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मंगलवार, 22 जून 2021

दोहे by अवनीश त्रिपाठी

सच्चाई को घेरते, झूठों के प्रतिरूप।
लगता जैसे पलटकर, फटक रहे हों सूप।।
 
बूढ़े बरगद के तले, बुद्ध रहे हैं सोच।
वर्तमान परिवेश के पैरों में है मोच।
 
भाषाओं की कैंचियाँ, जिनके जिनके पास।
त्रिज्याओं को खींचकर, बना रहे वे व्यास।।
 
बाहर ज़हरीली हँसी, भीतर चुप्पी घोर।
कब समझेंगे हम सभी, अपने मन का शोर।।
 
राजनीति की दुर्दशा, हुई बहुत घनघोर।
अफवाहों के पोस्टर, चिपके चारों ओर।।
 
भरी भीड़ में चीखते, लँगड़े हुए सवाल।
संवेदन की देह में, घुस आया बेताल।।
 
ठकुरसुहाती है बहुत, लोकतंत्र में आज।
सबके अपने ताज हैं, सबके अपने राज।।
 
नहीं सुन रहे चीख को, नहीं दे रहे ध्यान।
अब तो बहरे हो चुके, दीवारों के कान।।
 
संस्कार की देह पर, छोटी हुई कमीज।
कटु शब्दों ने लाँघ दी, होठों की दहलीज।।
 
पुनर्प्रश्न की देह पर, पूर्वोत्तर की टीस।
राजनीति इस वर्ष की, नहीं रही उन्नीस।।
 
धुँधलाये से सफर में, सूने हैं अहसास।
जीवनभर जिंदा रही, अवसादों में प्यास।।
 
पूर्वकाल पर मौन है, पूरा उत्तरकाल।
प्रश्नों के आकार पर, वैचारिक हड़ताल।।
 
मन से शायद दूर हैं, नेहभरे ठहराव।
चुप्पी साधे इसलिए, सूने पड़े अलाव।।
 
मोल भाव के फेर में, जब से चली खरीद।
मूल्ययुक्त अब प्रेम की, कटने लगी रसीद।।
 
उभर गए दीवार पर, कुछ आदिम अहसास।
घड़ी इसलिए आजकल, रहने लगी उदास।।
 
बूढ़े पेड़ों से हुई, बातचीत जो आज।
नन्हे पौधों को मिले, जीवन के कुछ राज।।
 
नटखट अल्हड़ धूप के, हाव भाव ठहराव।
शाम ढले है खटकता, इनका बहुत अभाव।।
 
फिसल रहीं हैं उंगलियाँ, खेल रही हैं खेल।
इक-दूजे को इन दिनों, कसकर रहीं धकेल।।
 
ठगने को आतुर सभी, करना होगा गौर।
सोचो परखो समय को, यह निर्णायक दौर।।
 
चीख भरे दिन बेसुरे, सन्नाटे में रात।
इस बदले माहौल में, खोई अपनी बात।।
 
खीस निपोरे हादसे, हर पल रहते पास।
लँगड़ी लूली भावना, दिव्य-अंग अहसास।।
 
साँकल-कुंडी-चिटकिनी, दरवाजे, दीवार।
सन्नाटों की गूँज के, अलग-अलग आकार।।
 
केन्द्रविन्दु पर हम खड़े, लगा रहे हैं आस।
शायद कोई खींच दे, एक वृत्त का व्यास।।
 
थकी-थकी सी है सुबह, बोझिल-बोझिल शाम।
मौसम अबकी रह गया, कुछ बूँदों के नाम।।
 
खुलीं खिड़कियों को मिला, सोने का अभिशाप।
लुटवाकर घर सींखचे, बैठ गए चुपचाप।।
 
पारेषण की दृष्टि से, आवश्यक है व्यष्टि।
एक-एकशः व्यष्टि से, होती सृष्टि समष्टि।।
 
मूक व्यथा को पहनकर, ओढ़ लिया अवसाद।
ऐसों के मुख से भला, कैसे निकले नाद।।
 
कितने इंजेक्शन लगे, कितनी सारी ड्रिप्स।
प्राण निकलकर उड़ गये, व्यर्थ हो गईं टिप्स।।
 
सद्य प्रसूता स्नेह से, फेर रही है दृष्टि।
संतति के वात्सल्य से, आच्छादित है गृष्टि।।
 
सदाचार का आवरण, ओढ़े है ईमान।
दो कौड़ी के लाभ में, लगी हुई है जान।।
 
शब्दों के संग्राम में, केवल शह या मात।
अर्थ व्यर्थ ही कर रहे, संधिपत्र की बात।।
 
अपशब्दों का व्याकरण, प्रत्यय, सन्धि, समास।
गठबंधन कुछ अलग ही, दिला रहा विश्वास।।
 
माँग रही जनता यही, सुन लो चौकीदार।
खत्म करो इस देश से, सारा भ्रष्टाचार।।
 
भूख प्यास से बिलखते, लोगों को दरकार।
रोजगार कुछ तो हमें, दे दो चौकीदार।।
 
सिद्धहस्त इतनी हुईं, चढ़ आया है भाव।
तारीखें अब वर्ष को, देने लगीं सुझाव।।

मानसून तप कर रहा, वर्षा है गमगीन।
जनजीवन की पीठ पर, कसी धूप की जीन।।
 
कुछ बूँदें अहसास की, मानसून के पास।
लगता सबने ले लिया, वर्षा से सन्यास।।
 
न ही सुरमई शाम है, न ही चम्पई भोर।
आँधी, गर्मी, प्यास की बातें, ही घनघोर।।
 
कथरी, कमरी, चीथड़े, फटी पुरानी शाल।
ओढ़े दुबकी है व्यथा, कोने में बेहाल।।
 
स्वाहा होते कुण्ड में, आशाओं के मंत्र।
धुआँ हुए परिवेश से, परिचय का गणतंत्र।।
 
भूख-प्यास से त्रस्त है, लोकतंत्र का पेट।
हवा चिताओं से रही, सुलगाती सिगरेट।।
 
विक्रम भी चुपचाप हैं, ओढ़े मोटी खाल।
प्रजातन्त्र की रीढ़ पर, चढ़ बैठा बेताल।।
 
दशा-दिशा दोनों हुए, शोषित, दलित, निरीह।
जातिवाद की डायनें, नहीं डाँकतीं डीह।।
 
संविधान किससे कहे, अपनी व्यथा असीम।
राजनीति ने कर दिए, कितने राम-रहीम??
 
