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सोमवार, 8 अगस्त 2016

दिल को छूती राहुल द्विवेदी स्मित की ग़ज़ल

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रौशनी की जद से आगे तक गुजरता कौन है ।
तीरगी में मुँह छुपाये एक साया कौन है ।।
🍀🌿🍀🌿
इस सियासत के अजब किरदार होते हैं मियाँ ;
ये बताना है बहुत मुश्किल कि सच्चा कौन है ।
🐚🐝🐚🐝
रौशनी की चाह में तुमने जला दीं बस्तियाँ ;
फिर भी उस घर में दिया अक्सर जलाता कौन है ।
🌹🌿🌹🌿
चन्द एहसासों के सिक्के और कुछ सपने लिए ;
बूढ़े बरगद के हवाले से सिसकता कौन है ।
🍁🌲🍁🌲
अब तलक हैरान हूँ ख्वाबों से होकर रूबरू ;
इन निगाहों को खुदाया ख्वाब देता कौन है ।
🍀🍂🍀🍂
दौरे-रुक्सत में हुई है जिंदगी से आशिकी ;
देख कर मुझको न जाने मुस्कुराया कौन है ।
🌴🌾💐🌴

राहुल द्विवेदी 'स्मित'
इटौंजा, लखनऊ

गुरुवार, 28 जुलाई 2016

राहुल द्विवेदी स्मित का ओजपूर्ण गीत

          मैं भारत का अंगारा हूँ
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मैं भारत का अंगारा हूँ, आग लगाने आया हूँ ।
आतंकी अँधियारे को मैं, दूर भगाने आया हूँ ।।

सरहद की मिट्टी का चन्दन, इस माथे पर रहता है ।
देशप्रेम की लिए लालिमा, रक्त नसों में बहता है ।
स्वाभिमान की कीमत दुनिया, को दिखलाने आया हूँ...
आतंकी........।।

तुमने हाथ बढ़ाया हमने, उन हाथो को चूम लिया ।
लिए शांति का परचम हमने, रावलपिंडी घूम लिया ।
चले दोगले दाँव जो' तुमने , उन्हें मिटाने आया हूँ ...
आतंकी........।।

मैं गाली की भाषा में, अंगार नही लिख सकता हूँ ।
और दोगले गद्दारों को, प्यार नहीं लिख सकता हूँ ।
मैं हूँ सूर्यवंश का प्रहरी, आज बताने आया हूँ ।
आतंकी .......।।

अगर शान्ति के लिए शांति की, नदिया बनकर बहता हूँ ।
शीश काटने वालों का फिर, शीश काट भी सकता हूँ ।
दुश्मन को उसकी करनी का, सबक सिखाने आया हूँ ...
आतंकी............।।

बेगुनाह तुमने जो मारे, उनका दर्द भुला बैठे ।
हमने रावण मारे तो तुम, काला दिवस मना बैठे ।
पुनः विश्व में रामशक्ति की, झलक दिखाने आया हूँ.....
आतंकी..........।।
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राहुल द्विवेदी 'स्मित'
ग्राम-करौंदी, पोस्ट-इटौंजा,जनपद: लखनऊ (उत्तर प्रदेश) 226203
Whats App : 7499776241
ईमेल: asmitdwivedi01@gmail.com

बुधवार, 3 फ़रवरी 2016

राहुल द्विवेदी स्मित की ग़ज़ल

                     【ग़ज़ल】
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कौन सी मुश्किल है साहब आदमी के सामने ।
अब कोई  पत्थर नहीं है  इस नदी  के सामने ।।
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हौसलों से मात खाकर रुक गया है वक़्त भी ;
मौत भी  बेबस  खड़ी  है  ज़िन्दगी के सामने ।
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रौशनी  से  बेख़बर  गुमनाम  इक  इन्सान है ;
झुक गया था जो कभी ख़ुद तीरगी के सामने ।
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खुशनुमा अहसास ओढ़े दर्द पर हँसता हुआ ;
एक लम्हा  ही बहुत  है अब  सदी के सामने ।
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ग़म को खुशियों की तरह जीने का देखा जब हुनर,
नाखुदा  भी  हँस  पड़ा  ऐसी  ख़ुशी  के  सामने ।
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चाँद भी फीका पड़ा औ गुल भी' मुरझाने लगे ;
सब  हुए   कुर्बान  तेरी   सादगी  के   सामने ।
                        🍂🍂
वक़्ते-रुख़्सत  बारहा मुड़ मुड़ के तेरा देखना ;
रो पड़े पत्थर भी' आँखों की नमी के सामने ।
                       🍂🍂
इश्क के इक जाम ने मदहोश इतना कर दिया ;
कुछ नहीं महफ़िल का जादू बेखुदी के सामने ।
                       🍂🍂
आँख दिखलाने लगे हैं खार भी अब शाख को ;
और मुश्किल आ पड़ी है हर कली के सामने ।

                                 -------राहुल द्विवेदी 'स्मित'