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शनिवार, 26 जून 2021

नवगीत-सह गये कबीर by मनीष कुमार झा


कागज पढ़-पढ़ जग बौराया,
देख-देख कह गए कबीर।

दोहों को दुहराया फिर भी
जिह्वा हुई न पैनी।
बाहर-बाहर बाँच रहे हम
साखी,सबद,रमैनी।

अपने भीतर झाँकें तब
सोचें क्या- क्या सह गए कबीर।

हम ग्रन्थों के अनुयायी बन
बदलें पल में बाना।
सिखा दिया अनपढ़ फकीर ने
सीखा ज्ञान भुलाना।

ढाई आखर प्रेम पढ़ाकर
जानें क्या गह गए कबीर।

भक्तिकाल था लेकिन
काशी जनती रही जहर को।
अमृत वहीं लुटाया, साधो!
श्रेय दिया मगहर को।

ज्यों की त्यों धर गए चदरिया
तो जिंदा रह गए कबीर।

✍️मनीष कुमार झा

नवगीत-ऐ कबीर कुछ बोलो ना by रूपम झा

कबीर के बहाने इस नवगीत में रूपम जी ने समकालीनता का ध्यान रखा है।वर्तमान की विद्रूपता को प्रतीक के माध्यम से प्रकट करता हुआ विशेष नवगीत.....

देखो क्या कुछ रोज हो रहा
ऐ कबीर कुछ बोलो ना 

मगहर भी काशी की बातें करता है
दम्भ धर्म का कोना-कोना भरता है
मैली अब 
हो गई चदरिया धो लो ना 

सच कहने पर लगी हुई पाबंदी है
मन में विश्वासों की फैली मंदी है
मन के अंदर 
कुछ तो हिम्मत घोलो ना 

ढाई आखर वाली बोली मैली है
अब फकीर की टूटी खोली मैली है
दोहों में फिर
राज सभी का खोलो ना
                     
✍️ रूपम झा