साहित्य एक विशद अनुभूति है और वह अनुभूति मानव मन में बसी है.....आइए महसूस करें उस अनुभूति को....😊
गुरुवार, 1 जुलाई 2021
सुल्तानपुर उत्तर प्रदेश by राज खन्ना
शुक्रवार, 17 नवंबर 2017
कथा समवेत द्वारा आयोजित कथा साहित्य प्रतियोगिता में "मोरी साड़ी अनाड़ी न माने राजा" कहानी को मिला प्रथम स्थान
सुलतानपुर 08 नवम्बर।
माँ धनपती देवी स्मृति कथा साहित्य सम्मान 2017 के लिए "कथा समवेत" द्वारा आयोजित अखिल भारतीय हिंदी कहानी प्रतियोगिता का परिणाम घोषित करते हुए सम्पादक डॉ शोभनाथ शुक्ल ने समय से पूर्व परिणाम देने के लिए निर्णायक मण्डल के सम्मानित सदस्यों का आभार व्यक्त किया है।बकौल उनके इस वर्ष सौ से अधिक आई कहानियों का मूल्यांकन कार्य निश्चित रूप से निर्णायकों के लिए चुनौतीपूर्ण रहा है।अन्तिम चरण (द्वितीय चरण) में निर्णायक मण्डल में शामिल कथाकार मदन मोहन, गोरखपुर,उ.प्र., जमशेदपुर के कथाकार एवं उपन्यासकार जयनन्दन तथा झाँसी के प्रो. जगदीश खरे के मूल्यांकनोपरांत कहानी लेखिका सोनी पाण्डेय आजमगढ़ उ.प्र. की कहानी "मोरी साड़ी अनाड़ी न माने राजा" को प्रथम स्थान मिला है।होशंगाबाद के कहानीकार गोपाल नारायण आप्टे की कहानी "बुद्ध रिसॉर्ट" को द्वितीय स्थान तथा तृतीय स्थान कहानी "मकान", अरुण अर्णव खरे,भोपाल को मिला है।
इसके अतिरिक्त तीन कहानियों को विशेष प्रोत्साहन पुरस्कार के लिए चुना गया है। ये कहानियाँ ब्रह्मदत्त शर्मा,हरियाणा की "बुढ़ापे का एक दिन", भरचन्द्र शर्मा बांसवाड़ा की "आखिर कौन" तथा रश्मि शील लखनऊ की "समाधान" हैं।आयोजक डॉ शुक्ल ने प्रतियोगिता में प्रतिभाग करने के लिए समस्त रचनाकारों का अभिवादन करते हुए कहा कि लगभग सभी कहानियाँ अपने कलेवर में अच्छी रहीं और इस प्रतियोगिता को गौरवान्वित करती हैं।
राहुल सांकृत्यायन की धरती आजमगढ़ से जुड़ी हुई कथा लेखिका सोनी पाण्डेय अपनी रचनात्मक कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए हिंदी कथा साहित्य में अपना एक खास स्थान बना चुकी हैं।कथादेश, कथाक्रम,हस्ताक्षर,पाखी,साक्षात्कार,कृतिओर, नया ज्ञानोदय,आम आदमी, निकट,लमही, युद्धरत आदि प्रसिद्ध एवं श्रेष्ठ पत्रिकाओं में निरन्तर अपनी कहानियों के प्रकाशन से सांगोपांग उपस्थित हैं। "मोरी साड़ी अनाड़ी न माने राजा" कहानी समय,समाज और जीवन के अंतर्विरोधों की गहरी समझ और सरोकार के साथ यथार्थ की अभिव्यक्ति है।
इसी तरह "बुद्ध रिसॉर्ट" संश्लिष्ट शिल्प में रची हुई ऐसी कहानी है जो दुर्लभ शारीरिक भौतिक सुख की होड़ और दौड़ को एक नए ढंग से व्याख्यायित करती है।निर्वस्त्र अवस्था में स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों में जिस तरह संयम और व्यवहार में संतुलन स्थापित करती है कहानी,वह प्रशंसनीय है।