'राजा गूँगा है यहाँ, बहरी है सरकार'।
कहते-कहते इस तरह, प्रजा गिरी मझधार।।
 
बूढ़े बरगद की जड़ें, भूख-प्यास से त्रस्त।
शाखा-गूलर-पत्तियाँ, सब अपने में मस्त।।
 
गूँगे-बहरे शब्द का, खोज-खोजकर अर्थ।
नियमित भाषा-व्याकरण, होने लगे तदर्थ।।
 
मरुथल मन आकाश का, देह हो गई धूप।
आहुतियां बस छाँव की, जीवन है विद्रूप।।
 
ईंगुर जैसी यह सुबह, सिन्दूरी सी धूप।
हल्दी का दोना लिए, सूरज का शुभ रूप।।
 
कैसे घिरती जा रही, निपट अभागिन भोर। 
कुहरे की बंदिश बढ़ी, धूप गई किस ओर।।
 
हरकारा मौसम हुआ, ठगी ठगी है भोर।
बदली के संग ब्याह कर, बदल गया चितचोर।।
 
नव दूर्वा नव मञ्जरी, नव नव कुसुम पराग।
नवल किशोरी का हृदय, नव कोमल अनुराग।।
 
ज्यों ही मुझको छू गया, यह मधुरिम मधुमास।
मन के रंगों को हुआ, फागुन का आभास।।
 
वैदर्भी यह दृष्टि है, राग भैरवी नेह।
हृदयों में संगीत का, बरस रहा है मेह।।
 
उपवन की अमराइयाँ, तर महुए की छाँव।
बरबस तुमको खोजते, चल पड़ते हैं पाँव।।
 
पग आहट का ज्यों हुआ, तनिक मुझे आभास।
अधरों पर छाने लगा, नेह भरा मधुमास।।
 
सरक गया तन से वसन, खुले कली के गोड़।
भौंरों में मचने लगी, छू लेने की होड़।।
 
काजल फिर कोमल हुआ, निष्ठा हुई निशेष।
खड़ा हृदय के द्वार पर, प्रीति नेह दरवेष।।
 
गोरी का मधुमत वदन, ज्यों बौराया आम। 
देख देखकर बढ़ रहा, तरल हृदय में काम।।
 
बिल्ली के संग आजकल, चूहे रहे दहाड़।
खोद-खोदकर कुछ बिलें, सोचें गिरे पहाड़।।
 
अधरों को छूने लगी, महक रही है श्वांस।
लाजभरे दोनों नयन, दोनों में है प्यास।।
 
भूल गया मानव यहाँ, रिश्तों का भूगोल।
भीतर बैठा भेड़िया, ऊपर मृग की खोल।।
 
जटिल हुई जीवन्तता, टूट गए सम्वेद।
उग आये फिर देह पर, कुछ मटमैले स्वेद।।
 
निर्विकार संचित समय, विकल बुद्धि विपरीत।
छन्द-रहित होने लगे, मानवता के गीत।।
 
प्राची की आँखें खुलीं, उषित सूर्य का गात।
स्नेह वसन ओढ़े चली, पश्चिम को अब रात।।
 
ज्येष्ठ माह के कांध पर, टिकी हुई है साख।
बैसाखी लेकर चला, लंगड़ा जब बैशाख।।
 
टूट टूट गिरने लगे, नक्षत्रों के दाँत।
उम्मीदें रूठी हुईं, ऐंठ रही है आँत।।
 
बाहर सम्मोहन दिखा, भीतर विषधर सर्प।
अनपढ़ चिट्ठी ने पढ़े, अक्षर अक्षर दर्प।।
 
बादल हरकारा किधर, घबराहट में जून।
पूछ समय से लिख रहा, ख़त में सब मजमून।।
 
मुड़ा-तुड़ा कागज हुआ, सूरज का विश्वास।
बादल भी लिखने लगे, बुझी अनबुझी प्यास।।
 
खेत-मेंड़ लिखने लगे, फसलों का सन्दर्भ।
देख इसे चुपचाप है, क्यों धरती का गर्भ??
 
धूप उनींदी सी हुई, अलसाई सी भोर।
पावस ऋतु में धुंध की, चादर चारों ओर।।
 
रंग, कूँचियां, पेंसिलें, नहीं चाहिए मित्र।
देखो बादल गढ़ रहे, कितने चित्र विचित्र।।
 
दीवारें, ईंटें सभी, रोईं हर-पल साथ।
दरवाजे, छत, खिड़कियां, छोड़ चले अब हाथ।।
 
सिरहाने की चुप्पियाँ, पैताने की चीख।
मौन देह की अस्मिता, मृत्यु-पाश की भीख।।

अवनीश त्रिपाठी
गरयें,सुल्तानपुर 

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

कीर्तिशेष नवगीतकार रामानुज त्रिपाठी जी के नवगीतों पर संवेदनात्मक आलोक समूह में चर्चा

।। विशेषांक एक दृष्टि ।।
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विरासत से...
।। इस बार : स्मृतिशेष-रामानुज त्रिपाठी ।।
                      【78】
  वाट्सएप पर संचालित एवं अपने फेसबुक संस्करण में क्रियान्वित 'संवेदनात्मक आलोक' नवगीत साहित्य विचार समूह के लोकप्रिय रविवारीय विशेषांक अन्तर्गत प्रकाशित *'मेरी अपनी पसंद'* का 78वां अंक आपके हाथों में सौंपते हैं।
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      "यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि एक समय था जब मुझे रामानुज त्रिपाठी जी की रचनाओं की प्रतीक्षा रहती थी। वह भी इसलिए कि वे गीत नवगीत एक कवि-गीतकार के होते थे जो अपने रचनाधर्म में ही खोया हुआ था। उन्हें मैं जानता न था और न ही देखा था लेकिन यह कभी महसूस ही नहीं हुआ कि त्रिपाठी जी कभी मिले न हों यह उनकी रचनाओं का गहन प्रभाव था। उनके गीत यह बताते हैं कि वे केवल कवि होने के लिए ही जन्मे थे और कवि के सिवा और कुछ हो ही नहीं सकते थे। कहना चाहिए कि आज जब लिखने बैठा हूँ तो विस्मृति के पन्नों से निकलकर यादें उस गंवई कवि के विषय में फिर से जानने परखने का निमंत्रण दे रही हैं जिसके पास प्रांजल भाषा के साथ साथ बिम्बों और प्रतीकों के प्रयोग की अद्भुत क्षमता थी। परम्परा और आधुनिकता के मध्य एक सार्थक पुल का निर्वहन था। वे गाँव के तालाब के किनारे खड़े छतनार वृक्ष तरह ऐसे गीतकार थे जो कि उर्वर जमीन से रस एवं शक्ति का संचय करते हुए सदैव ही साहित्य के आकाश की ओर उन्मुख रहे।
       
        त्रिपाठी जी के नवगीतों में आंचलिक व्यञ्जना, लोकतत्व, आधुनिक बोध, समकालीन चेतना, सामाजिक सरोकार और नए प्रयोगों से भरपूर नवता, सहज संप्रेषणीयता के साथ संपृक्त होती हैं।तात्कालिक घटनाओं का विवरण भी पूर्णतः उपलब्ध हुआ है। सृजन में संवादात्मक शैली का उत्कृष्ट नियोजन देखने को मिलता है। उनकी भाषा की भंगिमाएं, रंग और तेवर बदलते रहते हैं। उसमें नई लक्षणाएँ और बिम्ब नज़र आने लगते हैं, मोहक कल्पनाएं वैचित्र्य भरा कौतुक भी। गीतों का अद्भुत सौंदर्यबोध अपने साथ बांधे रखता है। उन्होंने अपने रचना संसार में छन्द और लय का ढीलापन भी कभी स्वीकार नहीं किया और इसके लिए हम उन्हें सदैव चौकन्ना पाते हैं। त्रिपाठी जी अपनी धूसर गंवई जमीन से उठकर आधुनिक साहित्य के विभिन्न रंगों से भरे आकाश में पहुंचाते हैं और बहुत कुछ हासिल करके दिखा देते हैं जो आज हममें से बहुतों को हैरान करता है।"
                        प्रकाश मनु
             आलोचक, विमर्शक-सर्जक
                  फरीदाबाद [हरियाणा]
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       स्मृतिशेष-रामानुज त्रिपाठी जी से उनकी प्रभावशील रचनाधर्मिता के कारण पाठकीय तौर पर मेरे अत्यन्त आत्मीय सम्बन्ध रहे हैं। कभी-कभार पत्र-व्यवहार भी। उन दिनों जब उनकी लेखनी अपने चरम सीमा पर लेखन कार्य में संलिप्त थी। वे वीणा, युगधर्म, माधुरी, नवनीत, आजकल, सरिता, राजस्थान पत्रिका, अछूते सन्दर्भ, कादम्बिनी, समांतर, हरिगंधा, मुक्ता, रविवारीय परिशिष्ट में दैनिक भास्कर, नवभारत, देशबन्धु या यह कहूँ कहीं भी उनकी रचनाएँ पढ़ने को मिल जाया करतीं थीं।

       यह समय सन् 1984 से 95 का रहा है। मैं उन दिनों शहडोल जिले में एक कस्बे के पास गाँव सामन्तपुर में रहकर स्कूल शिक्षा विभाग में अपनी सेवाएँ देता था। आदर. रामानुज त्रिपाठी जी के नवगीतों से मैं बहुत प्रभावित था। नवगीत को जानने, समझने उसकी बारीकियों को पकड़ने के प्रयास में कई गीतकारों से सम्पर्क करना फिर मेरी आदत में शामिल गया। बुढ़ार एक आद्योगिक क़स्बा है जहाँ मेरे कुछ साहित्यिक मित्र बन गये और शहडोल वहाँ से चालीस किलोमीटर दूर था। कभी किसी भी रविवार या शासकीय अवकाश में मुझे अपने हैडक्वाटर को छोड़ना ही होता था। एक नशा था अच्छा कुछ पढ़ने और अच्छे साहित्यकारों के बीच रहकर उनसे नया कुछ सीखने का। यह क्रम लगातार दस वर्ष निरन्तर जारी रहा।

