कवितालोक सृजन संस्थान लखनऊ के सौजन्य से हिन्दी दिवस पर ‘काव्य-गंगोत्री’ सामारोह का आयोजन 15वें राष्ट्रीय पुस्तक मेला मोतीमहल वाटिका लखनऊ में प्रो. उषा सिन्हा पूर्व अध्यक्ष भाषा विज्ञान विभाग लखनऊ विश्व विद्यालय की अध्यक्षता और संस्थाध्यक्ष ओम नीरव के संरक्षण में सम्पन्न हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में अनागत काव्यधारा के प्रवर्तक डॉ. अजय प्रसून और विशिष्ट अतिथि के रूप में उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की संपादक डॉ. अमिता दुबे एवं साहित्यिक संस्था सुंदरम के अध्यक्ष नरेंद्र भूषण उपस्थित रहे। आयोजन के प्रथम चरण में आमंत्रित चौबीस हिन्दी सेवी रचनाकारों को उत्तरीय और सम्मान पत्र भेंट कर ‘साहित्य गंगोत्री’, ‘काव्य गंगोत्री’ और ‘ग्रंथ गंगोत्री’ मानद उपाधियों से सम्मानित किया गया। इस सत्र का संचालन कविवर सुनील त्रिपाठी ने किया। दूसरे चरण में कवितालोक के पिछले आयोजन की स्मारिका ‘गीतिका गंगोत्री’ का लोकार्पण अध्यंक्ष, मुख्य अतिथि और विशिष्ट अतिथियों द्वारा किया गया, जिसे उपहार स्वरूप भेंट करने वाले सुभाञ्जलि प्रकाशन के संचालक डॉ. सुभाष चन्द्र को 'ग्रंथ गंगोत्री' सारस्वत सम्मान से विभूषित किया गया। काव्य गंगोत्री के तीसरे चरण में हिन्दी दिवस पर काव्यपाठ का क्रम प्रारम्भ हुआ जिसमें रचनाकारों ने हिन्दी की विभिन्न विधाओं में मनोहारी काव्यपाठ प्रस्तुत किया। इस सत्र का संचालन संस्थाध्यक्ष ओम नीरव ने किया। वाणी वंदना से काव्य-गंगोत्री का प्रारम्भ करते हुए ओज कवि उमाकान्त पाण्डेय ने इन पंक्तियों से श्रोताओं को भाव विभोर कर दिया-
माँ शरदे करूँ मैं शत-शत तुम्हारा वंदन,
सब काट दो मनस के जितने पड़े हैं बंधन।
श्याम फतनपुरी ने गीतिका के माध्यम से हिन्दी-प्रयोग का सार्थक संदेश देते हुए कहा-
विश्व-पटल पर श्याम, बढ़ेगा भारत अपना,
हिन्दी में तुम अगर, राष्ट्र व्यवहार करोगे।
पद्मकांत शर्मा प्रभात ने हिन्दी के गौरव की बात को कुछ इसप्रकार व्यक्त किया -
जन जन के प्राण प्राण में है बसी हुई
हिंदी हमारे राष्ट्र का गौरव निशान है
सौरभ टण्डन 'शशि' की इन पंक्तियों को सराहा गया
प्रेम घुला हर शब्द में, रखना मुझे सँभाल,
भारत की पहचान हूँ, सुन हिन्दी के लाल ।।
डॉ अशोक अज्ञानी ने इन पंक्तियों ने श्रोताओं को वाह-वाह करने पर विवश कर दिया-
हिन्दी का वही हाल है हिन्दोस्तान में
लाचार बाप की ज्यों बेटी जवान है।
डॉ अजय प्रसून ने हिन्दी के पक्ष में स्वर मुखरित किया-
जिसका शब्द शब्द मधुरिम है जिसमे भाव भाव पूरित है ।
जिसकी लिपि है देवनागरी, उसमें मानवता संचित है ।