"मकान" कहानी अपने पूरे कलेवर में पिता को पूरे तौर पर पुत्र द्वारा नकारे जाने और बिना उनकी मर्जी के मकान बेच देने के लिए प्रापर्टी डीलर को बुला लेना..... निःसन्देह पिता के लिए इससे बड़ी उपेक्षा क्या हो सकती है।संपत्ति के प्रति अगाध प्रेम बुजुर्गों के प्रति अपमान और उपेक्षा आज समय और विकसित समाज की सबसे बड़ी सच्चाई है। अन्य कहानियां भी अपनी भाषा,कहन और प्रस्तुति में मानव मन को बहुत गहराई से छूती हैं।ये कहानियाँ सिर्फ अनुभवजन्य स्थितियों का ही विश्लेषण नहीं करतीं बल्कि वस्तुगत सन्दर्भों की व्याख्या में विश्वसनीयता भी हासिल करती हैं।
ध्यातव्य है कि उक्त "माँ धनपती देवी स्मृति कथा साहित्य सम्मान" को 2011 में पत्नी संगीता शुक्ला के विशेष आग्रह पर डॉ. शोभनाथ शुक्ल ने अपनी माँ की पुण्य स्मृति में आरम्भ किया था।यह कथा प्रतियोगिता मूल्यांकन में अपनी पारदर्शिता और ईमानदारी के चलते निरन्तर विस्तार पा रही है और सम्पूर्ण भारत के प्रान्तों/जनपदों के कहानीकारों की पसंद हो गई है।
प्रत्येक वर्ष 20 दिसम्बर को सम्मान समारोह और राष्ट्रीय कथा संगोष्ठी में भारी संख्या में पुरस्कृत रचनाकारों के अतिरिक्त निर्णायकों, लेखकों,आलोचकों की भागीदारी इसकी विशिष्टता है। 2011 से अब तक इस सम्मान से सम्मानित होनेवाले कहानीकारों में नदीम अहमद नदीम बीकानेर, शुभा श्रीवास्तव वाराणसी, प्रदीप कुमार शर्मा हिमाचल प्रदेश,वेद प्रकाश अमिताभ अलीगढ़, वासुदेव राँची, किशोर श्रीवास्तव दिल्ली, वीरेंद्र कुमार त्रिपाठी फैज़ाबाद, रूबी मोहन्ती दिल्ली, कमल कपूर हरियाणा, सेराज खान बातिश कोलकाता, विजय कुमार सिकंदराबाद, निरुपम मध्य प्रदेश, सैली बलजीत पठानकोट, अमिता दुबे लखनऊ, विजय चितौरी इलाहाबाद, अखिलेश पालरिया अजमेर, अश्विनी कुमार मानव पठानकोट, रेखा पाण्डेय जयपुर, अनूपमणि त्रिपाठी लखनऊ, प्रदीप उपाध्याय गोरखपुर तथा देवेंद्र कुमार मिश्र छिंदवाड़ा प्रमुख हैं।
वर्ष 2011 से 2015 तक पुरस्कृत 18 कहानियों का संग्रह "पाठक की लाठी", अंजुमन प्रकाशन इलाहाबाद से प्रकाशित भी हुआ है जो इस आयोजन का मुख्य हिस्सा भी है।
इस वर्ष 20 दिसम्बर को जिला पंचायत सभागार सुलतानपुर में आयोजित सम्मान समारोह और कथा संगोष्ठी में चयनित कहानीकारों को अंगवस्त्र, प्रमाणपत्र, स्मृतिचिह्न और नकद राशि से सम्मानित किया जाना है।दो सत्रों में बंटे इस आयोजन की आवाज कथा जगत की निष्क्रियता और सन्नाटे को निश्चित रूप से तोड़ती है। इस बार की कथा संगोष्ठी का विषय "समय, समाज और साहित्य पर सोशल मीडिया का हस्तक्षेप" रखा गया है। उम्मीद है कि इस ज्वलंत विषय को लेकर सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावों पर विस्तृत चर्चा के जरिये कुछ प्रभावकारी निष्कर्ष अवश्य ही निकलेगा।
डॉ शुक्ल ने इस प्रतियोगिता की आवाज दूर-दूर तक पहुंचाने तथा उसे व्यवस्थित कर अंतिम निर्णय तक ले जाने के लिए कहानीकार चित्रेश, श्यामनारायण श्रीवास्तव, बन्धु कुशावर्ती और अवनीश त्रिपाठी का विशेष आभार व्यक्त किया है।
शनिवार, 8 जुलाई 2017
सम्मान समारोह एवं साहित्यिक संगोष्ठी 2017 सुल्तानपुर उप्र