    फिर ऐसे भी अवसर आए जब मैं कई पत्र-पत्रिकाओं में रामानुज त्रिपाठी जी आजू-बाजू हम दोनों एक साथ भी प्रकाशित हुए। उनके साथ मेरी रचनाओं का छपना यह मेरा सौभाग्य ही था। मेरी राज्य शासन स्कूल शिक्षा विभाग में सेवा होने केे कारण मेरे लगातार कई स्थान्तरण हुए। फिर स्थानांतरण भी ऐसी जगह पर हुये जहाँ मैं प्रिन्ट और इलेक्ट्रानिक मीडिया दूर हो गया। जीवन की इस आपाधापी ने उस समय मुझसे बहुत कुछ छीना। उन दिनों मैं खुद भी एक मौसमी कवि था। लेखन वह भी कभी कभार हो पाता था। हाँ! पढ़ने का शौक अवश्य था। डाक से कुछ पत्र पत्रिकाएँ आती रहती थीं। पर! उन्हें पढ़ने का समय नहीं। घर-परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ पाँव जकड़े रहते थे।

        वाट्सएप समूह 'संवेदनात्मक आलोक' का हार्दिक धन्यवाद। हमारे समूह के सक्रिय सदस्य प्रिय भाई अवनीश त्रिपाठी जी से मेरी मोबाइल पर हुई चर्चा से मुझे ज्ञात हुआ कि..वे वरिष्ठ नवगीतकवि रामानुज त्रिपाठी जी के सुपुत्र हैं। रामानुज त्रिपाठी जी अपनी रचनाधर्मिता में एक ओर जहाँ गाँव के माटी की खुशबू है वहीं वे दूसरी ओर वे सामाजिक सरोकारों से गहरे जुड़े रहे हैं। मैं उनकी समृद्ध कलम को शत-शत प्रणाम करता हूँ।।
                    ■ रामकिशोर दाहिया
                          कटनी [म.प्र]
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  'संवेदनात्मक आलोक' समूह पटल पर सुधी पाठकों एवं मूर्धन्य साहित्य मनीषियों के समक्ष विशेषांक चर्चार्थ प्रस्तुत है। आप अपने भाव एवं विचार समीक्षात्मक टिप्पणी के रूप में पटल पर अवश्य देने का कष्ट करें। आपकी भावनात्मक रूप से हमें सम्बल देने के साथ मंच पटल को समृद्ध बनाती है।

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        दिनांक 04 दिसम्बर 2016
 
                     ■ रामकिशोर दाहिया
                          प्रमुख संचालक 
                    *संवेनात्मक आलोक*
                   सदस्यता हेतु वाट्सएप मोबा.
                    097525-39896
                    🌏📚✍🙏�
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*।। संक्षिप्त जीवन परिचय ।।*
    ---------------------------------
नाम : रामानुज त्रिपाठी।
जन्म-10 जून 1946 ई0।
पिता: स्व.रामजनक त्रिपाठी।
माता : स्व.धनपत्ती देवी।
लेखन-1965 से 2004 तक।
*शिक्षा :*
गोरखपुर विश्वविद्यालय से कला स्नातक एवं आई.जी.डी.बॉम्बे ड्रॉइंग, 1970 से 2004 तक इण्टर कालेज में प्रशिक्षित स्नातक अध्यापक।
*देहावसान* : 08 जुलाई 2004 ई0 इलाहाबाद में।

*प्रमुख प्रकाशन-*
[1] 'यादों का चन्दनवन' 2009 गीत-नवगीत संग्रह। [2] 'धुएँ की टहनियाँ' नवगीत संग्रह। प्रकाशन की ओर। [3] 'नेह का महावर' समवेत संकलन रामानुज त्रिपाठी जी को समर्पित 2016।
    
*अन्य प्रकाशन*:
देश की समस्त श्रेष्ठ पत्रिकाओं सारिका, नई कहानियां, निहारिका, नवनीत, सरिता, समांतर, वीणा, संकल्प रथ, अछूते सन्दर्भ, कादम्बिनी, हरिगन्धा, राष्ट्रधर्म, काव्यम, उत्तरायण आदि पत्र-पत्रिकाओं में गीत, नवगीत, हिन्दी ग़ज़लें, दोहों का अनवरत प्रकाशन। अनेकों समवेत संकलनों 'गीतदशक', 'संदीपनी', 'भोर की आहट', 'समय की शिला पर', 'हिंदी के मनमोहक गीत' '280 साहित्यकार', 'गीत वसुधा'  'स्वरत्रयी', 'काव्यभारती', 'हिंदी ग़ज़ल एक प्रतिमान' आदि में रचनाएँ चयनित एवं संकलित।

*बाल साहित्य-*
[1] 'जंगल का स्कूल' बालगीत संग्रह।
[2] 'बाल साहित्य समीक्षा' और 'बालवाटिका' दो बाल पत्रिकाओ के अंक केंद्रित। नंदन, बालवाटिका, बालभारती, बालहंस, देवपुत्र सहित समस्त प्रतिष्ठित बाल पत्रिकाओं में निरन्तर बालगीतों एवं बाल कविताओं का प्रकाशन। 'प्रतिनिधि बालगीत' में रचनाएँ संकलित।

*पुरस्कार/सम्मान :*
अखिल भारतीय स्वतंत्र लेखक मंच स्लेम द्वारा 'काव्य साधना'। पानीपत साहित्य अकादमी द्वारा 'आचार्य'। भाव सृष्टि समिति रामपुरा द्वारा 'काव्य किरीट' सम्मान सहित अनेक साहित्यिक-सामाजिक संस्थाओं द्वारा सम्मानित एवं अभिनन्दित। 'नागरी बाल साहित्य संस्थान बलिया', 'भारतीय बाल कल्याण संस्थान कानपुर'। 'बाल साहित्य संस्कृति और कला विकास संस्थान बस्ती' द्वारा सम्मानित।

*सम्पर्क सूत्र :*
अवनीश त्रिपाठी [पुत्र]
गरयें, लम्भुआ, सुलतानपुर उ.प्र.। पिन-227-304 चलभाष-- 94515-54243
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।।धूप का खण्डहर ।।
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ढह
गया है धूप का
एक खण्डहर टूटकर।

क्षितिज की
पगडंडियों से
फिर कुहासा
दूर भागा जा रहा है
बेतहाशा ।

रोशनी का
एक सोया
शहर चुपके लूटकर ।

सिर दिशाओं के
शरम से झुक गये हैं
रश्मियों के पाँव
सहसा रूक गये हैं ।

लौट आया
है अँधेरा
कैद से फिर छूटकर ।

बड़बड़ाती !
हवा अब खामोश है
नदी पुलिया पर
पड़ी बेहोश है ।

रिस रहा
है जिस्म से
नासूर कोई फूटकर ।
           •••
■ रामानुज त्रिपाठी
-----------------------------------------------------------

।। कौन साँकल खटखटाए ।।
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कहो कैसे !
खूँटियों पर टाँग दें...
फट गए हैं
हसरतों से भरे झोले ।

जिन्दगी भर
नेह से
जिसको भरा
सुप्त दीपक को
जगा देना मेरा ।

कभी आकर
अपाहिज अंधा अँधेरा...
रोशनी के जिस्म को
शायद टटोले ।

समेटे
चुप्पी नियति की
खिड़कियाँ
सह रहीं
रूठे समय की
झिड़कियाँ ।

घुन गए
तकदीर के
आवृत किवाड़े...
कौन साँकल खटखटाए
कौन खोले ।

जलाकर के
मरे रिश्तों की
चिताएँ
शोकाकुल लेटे
कदाचित अस्मिताएँ ।

अब तो सिर्फ
सँभाल करके ही
बिछाना !
हैं वसीयत में मिले
टूटे खटोले ।
           •••
■ रामानुज त्रिपाठी
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।। खींचने आया समय तस्वीर ।।
---------------------------------------
लोग सहमे
खण्डहर में हैं छिपे
खींचने आया
समय तस्वीर जिनकी ।

नयन में जिनके
न अब तक
सुनहरे सपने खिले हैं
भीड़ में हों
या अकेले
जब मिले चिंतित मिले हैं ।

हैं खड़े वे मौन
नीचे सर झुकाए
फटे कागज़ पर
लिखी तकदीर जिनकी ।

वे बनाएँगे प्रतीकों के
नये आकार कैसे !
जायेंगे प्रतिबिम्ब लेकर
आईने के द्वार कैसे !!