यह देवों की मनोकामना मन में आठों प्रहर रहेगी ।
नरेंद्र भूषण की बात पर खूब वाहवाही मिली-
मान करें हर भाषा का,पर /हिन्दी पर अभिमान करें हम।
चर्चा हर भाषा की हो,पर/हिन्दी का गुणगान करें हम।
दिनेश कुशभुवनपुरी ने सशक्त स्वर अपने विचार व्यक्त किए कुछ ऐसे-
दुविधा अब मत पालिए, ये है अपना देश।
हिंदी का गौरव बढ़े, ऐसा करो विशेष॥
उमा शंकर शुक्ल ने हिन्दी के पक्ष में पढ़ा तो श्रोता झूम उठे-
मान हमारा शान हमारी हिन्दी है ।
हमको प्राणों से भी प्यारी हिन्दी है ।।
शोभा दीक्षित भावना ने मन के उद्गार इसप्रकार व्यक्त किए-
नीले अम्बर का व्याकरण इसमें,
संस्कृति का सुवास है हिंदी।।
निवेदिता श्रीवास्तव ने गागर में सागर भरते हुए कहा-
हिन्दी भाषा पूज्य है, करें सदा सम्मान।
हिन्दी माता तुल्य है, दूजी मौसी जान।
संध्या सिंह के दोहे को श्रोताओं ने भरपूर सराहा-
हिंदी में अनुभूतियाँ हिंदी में उद्गार ।
बाकी सब अनुवाद है हिन्दी मूल विचार।
मन मोहन बाराकोटी ‘तमाचा लखनवी’ ने सुनाया -
क्यों मातृ-भाषा’ अपने’ ही’ घर में है उपेक्षित,
हिन्दी बिना है’ देश का’, शृंगार अधूरा।
डॉ मंजु श्रीवास्तव ने हृदय के उद्गार कुछ इसप्रकार व्यक्त किए-
हँसाती है, रुलाती है, मनो को गुदगुदाती है,
हमारी मातृभाषा ये सरस गङ्गा बहाती है।
सुनील त्रिपाठी ने करतल ध्वनि के बीच पढ़ा-
पढ़ें लिखें बोलें हिन्दी हम हिन्दी से जोड़े सबको,
बात करें जब हिन्दी की तो दिल में हिंदुस्तान रहे।
ओम नीरव ने सुनाया -
भारत के जन-मन बसी, सुन्दर सरस सुगम्य।
माँ वाणी की वत्सला, हिंदी परम प्रणम्य।
काव्य पाठ से आयोजन को शिखर तक पहुंचाने वाले अन्य कवियों में मुख्य थे- डॉ उषा सिन्हा धीरज श्रीवास्तव, डॉ अमिता दुबे, डॉ कैलाश नाथ मिश्र, उमा शंकर शुक्ल, पारसनाथ श्रीवास्तव।
साहित्य एक विशद अनुभूति है और वह अनुभूति मानव मन में बसी है.....आइए महसूस करें उस अनुभूति को....😊
शनिवार, 16 सितंबर 2017
पुस्तक मेला लखनऊ में कवितालोक द्वारा 'काव्य-गंगोत्री' का आयोजन
रविवार, 10 सितंबर 2017
'साहित्य सेवा संस्थान' मिल्कीपुर, फैज़ाबाद द्वारा कवि सम्मेलन एवं सम्मान समारोह ‘ राष्ट्रीय पुस्तक मेला मोतीमहल वाटिका लखनऊ'
डॉ. लालता प्रसाद पाण्डेय 'साहित्य सेवा संस्थान' मिल्कीपुर, फैज़ाबाद के सौजन्य से एक कवि सम्मेलन एवं सम्मान समारोह का आयोजन ‘ राष्ट्रीय पुस्तक मेला मोतीमहल वाटिका लखनऊ' मे वरिष्ठ कवि एवं कवितालोक के संस्थापक आचार्य ओम नीरव जी की अध्यक्षता और उमाकान्त पाण्डेय के संयोजन और संचालन में सम्पन्न हुआ। समारोह में राष्ट्रीय कवि एवं मंचो के प्रसिद्ध सञ्चालक कमलेश मौर्य 'मृदु'मुख्य अतिथि ,प्रमुख अतिथि जबलपुर म.