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बुधवार, 20 जनवरी 2016

मनोज जैन मधुर (नवगीत)

📑हम जड़ों से कट गए📑
✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍

हम जड़ों से कट गए।
📚
नेह के वातास की
हमने कलाई मोड़ दी।
प्यार वाली छाँव
हमने गाँव में ही छोड़ दी।

मन लगा महसूसने
हम दो धड़ो में बँट गए।
📚
डोर रिश्तों की नए
वातावरण-सी हो गई।
थामने वाली जमीं हमसे
कहीं पर खो गई।

भीड़ की खाता-बही में
कर्ज से हम पट गए।
📚
खोखले आदर्श के हमने
मुकुट धारण किए।
बेंचकर हम सभ्यता के
कीमती गहने जिए।

कद भले अपने बड़े हों
पर वजन में घट गए।

---मनोज जैन
कटनी,मध्यप्रदेश
       ******

रविवार, 17 जनवरी 2016

मनोज जैन मधुर का गीत

सुनहरी सुबह

सुनहरी सुनहरी,
सुबह हो,
रही है।
        *
कहीं शंख ध्वनियाँ,
कहीं पर ,
अज़ानें।
चली शीश श्रद्धा,
चरण में,
झुकाने ।

प्रभा तारकों
की स्वतःखो
रही है।
   *
सुनहरी सुनहरी,
सुबह हो,
रही है।
    *
प्रभाती सुनाते,
फिरें दल,
खगों के।
चतुर्दिक सुगंधित,
हवाओं,
के झोंके।
नई आस मन में,
उषा बो,
रही है।
     *
सुनहरी सुनहरी,
सुबह हो,
रही है।
   *
ऋचा कर्म की ,
कोकिला ,
बाँचती है।
लहकती फसल,
खेत में ,
नाचती है ।

कली ओस,
में भींज मुँह धो ,
रही है।
   *
सुनहरी सुनहरी,
सुबह हो ,
रही है।
    *
      मनोज जैन