रह गए हैं
जो पर युगबोध से
हो गई है
सहचरी अब पीर जिनकी ।

हर नये
एहसास ने भी
खुली आँखें बन्द कर लीं
नियति ने भी
स्यात् सम्प्रति
एक रेख पसन्द कर ली ।

अभी जो थी
एक ऋजु रेखा सहज-सी
हो गई है आज
वक्र लकीर जिनकी ।
         •••
■ रामानुज त्रिपाठी
-----------------------------------------------------------

।। अंधकार सोया है ।।
--------------------------

अरसे से
पेड़ तले
अंधकार सोया है ।

जाग रहीं
शाखाएँ
लेकर उम्मीद
कब लेगा
करवटें
टूटेगी नींद ।

एक भरम
ओढ़कर
वनपांखी खोया है ।

इन दिनों
जाने क्यों
ठौर-ठौर दर-दर
सारे ही
जंगल में
उग आए पत्थर ।

क्या पता
चुपके से
कौन बीज बोया है ।

पगडण्डी
पगडण्डी
भाग रही मृगतृषा
काँटों ही
काँटों में
उलझी जिजीविषा।

अधमुंदी
पलकों ने
स्वप्न में डुबोया है ।
         •••
■ रामानुज त्रिपाठी
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।। हमने कितने नाटक खेले ।।
-------------------------------------

छिपा
आस्था को परदे में
हमने कितने नाटक खेले ।

राग-रागिनी को
भरमाने-जुटी
आज दुर्वृत्ति आसुरी
जाने कहाँ !
सप्त स्वर भटके
भौचक्की रह गई बाँसुरी ।

लय की
नहीं कहीं गुंजाइश
किस स्वर को अपने संग ले-ले ।

मानव की
पहचान मापने के
लगते ओछे पैमाने
भरी भीड़ में
नहीं लग रहे
हैं चेहरे जाने-पहचाने ।

हैं अनभिज्ञ
परस्पर जन-जन
लेकिन लगे हुए हैं मेले ।

कहीं घोंसलों
में रोती है
पंखहीन पंछी की ममता
कहीं गले से
गले मिल रहीं
हँसकर समता और विषमता ।

कैसे चलें
चरण-चिन्हों पर
डरे-डरे हम आज अकेले ।
            •••
   ■ रामानुज त्रिपाठी
-----------------------------------------------------------

।। सपनों का गाँव ।।
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ईंगुर -सी
धूप और
काजल -सी छाँव
एक प्यास
लूट गई
सपनों का गाँव ।

यद्यपि
भुलावे के
लम्हे छले गये
साँसो
के पर्याय
बनते चले गये ।

सूनी
पगडंडी से
थके-थके पाँव ।

पाँवो को
फैलाए
लम्बी चादर ताने
मसनद
सवालों की
फिर रखकर सिरहाने ।

खामोशी
लेट गई
फिर ठाँव- ठाँव ।

हिस्से में
लिए हुए
जख्मों का केवल धन
अड़े हुए
हैं अब तक
कुछ जिद्दी सम्बोधन ।

जिन्दगी की
चौसर में
नित्य नया दाँव ।
        •••
■ रामानुज त्रिपाठी
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।। नेह के खनके बाजूबंद ।।
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कोरे कागज़
पर किसने
लिख दिए लजीले छंद
नेह के खनके बाजूबंद।

सावन में
खुले सिन्होरे
भादों में कजरौटे
पिए वारुणी
बेसुध हो
यादों के मौसम लौटे ।

कच्ची उमर
खिली निशिगंधा
रह रह चुए मरंद
नेह के खनके बाजूबंद ।

टँगे कई
रेशमी ख्वाब के
परदे झीने झीने
खींच गए
तस्वीर हर घडी
सपनों के आईने ।

धूप छाँव में
अब सो जाना
पल छिन हुआ पसंद
नेह के खनके बाजूबंद ।
            •••
  ■ रामानुज त्रिपाठी
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।। नया अनुच्छेद ।।
------------------------

उग आए
चेहरे पर
मटमैले स्वेद ।

दृगों के
समन्दर में
तहछट का पानी
जिन्दगी है
बिना-
शीर्षक की कहानी ।

लिख रही हैं
साँसे
नया अनुच्छेद ।

खड़ी हैं
मुँह ढाँके
निर्वसन पीढ़ियाँ
चढ़ना है
मुश्किल
दुविधा की सीढ़ियाँ ।

चक्रव्यूह
मन का
सवाल रहे भेद ।
         •••
■ रामानुज त्रिपाठी
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विशेषांक पर आई प्रतिक्रियाएं----------------

[12/4, 6:18 PM] सुशीला जोशी
            मुजफ्फरनगर: संवेदनात्मक अलोक ,ग्रुप से जुड़ कर जीवन के आखिरी पड़ाव में नवगीत जैसी लोकप्रिय विधा को पढ़ने ,समझने ,जानने और लिखने के साहस का  करने की ईच्छा पूर्ण हुई ।
       रामकिशोर जी ने मुझे तुरन्त ये ग्रुप से जोड़ रामानुज त्रिपाठी जी के चार पांच गीत पढवाये । उन्हें पढ़ कर जो कुछ मैं समझ पाई ,उसे आपके समक्ष रखने का साहस कर रही हूं ।
      रामानुज त्रिपाठी जी का नवगीत " धूप का खण्डहर " पढ़ी तो मुम्बई में बिताए कुछ महीने मेरी स्मृति पटल पर तैर गये जहाँ मैंने धूप के लिए तरसते जीवन को देखा है । उनके गीत की यह पंक्ति " रौशनी का शहर चुपके लूट कर " मेरी स्मृति को बल प्रदान करती है । जहां एक ओर गगनचुम्बी इमारतों का आकर्षण लुभाता है वही उनके कारण बना अँधेरा कभी स्वयं को कैद करता है तो कभी दिशाओं तक को अपने  आँचल से ढकता नजर आता है । छोटे छोटे घरों में जिंदगियां जीवन के अंधेरे में कैद हो कर कसकती है तो कही रिसती है । इस गीत में शहरी जिंदगी की विसंगतिया देखने को मिली ।
   " कौन साँकल खटखटाये" गीत आभाव में पली बढ़ी जिंदगी की विषमताओं का आइना बड़ी सफाई से दिखया है रामानुज जी ने । अपने फ़टे थैले का लगाव आशा को अपनी इन पंक्तियों में " कभी आ कर ...... शायद टटोले " बाँध कर रखते है । यह गीत आशा और सकारात्मकता का अद्भुत सामंजस्य सँजोये है ।
   "  हमने कितने नाटक खेले " गीत आज की विसंगतियों के साथ स्वयं की तीव्र इच्छा को भी दर्शाता है । *कैसे चलें चरण चिन्हों पर , डरे डरे हम आज अकेले * पंक्तियां उनके इस भाव की पुष्टि करती है ।
     " खीचने आया समय तस्वीर " गीत में आभाव में जी रहे लोगो का चित्रण है । अभाव पोषित न प्रतीकों को आकार देने में सक्षम है और न ही स्वयं को दर्पण में निहारने का समय । कोई नया अहसास उन्हें मायूस बना जाता है । शायद यही वक्र रेखा उनकी नियति है ।
    " अंधकार सोया है " गीत एक सशक्त विरोधाभास से लबरेज है । जहाँ पेड़ के तले अँधेरा सोया है वही उसकी करवट लेने की आशा में उसकी डालिया जगती दिखाई देती है ।उस पर रहने वाले पाखी भी भ्रमित हो कर सोने और जागने की जंग से जूझ रहा है । आशावादिता और सकारात्मकता की चरम को दर्शाती है गीत की ये पंक्तिया -*इन दिनों ..........कौन बीज बोया * । यद्यपि जिंदगी की चौसर में किसी दाँव की भी पूरी सम्भवना देखते है किंतु कांटो में भाग रही मृगतृष्णा भी स्वप्न देखने से नही चूकती ।
     " नेह के खनके बाजूबन्द " एक श्रृंगार गीत है जिसमें जीवन की धूप छाँव के साथ यथार्थ को देर्शाता है ।
      " नया अनुच्छेद " -वास्तव में नया अनुच्छेद है जिसमे कही जिंदगी बिना शीर्षक के एक कहानी दिखाई देती है तो कही नई पीढ़ी के लिए एक दुविधा । समय का बदलाव हर पल एक नया अनुच्छेद लिख रहा है ।
    रामानुज त्रिपाठी जी के गीतों में परिपाटी , परम्परा , प्राकृतिक हलचल ,मानवीय संवेदना , हालात की चीत्कार और अधुनिकता का पुट स्पष्ट दिखाई देता है ।
(  क्षमा चाहूंगी ,इतने बड़े गीतकार ,लेखक या कवि का विश्लेषण मेरे जैसी नौसिखिया के लिए सम्भव नही ।)
सुशीला जोशी
मुजफ्फरनगर
4-12-2016