प्र. शासकीय महा विद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. श्रीकृष्ण तिवारी और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की संपादक डॉ. अमिता दुबे जी,प्रसिद्ध मंच सञ्चालक एवं ओज कवि आदरणीय राम किशोर तिवारी जी,ओज कवि आदरणीय केदार नाथ शुक्ल ,डॉ. अशोक अज्ञानी जी,श्री सुनील कुमार बाजपेयी जी ,सुश्री निवेदिता श्रीवास्तव जी,डॉ मंजु श्रीवास्तव जी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। समारोह के प्रथम चरण में संस्था के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ विमलासन पाण्डेय और कोषाध्यक्ष सुरेन्द कुमार पाण्डेय ने उत्तरीय और सम्मान पत्र भेंटकर मंचस्थ कवियों को सम्मानित किया। उसके बाद अध्यक्ष आचार्य ओम नीरव और श्री कमलेश मौर्य 'मृदु' जी विशिष्ट अतिथि आ डॉ अमित दुबे जी और केदार नाथ शुक्ल जी द्वारा कुल 22 कवियों को , साहित्य भूषण और काव्य भूषण सम्मान से विभूषित किया।कार्यक्रम में कवि अब्दुल हफ़ीज खाँ की कृति'मेरी कविता मेरी सोच' का लोकार्पण हुआ। सम्मान समारोह एवं कवि सम्मेलन का संचालन संस्था के सचिव /संयोजक उमाकान्त पाण्डेय ने किया।
कवि सम्मेलन का प्रारम्भ ओज कवि केदारनाथ शुक्ल जी की वाणी वन्दना से हुआ।
श्रृंगार की मीठी फुहार छिड़कते हुए कवि संजय साँवरा ने
अधरों से कोई जाम पिलाये तो क्या करें।
पानी ही स्वयं आग लगाये तो क्या करें।
पढा तो पंडाल में श्रृंगार की धारा बहने लगी
कवि अशोक अज्ञानी ने पढ़ा
रास लीला कृष्ण की लिखना बहुत आसान लेकिन,
गोपियों के आसुँओं का मोल कोई क्या लिखेगा।
हास्य कवि सन्दीप अनुरागी ने जब पढा
यतना जादा चोटान छोटे सब खाना पानी भूला है।
भोरहे शीशा मा मुंह देखिस तौ हनोमान कस फूला है।
तो हँसी का फौव्वारा छूट गया।
कवि सम्मेलन की दिशा बदलते हुए बाराबंकी के डॉ शर्मेश शर्मा ने जब देश प्रेम की पंक्तियाँ
न लिक्खेंगे अगर शर्मेश दर्पण बोल उट्ठेगा,
दूध को दूध औ पानी को पानी कौन लिक्खेगा।
तो श्रोता रोमांचित हो उठे।
काव्य मंच को ग़ज़ल की मिठास की ओर मोड़ते हुए मिज़ाज़ लखनवी ने पढा
चला गया भी अगर छोड़के मैं ये दुनिया।
मिज़ाज़ बनके रहूँगा वजूद में सबके।।
हास्य कवि अजय प्रधान ने
चलना ही जिंदगी है मेले ठेले में चलो,
पर रेलों में चलो तो कफ़न बाँध के चलो।
कवि मुकेश मिश्र ने
कहूँगा इसे आज दुर्भाग्य ही जो नहीं देश में सर्व स्वीकार हिंदी।
सुनील बाजपेयी ने पढ़ा-गाँव गया था कुछ दिन पहले, बीबी बच्चों को भी संग ले।
उनको अपना गाँव दिखाने, खुद भी देखा इसी बहाने।
कवि कुमार तरल ने पढ़ा-