पंडित रामानुज त्रिपाठी सृजन संस्थान, गरएं,सुल्तानपुर,उप्र द्वारा कीर्तिशेष बालसाहित्यकार एवं गीतकार कवि रामानुज त्रिपाठी की 13वीं पुण्य तिथि पर 08 जुलाई 2017 को साहित्यकार सम्मान समारोह, पुस्तक लोकार्पण एवं विचार गोष्ठी का आयोजन जिला पंचायत सभागार, सुलतानपुर में किया गया| इस अवसर पर देश प्रदेश के कई साहित्यकार भाग लिए | सम्पूर्ण कार्यक्रम दो सत्रों में विभाजित था जिसमें पहला सत्र बाल साहित्य पर और दूसरा सत्र नवगीतों पर आधारित था| पहले सत्र में रामानुज त्रिपाठी के बालगीत संग्रह "जंगल का स्कूल" और मासिक पत्रिका "बालवाटिका" के जुलाई अंक का लोकार्पण और दूसरे सत्र में आद धीरज श्रीवास्तव जी एवं आदरेया डॉ मंजु श्रीवास्तव जी द्वारा सम्पादित गीत-संकलन "नेह के महावर" और बाबूजी रामानुज त्रिपाठी के नवगीत संग्रह "धुंए की टहनियां" का लोकार्पण हुआ| दोनों सत्रों के विचार पक्ष को विभिन्न साहित्यकारों ने सम्बोधित किया| दोनों सत्रों का कुशल संचालन युवा आलोचक एवं समीक्षक साहित्यकार ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह रवि जी ने किया।
प्रथम सत्र:-----------
संस्थान द्वारा आद0 डॉ.भैरूंलाल गर्ग, आद0 आद्या प्रसाद सिंह प्रदीप जी, आद बन्धु कुशावर्ती जी, आद श्याम नारायण श्रीवास्तव जी एवं आद0 फतह सिंह लोढ़ा जी को बाल साहित्य सम्मान 2017 से सम्मानित किया। बाल साहित्य की वर्तमान प्रासंगकिता पर बोलते हुये वरिष्ठ बालकथाकार दिनेश प्रताप सिंह चित्रेश का कहना था "आज हम बच्चों को शिक्षा देने और उसे प्रौढ़ बनाने के नाम पर अधिक से अधिक बोझ के नीचे दबा रहे हैं| यहाँ बच्चे बौद्धिक न होकर कुंठित होने लगते हैं| हमें बच्चों को इस कुंठा से बचाने के लिए बाल साहित्य से जोड़ना होगा| इसे स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि बाल साहित्य न के बराबर लिखे जा रहे हैं| घुमन्तू जातियों, दलितों और बंजारों पर तो लिखे ही नहीं जा रहें हैं| इसके लिए प्रत्येक प्रदेश सरकार को अपने अपने तरीके से प्रयत्न करना चाहिए| लखनऊ के आद बंधु कुशावर्ती का कहना था " रामानुज त्रिपाठी रामनरेश त्रिपाठी के बाद बाल साहित्य के इस जिले के बड़े महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे हैं|" डॉ० शोभनाथ शुक्लजी ने त्रिपाठी जी के बाल साहित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा "बाल साहित्य पढ़ते हुए मुझे हमेशा लगता है कि दो प्रकार के उद्देश्य होने चाहिए जिसमें पहला-बच्चों का मनोरंज करना और दूसरा ज्ञान देते हुए बच्चों को सचेत करना| रामानुज त्रिपाठी के बाल साहित्य की बड़ी विशेषता रही है कि वे मनोरंजन के साथ-साथ ज्ञान देते हुए सचेत भी करती हैं|" मुख्य अतिथि के रूप में बालवाटिका पत्रिका के संपादक डॉ० भैरूं लाल गर्ग जी ने संस्मरण साझा करते हुए कहा "रामानुज त्रिपाठी के बाल साहित्य से परिचय बालवाटिका पत्रिका से ही संभव हो सका| उनकी चिट्ठियां