[12/4, 6:33 PM] विनय शुक्ल जी:---------
        आदरणीय त्रिपाठीजी के समस्त नवगीत एक से बढ़कर एक हैं। शास्वत सत्य की तरफ इंगित करते हुए हर शब्द की गहराई अपने आप में अद्वतीय है। उनकी लेखनी को और उन्हें सदर वंदन।

[12/4, 7:34 PM] आलोक मित्तल:--------
            आज पटल पर परम श्रध्देय श्री रामानुज त्रिपाठी जी की रचनाएँ पढ़ने का मौका मिला मेरे लिए उनको पढ़ने का पहला मौका रहा है वाकई लाजवाब रचनाये है ये सौभाग्य है मेरा । नमन है उनकी लेखनी को शानदार रचनाये कही है उन्होंने उनकी रचनाओं की छाप मुझे बहुत कुछ अवनीश भाई में भी देखने को मिलती है ।
लाजवाब रचना है सब की सब ।।

[12/4, 7:50 PM] डॉ अर्चना गुप्ता:---------
         आदरणीय रामानुज त्रिपाठी जी के गीतों को पढ़ने का अवसर मिला ।अभी मैं नवगीत को सीखने की ही प्रक्रिया में हूँ ।  इसलिये विश्लेषण करना मेरे लिए असंभव ही है । लेकिन इतना जरूर कहूँगी  सभी गीत हृदयस्पर्शी हैं । कहो कैसे....फट गएँ हैं हसरतों से भरे झोले .... कौन सांकल खटखटाये ..नेह के खनके बाजूबंद .... आदि सभी अत्यंत भावपूर्ण हैं। उत्कृष्ट लेखनी को मेरा सादर नमन ------ डॉ अर्चना गुप्ता

[12/4, 8:21 PM] रामनरेश रमन मोठ:------
             कीर्तिशेष श्रद्धेय श्री रामानुज त्रिपाठी के नवगीतों को समूह पटल पर लाने हेतु आदरणीय श्री राम किशोर दहिया जी को सादर धन्यवाद एवम् पूज्य पिता की विरासत सभालने वाले भाई अवनीश त्रिपाठी जी को हार्दिक बधाई।
    प्रथम गीत में प्राकृतिक बिम्बों के माध्यम से आज की सामाजिक स्थिति को प्रतिबिम्बित किया गया है, जो एक समर्थ रचनाकार से ही सम्भव है।आधुनिकता के चलन ने पुराने प्रतीकों, रिवाजों, लोगों को जिस तरह उपेक्षित कर दिया है उसका दर्द दूसरे गीत में साकार होता है। " हमने कितने नाटक खेले " रचना में वर्तमान जीवन शैली को ही एक नाटक की तरह बताया गया है जिसके अनुसार जो दिखाई देता है वह सच नहीं होता, रचनाकार का यह प्रयोग सच्चाई से युक्त है।आज मानवीय संवेदनाएं क्षीण होती जा रही हैं , जिसको " खीचने आया समय तस्वीर" गीत के माध्यम से निरूपित किया है। " अंधकार सोया है " तथा "सपनों का गांव" रचनायें आम आदमी से जुड़ीं विषम परिस्थितियों को उकेरती हैं। " नेह के खनके बाजूबन्द " गीत में प्रकृति को साथ लेकर नायिका के जागते प्रेम को सुन्दर वर्णित किया है।
     कविहृदय कीर्तिशेष त्रिपाठी जी को श्रद्धा पुष्प अर्पित करते हुए नमन करता हूँ--------राम नरेश रमन मोठ(झाँसी)

[12/4, 9:42 PM] जीतेन्द्र प्रसाद माथुर:---------
          आदरणीय रामानुज त्रिपाठी जी की आठ रचनाये पढ़ने के बाद लगा, अभी मन नहीँ भरा कुछ और होना ही चाहिए ।।
      आपका ये सार्थक प्रयास
वास्तव में तारीफ़े क़ाबिल है ।।
बह के खनके बाजूबन्द रचना में जहां सौन्दर्यबोध के साथ मोहक भावों को सहज शब्दों में पिरोया गया है वहीँ त्रिपाठी जी ने नया अनुच्छेद में प्राकट्य मनः स्थिति से प्रकृति भावों को एक चित्र की भांति क़लम से उभरने की कोशिश की है।। सपनो के गाँव में जिद्दी सम्बोधन विशेषरूप से मन को भा गया ।। अन्धकार सोया है जैसी रचनाएं रचना हर किसी के बस की बात नहीँ है इस रचना ने सही मानिये मुझे निःशब्द कर दिया ।।
     रचनाकर ने चुन चुन कर भावों को अपनी क़लम से कलमबद्ध किया है इसमें शक़ नहीँ है हर रचना प्यारी और मोहक है, अब बताइये इन रचनाओं पर क्या टिप्पणी की जाये --------डॉ.जितेन्द्र प्रसाद माथुर।।

[12/5, 10:36 AM] डॉ श्याम सिरोठिया:-------
          मित्रो
सम्मानीय स्व.श्री रामानुज त्रिपाठी जी के गीतों को पढ़कर साहित्यिक तृप्ति का अनुभव होता है।
भाव,भाषा,और शिल्प के अनुपम शिल्पी,स्व, त्रिपाठी जी के नव गीत पढ़कर यह कहा जा सकता है कि वह सामाजिक सरोकारों के रचनाकार  थे। वह प्रकृति और मनुष्य के बीच सशक्त तादम्य स्थापित करने का कौशल रखते थे।
'हमने कितने नाटक खेले ",रचना छल के सामाजिक रूपान्तर की बानगी है।
"खीचने आया समय तस्वीर", "अंधकार सोया है," 'सपनों का गाँव" ,आदि रचनाएँ समाज के संघर्षों को झेलते आम आदमी की जीवटता की आवाज हैं।
"नेह के खनके बाजूबंद "प्रेम के शास्वत स्वरुप की सहज अभिव्यक्ति हैं।

ऐसे रचनाकार का हमारे बीच से चला जाना साहित्य में शून्यता उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त है,लेकिन उनका रचना कोष  इस रिक्तता को भरने में सक्षम है।
मेरी विनम्र श्रद्धांजलि।
स्व,त्रिपाठी जी की रचनाओं को हम तक पहुँचाने के लिए
आद, भाई रामकिशोर दाहिया जी को साधुवाद---------डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया

[12/5, 11:15 AM] शशि पुरवार जी:-------
             सर्वप्रथम हमारी विरासत को नमन। श्री रामानुज त्रिपाठी जी के गीतों को पटल पर लाने के लिए आ. दहिया जी को सादर धन्यवाद , कल से इन गीतों का बारम्बार पढ़ रही हूँ किन्तु  क्षुधा शांत ही नहीं हो रही है । अध्बुद्ध  अनुपम जैसे एक एक गीत नगीने में जड़ा हुआ हीरा हैं प्रकाश जी व दहिया जी से सहमत हूँ पाठकों के लिए एक नया आकाश खोलतें है, नए नए बिम्ब, हृदयस्पर्शी संवेदना, गेयता, एक नयी उड़ान , समय के साथ चलते गीत, उनके सभी गीत बहुत अच्छे लगे।   निःशब्द हूँ सभी अनुभूति को बारम्बार महसूस कर रही हूँ। नवगीत गीत की  विरासत के किर्तिशेष रामानुज त्रिपाठी जी को नमन , मैं इन गीतों को सहेज रहीं हूँ , पुनः आ. दाहिया जी व अविनाश त्रिपाठी जी को हार्दिक बधाई।  मैं उनके अन्य गीतों को भी पढ़ना चाहती हूँ। कलम को नमन। सादर - -----शशि पुरवार।