जो शीतल चाँदनी बनकर उतर आते हैं धरती पर।
सुबह की रोशनी बनकर बिखर जाते है धरती पर।
कवि हरीश लोहुमी जी ने पढ़ा
विष धर सम हर व्यक्ति है, उर-उर गरल प्रधान।
पुनः कीजिए हे प्रभो!मान सहित विष पान।
मंचो के संचालक आदरणीय राम किशोर तिवारी जी ने वीरगाथा काल भक्ति काल रीतिकाल से लेकर छायावादी युग तक हिंदी पर सवैया छंद पढ़कर सबका मन मोह लिया।
डॉ श्री कृष्ण ने
किससे कहें कि तुम चलो मेरे जुलूस में ,
इन बस्तियों के लोग सब नामर्द हो गये।
ओज कवि आदरणीय केदार नाथ शुक्ल ने
उचित बात भी पक्षपात बस टलने लगती है।
तभी हमारी रुकी लेखनी चलने लगती है।
मुख्य अतिथि श्री कमलेश मौर्य मृदु ने समसामयिक विषय पर कविता पढ़ी कि
हमार मन करे हम बाबा बनि जाई।
अध्यक्ष आचार्य ओम नीरव जी ने सुनाया -
सत्य ने सिर उठाया तनिक जो कहीं,
झूठ की संगठित हो गईं टोलियाँ।
इसके अतिरिक्त कार्यक्रम में
सुश्री निवेदिता श्रीवास्तव,श्री योगेश चौहान, श्री मनीष मगन,श्री बिपिन मलिहाबादी,हास्य कवि श्री चेतराम अज्ञानी,सहित कई कवियों ने काव्य पाठ किया।कार्यक्रम का समापन कार्यकारी अध्यक्ष डॉ विमलासन पाण्डेय के आभार ज्ञापन से हुआ।
शुक्रवार, 18 अगस्त 2017
लखनऊ में कवितालोक सृजन संस्थान का 'गीतिका-गंगोत्री' महोत्सव एवं सम्मान समारोह
‘गीतिका गंगोत्री’
कवितालोक सृजन संस्थान के सौजन्य से हिन्दी गीतिका को समर्पित ‘गीतिका गंगोत्री’ और सम्मान समारोह ‘गागर में सागर’ राष्ट्रीय पुस्तक मेला मोतीमहल वाटिका हजरतगंज लखनऊ मे वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अनिल मिश्र की अध्यक्षता और गीतिकाकार सुनील त्रिपाठी के संयोजन में सम्पन्न हुआ। समारोह में साहित्यगंधा के संपादक यशभारती सर्वेश अस्थाना मुख्य अतिथि और उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की संपादक डॉ. अमिता दुबे विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहीं। समारोह के प्रथम चरण में संरक्षक ओम नीरव ने उत्तरीय और सम्मान पत्र भेंटकर तीस गीतिकाकारों को गीतिका गंगोत्री, तीन काव्य साधकों को ‘काव्य गंगोत्री’, साहित्यसेवी प्रकाशक सुभाष चंद्रा को ‘प्रकाशन गंगोत्री’ और राष्ट्रीय पुस्तक मेला के संयोजक देवराज अरोड़ा को ‘ग्रंथ गंगोत्री’ सम्मान से विभूषित किया। सम्मान समारोह का संचालन सुनील त्रिपाठी ने किया। दूसरे चरण ‘गीतिका गंगोत्री’ में गीतिकाकारों ने हिन्दी गीतिकाओं की सरस धारा प्रवाहित कर श्रोताओं को रस-विभोर कर दिया। गीतिका गंगोत्री की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि इसका संचालन करते हुए गीतिका-विधा के प्रवर्तक ओम नीरव