manoj लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
manoj लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 4 अगस्त 2016

मनोज मानव की ग़ज़ल

काव्य शिल्पी फ़िलबदीह-7
🌳🌲
कोशिशें हैं कि कुछ सुधर जाऊँ
राय दो कौनसी डगर जाऊँ
🌱🌷
जेब खाली है क्यों करूँ वादा
क्या पता कब कहाँ मुकर जाऊँ
🌼🌻
सुन जमाने न हार मानूँगा
चाहे मैं टूट कर बिखर जाऊँ
💐🌸
कल मुझे देख मुस्कुराई वह
आज उसके लिए संवर जाऊँ
🌹💮
जिंदगी तुझसे भी मिलूँगा पर
मैं दुखो से तो कुछ उबर जाऊँ
🌺🌴
मैं उबरने की कर रहा कोशिश
घाव पूछे मुझे , उभर जाऊँ ?
🍂🍁
कह रही थी कली मुझे कल ये
छोड़ काँटों को मैं किधर जाऊँ
🌱🌸
हुस्न ! तू जाल दूर रख अपना
सब्र कर और कुछ निखर जाऊँ
🐝🐡
चाहिए और क्या मुझे मित्रो
मान मिलता बहुत जिधर जाऊँ
🐚🐌
सब जगह एक सी परेशानी
ये नगर छोड़ किस नगर जाऊँ
🍂💐
याद करते रहें सदा मानव
काम ऐसा अमूल्य कर जाऊँ

  मनोज मानव
बिजनौर उत्तर प्रदेश

बुधवार, 20 जनवरी 2016

मनोज जैन मधुर (नवगीत)

📑हम जड़ों से कट गए📑
✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍✍

हम जड़ों से कट गए।
📚
नेह के वातास की
हमने कलाई मोड़ दी।
प्यार वाली छाँव
हमने गाँव में ही छोड़ दी।

मन लगा महसूसने
हम दो धड़ो में बँट गए।
📚
डोर रिश्तों की नए
वातावरण-सी हो गई।
थामने वाली जमीं हमसे
कहीं पर खो गई।

भीड़ की खाता-बही में
कर्ज से हम पट गए।
📚
खोखले आदर्श के हमने
मुकुट धारण किए।
बेंचकर हम सभ्यता के
कीमती गहने जिए।

कद भले अपने बड़े हों
पर वजन में घट गए।

---मनोज जैन
कटनी,मध्यप्रदेश
       ******