[12/5, 1:18 PM] जय प्रकाश श्रीवास्तव जी:---------
       आ.रामानुज जी के नवगीत गहरे सामाजिक की उत्कृष्टता को तो जीते ही है नव्यता के उजले प्रतिमान भी स्थापित करते हैं युगबोध नवीन बिंब नये प्रतीकों से सजे सभी गीत आंचलिकता के साथ भाषा के सौष्ठव रूप को भी सहजता के साथ लेकर चलते हैं उनके गीत आज की युवा पीढ़ी ही नही हम जैसों के लिए प्रेरणा का कार्य करेंगे इन्ही शब्दों के साथ मैं अपनी विनम्र श्रद्धांजलि उन्हे अर्पित करता हूं और दाहिया जी का ह्रदय से धन्यवाद करता हूं।------जयप्रकाश श्रीवास्तव

[12/5, 2:13 PM] रंजना गुप्ता जी लखनऊ:-------
          रामानुज जी के गीत.. भाव संवाहक ..सहज..सामाजिक सरोकार से अनुबंधित ..से लगे...उनके सरस गीतों को पढ़ कर कौन सहृदय अभिभूत नहीं होगा..?
सादर ..अभिनंदन ..प्रणाम उनकी लेखनी को
वे युग बोध को अपने समय में ही नहीं ..
वरन आज के समय को भी भविष्य द्रष्टा की तरह जीवंत कर गये ----- रंजना गुप्ता

[12/5, 4:05 PM] विनय भदौरिया:-----
        विरासत के अन्तर्गत  मेरे चहेते श्रेष्ठ नवगीत कवि स्मृतिशेष रामानुज त्रिपाठी के नवगीत प्रस्तुत करने के लिए प्रथमतः आदरणीय दाहिया जी को हार्दिक धन्यवाद।श्रदेय त्रिपाठी जी भाषा, शिल्प, बिम्ब व प्रतीकों के प्रयोग मेंसर्वथा अनूठे रहे हैं। विषय वस्तु के चयन मे सजगता तथा निर्वहन मे नवता उनकी विशेषता थी।अनूठे प्रयोगों के द्वारा नवगीत को एक विशिष्ट आयाम देने का प्रयास किया।
आसपास  से लेकर वैश्विक परिवर्तनों पर उनकी  पैनी दृष्टि रही है तथा सूक्ष्म अन्वेषण के पश्चात  ही अनूभत अनुभूतियों  की अभिव्यक्ति उनके नवगीतो मे हुई है। पहले गीत में विसंगतियों को  बिम्बो के माध्यम से सार्थक अभिव्यक्ति मिली हैः
रोशनी का
एक सोया
शहर चुपके लूटकर।
****************
लौट आया है
अँधेरा है
कैद से फिर छूट कर।
     किन्तु कवि इन विसंगतियों के मध्य भी आशा की किरन संचरित करने हेतु प्रयास रत है
अन्धे के हाथों में  गई व्यवस्था जो पंगु हो चुकी है से कवि निराश नहीं है।
जिन्दगी भर
नेह से
जिसको भरा
सुप्त दीपक को
जगा देना जरा

कभी आकर
अपाहिज
अंधा अँधेरा
रोशनी के जिस्म
को शायद टटोले
अन्त में यह कहना चाहूँगा कि त्रिपाठी जी ने जीवन के विभिन्न आयामों को अपने नवगीतों  मे  अभिव्यक्त किया है ऐसे श्रेष्ठ सर्जक को शतशः
नमन।साथ ही अवनीश त्रिपाठी जी को हार्दिक साधुवाद व आशीर्वाद जो "
बाढहि पूत पिता के धर्मा "
कहावत को चरितार्थ कर श्रेष्ठ सृजन के माध्यम से हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने में संलग्न हैं।
विनय भदौरिया

[12/5, 5:50 PM] मुकुट सक्सेना जी:------
            ढह गया है धूप का एक
खण्डहर टूट कर.. कैसी विलक्षण परिकल्पना है।खण्डहर तो स्वयं एक स्वरूप की टूटकर गिरी हुई स्थिति  का द्योतक  है।किंतु रामानुज शेष रहे अवशेष में संवेदना स्पंदन महसूस करते हुए विसंगतियों  को  ऐसे लक्षित करते है कि गीत के सभी
बन्दों  में एक  अव्यक्त पीड़ा के वशीभूत परिभ्र्मणाधींन जाने क्या तलाशते हुए आकुल लगते है। ऐसी आकुल व्याकुल भावनात्मक स्थिति में तार्किकता बौनी लगने लगती है।
कोन सांकल खटखटाये ,, में मुझे  शे ली याद आये जिन्हों ने कहा था,,आवर स्विटेस्ट सोंगस आर  दोज़ डेट टेल्स अबाउट दी सेडेस्ट थॉट्स।,, सुंदर गीत के लिए  बधाई।
आदर नीय दाहिया जी द्वारा रामानुज जी के रचनाकर्म से साक क्षात्कार करने पर मुझे ऐसा लग रहा है कि वे अभी भी जीवित ही नहीँ, जीवन्त हैं हमारे  समक्ष अपनी रचनाओं और अवनीश जी की धमनियों शिराओं  में।
रामानुज जी के प्रति मेरा नमन तथा दा हिया जी,अवनीश जी के प्रति साधुवाद।
मुकुट सक्सेना जयपुर

[12/5, 6:35 PM] विजय बागरी जी:------
         कालजयी रचनाओं के प्रणेता लोकधर्मी अस्मिता के सशक्त हस्ताक्षर प्रेम,करुणा, रागात्मकता, संस्कृति और संवेदना की छांदस अभिव्यक्ति के ज्वलंत प्रतीक, कीर्ति शेष रामानुज त्रिपाठी जी की काव्य धारा का अवगाहन, सौभाग्य की बात है।
           उनकी अनूठी मर्मस्पर्शी रचना शैली निस्संदेह हिंदी साहित्य की गरिमामयी धरोहर है। इस अद्वितीय सारस्वत विरासत को मेरा कोटि-कोटि नमन। आदरनीय दाहिया जी को इस प्रस्तुति के लिए हृदय से साधुवाद।
                            विजय बागरी

[12/5, 7:06 PM] विजय प्रकाश भरद्वाज:-----
       श्रद्धेय रामानुज त्रिपाठी जी के विषय में बहुत कुछ पढ़ा सुना था किंतु आज उन्हें विशेषांक में विधिवत रूप से समझने का एक श्रेष्ठ अवसर मिला जिसके लिए साधुवाद आदरणीय रामकिशोर दाहिया जी के हिस्से में जाता है।निश्चय ही अग्रज बंधु आदरणीय अवनीश त्रिपाठी जी को विगत जन्म का पुण्य फला होगा जो साहित्य के ऐसे महामनीषी और शब्दसर्जना के शिखरपुरुष को पिता रूप में पाया उन्होंने।उन्हें अशेष बधाइयाँ।साथ ही नवगीत के महान शिल्पी श्रद्धेय स्व त्रिपाठी जी की स्मृतिशेष को मेरा विनत अभिनन्दन।
       प्रस्तुत विशेषांक के सभी आठों नवगीत विलक्षण तो हैं साथ ही स्वयं में नवगीत के लिए एक आदर्श मापनी भी हैं जिस पर भावी पीढियां सदियों तक अपने लेखन को माप सकती हैं।
      पहले नवगीत का मुखड़ा ही संप्रेषण शब्दकौशल और साहित्य-चेतना का संगम प्रतीत होता है।