ने काव्य-पाठ के बीच-बीच पढ़ी गयी प्रत्येक गीतिका के आधारछंद, मापनी, समांत, पदांत आदि की रोचक व्याख्या कर श्रोताओं को आश्चर्य चकित कर दिया। मंजुल मंज़र लखनवी की वाणीवंदना से प्रारम्भ हुई गीतिका गंगोत्री में काव्य पाठ करते हुए उमाकांत पाण्डेय ने गीतिका का परिचय कराते हुए यह युग्म पढ़कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया-
यह छंद जिसपर मैं पढ़ रहा हूँ प्रसिद्ध वाचिक अनंगशेखर,
लगालगागा की मापनी पर यही तो नीरव की गीतिका है।
मनकापुर से पधारे धीरज श्रीवास्तव ने जीवन के कटु यथार्थ को अपनी गीतिका में कुछ इसप्रकार ढाला-
और भी पाना बहुत कुछ ज़िंदगी तुमसे हमें,
कब कटा जीवन किसी का चुंबनी उपहार पर।
वरिष्ठ कवि मधुकर अष्ठाना की गीतिका के इस युग्म पर श्रोता बरबस वाह-वाह कर उठे-
अर्थ की खोज में व्यर्थ से शब्द हैं,
कल्पना पांखुरी-सी झरी रह गयी।
छंदाचार्य रामदेव लाल विभोर ने अपनी गीतिका में युग को दर्पण दिखाते हुए कहा-
कलयुग है रंग लाया कहते विभोर सच-सच,
अब कृष्ण का न द्वापर, अब राम का न त्रेता।
कानपुर से आयीं डॉ. मंजु श्रीवास्तव ने दासता की वेदना को अपने युग्म में ढालते हुए कहा-
नापते पंछी रहे जो नित्य ही धरती-गगन
मुस्कराकर बंद पिंजड़े में भला कैसे रहें।
गोंडा से पधारे उमाशंकर शुक्ल की गीतिका में सामाजिक विकृति का प्रतिबिंब देखने को मिला-
दुर्व्यसनों में लिप्त और जो है व्यभिचारी,
नैतिकता का पाठ आजकल वहीं पढ़ाता।
बिजनौर से पधारे गीतिकाकार मनोज मानव ने मनहर घनाक्षरी पर आधारित गीतिका सुनाकर श्रोताओं को तालियाँ बजाने पर विवश कर दिया-
बढ़ रहे अपराध, सैकड़ों, न एक आध,
खतरे में घिरी हुई आन-बान शान है।
घर-घर की कहानी, नशे में लूटी जवानी,
झूम रहे युवकों को लठियाना चाहिए।
संयोजक सुनील त्रिपाठी ने लेखनी के धर्म को कुछ इसप्रकार उजागर किया-
सत्य लिखने का अगर साहस न हो तो,
व्यर्थ है इस लेखनी को फिर उठाना।
हरीश चन्द्र लोहुमी के इस युग्म पर बहुत वाहवाही मिली-
पथिक काव्य के भूल मत जाइयेगा,
सृजन से सजी वीथिका का निमंत्रण।
राहुल द्विवेदी स्मित ने गीतिका विधा पर गीतिका सुनाते हुए कहा-
छंद की शुद्धता सौम्यता के लिए,
अनवरत है समर्पित विधा गीतिका।
गोला गोकर्णनाथ से पधारे राम कुमार गुप्त ने कहा-
ज़िंदगी घन के लिए केवल घुटन है।
बूंद का हरबार ही जीवन पतन है।
वरिष्ठ गीतिकाकार श्याम फतनपुरी ने बेटियों को समर्पित युग्म पढ़कर तालियाँ बटोरी-
बेटियों को है बचाना अब हमें बढ़कर,
स्वप्न उनकी आँख नें भी खूब सजते हैं।
ओम नीरव ने सुनाया -
सत्य ने सिर उठाया तनिक जो कहीं,
झूठ की संगठित हो गईं टोलियाँ।
