो, उनके प्रशंसक भी जुमला-जीवी ही होंगे। लेकिन हमें इन्हीं कील-काँटों को भोथरा करते हुए रचनारत रहना है - प्रो.राजेन्द्र गौतम, नई दिल्ली

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साधो ! यह कैसी सरकार
बीच सड़क पर बिछा रही है कील-कंटकित तार।

अन्धा भी अब देख रहा है
'राजा की दाढ़ी में तिनका',
'परजा' बैठी है धरने पर
डूब गया रवि 'अच्छे दिन' का,
घोर निशा है दिशा न सूझे  नाव पड़ी मझधार।
 
आँधी ने सब तोड़ दिया अब
टूट-फूट बिखराव गिन रहे,
भगत बोस अशफ़ाक राजगुरु
अपने-अपने घाव गिन रहे,
बेघर हुए सपन आँखों के आंगन में दीवार।  

न्यायालय की नींव हिल रही
सबके भीतर डर बैठा है,
किससे जन फ़रियाद करें अब
जज मुज़रिम के घर बैठा है,
सच के सहचर बिके हुए हैं  टीवी 'औ' अख़बार।
 
मिट्टी की मरजाद बेच कर
इसने सीखा जीने का ढब,
मुरझाये सब फूल डाल के
झड़ने लगे हरे पत्ते अब,
फैली ऐसी हवा विषैली देश हुआ बीमार।  

अक्षय पाण्डेय

नवगीत-सिद्धार्थ होना चाहता हूँ by राहुल शिवाय

अंतर्यात्रा के दौरान हो रही मानसिक उथल पुथल से ऐसे गीत सृज जाते हैं।राहुल शिवाय के गीत संग्रह 'मौन भी अपराध है' के अधिकांश गीत गीत संग्रह के शीर्षक को जस्टिफाई करते हुए उसका प्रबल उत्तर देते हुए प्रतीत होते हैं।राहुल एक सम्वेदनशील और प्रतिबद्ध रचनाकार हैं।उनकी जनपक्षधरता उनकी सजगता का प्रमाण है।उनकी उम्र को देखते हुए उनकी साहित्यिक गम्भीरता उन्हें उनके समकालीनों से अलग करती है।उनके संग्रहों का निरन्तर प्रकाशित होना, नवगीत,दोहों या किसी विषय विशेष पर लगातर कई रचनाकारों को लेकर उस विधा के समग्र अवदान को रेखांकित करने हेतु अनेक संकलन निकालना उनका छन्दोबद्ध कविता के लिए किया गया अमूल्य प्रयास है।
आज 'मौन भी अपराध है' के एक बार दोबारा सारे गीत पढ़े।हर दृष्टि से सारे गीत बहुत उत्कृष्ट हैं।नवगीतों के संकलनों की शृंखला में इस नयी कृति का बहुत बहुत स्वागत.
-सोनरूपा विशाल

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बुद्ध बनना है सरल
सिद्धार्थ होना चाहता हूँ

हाँ वही जिसको
विहग की पीर ने
व्याकुल किया था
हाँ वही जिसको
अचल गम्भीर ने
व्याकुल किया था
मैं उसी सिद्धार्थ का
संकल्प बनकर,
इस समय का
बोध जो मुझमें जगा दे
स्वार्थ होना चाहता हूँ

है बड़ा आसान 
सत को जानकर,
सत को बताना
पर कठिन है
सत कहाँ?
यह खोजने में मन लगाना
हैं बहुत से अर्थ मेरे,
पर सभी को
सार देकर
इस भटकते अर्थ का
परमार्थ होना चाहता हूँ 

क्या जगत है,
क्या जगत में,
अर्थ है या भेद है यह
एक जल
वह भाप है,वह बर्फ है
या स्वेद है वह 
निज ह्रदय के गर्भ में
मैं दो करों को
जोड़ कबसे
बोधि तरु-सा कृष्ण पाकर
पार्थ होना चाहता हूँ 

राहुल शिवाय

नवगीत-अकाज के दिन - गरिमा सक्सेना

गरिमा समकालीन गीत, नवगीत के परिदृश्य में एकदम नये नामों में से एक है। पिछले तीन वर्षों में शायद सबसे अधिक पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली गीतकार कहूँ तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इन वर्षों में उन्होंने लगभग हर मुद्दे पर गीत लिखे हैं। एक तरफ जहाँ गीत का एक संसार पूराने ढांचे को प्रयोगिक नवता देने में जुटा है वहीं गरिमा जी भोगे और दिखाई देने वाले यथार्थ को लिख रही हैं। उनके गीतों में विवधता के साथ नवता की तलाश भाषा के यूरोपीकरण तक दम नहीं तोड़ती.. वह तो विषयगत कुछ नया करने का सोचती हैं। समस्या को समाधान तक ले जाना, उसकी तलाश भी इसी नवता का अंग है।
प्रस्तुत गीतों में कुछ गीत नवगीत के पुराने ढर्रे के हैं जो स्थिति का शोकगायन कर रहे हैं.. वहीं कई गीतों में चेतना और बदलाव की आकांक्षा भी है.. उनके गीतों में.. परदे और डर का लिबास.. स्त्री और यौन शोषण को कितने सलीके से अभिव्यक्त कर रहे हैं.. झूठी क्रांतियाँ ललकार रही हैं..  वो पूछ रही हैं कब तक इन पत्थर के झूठे देवताओं पर चढ़ावा चढ़ाते रहोगो..  क्योंकि ये बरगद तुम्हें पनपने नहीं देंगे अपनी छांव में....-राहुल शिवाय

जठरानल के हिस्से आये 
हैं अकाज के दिन

दौड़ रहीं प्रतिभाएँ
फाइल ले दफ्तर-दफ्तर
कितने सपनों को सलीब-सा
ढोतीं काँधे पर

सदियों जैसे बीत रहे हैं 
जीवन के पल-छिन

लोकतंत्र भी भुना रहा है
बस आशाओं को
सुखमय, अच्छे दिन वाली ही
दंतकथाओं को

आँखों की जेबों से रिस-रिस 
टपक रहे दुर्दिन

सरकारी रिक्तियाँ अधूरी,
झूठे हैं वादे
सुविधाओं के बल पर आगे
निकल रहे प्यादे

ऊपर से शिक्षा-ऋण की 
युवकों को गड़ती पिन

-गरिमा सक्सेना