ढह
गया है धूप का
एक खँडहर टूट कर।

भावव्यंजना की गहराई और संवेदना की सिद्ध मारकता ही है जो पूरे नवगीत का सारसूत्र इन पंक्तियों में गुँथा हुआ प्रतीत होता है। मुखड़े के प्रवाह में कहीं कुछ छूटा हुआ अवश्य लगता है हो सकता है अंकन की कोई त्रुटि रही हो क्योंकि जिस मापनी पर बंधांत हैं उस पर यह मुखड़ा कुछ इस तरह अधिक सटीक प्रतीत होता है कि

ढह
गया है धूप का
हर एक खँडहर टूट कर।

इसी नवगीत की योजना में आगे कुछ ऐसे अद्भुत प्रतीक हैं जो कल्पना लोक में नया संसार सा बसा देते हैं यथा रोशनी के सोये हुए शहर को चुपके से लूट ले जाना या क्षितिज की पगडंडियों से कुहासे का दूर भागे जाना या फिर नदिया का पुल पर बेहोश पड़े रहना आदि। इस नवगीत की एक पृथक विशेषता यह है कि इसमें नकारात्मकता से सकारात्मकता तक की अश्रम-यात्रा जारी है। मानवीकरण अलंकार भी इसे इस श्रृंखला के अन्य नवगीतों की तरह स्वतःसजीव बना दे रहा है।
      नवगीत 2 में "कौन सांकल खटखटाये" की उक्ति जीवन की उसी युक्ति को तलाशती प्रतीत होती है जहाँ विद्रूप व्यवस्थाओं के प्रति 'बिल्ली के गले में कौन घंटी बांधे' वाली विवशता ज़हन में कौंधती है। यह नवगीत के बड़ा उदाहरण है किसी भी नौजवान साहित्यकार के लिए जिससे उसे पता चले कि भाषा का मौलिक मुहावरा कैसे गढ़ा जाता है।

कहो कैसे !
खूँटियों पर टाँग दें...
फट गए हैं
हसरतों से भरे झोले।
 
भाषा का एक अद्भुत और निर्वाचीन सौंदर्य शब्दों की खिड़की से झाँक रहा है यहाँ जहाँ नवीनता भी है और परंपरा का निर्वाह भी।अपाहिज अँधेरे से रोशनी के जिस्म को टटोलने की आशा बांधना वाक़ई अँधेरे कुएं में प्रकाश की रेखा को खोजने का सबल साहित्यिक उपक्रम है जिससे सदियों के कलम की कुदाली साधती आयी है मगर यहाँ कहन का तरीका नया है।बाकी इस नवगीत में भी कहने समझने को बहुत कुछ मिलता ही है।प्रतीक योजना भी हमेशा की तरह ही ...लाज़वाब !!
      नवगीत 3 में समय के कैमरे से जिंतनी सारी तस्वीरें आदरणीय त्रिपाठी जी खींचते हैं वे सब युगबोध से परे हाशिये पर पड़े उस महामानव की पीड़ा की झलकियां हैं जिन्हें खींचते खींचते स्वयं समय की आँख भी अक्सर रोई है।
       नवगीत 4 नवगीतकार का स्वयं एक परिपक्व संवेदना से साक्षात्कार सा जान पड़ता है।

कैसे चलें
चरण चिह्नों पर
डरे डरे हम आज अकेले।

निश्चय ही अनिर्वचनीय संवेदना भरी है इन पंक्तियों में।
         नवगीत 5 भी कथ्य और भाव के स्तर पर अपना प्रथक प्रभाव छोड़ता है।
         नवगीत 6 को पढ़कर नवगीतकार की प्रतीक योजना की जिस सामर्थ्य से परिचय होता है वह साहित्य में उन्हें शीर्षस्थ प्रमाणित करती है।

ईंगुर सी
धूप और
काजल सी छाँव ....

अद्भुत ! अद्भुत ! मौलिक प्रतीकात्मकता का अन्यत्र दुर्लभ उदाहरण। यही नही पूरा नवगीत एक मास्टरपीस है स्वयं में। और इसी परंपरा का निर्वाह करता नवगीत 7 भी। कथ्य की मारकता के स्तर पर बिलकुल इसके बगल बैठा हुआ।
       श्रृंखला के अंतिम नवगीत में प्राञ्चल-प्रांजल-भाषा का अपना अलग स्वाद आ घुला है जैसे सोंठ का बताशा। इस नवगीत के प्रथम बन्ध में किसी कारणवश (शायद लिपिकीय त्रुटि यहाँ भी रही हो)हल्का लयभंग द्रष्टव्य अवश्य हुआ है किंतु अंत तक पूरा नवगीत रसराज श्रृंगार की जिस रतिप्रियता के साथ व्याख्या करता है उससे सिद्ध होता है कि काव्य में जिसने श्रृंगार साध लिया , मानो सब साध लिया।एक एक पंक्ति की गीतोक्ति हो मानो।
       अन्त में यही कहा जा सकता है कि सम्पूर्ण श्रृंखला श्रद्धेय त्रिपाठी जी का साहित्य के लिए दिया गया वह रक्तपरिश्रम है जो साहित्यलोक की जड़ों को दूर तक सींचता रहेगा।सहज बोलचाल की भाषा ,उर्दूमिश्रित शब्दावली और ग़ज़ल की कहन जैसा सलीका अंततः नवगीतों में ऐसा माधुर्य पैदा करते हैं जो पाठक को शब्दशक्ति और अर्थोपादेयता तक की यात्रा को अधिक सहज कर देता है।
      मैं आदरणीय रामकिशोर दाहिया जी को पुनः साधुवाद देता हूँ उनके समवेत परिश्रम और गीत नवगीत की इस तरह उत्कृष्ट सेवाभावना के संपादन लिए।श्रद्धेय स्वर्गीय रामानुज त्रिपाठी जी की स्मृतिशेष को नमन वंदन अभिनन्दन ।आपने निश्चय ही शब्दों का एक ऐसा स्वर्ग पन्नों पर छोड़ा है जो आपको सदैव जीवित रखेगा साहित्य की दुनिया में... ऐसा मेरा विश्वास है ! सादर-----------------  विजय प्रकाश भारद्वाज,इगलास ,अलीगढ ( उत्तर-प्रदेश )

[12/5, 8:12 PM] मोहन भारतीय:-------
     श्रध्देय रामानुज त्रिपाठी जी
को मैं पढ़ता रहा हूं। अपनी
गीत यात्रा के  शुरुआत में
उनके जैसा लिखने की कोशिश करता था। इस
लिहाज से वे मेरे आदर्श जैसे
ही हैं।उन की गीत यात्रा की तरह मेरी यात्रा भी पारम्परिक गीतों से आधुनिक गीतों की यात्रा
रही है।
उनके गीतों मै भाषा का सौंदर्य और प्रतीकों कासहज
सटीक प्रयोग गीतों में मोर
मुकुट बन कर छाया रहता
है।
गीतों में सादगी भरी तल्लीनता  और नैसर्गिक
अभिव्यक्ति गीतों को प्रभावी
बनाती है। उन की गीत साधना को नमन करता हूं..

[12/6, 10:11 AM] रामबाबू रस्तोगी जी:----
स्व. रामानुज त्रिपाठी जी के नवगीत उनके व्यक्त्तित्व एवं उनके रचनाकर्म का प्रमाण हैं | वे सदैव बड़ा कैनवस लेकर चलते थे और उस पर बड़ी शालीनतापूर्वक शब्दों से पेंटिंग करते थे |

ढह
गया है धूप का
एक खंडहर टूट कर
-----------------------------------
कहो कैसे
खूँटियों पर टाँग दें
फट गये हैं
हसरतों से भरे झोले
-----------
अभी जो थी
एक ऋजु रेखा सहज सी
हो गई है आज
वक्र लकीर जैसी
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पहले नवगीत से अंतिम तक उनका शब्द - संसार कहीं बाधित नहीं होता | युगबोध से लेकर अंतिम श्रृंगारिक कल्पना तक उनकी रास कहीं ढीली नहीं पड़ती | उनके नवगीतों की ख़ास बात यह है कि उनका भावनात्मक संसार कहीं विश्रंखल नहीं होता |
वे अपने जीवन में भी ऐसे ही थे |
मेरी उनसे कई मुलाकातें हुई थीं | वे अपने नवगीतों की तरह ही सहज और सरल थे |
माटी की गंध को सहेज कर रखने वाले स्व. रामानुज जी की बिंब - विधान अभूतपूर्व है | सीधे- शब्द , सीधी - बात जो दिल में उतरती चली जाती है |
ईँगुर सी
धूप और
काजल सी छाँव
एक प्यास
लूट गई
सपनों का गाँव |
-------------+-