अध्यक्षीय काव्यपाठ करते हुए डॉ अनिल मिश्र ने गीतिका का एक नए स्वरूप में प्रस्तुत करते हुए श्रोताओं को रस-विभोर कर दिया -
आओ यशुदा दुलारे हाँ हमारे अंगना।
आओ यमुना किनारे हाँ कामारे अंगना।
मुख्य अतिथि सर्वेश अस्थाना ने गीतिका गंगोत्री को एक अभूतपूर्व परिकल्पना बताते हुए हिन्दी-सेवा के लिए कवितालोक की सराहना की। विशिष्ट अतिथि डॉ. अमिता दुबे ने इस आयोजन को काव्यशिल्पियों के लिए उपयोगी बताते हुए कवितालोक का एक कार्यशाला के रूप में स्वागत किया। गीतिका गंगोत्री में गीतिका-गुंजन करने वाले अन्य कवियों में मुख्य थे- मंजुल मंजल लखनवी, सौरभ टंडन शशि, रेनू द्विवेदी, डॉ अजय प्रसून, कुमार तरल, आभा मिश्रा, विपिन मलिहाबादी, अशोक अवस्थी, चेतराम अज्ञानी, केवल प्रसाद सत्यम, नागेंद्र सोनी, गौरीशंकर वैश्य विनम्र, सुंदर लाल सुंदर, डॉ उमेश श्रीवास्तव, डॉ प्रेमलता त्रिपाठी,डॉ हरि फैजाबादी।
रपट- सुनील त्रिपाठी, लखनऊ
मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016
चंद्रवाटिका शिक्षा निकेतन महोना में काव्यशाला का सफल आयोजन
कवितालोक
------------- दिनांक-25/10/2016
कवितालोक सृजन संस्थान लखनऊ के तत्वावधान में काव्यशाला का आयोजन महोना के चन्द्र वाटिका शिक्षा निकेतन में व्यवस्थापक डॉ० सी.के. मिश्र जी के सौजन्य से व संस्थान के संरक्षक श्रीओम नीरव जी के संरक्षण में किया गया। आयोजन की अध्यक्षता वरिष्ठ गीतकार डॉ. अजय प्रसून जी ने की और संयोजन और संचालन युवा कवि राहुल द्विवेदी स्मित ने किया। मुख्य अतिथि के रूप में महेश अष्ठाना जी और विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. अशोक अज्ञानी जी तथा मिज़ाज़ लखनवी जी उपस्थित रहे।
काव्यशाला का प्रारम्भ मिज़ाज़ लखनवी जी की सुमधुर वाणी वंदना से हुआ । इस अवसर पर अनेक कवियों ने छंद, मुक्तक, गीत, गीतिका, ग़ज़ल, व्यंग्य आदि के द्वारा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर लिया ।
कार्यक्रम का सबसे रोचक दौर तब रहा जब विद्यालय के बच्चों ने अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के आधार पर मंचासीन अतिथि व विशेषज्ञों से साहित्य व कविता के सन्दर्भ में अपने प्रश्न पूछे और उनका संतुष्टि पूर्ण उत्तर प्राप्त किया । प्रश्न पूछने वाले बच्चों में तौहीद समानी (कक्षा-१०), महविश शेख (कक्षा-९), गौरव चौरसिया (कक्षा-८) तथा रिया मिश्रा (कक्षा-८) आदि प्रमुख रहे ।
साथ ही कार्यक्रम के दौरान मिज़ाज़ लखनवी जी को 'गीतिका लोक रत्न सम्मान' और डॉ अशोक अज्ञानी जी को 'कवितालोक रत्न सम्मान' से सम्मानित भी किया गया ।इस अवसर पर :-------------