बड़े आदरपूर्ण और सम्मान से सुन्दर हस्तलिखित प्रारूप में आती थीं| मैं सहसा देखकर यह विश्वास कर बैठता था की यह किसी मेहनती रचनाकार का खत है और उसे बड़े मनोयोग से प्रकाशित करता था|" विशिष्ट अतिथि के रूप में राजस्थान के आद फतह सिंह लोढ़ा जी ने कहा "भारतवर्ष में अनेक लेखक थे, हैं और रहेंगे लेकिन पिता के साहित्य को आगे लाने वालों को उँगलियों पर गिना जा सकता है| रामानुज त्रिपाठी के साहित्य को जन-जन तक पहुंचाने में अवनीश त्रिपाठी का बड़ा योगदान रहा है इसीलिए वे बधाई के पात्र हैं|" प्रथम सत्र का अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए वरिष्ठ बाल एवं अवधी साहित्यकार आद्या प्रसाद सिंह 'प्रदीप' जी का कहना था कि "बाल साहित्य आज से नहीं आदि काल से रचा जा रहा है जिसे समृद्ध करने में रामानुज त्रिपाठी जी की बड़ी भूमिका रही है|"
द्वितीय सत्र:-------
आद ओम नीरव जी, डॉ सूर्यदीन यादव जी, आदरेया डॉ मंजु श्रीवास्तव जी, आदरणीय धीरज श्रीवास्तव जी को शॉल,पुष्पमाला एवं सम्मानपत्र देकर साहित्य सम्मान 2017 से सम्मानित किया गया।
समीक्षक एवं आलोचक सुरेश चंद्र शर्मा ने बाबूजी रामानुज त्रिपाठी जी के नवगीतों में मानवीय संवेदना के पक्ष को रखते हुए उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर प्रकाश डाला| चंडीगढ़ विश्वविद्यालय के शोधार्थी समीक्षक अनिल पाण्डेय ने कहा - "नवगीतों में आत्मकथ्य और मानवीय संवेदनाएं तलाशनी हों तो कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है,बस रामानुज जी के गीत पढ़ें।" वरिष्ठ साहित्यकार डा.सुशील कुमार पांडेय जी का कहना था "पंडित रामानुज त्रिपाठी जी प्राचीन परम्पराओं के पथ पर अग्रसर हैं| उनके नवगीत कल के प्रतीक पर आज की सच्चाई है| इस सत्र के मुख्य अतिथि कवितालोक लखनऊ के संस्थापक आदरणीय आचार्य ओम नीरव जी ने अपनी अभिव्यक्ति देते हुए कहा कि "नवगीत और बाल कविता में उनका स्वरुप अलग दिखता है| बच्चे के अंदर प्रवेश करना परमहंस हो जाना है| पंडित जी इसके अनुकरणीय उदहारण हैं| यह कार्यक्रम एक पुत्र द्वारा पिता जी को श्रद्धांजलि ही नहीं समाज पर भी एक उपकार है|" द्वितीय सत्र में विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर मंजू श्रीवास्तव रहीं और अध्यक्षता नाडियाड गुजरात के वरिष्ठ उपन्यासकार डॉ० सूर्यदीन यादव ने की| मंच का सञ्चालन युवा समीक्षक ज्ञानेन्द्र विक्रम सिंह रवि और सरस्वती वंदना करुणेश भट्ट ने किया| कार्यक्रम में आशुकवि आद मथुरा प्रसाद सिंह ' जटायु ' , डॉ० रामप्यारे प्रजापति, जगदीश प्रसाद श्रीवास्तव, डॉ० देवनारायण शर्मा, आद उमाशंकर शुक्ल जी, आद उमाकांत पांडेय जी, डॉ० ओंकार नाथ द्विवेदी, आद जयंत त्रिपाठी, डॉ० लक्ष्मण गाँधी, सुधा त्रिपाठी,आद वीरेंद्र कुमार त्रिपाठी जी,प्रीति त्रिपाठी,प्रशंसा शुक्ला,रचना शुक्ला, आदि प्रमुख रुप से उपस्थित रहे|
आभार ज्ञापन आयोजक के रूप में मैंने किया ।