कच्ची उमर
खिली निशिगंधा
रह रह चुये मरंद
नेह के खनकें बाजूबंद
-----------------
अद्भुत -
मैं उनके सुयोग्य पुत्र बहुत अच्छे साहित्यकार श्री अवनीश त्रिपाठी के प्रति उनकी रचनायें उपलब्ध कराने के लिये कृतज्ञता प्रकट करता हूँ |

[12/6, 1:16 PM] संजय प्रधान:--------
      श्रद्धेय त्रिपाठी जी के सभी नवगीतों में  प्रतीकात्मक उदाहरण सबसे अलग सौंदर्य है।
नवगीत में सहज बोलचाल की भाषा नें माधुर्य को जैसे जीवित कर दिया है ।
सादर नमन....संजय प्रधान , वाराणसी

[12/6, 11:19 PM] मुकेश त्रिपाठी:--------
          संवेदनात्मक आलोक मंच पटल पर स्मृतिशेष कवि स्व• रामानुज त्रिपाठी जी के नवगीत प्रस्तुत करने हेतु आदरणीय दाहिया जी का आभार। मुझे अच्छी तरह याद है जब मैंने सन 2001 में लिखने की शुरुवात की थी, उस समय आदरणीय त्रिपाठी जी के दोहे/गीत तथा अन्य विधाओं की रचनाएं नवनीत जैसी श्रेष्ठ अनेक साहित्यिक पत्रिकाओं में पढ़कर मैं उनके करीब आता जा रहा था। अनेक बार उनसे पत्राचार भी हुआ है, मुझे याद है मेरे हर पत्र का उत्तर वे अवश्य दिया करते थे,मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ की मुझे उनका स्नेह मिला है। आज उनके नवगीत पढ़कर बहुत अच्छा लगा। कीर्तिशेष कवि और उनके श्रेष्ठ साहित्य को नमन।
------------- मुकेश त्रिपाठी

[12/7, 1:19 AM] संध्या सिंह जी:-----
          आज पटल पर कीर्तिशेष श्रद्धेय रामानुज त्रिपाठी जी के गीत सुशोभित हैं l मैं सौभाग्यशाली हूं कि उनके गीत संग्रह "यादों का चंदनवन " के विमोचन मे मैं भी शामिल थी और जिसे प्रकाश मे लाने का श्रेय उनके सुपुत्र श्री अवनीश त्रिपाठी जी को है l रामानुज त्रिपाठी जी के गीत प्रकृति के अनूठे प्रयोग से सुसज्जित हैं l उनका पहला  गीत 'धूप के खंडहर ' मे उन्होने  विस्मित करने वाले अंदाज़ मे संध्या समय को चित्रित किया है l एक एक अन्तरा त्रासदी को मर्मबेधी तरीके से प्रस्तुत करता है l " कौन सांकल खटखटाये " , "हमने कितने नाटक खेले " , ' अंधकार सोया है ' ये सभी गीत विषम परिस्थितियों और सामाजिक कमज़ोरियों को सशक्त शब्दों मे और प्रभावशाली बिम्बों के माध्यम से लय और ताल को बरकरार रखते हुए पाठक के दिल मे जगह बनाते हैं l " सपनों का गांव ' गीत मे ' एक प्यास लूट गयी सपनों का गांव ' कितने सशक्त शब्दों मे विडम्बना को  चित्रित किया है l नेह के खनके बाजू बंद एक  मधुर और नशीला श्रन्गार रस से सराबोर गीत विविधता को आयाम देता हुआ  l उनका अंतिम गीत ' नया अनुच्छेद' अपने शिल्प और कहन से चकित करता है l अंत मे रामानुज जी को प्रणाम करते हुए यही कहून्गी इतने अनमोल गीतों के रचियता का इतनी जल्दी दुनिया से विदा लेना एक बडी साहित्यिक क्षति है l अंत मे उन्हे प्रणाम करते हुए और अवनीश जी का आभार प्रकट करते हुए आदरणीय राम किशोर दाहिया जी को को भी नवगीत के क्षेत्र मे साहित्यिक योगदान के लिये साधुवाद देती हूं l ---------- संध्या सिंह , लखनऊ

[12/7, 10:13 AM] गणेश गम्भीर जी:---
      आदरणीय रामानुज जी के नवगीत नवगीत के वैभव पूर्ण इतिहास के संग्रहणीय पृष्ठ  हैं।गीत प्रस्तुत करने के लिए हार्दिक धन्यवाद ।इन गीतों की रचना -भूमि संस्कृति का अद्यतन विकास है और नयी आलोचना -दृष्टि की आग्रही भी ।दरअसल प्रचलित आलोचना - पद्धति के तर्क - आयुध बेकार हो चुके हैं।

[12/7, 1:38 PM] डॉ सुभाष वशिष्ठ:---

समूह के रविवारीय विशेषांक के सन्दर्भ में,सर्वप्रथम श्री दाहिया जी को बहुत धन्यवाद कि उन्होंने कीर्तिशेष श्री रामानुज त्रिपाठी जी के नवगीत समूह पटल पर चर्चार्थ प्रस्तुत किये।
संस्कारशील व सदाशय व्यक्तित्व व अच्छे गीतकार श्री अवनीश जी सौभाग्यशाली हैं जिनके श्री रामानुज त्रिपाठी जी जैसे गीत-व्यक्तित्व पिता थे।अवनीश जी को शुभेषणा! 
समूह पटल पर गीतों के प्रकाशन के उपक्रम के दौरान श्री दाहिया जी के माध्यम से,मुझे श्री रामानुज जी के कई गीतों को पढ़ने का सौभाग्य मिला।फिर पटल पर गीत पढ़े।
मुझे सभी गीत अच्छे लगे।श्रेष्ठ के आस-पास।
कविता,बात के सीधे कथन से इस अर्थ में भिन्न होती है कि उसकी अभिव्यक्ति प्रत्यक्ष नहीं अप्रत्यक्ष होती है।
उपर्युक्त के सन्दर्भ में श्री त्रिपाठी जी की अभिव्यक्ति सर्वत्र अप्रत्यक्ष है।वह एकदम सरल नहीं है,हाँ संश्लिष्ट भी नहीं है।परन्तु अपने मन्तव्यों को प्रभावी ढंग से व्यक्त करने में पूर्णतः सक्षम है।
छन्द ,कथ्य की आवश्यकता/अपेक्षा के अनुसार आकार ग्रहण करते हैं।
बिम्ब सुस्पष्ट व सजीव हैं।
प्रकृति तथा उसके उपांगों का,मानवीकरण के माध्यम से ,बड़ा सधा हुआ तथा सार्थक प्रयोग दृष्टिगोचर होता है।
बाह्य जगत्,उसके मानस, उसके आचरण तथा परिणामस्वरूप व्यक्ति पर पड़ने वाले अच्छे-बुरे प्रभावों को श्री त्रिपाठी जी एक अन्तर्यात्रा के बतौर अहसास के स्तर पर जीते हैं और उसी अन्तर्यात्रा के साथ उसको,अहसास के तापमान के अनुसार तलाशे गये अथवा स्वतः रचना-प्रक्रिया के दौरान उभर आये,सटीक व प्रभावी शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं।
श्री त्रिपाठी जी अभिव्यक्ति कौशल के बेहतरीन नवगीतकार हैं।
कथ्य की दृष्टि से उनके सरोकार,सार्वजनीन हैं।कुछ सीमा तक कुछ गीतों के लिए दीर्घकालिक भी कहा जा सकता है।
अन्धकार व प्रकाश उनका प्रिय विषय-बिन्दु है,जो,श्रेय के स्तर पर लगभग सर्वत्र रेखांकित है। 
कुल मिलाकर प्रस्तुत सभी 
गीत अच्छे हैं। 
कीर्तिशेष श्री  रामानुज त्रिपाठी जी को सादर नमन!
- डॅा० सुभाष वसिष्ठ  , नई दिल्ली।