डॉ अजय प्रसून जी ने 'एक तीखी कटार है यारों, ये ग़ज़ल धारदार है यारों । मेरी ग़ज़ल ने जो भी बाँटा है, वो मेरे मन का प्यार है यारों ।।'
ओम नीरव जी ने 'सांवरे न बाँसुरी की धुन पे रहे भरोस, कालिये भी बाँसुरी बजा के डसने लगे ।'
महेश अष्ठाना 'प्रकाश' जी ने 'वंदे मातरम, वंदे मातरम, करें शहीदों को नमन। '
डॉ अशोक अज्ञानी जी ने 'गांव का ताल, अपनी दुर्दशा पर रोता है, लोग गंगा को बचाने की बात करते हैं ।'
मिज़ाज़ लखनवी जी ने 'जिंदगी दे रही तलाक मुझे, मौत से अब निकाह कर लेंगे ।'
राहुल द्विवेदी 'स्मित' ने ' जग के लोभी दांवपेंच मैं बिल्कुल नहीं समझता हूँ , मैं सूखा सागर सपनो का फिर भी बहुत बरसता हूँ ।'
उमाकान्त पांडे जी ने 'पलकों में मैं समेट लूँ वो बीते हुए पल, वो जिन्दी के पल मेरी वो जिंदगी के पल ।'
गौरव पाण्डे 'रूद्र' ने 'मौत से तो रूबरू होते रहे हम हर दफ़ा, जिंदगी ने और कुछ लिक्खी कहानी रात भर ।'
नीलम भारती ने ' चले आओ सनम अब तुम विरह के गीत गाती हूँ, बताता भोर है मुझको बुझे दीपक की बाती हूँ ।'
मुकेश कुमार मिश्र जी ने ' सर्वत्र है दैवीय सम्पदायें धरा से यहाँ स्वर्ण ही हैं उगाते । '
मन्जुल मन्ज़र लखनवी जी ने ' किया रचनाओं में तूने जमाने का जो चित्रण है, वहीं साहित्य तेरा आज इस दुनिया का दर्पण है ।'
विपिन मलीहाबादी ने 'बात ही बात में याद आने लगा, दिल तड़प कर उसी को बुलाने लगा ।'
भ्रमर बैसवारी जी ने 'वीर जवानों के दुश्मन को उसके घर में मारा है, भारत की जनता वीरों का लगा रही जयकारा है ।'
संदीप अनुरागी जी ने 'सरकार दे लुटाय तौ जानौ की नरेगा, मजदूरौ न चोटाय तौ समझौ नरेगा । सरकार की रकम का खाय खाय के, परधान जी मोटाय तौ जानौ कि नरेगा ।।'
सुन्दर लाल सुन्दर जी ने 'जन्मभूमि जननी की रक्षा हेतु जा रहा माँ, पूज्यनीय माँ हमारी धैर्य ना गंवाइयो ।'
अनिल कुमार श्रीवास्तव 'व्यथित' जी ने 'ये सुरमई अक्स हमें सोने नही देती, ये हमारा जज्बा तुम्हे खोने नहीं देता ।'
केदार नाथ शुक्ल जी ने 'दुम को सदा दबाने वाले यदि दुमदार नहीं होते , तो आतंकवादियों के पग सीमा पार नही होते ।'
भैरो नाथ पांडे जी ने 'रात है जगमग दिखे फिर भी अँधेरे, यह दिवाली तुम मना लो साथ मेरे ।'
आशुतोष मिश्र जी ने 'लिखते-लिखते लिख गया, दिल का ये उद्गार । सच्चा केवल प्रेम है, झूँठा है संसार ।'
योगेश चौहान जी ने 'वीर शहीदों की आत्मा हर्षित हो नाच रही होगी, स्वर्गलोक में जनगणमन की पंक्ति बाँच रही होगी ।'
आशुतोष 'आशु' जी ने 'फूल को खार करने लगे हैं, सिर्फ अँधियार करने लगे हैं ।'
पढ़कर खूब तालियां व वाह-वाही बटोरी ।